श्लोक:

तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चार्धलम्बी त्वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तैर्यगम्भः। संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छायाऽसौ स्यादस्थानोपगतयमुनासङ्गमेवाभिरामा॥५१॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • तस्याः पातुं: उसका (गंगा का) जल पीने के लिए।
  • सुरगज इव: इंद्र के हाथी (ऐरावत) की तरह।
  • व्योम्नि पश्चार्धलम्बी: आकाश में पिछले आधे भाग को लटकाए हुए।
  • त्वं चेदच्छस्फटिकविशदं: यदि तुम उस स्वच्छ स्फटिक (बिल्लौर) के समान निर्मल।
  • तर्कयेस्तैर्यगम्भः: तिरछे बहते हुए गंगा के जल को।
  • संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसि: तुम्हारे (मेघ के) उस जल के प्रवाह में चलते ही।
  • च्छायाऽसौ: वह छाया।
  • स्यादस्थानोपगतयमुनासङ्गमेवाभिरामा: स्थान से हटकर (अनपेक्षित स्थान पर) यमुना के संगम जैसी सुंदर प्रतीत होगी।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ और गंगा के मिलन को एक दिव्य दृश्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं:

  1. ऐरावत की उपमा: यक्ष मेघ से कहता है कि जब तुम गंगा का जल पीने के लिए आकाश में पिछले आधे भाग को लटकाओगे, तो तुम इंद्र के हाथी (ऐरावत) के समान प्रतीत होगे।
  2. गंगा की निर्मलता: गंगा का जल स्फटिक (बिल्लौर) के समान अत्यंत स्वच्छ और निर्मल है।
  3. यमुना संगम की कल्पना: जब तुम उस निर्मल जल के ऊपर अपनी छाया डालोगे, तो तुम्हारी काली छाया और गंगा का श्वेत जल मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाएंगे, जो मानो यमुना का गंगा के साथ अनपेक्षित स्थान पर संगम हो गया हो। यह दृश्य अत्यंत मनोरम और अभिराम (सुंदर) लगेगा।

श्लोक:

आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगन्धैर्मृगाणां तस्या एव प्रभावमचलं प्राप्य गौरं तुषारैः। वक्ष्यस्यध्वश्रमविनयने तस्य शृङ्गे निषण्णः शोभां शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम्॥५२॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • आसीनानां सुरभितशिलं: (कस्तूरी मृगों के) बैठने से सुगन्धित शिलाओं वाले।
  • नाभिगन्धैर्मृगाणां: कस्तूरी मृगों की नाभि की गंध से।
  • तस्या एव प्रभावमचलं: उसी (गंगा के) उद्गम स्थान, उस अचल (पर्वत/हिमालय) को प्राप्त कर।
  • गौरं तुषारैः: बर्फ के कारण श्वेत (गौर)।
  • वक्ष्यस्यध्वश्रमविनयने: मार्ग की थकान दूर करने के लिए।
  • तस्य शृङ्गे निषण्णः: उसके (पर्वत के) शिखर पर बैठकर।
  • शोभां शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम्: उस शोभा (दृश्य) को देखना, जो शिवजी के बैल (नंदी) द्वारा खोदी गई मिट्टी की शोभा के समान है।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ के विश्राम और हिमालय की सुंदरता का अद्भुत वर्णन करते हैं:

  1. हिमालय की सुगन्ध: यक्ष मेघ से कहता है कि जब तुम उस हिमालय पर्वत पर पहुंचोगे, जहाँ कस्तूरी मृग बैठते हैं, तो उनकी नाभि की गंध से वहाँ की शिलाएं सुगंधित हो गई हैं।
  2. बर्फ का सौंदर्य: वह पर्वत बर्फ से ढका हुआ है, इसलिए अत्यधिक श्वेत और गौर वर्ण का दिखाई देता है।
  3. विश्राम का आनंद: अपनी यात्रा की थकान मिटाने के लिए तुम उस हिमालय के शिखर पर बैठना।
  4. अद्भुत उपमा: वहाँ बैठकर तुम जो दृश्य देखोगे, वह इतना सुंदर होगा जैसे महादेव शिव के बैल (नंदी) ने अपने खुरों से जो मिट्टी खोदी हो, वह शोभा दे रही हो। मेघ की श्याम छाया और श्वेत बर्फ का मेल उसी मिट्टी को खोदने से बनी शोभा जैसा अद्भुत लगेगा।

श्लोक:

तं चेद्वायौ सरति सरलस्कन्धसङ्घट्टजन्मा बाधेतोल्काक्षपितचमरीबालभारो दवाग्निः। अर्हस्येनं शमयितुमलं वारिधारासहस्रै- रापन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम्॥५३॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • तं चेद्वायौ सरति: यदि हवा चलने पर वह (दावाग्नि) फैल जाए।
  • सरलस्कन्धसङ्घट्टजन्मा: सरल (चीड़ के पेड़) के तनों के आपस में रगड़ने से उत्पन्न।
  • बाधेतोल्काक्षपितचमरीबालभारो दवाग्निः: और वह दावाग्नि चमर मृगों (चमरी गायों) के पूंछों के बालों को जला दे।
  • अर्हस्येनं शमयितुमलं: तो तुम उसे शांत करने में समर्थ हो।
  • वारिधारासहस्रै: हजारों जल की धाराओं (वर्षा) के द्वारा।
  • आपन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम्: क्योंकि उत्तम पुरुषों की संपत्तियाँ (शक्ति) संकट में पड़े लोगों के दुखों को दूर करने के लिए ही होती हैं।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ को एक परोपकारी के रूप में चित्रित करते हैं:

  1. दावाग्नि की विकरालता: यक्ष कहता है कि हिमालय में जब तेज हवा चलती है, तो चीड़ (सरल) के पेड़ों के आपस में टकराने से आग (दावाग्नि) उत्पन्न हो जाती है, जो वहाँ रहने वाले चमर मृगों के सुंदर बालों को जला देती है।
  2. मेघ का कर्तव्य: यक्ष मेघ से आग्रह करता है कि यदि ऐसी स्थिति आए, तो तुम्हें अपनी वर्षा की हजारों धाराओं से उस आग को शांत कर देना चाहिए।
  3. महानता का संदेश: यह श्लोक परोपकार की पराकाष्ठा है। कालिदास कहते हैं कि जो श्रेष्ठ या उत्तम पुरुष होते हैं, उनके पास जो भी धन या शक्ति (सम्पदा) होती है, उसका मुख्य उद्देश्य दुखी और संकटग्रस्त प्राणियों के कष्टों का निवारण करना ही होता है।

श्लोक:

ये संरम्भोत्पतनरभसाः स्वाङ्गभङ्गाय तस्मिन् मुक्ताध्वानं सपदि शरभा लङ्घयेयुर्भवन्तम्। तान्कुर्वोथास्तुमुलकरकावृष्टिपातावकण्ीर्णान् के वा न स्युः परिभवपदं निष्फलारम्भयत्नाः॥५४॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • ये संरम्भोत्पतनरभसाः: जो क्रोध में उछलने के वेग से युक्त हैं।
  • स्वाङ्गभङ्गाय तस्मिन्: अपने शरीर को चोट पहुँचाने के लिए (मेघ पर झपटने के कारण)।
  • मुक्ताध्वानं सपदि शरभा लङ्घयेयुर्भवन्तम्: वे ‘शरभ’ (अष्टपाद मृग या हिमालय के शक्तिशाली सिंह) अचानक तुम पर झपट सकते हैं।
  • तान्कुर्वोथास्तुमुलकरकावृष्टिपातावकण्ीर्णान्: तुम उन पर ओलों (करका) की मूसलाधार वर्षा कर देना।
  • के वा न स्युः परिभवपदं निष्फलारम्भयत्नाः: क्योंकि व्यर्थ के प्रयास करने वाले लोग अपमान का पात्र नहीं होते? (अर्थात् वे निश्चित रूप से अपमानित होते हैं)।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ प्रकृति की शक्ति और बुद्धिमानी का संदेश देते हैं:

  1. शरभ का खतरा: यक्ष मेघ को सावधान करता है कि हिमालय में ‘शरभ’ नाम के अत्यंत शक्तिशाली जीव रहते हैं, जो अपने क्रोध और वेग के कारण आकाश में उड़ते हुए मेघों पर भी झपट पड़ते हैं। यदि वे तुम पर आक्रमण करें, तो तुम डरना मत।
  2. मेघ का उत्तर: तुम अपनी मूसलाधार ओलों की वर्षा (तुमुल् करका वृष्टि) से उन्हें परास्त कर देना।
  3. सारगर्भित संदेश: कालिदास कहते हैं कि जो लोग बिना सोचे-समझे या व्यर्थ के कार्य (निष्फल आरम्भ) करने का प्रयास करते हैं, वे अंत में अपमानित ही होते हैं। शरभ का मेघ पर झपटना एक ‘निष्फल प्रयास’ है, क्योंकि मेघ अपनी वर्षा से उन्हें हरा देगा।

श्लोक:

तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्यासमर्धेन्दुमौलेः शश्वत् सिद्धैरुपचितबलिं भक्तिनम्रः परीयाः। यस्मिन् दृष्टे करणविगमादूर्ध्वमुद्धूतपापाः कल्पन्तेऽस्य स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः॥५५॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • तत्र: वहाँ।
  • व्यक्तं दृषदि चरणन्यासमर्धेन्दुमौलेः: उस शिला पर अर्धेन्दुमौलि (शिव) के स्पष्ट चरण चिह्न हैं।
  • शश्वत् सिद्धैरुपचितबलिं: जिसकी सिद्ध पुरुष निरंतर पूजा (बलि) करते हैं।
  • भक्तिनम्रः परीयाः: भक्तिपूर्वक झुककर उसकी परिक्रमा करना।
  • यस्मिन् दृष्टे: जिसको देख लेने पर।
  • करणविगमादूर्ध्वमुद्धूतपापाः: मृत्यु के पश्चात पापों से मुक्त होकर।
  • कल्पन्तेऽस्य स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः: श्रद्धालु व्यक्ति शिवजी के ‘स्थिर गण’ (गणपद) को प्राप्त करने योग्य बन जाते हैं।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ उस स्थान की महिमा का वर्णन करते हैं जहाँ भगवान शिव के पदचिह्न हैं:

  1. शिव के पदचिह्न: यक्ष मेघ को बताता है कि हिमालय में एक ऐसी शिला है जिस पर भगवान शिव (अर्धेन्दुमौलि – जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र है) के चरण चिह्न स्पष्ट रूप से अंकित हैं।
  2. पूजा और परिक्रमा: सिद्ध पुरुष निरंतर उस स्थान पर पूजा करते हैं। यक्ष मेघ से कहता है कि तुम वहाँ जाकर भक्ति के साथ झुककर उन चिह्नों की परिक्रमा करना।
  3. मुक्ति का मार्ग: इस स्थान की इतनी महिमा है कि जो श्रद्धालु व्यक्ति इन चरणों का दर्शन कर लेता है, वह मृत्यु के बाद अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और भगवान शिव के गणों में सम्मिलित होकर ‘स्थिर पद’ को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक:

शब्दायन्ते मधुरमनिलैः कीचकाः पूर्यमाणाः संसक्ताभिस्त्रिपुरविजयो गीयते किन्नरीभिः। निह्रादिस्ते मुरज इव चेत् कन्दरेषु ध्वनिः स्यात् सङ्गीताथो ननु पशुपतेस्तत्र भावी समग्रः॥५६॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • शब्दायन्ते मधुरमनिलैः: वायु के प्रवेश से मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं।
  • कीचकाः पूर्यमाणाः: (बाँस के छेद) जिनमें हवा भर जाने से वे बाँसुरी की तरह बज रहे हैं।
  • संसक्ताभिस्त्रिपुरविजयो गीयते किन्नरीभिः: वहाँ की किन्नरियाँ शिव (त्रिपुरविजयी) के विजय गान को गा रही हैं।
  • निह्रादिस्ते मुरज इव चेत्: यदि तुम्हारी गड़गड़ाहट (मेघ का गर्जन) मृदंग (मुरज) जैसी हो।
  • कन्दरेषु ध्वनिः स्यात्: और वह गुफाओं में गूँज जाए।
  • सङ्गीताथो ननु पशुपतेस्तत्र भावी समग्रः: तो निश्चय ही वहाँ भगवान शिव (पशुपति) के लिए एक पूर्ण संगीत का आयोजन हो जाएगा।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ प्रकृति को संगीतकार और हिमालय को एक दिव्य सभागार के रूप में चित्रित करते हैं:

  1. प्राकृतिक बाँसुरी: हिमालय में जो बाँस (कीचका) हैं, उनमें हवा भरने से वे स्वतः ही मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं, जो बाँसुरी जैसा प्रभाव दे रही है।
  2. किन्नरियों का गान: वहाँ की किन्नर स्त्रियाँ भगवान शिव के त्रिपुरासुर विजय की कथाओं का गान कर रही हैं।
  3. मेघ का योगदान: यक्ष कहता है कि हे मेघ! यदि तुम्हारी गंभीर गड़गड़ाहट उस समय मृदंग (ढोल/मुरज) की ध्वनि की तरह गुफाओं में गूँज जाए, तो वह संगीत का वातावरण और भी पूर्ण हो जाएगा। इस प्रकार, शिवजी की स्तुति के लिए वहाँ एक दिव्य संगीत समारोह संपन्न हो जाएगा।

श्लोक:

प्रालेयाद्रेरुपतटमतिक्रम्य तास्तान् विशेषान् हंसद्वारं भृगुपतियशोवर्त्म यत्क्रौञ्चरन्ध्रम्। तेनोदीचीं दिशमनुसरेस्तिर्यगायामशोभी श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः॥५७॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • प्रालेयाद्रेरुपतटमतिक्रम्य: हिमालय के उपत्यकाओं (पर्वत के निचले हिस्सों) और उन विशेष दृश्यों को पार करके।
  • हंसद्वारं: जिसे ‘हंसद्वार’ कहा जाता है।
  • भृगुपतियशोवर्त्म: भृगुपति (परशुराम) के यश का मार्ग।
  • यत्क्रौञ्चरन्ध्रम्: जिसे ‘क्रौञ्चरन्ध्र’ (क्रौञ्च पर्वत का दर्रा) कहते हैं।
  • तेनोदीचीं दिशमनुसरेः: उस मार्ग से उत्तर दिशा की ओर जाना।
  • तिर्यगायामशोभी: जो तिरछे फैलाव से सुशोभित है।
  • श्यामः पादो: (तुम्हारा) काला शरीर।
  • बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः: राजा बलि को बाँधने (वामन अवतार में) के लिए उठे हुए भगवान विष्णु के पैर जैसा (दिखाई देगा)।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ की यात्रा और उसके स्वरूप की दिव्य तुलना करते हैं:

  1. क्रौञ्चरन्ध्र का मार्ग: यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि हिमालय की उन सुंदरता वाली जगहों को पार करके तुम ‘हंसद्वार’ जाना, जिसे ‘क्रौञ्चरन्ध्र’ भी कहा जाता है। यह मार्ग परशुराम के यश के रूप में प्रसिद्ध है।
  2. उत्तर की यात्रा: उस क्रौञ्चरन्ध्र से होकर तुम उत्तर दिशा की ओर बढ़ना।
  3. विष्णु के पैर की उपमा: जब तुम उस दर्रे से तिरछे होकर गुजरोगे, तो तुम्हारा श्याम (काला) शरीर आकाश में ऐसा सुशोभित होगा, जैसे भगवान विष्णु ने राजा बलि को बाँधने के लिए वामन अवतार में अपना पैर ऊपर की ओर उठाया हो।

श्लोक:

प्रालेयाद्रेरुपतटमतिक्रम्य तास्तान् विशेषान् हंसद्वारं भृगुपतियशोवर्त्म यत्क्रौञ्चरन्ध्रम्। तेनोदीचीं दिशमनुसरेस्तिर्यगायामशोभी श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः॥५७॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • प्रालेयाद्रेरुपतटमतिक्रम्य: हिमालय के उपत्यकाओं (पर्वत के निचले हिस्सों) और उन विशेष दृश्यों को पार करके।
  • हंसद्वारं: जिसे ‘हंसद्वार’ कहा जाता है।
  • भृगुपतियशोवर्त्म: भृगुपति (परशुराम) के यश का मार्ग।
  • यत्क्रौञ्चरन्ध्रम्: जिसे ‘क्रौञ्चरन्ध्र’ (क्रौञ्च पर्वत का दर्रा) कहते हैं।
  • तेनोदीचीं दिशमनुसरेः: उस मार्ग से उत्तर दिशा की ओर जाना।
  • तिर्यगायामशोभी: जो तिरछे फैलाव से सुशोभित है।
  • श्यामः पादो: (तुम्हारा) काला शरीर।
  • बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः: राजा बलि को बाँधने (वामन अवतार में) के लिए उठे हुए भगवान विष्णु के पैर जैसा (दिखाई देगा)।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ की यात्रा और उसके स्वरूप की दिव्य तुलना करते हैं:

  1. क्रौञ्चरन्ध्र का मार्ग: यक्ष मेघ को निर्देश देता है कि हिमालय की उन सुंदरता वाली जगहों को पार करके तुम ‘हंसद्वार’ जाना, जिसे ‘क्रौञ्चरन्ध्र’ भी कहा जाता है। यह मार्ग परशुराम के यश के रूप में प्रसिद्ध है।
  2. उत्तर की यात्रा: उस क्रौञ्चरन्ध्र से होकर तुम उत्तर दिशा की ओर बढ़ना।
  3. विष्णु के पैर की उपमा: जब तुम उस दर्रे से तिरछे होकर गुजरोगे, तो तुम्हारा श्याम (काला) शरीर आकाश में ऐसा सुशोभित होगा, जैसे भगवान विष्णु ने राजा बलि को बाँधने के लिए वामन अवतार में अपना पैर ऊपर की ओर उठाया हो।

श्लोक:

उत्पश्यामित्वयितटगतेस्निग्धभिन्नाञ्जनाभे सद्यःकृत्तद्विरददशनच्छेदगौरस्यतस्य। शोभामद्रेः स्तिमितनयनप्रेक्षणीयां भवित्री- मंसन्यस्तेसतिहलभृतोमेचकेवाससीव॥५९॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • उत्पश्यामित्वयितटगते: मैं कल्पना करता हूँ कि जब तुम (मेघ) उसके तट पर जाओगे।
  • स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे: जो चिकने और टूटे हुए अंजन (काजल) के समान आभा वाला है।
  • सद्यःकृत्तद्विरददशनच्छेदगौरस्यतस्य: जो हाल ही में काटे गए हाथी के दाँत (गजदन्त) के टुकड़े के समान श्वेत (गौर) है।
  • शोभामद्रेः: उस पर्वत (कैलाश) की शोभा।
  • स्तिमितनयनप्रेक्षणीयां भवित्री: जो टकटकी लगाए देखने योग्य होगी।
  • अंसन्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव: जैसे हलधर (बलराम) के कंधे पर नीला वस्त्र सुशोभित होता है, वैसे ही कैलाश पर्वत पर तुम (मेघ) शोभा दोगे।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ और कैलाश पर्वत के मिलन का अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करते हैं:

  1. कैलाश और मेघ का मिलन: यक्ष कहता है कि हे मेघ! जब तुम अपने ‘स्निग्ध भिन्नाञ्जन’ (चिकने, गहरे काले अंजन) जैसे रंग के साथ कैलाश पर्वत पर पहुँचोगे, तो वह दृश्य देखने योग्य होगा।
  2. रंगों का कंट्रास्ट: कैलाश पर्वत हाल ही में काटे गए हाथी के दाँत जैसा अत्यंत श्वेत (गौर) है। उस श्वेत पर्वत पर जब तुम अपना काला शरीर रखोगे, तो वह बहुत ही सुंदर लगेगा।
  3. बलराम की उपमा: कालिदास उपमा देते हैं कि जैसे हलधर बलराम अपने श्वेत शरीर पर नीला वस्त्र (मेचक वासस) धारण करते हैं, वैसे ही उस श्वेत कैलाश पर्वत पर स्थित तुम (श्याम मेघ) अत्यंत सुशोभित होगे। यह दृश्य ऐसा होगा जिसे लोग पलकें झपकाए बिना देखते ही रह जाएंगे।

श्लोक:

हित्वा तस्मिन् भुजगवलयं शम्भुना दत्तहस्ता क्रीडाशैले यदि च विचरेत् पादचारेण गौरी। भङ्गीभक्त्या विरचितवपुः स्तम्भितान्तर्जलोघः सोपानत्वं कुरु मणितटारोहणायाग्रयायी॥६०॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • हित्वा तस्मिन् भुजगवलयं: उस समय सर्प के कंगन (भुजगवलय) को त्यागकर।
  • शम्भुना दत्तहस्ता: शिवजी द्वारा हाथ पकड़कर।
  • क्रीडाशैले यदि च विचरेत् पादचारेण गौरी: यदि माता गौरी उस क्रीड़ा पर्वत (कैलाश) पर पैदल चलें।
  • भङ्गीभक्त्या विरचितवपुः: अपनी आकृति को सीढ़ी की तरह ढालकर।
  • स्तम्भितान्तर्जलोघः: अपने भीतर के जल को स्थिर करके (अर्थात् वर्षा न करके)।
  • सोपानत्वं कुरु: सीढ़ी बन जाओ।
  • मणितटारोहणायाग्रयायी: उनके रत्नों से जड़ित तट पर चढ़ने के लिए आगे-आगे चलने वाले।

सरल हिंदी व्याख्या:

कालिदास यहाँ मेघ को माता गौरी की सेवा का एक अद्भुत अवसर प्रदान करते हैं:

  1. गौरी का विहार: यक्ष कहता है कि यदि कभी माता गौरी अपने सर्प-कंगन को त्यागकर, शिवजी का हाथ पकड़कर उस कैलाश पर्वत पर पैदल विचरण करें।
  2. मेघ की भूमिका: तब हे मेघ! तुम अपने शरीर को इस तरह मोड़ना (भङ्गीभक्त्या) कि तुम एक सीढ़ी (सोपान) के समान दिखाई दो।
  3. सावधानी: उस समय तुम अपने भीतर के जल के वेग को रोक लेना (वर्षा न करना), ताकि माता गौरी को चढ़ने में कोई असुविधा न हो। तुम उनके आगे-आगे सीढ़ी बनकर उन्हें उस रत्नमय तट पर चढ़ने में सहायता करना।

श्लोक:

तत्रावश्यं वलयकुलिशोद्घट्टनोत्तीर्णतोयं नेष्यन्ति त्वां सुरयुवतयो यन्त्रधारागृहत्वम्। ताभ्यो मोक्षस्तव यदि सखे घर्मलब्धस्य न स्यात् क्रीडालोलाः श्रवणपरुषैर्गर्जितैर्माद्ययेस्ताः॥६१॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • तत्रावश्यं: वहाँ (कैलाश पर) निश्चित रूप से।
  • वलयकुलिशोद्घट्टनोत्तीर्णतोयं: (अप्सराओं के) कंकणों (वलय) और उनके वज्र जैसे कठोर आभूषणों के आघात से जल छिड़कने के कारण।
  • सुरयुवतयो: देव-स्त्रियाँ (अप्सराएं)।
  • यन्त्रधारागृहत्वम्: तुम्हें ‘यन्त्रधारागृह’ (फव्वारे वाला घर/कृत्रिम जल-क्रीड़ा का स्थान) बना लेंगी।
  • ताभ्यो मोक्षस्तव यदि सखे: हे मित्र! यदि उन (अप्सराओं) से तुम्हारा छुटकारा न हो सके।
  • घर्मलब्धस्य: (तब) गर्मी से प्राप्त (तुम्हारी) स्वतंत्रता का कोई लाभ नहीं रहेगा।
  • क्रीडालोलाः: खेल-कूद में मग्न उन स्त्रियों को।
  • श्रवणपरुषैर्गर्जितैः माद्ययेः ताः: अपने कानों को चुभने वाली (कठोर) गर्जनाओं से डराकर वहाँ से हटा देना।

सरल हिंदी व्याख्या:

यक्ष मेघ को एक व्यावहारिक सलाह देता है:

  1. अप्सराओं की क्रीड़ा: यक्ष कहता है कि हे मेघ, कैलाश पर रहने वाली अप्सराएं तुम्हें अपनी जल-क्रीड़ा का साधन बना लेंगी। वे अपने कंकणों के टकराने से उत्पन्न ध्वनि और हाथों की चोट से तुम्हें ‘यन्त्रधारागृह’ (फव्वारे) की तरह इस्तेमाल करेंगी।
  2. चेतावनी: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मित्र, यदि तुम उन अप्सराओं के बंधन से खुद को मुक्त नहीं करा पाए, तो तुम्हारी यह लंबी यात्रा (गर्मी में राहत पाने की) व्यर्थ हो जाएगी।
  3. समाधान: यदि वे तुम्हें न छोड़ें, तो अपनी अत्यंत गंभीर और कानों को कठोर लगने वाली गर्जना (बिजली की कड़कड़ाहट) से उन चंचल अप्सराओं को डरा देना, जिससे वे तुम्हें छोड़कर चली जाएं और तुम अपनी यात्रा पर आगे बढ़ सको।

श्लोक:

हेमाम्भोजप्रसवि सलिलं मानसस्याददानः कुर्वन् कामं क्षणमुखपटप्रीतिमैरावतस्य। धुन्वन् कल्पद्रुमकिसलयान्यांशुकानि स्ववातै- र्नानाचेष्टैर्ज्वलद! ललितैर्निर्विशेस्तं नगेन्द्रम्॥६२॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • हेमाम्भोजप्रसवि सलिलं मानसस्य आददानः: मानसरोवर का वह जल ग्रहण करना जिसमें स्वर्ण कमल (हेमाम्भोज) खिलते हैं।
  • कुर्वन् कामं क्षणमुखपटप्रीतिमैरावतस्य: इंद्र के हाथी (ऐरावत) के मुख को ढंकने वाले वस्त्र (मुखपट) के समान सुखद आभा पैदा करना।
  • धुन्वन् कल्पद्रुमकिसलयानि अंशुकानि स्ववातैः: अपनी वायु (हवा) से कल्पवृक्ष के नवीन पल्लवों (कोमल पत्तों) को हिलाना, जो वस्त्रों जैसे प्रतीत होते हैं।
  • नानाचेष्टैः ललितैः: विभिन्न प्रकार की सुंदर क्रीड़ाओं द्वारा।
  • निर्विशेस्तं नगेन्द्रम्: उस पर्वतों के राजा (कैलाश) का आनंद लो।

सरल हिंदी व्याख्या:

यक्ष मेघ को कैलाश पर्वत पर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से आनंद लेने के लिए प्रेरित करता है:

  1. मानसरोवर का जल: मानसरोवर से वह जल ग्रहण करना, जो स्वर्ण कमलों को उत्पन्न करता है। यह जल बहुत ही पवित्र और विशिष्ट है।
  2. ऐरावत की उपमा: अपनी फुहारों से इंद्र के हाथी, ऐरावत के मुख को ढंकने वाले वस्त्र के समान सुखद अनुभूति उत्पन्न करना।
  3. कल्पवृक्ष की सेवा: अपनी वायु से कल्पवृक्ष के कोमल पत्तों को हिलाकर उन्हें एक प्रकार से वस्त्रों की भांति लहराना।
  4. पर्वत का आनंद: यक्ष मेघ से कहता है कि हे जलद (मेघ)! तुम अपनी इन विभिन्न प्रकार की सुंदर और ललित क्रीड़ाओं के द्वारा उस पर्वतराज कैलाश का पूर्ण आनंद लो।

श्लोक:

तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव स्रस्तगङ्गादुकूलां न त्यं द्रष्टा न पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारिन्। या वः काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना मुक्ताजालप्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम्॥६३॥

शब्दार्थ एवं भावार्थ:

  • तस्योत्सङ्गे: उस (कैलाश पर्वत) की गोद में।
  • प्रणयिन इव स्रस्तगङ्गादुकूलां: प्रेमी के समान (जिसकी) गंगा रूपी रेशमी साड़ी खिसक गई है।
  • न त्यं द्रष्टा न पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारिन्: हे कामचारी (अपनी इच्छा से घूमने वाले) मेघ! तुम उसे देखे बिना अलकापुरी को नहीं जान पाओगे।
  • या वः काले वहति: जो (अलका) उचित समय पर धारण करती है।
  • सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना: ऊँचे विमानों से जल (फुहार) की वर्षा करती हुई।
  • मुक्ताजालप्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम्: जो बादलों के समूह को मोतियों के जाल से गुंथे हुए बालों वाली स्त्री (कामिनी) के समान धारण करती है।

सरल हिंदी व्याख्या:

यक्ष मेघ को अलकापुरी की अद्भुत सुंदरता का परिचय देता है:

  1. कैलाश की गोद में अलका: यक्ष बताता है कि कैलाश पर्वत की गोद में बसी अलकापुरी ऐसी लग रही है, मानो उसने प्रेमी के सामने अपनी गंगा रूपी रेशमी साड़ी (दुकूल) को ढीला छोड़ दिया हो।
  2. मेघ की विवशता: यक्ष कहता है कि हे मेघ, तुम अपनी इच्छा से जहाँ चाहो वहाँ घूम सकते हो, लेकिन जब तक तुम अलकापुरी को देख नहीं लोगे, तब तक तुम उसके वास्तविक वैभव को नहीं समझ पाओगे।
  3. स्त्री से तुलना: अलकापुरी की शोभा ऐसी है कि उसके ऊँचे विमान जब बादलों के समूह को स्पर्श करते हैं, तो वे ऐसे लगते हैं जैसे किसी सुंदर स्त्री ने अपने बालों में मोतियों की माला (मुक्ताजाल) गूँथ रखी हो।

,

Leave a Reply

Discover more from SanskritDom

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading