श्लोक:
तस्याः किञ्चित् करधृतमिव प्राप्तवानीरशाखं हत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोधोनितम्बम्। प्रस्थानं ते कथमपि सखे लम्बमानस्य भावि ज्ञातास्वादो विवृतजघनां को विहातुं समर्थः॥४१॥
शब्दार्थ एवं अन्वय (भावार्थ हेतु):
- हे सखे! (हे मित्र मेघ!)
- प्राप्तवानीरशाखम्: वानीर (वेत) की शाखाओं को स्पर्श करने वाली।
- किञ्चित् करधृतमिव: मानो तुम्हारे हाथ में (पकड़ी गई) हो।
- नीलं सलिलवसनं: नीले जल रूपी वस्त्र।
- मुक्तरोधोनितम्बम्: तट रूपी नितम्बों को मुक्त करने वाली।
- ज्ञातास्वादः: जिसका आनंद चख लिया गया हो।
- विवृतजघनां: प्रकट नितम्बों वाली (नदी)।
- विहातुम् समर्थः: छोड़ने में कौन समर्थ है?
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास ने इस श्लोक में एक अत्यंत कामुक और सुंदर दृश्य की रचना की है:
- नदी का मानवीकरण: यक्ष कहता है कि हे मित्र मेघ! वह नदी (निर्विन्ध्या) अपने तटों को छोड़कर आगे बढ़ रही है, मानो उसने अपने नीले जल रूपी वस्त्र को ढीला कर दिया हो और उसके तट उसके नितम्बों की तरह प्रकट हो गए हों।
- मेघ का हाथ: नदी की वानीर (वेत) की शाखाएं झुककर तुम्हारे हाथ को छू रही हैं, मानो वह नदी लज्जा के साथ अपने वस्त्र को थामे हुए तुमसे प्रार्थना कर रही हो।
- प्रस्थान की कठिनाई: यक्ष पूछता है कि ऐसी सुंदर और प्रेममयी स्थिति में, जब तुमने उसके जल का आनंद चख लिया है, तो भला यहाँ से आगे बढ़ने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात, इस नदी का सौंदर्य इतना मोहक है कि इसे छोड़कर जाना बहुत कठिन है।
यह श्लोक महाकवि कालिदास द्वारा विरचित ‘मेघदूतम्’ (पूर्वमेघ) का 42वाँ श्लोक है। इसमें यक्ष मेघ को उस मार्ग के बारे में बता रहा है जहाँ से उसे गुजरना है, जिसमें एक पर्वत का वर्णन है।
श्लोक:
त्वन्निष्पन्दोच्छ्वसितवसुधागन्धसम्पर्करम्यः स्रोतोऽभ्यध्वनितसुभगं दन्तिभिः पीयमानः। नीचैर्वास्यत्युपजिगमिषोर्देवपूर्वं गिरिं ते शीतो वायुः परिणमयिता काननोदुम्बराणाम्॥४२॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- त्वन्निष्पन्दोच्छ्वसितवसुधागन्धसम्पर्करम्यः: तुम्हारे (मेघ के) आने से पृथ्वी जो तृप्त होकर सांस ले रही है, उसकी सुगंध से युक्त वायु।
- स्रोतोऽभ्यध्वनितसुभगं: झरनों की ध्वनि से सुहावना।
- दन्तिभिः पीयमानः: हाथियों द्वारा पिया जा रहा (जल)।
- देवपूर्वं गिरिं: देवगिरि पर्वत की ओर।
- उपजिगमिषोः: जाने के इच्छुक तुम्हारे।
- नीचैः वास्यति: नीचे से बहेगी।
- शीतो वायुः: ठंडी हवा।
- परिणमयिता काननोदुम्बराणाम्: जो जंगली गूलर (उदुम्बर) के फलों को पकाने वाली है।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ प्रकृति के एक शांत और शीतल दृश्य का चित्रण कर रहे हैं:
- पृथ्वी की सुगंध: जब तुम (मेघ) आकाश में होगे, तो तुम्हारी वर्षा से पृथ्वी तृप्त हो जाएगी और उसकी भीनी-भीनी सुगंध से युक्त शीतल वायु बहेगी।
- पर्वत का दृश्य: तुम जिस ‘देवगिरि’ पर्वत की ओर बढ़ रहे हो, वहाँ के झरनों की आवाज़ बहुत मधुर है और वहाँ के जल को हाथी पी रहे हैं।
- शीतल पवन: उस देवगिरि पर्वत पर बहने वाली ठंडी हवा बहुत सुखद है, जो वहाँ के जंगली गूलर (उदुम्बर) के फलों को पका देती है।
- मेघ को संदेश: यक्ष मेघ से कहता है कि यह ठंडी हवा तुम्हारे मार्ग में नीचे से बहेगी, जो तुम्हारी यात्रा को और अधिक सुखद बना देगी।
श्लोक:
व्रज स्कन्दं नियतवसतिं पुष्पमेधीकृतात्मा पुष्पासारैः स्नपयतु भवान् व्योमगङ्गाजलार्द्रैः। रक्षाहेतोर्नवशशिभृता वासवीनां चमूना- मत्यादित्यं हुतवहमुखे संभृतं तद्धि तेजः॥४३॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- व्रज स्कन्दं: तुम भगवान स्कंद (कार्तिकेय) के पास जाओ।
- नियतवसतिं: जो वहीं (देवगिरि पर) नित्य निवास करते हैं।
- पुष्पमेधीकृतात्मा: अपने शरीर को फूलों की वर्षा करने वाला मेघ बनाकर।
- पुष्पासारैः स्नपयतु भवान्: तुम फूलों की वर्षा से उनका अभिषेक करो।
- व्योमगङ्गाजलार्द्रैः: आकाशगंगा के जल से भीगे हुए (फूलों से)।
- रक्षाहेतोः: देवताओं की रक्षा के लिए।
- नवशशिभृता (शिवजी द्वारा): नए चंद्रमा को धारण करने वाले शिवजी द्वारा।
- वासवीनां चमूनाम्: इंद्र की सेनाओं के लिए।
- हुतवहमुखे संभृतं तद्धि तेजः: अग्निदेव के मुख में जो तेज (कार्तिकेय के रूप में) संचित किया गया था, वह साक्षात वही तेज हैं।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास इस श्लोक में कार्तिकेय के प्रति सम्मान और मेघ की भक्ति को दर्शाते हैं:
- कार्तिकेय के पास जाना: यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि वह देवगिरि पर निवास करने वाले भगवान स्कंद (कार्तिकेय) के पास जाए।
- पुष्पाभिषेक: मेघ को स्वयं को फूलों का मेघ बनाकर आकाशगंगा के जल से भीगे हुए फूलों से कार्तिकेय का अभिषेक करना चाहिए।
- कार्तिकेय का महत्व: यक्ष बताता है कि कार्तिकेय का जन्म देवताओं की रक्षा के लिए हुआ था; शिवजी ने इंद्र की सेना की सहायता के लिए अग्नि के मुख में जो तेज स्थापित किया था, वही कार्तिकेय हैं।
श्लोक:
ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बर्हं भवानी पुत्रप्रेम्णा कुवलयदळप्रापि कर्णे करोति। धौतपाङ्गं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरं पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः॥४४॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- यस्य बर्हं (जिसका पंख): कार्तिकेय के मयूर का पंख।
- ज्योतिर्लेखावलयि: जो तारों की पंक्ति जैसा चमकता है।
- भवानी: माता पार्वती।
- पुत्रप्रेम्णा: पुत्र के प्रति प्रेम के कारण।
- कुवलयदळप्रापि कर्णे करोति: उसे कुवलय (नीलकमल) के समान कानों का आभूषण बनाती हैं।
- धौतपाङ्गं: जिसके नेत्रों के कोने (पांग) स्वच्छ/चमकदार हैं।
- हरशशिरुचा: शिवजी के चंद्रमा की कांति से।
- पावकेस्तं मयूरं: अग्निपुत्र कार्तिकेय के मयूर को।
- पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैः: पर्वत से टकराकर गूँजने वाली अपनी भारी गर्जना से।
- नर्तयेथाः: नचाओ।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ भगवान कार्तिकेय के प्रति माता पार्वती के प्रेम और मयूर की सुंदरता का अद्भुत चित्रण करते हैं:
- पार्वती का प्रेम: माता पार्वती अपने पुत्र कार्तिकेय के मयूर के उस पंख को, जो तारों की तरह चमकता है, पुत्र-प्रेम के कारण अपने कानों के आभूषण (कर्णफूल) के रूप में धारण करती हैं।
- मयूर की कांति: कार्तिकेय के उस मयूर के नेत्रों के कोने शिवजी के मस्तक पर स्थित चंद्रमा की कांति से हमेशा चमकते रहते हैं।
- मेघ को निर्देश: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मेघ! तुम अपनी उन भारी गर्जनाओं से, जो पहाड़ों से टकराकर और अधिक गूँजती हैं, इस मयूर को प्रसन्न करो और उसे नाचने के लिए विवश करो (अर्थात् मयूर को नचाओ)।
श्लोक:
आराध्यैनं शरवणभवं देवमुल्लङ्घिताध्वा सिद्धद्वन्द्वैर्जलकणभयाद् वीणिभिस्त्यक्तमार्गः। व्यालम्बेथाः सुरभितनयालम्भजां मानयिष्यन् स्रोतूमूर्त्या भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्त्तिम्॥४५॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- आराध्यैनं शरवणभवं देवम्: कार्तिकेय (जो शर-वन में उत्पन्न हुए हैं) की आराधना करके।
- उल्लङ्घिताध्वा: आगे का मार्ग तय करना।
- सिद्धद्वन्द्वैः: सिद्ध जोड़े (दंपति)।
- जलकणभयात्: जल की बूंदों (वर्षा) के डर से।
- वीणिभिस्त्यक्तमार्गः: अपना मार्ग छोड़कर भाग गए हैं।
- व्यालम्बेथाः: नीचे की ओर झुकना (नीचे आना)।
- सुरभितनयालम्भजां: सुरभि (कामधेनु) की पुत्री (सरस्वती नदी) के स्पर्श से उत्पन्न।
- रन्तिदेवस्य कीर्त्तिम्: राजा रन्तिदेव की कीर्ति।
- स्रोतूमूर्त्या भुवि परिणतां: जो पृथ्वी पर नदी (सरस्वती) के रूप में बह रही है।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ मेघ के मार्ग और उसके महत्व का सुंदर वर्णन करते हैं:
- कार्तिकेय की आराधना: कार्तिकेय (शरवणभव) की आराधना करने के बाद, जैसे ही तुम आगे बढ़ोगे, सिद्ध दंपति तुम्हारी वर्षा की बूंदों से बचने के लिए अपना मार्ग छोड़ देंगे।
- रन्तिदेव की कीर्ति: तुम्हें अब नीचे की ओर झुकना है, क्योंकि वहाँ राजा रन्तिदेव की वह महान कीर्ति बह रही है, जो पृथ्वी पर ‘चर्मण्वती’ (सरस्वती/चंबल) नदी के रूप में परिणत हो गई है।
- कीर्ति का स्वरूप: रन्तिदेव ने यज्ञों में इतनी अधिक गायों का वध किया था कि उनके रक्त से यह नदी बन गई, जो आज उनकी कीर्ति के प्रतीक के रूप में बह रही है।
श्लोक:
त्वय्यादातुं जलमवनते शार्ङ्गिणो वर्णचौरे तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात् प्रवाहम्। प्रेक्ष्यिष्यन्ते गगनगतयो नूनमावर्ज्य दृष्टि- रेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम्॥४६॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- त्वय्यादातुं जलमवनते: जब तुम (मेघ) जल लेने के लिए नीचे झुकोगे।
- शार्ङ्गिणो वर्णचौरे: भगवान विष्णु (शार्ङ्गपाणि) के शरीर जैसी कांति (श्याम वर्ण) को चुराने वाले।
- तस्याः सिन्धोः: उस नदी (चर्मण्वती) के।
- पृथुमपि तनुं: चौड़ी होते हुए भी पतली दिखाई देने वाली (ऊँचाई के कारण)।
- दूरभावात् प्रवाहम्: दूर होने के कारण प्रवाह।
- गगनगतयो: आकाश में स्थित (देवता/सिद्ध)।
- आवर्ज्य दृष्टिम्: अपनी दृष्टि झुकाकर।
- मुक्तागुणमिव भुवः: पृथ्वी के मोतियों के हार के समान।
- स्थूलमध्येन्द्रनीलम्: जिसके बीच में एक बड़ा नीलम जड़ा हो।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ मेघ के विशाल स्वरूप और नदी की सुंदरता का एक अद्भुत उपमान प्रस्तुत करते हैं:
- मेघ का विष्णु जैसा रूप: यक्ष कहता है कि जब तुम (मेघ) जल लेने के लिए पृथ्वी की ओर झुकोगे, तो तुम्हारा श्याम वर्ण भगवान विष्णु की कांति की याद दिलाएगा।
- नदी का दृश्य: उस ऊँचाई से वह विशाल नदी (चर्मण्वती) दूर होने के कारण बहुत पतली दिखाई देगी।
- सुंदर उपमा: आकाश में चलने वाले देवगण जब नीचे अपनी दृष्टि झुकाकर देखेंगे, तो उन्हें वह नदी पृथ्वी के गले में पड़े एक ऐसे मोतियों के हार जैसी दिखेगी, जिसके बीच में एक बड़ा सा नीलम जड़ा हो। यहाँ ‘नीलम’ का अर्थ स्वयं ‘मेघ’ है, जो जल लेते समय नदी के बीच में स्थित होगा।
यह श्लोक महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘मेघदूतम्’ (पूर्वमेघ) का 47वाँ श्लोक है। इसमें यक्ष मेघ को ‘दशपुर’ (आधुनिक मंदसौर) नगरी की ओर जाने और वहाँ की स्त्रियों के आकर्षण का वर्णन करने का निर्देश दे रहा है।
श्लोक:
तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रूलताविभ्रमाणं पक्ष्मोक्षेपादुपरिविलसत् कृष्णशारप्रभाणाम्। कुन्दक्षेपादनुमधुकरश्रीमुषामात्मबिम्बं पात्रीकुर्वन् दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम्॥४७॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- तामुत्तीर्य व्रज: उस नदी (चर्मण्वती) को पार करके आगे बढ़ो।
- परिचितभ्रूलताविभ्रमाणं: जहाँ की स्त्रियाँ अपनी सुंदर भौंहों के विलास से परिचित हैं।
- पक्ष्मोक्षेपात्: पलकें झपकाने से।
- कृष्णशारप्रभाणाम्: जिनकी आँखों में काले हिरण जैसी चमक है।
- कुन्दक्षेपात्: कुंद (फूलों) के समान सुंदर।
- दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम्: दशपुर की वधुओं के नेत्रों के कौतूहल (आकर्षण) का।
- पात्रीकुर्वन्: पात्र (विषय) बनाते हुए।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ दशपुर (दशार्ण क्षेत्र) की स्त्रियों की सुंदरता का चित्रण करते हैं:
- नदी पार करना: यक्ष कहता है कि उस नदी को पार करने के बाद तुम ‘दशपुर’ की ओर जाना।
- स्त्रियों की सुंदरता: वहाँ की स्त्रियाँ बहुत ही सुंदर और चंचल भौंहों वाली हैं। उनकी आँखों की चमक काले हिरण के समान है, और जब वे अपनी पलकें झपकाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा ही मोहक दृश्य हो।
- मेघ का आकर्षण: यक्ष मेघ से कहता है कि तुम वहाँ जाकर उन दशपुर की वधुओं के नेत्रों के कौतूहल का केंद्र बनो, यानी वे स्त्रियाँ तुम्हें बहुत ही उत्सुकता और आश्चर्य से देखेंगी।
यह श्लोक महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘मेघदूतम्’ (पूर्वमेघ) का 48वाँ श्लोक है। इसमें यक्ष मेघ को ‘कुरुक्षेत्र’ (कौरव) के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले स्थान पर जाने का निर्देश दे रहा है।
श्लोक:
ब्रह्मावर्तं जनपद मथच्छायया गाहमानः क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद् भजेथाः। राजन्यानां शितशरशतैर्यत्र गान्डीवधन्वा धारापातैस्त्वमिव कमलान्युप्यवर्षन्मुखानि॥४८॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- ब्रह्मावर्तं जनपदम्: ब्रह्मावर्त नामक देश (पवित्र भूमि)।
- अथच्छायया गाहमानः: छाया से (घेरकर) प्रवेश करते हुए।
- क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं: वह युद्धक्षेत्र जो क्षत्रियों के भीषण संग्राम का साक्षी है।
- कौरवं तद् भजेथाः: उस कुरुक्षेत्र का सेवन (आश्रय) करो।
- राजन्यानां: राजाओं के।
- शितशरशतैः: तेज बाणों की सैकड़ों बौछारों से।
- गान्डीवधन्वा: गांडीव धनुष धारण करने वाले अर्जुन।
- धारापातैस्त्वमिव: जैसे तुम (मेघ) जल की बौछारें करते हो।
- कमलान्युप्यवर्षन्मुखानि: कमलों के समान मुखों को (रक्त/बाणों से) भर दिया था।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ महाभारत के भीषण युद्ध और मेघ की वृष्टि के बीच एक सुंदर तुलना करते हैं:
- कुरुक्षेत्र का महत्व: यक्ष मेघ को ‘ब्रह्मावर्त’ को पार करके उस प्रसिद्ध ‘कुरुक्षेत्र’ में जाने के लिए कहता है, जो क्षत्रियों के महान युद्ध का साक्षी रहा है।
- अर्जुन का पराक्रम: यक्ष याद दिलाता है कि इसी भूमि पर गांडीवधारी अर्जुन ने शत्रु राजाओं के सिर पर अपने तीखे बाणों की ऐसी बौछार की थी, जैसे आज तुम (मेघ) वर्षा करते हो।
- काव्यात्मक समानता: जिस प्रकार तुम अपनी वर्षा से कमलों को तृप्त करते हो, उसी प्रकार अर्जुन ने अपने बाणों से उन राजाओं के कमलों के समान मुखों को ढंक दिया था (अर्थात् उन्हें मार गिराया था)
यह श्लोक महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘मेघदूतम्’ (पूर्वमेघ) का 49वाँ श्लोक है। इसमें यक्ष मेघ को सरस्वती नदी के पवित्र जल का सेवन करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
श्लोक:
हित्वा हालामभिमतरसां रेवतीलोचनाङ्कां बन्धुप्रीत्या समरविमुखो लाङ्गली याः सिषेवे। कृत्वा तासामधिगममपां सौम्य सारस्वतीना- मन्तःशुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः॥४९॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- हित्वा हालामभिमतरसां: अत्यंत प्रिय मदिरा (हला) को त्याग कर।
- रेवतीलोचनाङ्कां: जो रेवती (बलराम की पत्नी) के नेत्रों के समान सुंदर है।
- बन्धुप्रीत्या समरविमुखो लाङ्गली याः सिषेवे: जिसे भाई (कृष्ण) के प्रेम के कारण युद्ध से विमुख हुए बलराम (लाङ्गली) ने ग्रहण किया था।
- कृत्वा तासामधिगममपां: उन सरस्वती नदी के जल को प्राप्त करके (सेवन करके)।
- सौम्य: हे सौम्य (मेघ)।
- अन्तःशुद्धस्त्वमपि भविता: तुम भी भीतर से अत्यंत पवित्र हो जाओगे।
- वर्णमात्रेण कृष्णः: (केवल) बाहर के रंग से काले रह जाओगे।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ सरस्वती नदी की पवित्रता और उसके प्रभाव का वर्णन करते हैं:
- बलराम का संदर्भ: यक्ष मेघ को बताता है कि बलराम ने, जो अत्यधिक मदिरा के प्रेमी थे, अपने भाई कृष्ण के प्रति प्रेम के कारण युद्ध से दूर रहकर सरस्वती नदी के पवित्र जल का सेवन किया था।
- मेघ की शुद्धि: यक्ष मेघ से कहता है कि हे सौम्य! यदि तुम भी सरस्वती के उस पवित्र जल को ग्रहण करोगे, तो तुम भीतर से पूरी तरह शुद्ध और पवित्र हो जाओगे।
- बाहरी रूप बनाम आंतरिक पवित्रता: इस प्रक्रिया के बाद तुम्हारा श्याम वर्ण (काला रंग) तो बना रहेगा, लेकिन वह केवल ऊपरी होगा; भीतर से तुम अत्यंत पवित्र हो जाओगे।
श्लोक:
तस्माद् गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां जह्रोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम्। गौरीवक्त्रभ्रुकुटरचनां या विहस्येव फेनैः शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्र्मिहस्ता॥५०॥
शब्दार्थ एवं भावार्थ:
- तस्माद् गच्छेरनुकनखलं: वहाँ से (सरस्वती तट से) कनखल पर्वत की ओर जाओ।
- शैलराजावतीर्णां: पर्वतराज हिमालय से अवतरित।
- जह्रोः कन्यां: जह्नु ऋषि की पुत्री (गंगा)।
- सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम्: राजा सगर के पुत्रों के स्वर्ग जाने के लिए सीढ़ियों की पंक्ति के समान।
- गौरीवक्त्रभ्रुकुटरचनां: माता गौरी (पार्वती) के मुख की भौंहों की रचना (क्रोध)।
- विहस्येव फेनैः: अपने झागों (फेन) से मानो हँसते हुए।
- शम्भोः केशग्रहणमकरोत्: शिवजी के बालों को पकड़ लिया था।
- इन्दुलग्नोर्र्मिहस्ता: जिसकी लहरें (ऊर्मि) ही हाथ हैं और जो चंद्रमा से युक्त हैं।
सरल हिंदी व्याख्या:
कालिदास यहाँ गंगा के अवतरण और शिवजी के साथ उनकी लीला का अत्यंत सुंदर चित्रण करते हैं:
- कनखल की ओर: यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि सरस्वती नदी के तट से आगे बढ़कर वह ‘कनखल’ नामक स्थान पर जाए।
- गंगा की महिमा: वहाँ गंगा बहती है, जिसे सगर के पुत्रों के स्वर्ग जाने के लिए एक सीढ़ी के समान माना गया है।
- पौराणिक लीला: जब गंगा का वेग बहुत अधिक था, तो शिवजी ने उन्हें अपनी जटाओं में बांध लिया था। कालिदास कहते हैं कि गंगा की लहरें (ऊर्मि) मानो हाथ की तरह थीं, जिन्होंने झाग (फेन) के माध्यम से हँसते हुए शिवजी के बालों (केश) को पकड़ लिया था। ऐसा दृश्य देखकर मानो माता पार्वती के मुख पर क्रोध की भौंहें तन गई थीं।
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