ऋषि: शुनःशेप आजीगर्त
देवता: वरुण
छन्द: गायत्री
कुल मन्त्र: 21


मन्त्र 1

यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्।
मिनीमसि द्यविद्यवि॥१॥

सरल हिन्दी अर्थ

हे देव वरुण! जिस प्रकार संसार के सभी मनुष्य आपके व्रत/नियम का पालन करते हुए भी प्रतिदिन कुछ-न-कुछ भूल करते हैं, उसी प्रकार हम भी प्रतिदिन आपके नियमों का उल्लंघन कर बैठते हैं।

समझिए

यहाँ मनुष्य अपने अपराध/भूल को स्वीकार कर रहा है और वरुण से अप्रत्यक्ष रूप से क्षमा की अपेक्षा करता है।

NET Point:
👉 वरुण = व्रत/नियम के रक्षक
👉 मनुष्य = अपने अपराध को स्वीकार करने वाला।


मन्त्र 2

मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः।
मा हृणानस्य मन्यवे॥२॥

सरल हिन्दी अर्थ

हे वरुण! जब आप हमसे अप्रसन्न हों, तब अपने क्रोध के कारण हमें मृत्यु या विनाश का पात्र मत बनाइए। अपने क्रोध में हमें दण्ड मत दीजिए।

मुख्य भाव

यहाँ मनुष्य वरुण के क्रोध से बचने और क्षमा प्राप्त करने की प्रार्थना करता है।

NET Point

वरुण → क्रोध → दण्ड → क्षमा की प्रार्थना


मन्त्र 3

वि मृळीकीय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्।
गीर्भिर्वरुण सीमहि॥३॥

सरल हिन्दी अर्थ

हे वरुण! हम स्तुतियों के द्वारा आपके मन को प्रसन्न/अनुकूल करना चाहते हैं, जैसे सारथि लगाम द्वारा घोड़े को नियंत्रित करता है।

उपमा

सारथि : घोड़ा :: स्तुति : वरुण का मन

यह मन्त्र वरुण को प्रसन्न करने के लिए स्तुति और प्रार्थना के महत्व को बताता है।


मन्त्र 4

परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये।
वयो न वसतीरुप॥४॥

सरल हिन्दी अर्थ

हे वरुण! जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले की ओर उड़कर जाते हैं, उसी प्रकार हमारी इच्छाएँ/विचार धन और जीवनोपयोगी वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इधर-उधर दौड़ते हैं। (eGyankosh)

महत्वपूर्ण उपमा

पक्षी → घोंसला
मनुष्य की बुद्धि/इच्छाएँ → धन की प्राप्ति


मन्त्र 5

कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे।
मृळीकीयोरुचक्षसम्॥५॥

सरल हिन्दी अर्थ

हम उस महान् शक्ति-संपन्न और विशाल दृष्टि वाले वरुण को कब अपना सहायक बनाएँगे, जो कृपालु और सबको देखने वाला है?

महत्वपूर्ण शब्द

  • क्षत्रश्रिय → शक्ति/राजकीय सामर्थ्य से युक्त
  • उरुचक्षस् → विस्तृत दृष्टि वाला, दूर तक देखने वाला
  • मृळीकीय → कृपालु/दयालु

NET Point

उरुचक्षस् → वरुण का विशेषण


मन्त्र 6

तदित् समानमाशाते वेनन्ता न प्रयुछतः।
धर्तव्रताय दाशुषे॥६॥

सरल हिन्दी अर्थ

जो यजमान वरुण के लिए श्रद्धा से यज्ञ करता है और वरुण के धृत व्रत का पालन करता है, उसकी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और उसे वरुण की कृपा प्राप्त होती है।

महत्वपूर्ण शब्द

धर्तव्रत = व्रत को धारण/पालन करने वाला

👉 वरुण का सम्बन्ध फिर से व्रत और नियम से दिखाई देता है।


मन्त्र 7

वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्।
वेद नावः समुद्रियः॥७॥

सरल हिन्दी अर्थ

वरुण उन पक्षियों के मार्ग को जानते हैं जो अन्तरिक्ष में उड़ते हैं और समुद्र में चलने वाली नावों के मार्ग को भी जानते हैं।

⭐ बहुत महत्वपूर्ण NET तथ्य

वरुण को सर्वज्ञ/सर्वदर्शी रूप में प्रस्तुत किया गया है।

वे जानते हैं—

पक्षियों का मार्ग + नावों का समुद्री मार्ग

अर्थात् उनकी दृष्टि आकाश और समुद्र दोनों पर है।


मन्त्र 8

वेद मासो धृतवतो द्वादश प्रजावतः।
वेद य उपजायते॥८॥

सरल हिन्दी अर्थ

वरुण उन बारह महीनों को जानते हैं जो निश्चित क्रम से चलते हैं तथा उस अतिरिक्त समय/अधिक मास को भी जानते हैं जो उत्पन्न होता है।

⭐ NET Point

यह मन्त्र वैदिक काल-गणना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

द्वादश मास = 12 महीने

और वरुण को इनके क्रम का ज्ञाता बताया गया है।


मन्त्र 9

वेद वातस्य वर्तनिमुरोर्घस्य बृहतः।
वेद ये अध्यासते॥९॥

सरल हिन्दी अर्थ

वरुण विस्तृत और महान् वायु के मार्ग को जानते हैं तथा आकाश में निवास करने वाले/स्थित रहने वाले देवताओं को भी जानते हैं।

मुख्य भाव

वरुण की दृष्टि अत्यन्त व्यापक है—

वायु का मार्ग → आकाश → देवता

इससे वरुण का सर्वज्ञ और विश्वव्यापी स्वरूप स्पष्ट होता है।


🔥 इन 9 मन्त्रों को एक साथ समझो

मन्त्रमुख्य विषयNET Keyword
1मनुष्य की भूलव्रत
2वरुण के क्रोध से रक्षादण्ड/क्षमा
3वरुण को प्रसन्न करनासारथि–घोड़ा उपमा
4धन की इच्छापक्षी–घोंसला उपमा
5वरुण की महिमाउरुचक्षस्
6यज्ञ और वरुण का व्रतधर्तव्रत
7पक्षियों और नावों का मार्गसर्वज्ञता
812 महीनेद्वादश मास
9वायु का मार्गविश्वव्यापक दृष्टि

🎯 UGC NET/JRF

ऋग्वेद 1.25 → वरुण

ऋषि → शुनःशेप आजीगर्त

छन्द → गायत्री

कुल मन्त्र → 21

वरुण → व्रत का रक्षक

वरुण → सर्वदर्शी/उरुचक्षस्

वरुण → नैतिक व्यवस्था से सम्बन्धित

वरुण → पाप/अपराध के लिए दण्ड दे सकते हैं

वरुण → क्षमा प्रदान करने वाले

वरुण → पाश से सम्बन्धित

मन्त्र 7 → पक्षियों और समुद्री नावों के मार्ग का ज्ञान

मन्त्र 8 → द्वादश मास और अधिक मास का उल्लेख


🧠 एक बहुत आसान Memory Trick

1 → व्रत
2 → क्रोध
3 → सारथि
4 → पक्षी
5 → उरुचक्षस्
6 → धर्तव्रत
7 → नाव
8 → 12 मास
9 → वायु

मन्त्र 10

नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा।
साम्राज्याय सुक्रतुः॥१०॥

सरल अर्थ:
वरुण अपने निश्चित व्रत को धारण करने वाले, श्रेष्ठ कर्म करने वाले और साम्राज्य के लिए अपनी प्रजा के बीच विराजमान होते हैं।

समझें

यहाँ वरुण का स्वरूप साम्राज्य के अधिपति और शासनकर्ता के रूप में दिखाई देता है।

NET Keywords:
धृतव्रत → वरुण
साम्राज्य → वरुण
सुक्रतुः → श्रेष्ठ कर्म करने वाला


मन्त्र 11

अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति।
कृतानि या च कर्त्वा॥११॥

सरल अर्थ:
वरुण वहाँ से संसार की सभी अद्भुत वस्तुओं को देखते हैं। जो कार्य किए जा चुके हैं और जो आगे किए जाने वाले हैं, उन सबको वे जानते हैं।

मुख्य भाव

वरुण को भूत और भविष्य का ज्ञाता बताया गया है।

NET:
👉 वरुण = सर्वज्ञ / सर्वदर्शी


मन्त्र 12

स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत्।
प्र ण आयूंषि तारिषत्॥१२॥

सरल अर्थ:
वह सुबुद्धि वाले आदित्य वरुण हमें सदैव श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाएँ और हमारी आयु को सुरक्षित रखें/बढ़ाएँ।

मुख्य भाव

यहाँ वरुण से कल्याण, अच्छे मार्ग और दीर्घायु की प्रार्थना है।

याद रखें:
सुपथा → अच्छा मार्ग
आयूंषि → आयु


मन्त्र 13

बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्।
परि स्पशो नि षेदिरे॥१३॥

सरल अर्थ:
वरुण स्वर्णमय, चमकीला वस्त्र धारण करते हैं और उनके चारों ओर उनके स्पशः (दूत/निरीक्षक) स्थित रहते हैं।

⭐ NET Point

स्पशः = वरुण के दूत/निरीक्षक

इनका कार्य संसार में होने वाली गतिविधियों पर दृष्टि रखना समझा जाता है।


मन्त्र 14

न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम्।
न देवमभिमातयः॥१४॥

सरल अर्थ:
जिस व्यक्ति की वरुण रक्षा करते हैं, उसे न तो शत्रु हानि पहुँचा सकते हैं, न छल करने वाले लोग और न ही कोई विरोधी शक्ति।

मुख्य भाव

वरुण = रक्षक


मन्त्र 15

उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या।
अस्माकमुदरेष्वा॥१५॥

सरल अर्थ:
मनुष्यों में जिसने हमारे लिए श्रेष्ठ और अद्वितीय यश उत्पन्न किया है, वह यश हमारे वंश/परिवार में भी बना रहे।

NET Keyword

यशस् → कीर्ति / प्रसिद्धि


मन्त्र 16

परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु।
इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥१६॥

सरल अर्थ:
मेरी बुद्धियाँ/प्रार्थनाएँ उस विशाल-दृष्टि वाले वरुण की ओर उसी प्रकार जाती हैं, जैसे गायें अपने चरागाह की ओर जाती हैं।

⭐ उपमा

गाय → गव्यूति/चरागाह
धीतियाँ → वरुण

यहाँ भक्त का मन लगातार वरुण की ओर जाने की इच्छा रखता है।


मन्त्र 17

सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्।
होतेव क्षदसे प्रियम्॥१७॥

सरल अर्थ:
आओ, हम फिर से वरुण से प्रार्थना करें। जिस प्रकार होता प्रिय वस्तु का सेवन करता है, उसी प्रकार मेरी मधुर स्तुति/प्रार्थना को स्वीकार करें।

NET Point

होता शब्द फिर से यज्ञीय संदर्भ को याद कराता है।


मन्त्र 18

दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि।
एता जुषत मे गिरः॥१८॥

सरल अर्थ:
मैं उस विश्वदर्शी वरुण को देखना चाहता हूँ और उनके रथ को देखना चाहता हूँ। मेरी ये स्तुतियाँ वे स्वीकार करें।

महत्वपूर्ण शब्द

विश्वदर्शतम् → सबको देखने वाला / अत्यन्त दर्शनीय

👉 वरुण की सर्वदर्शिता फिर स्पष्ट होती है।


मन्त्र 19 ⭐

इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय।
त्वामवस्युरा चके॥१९॥

सरल अर्थ

हे वरुण! मेरी इस पुकार को सुनो और आज मुझ पर कृपा करो। मैं सहायता और रक्षा की इच्छा से तुम्हें पुकार रहा हूँ।

⭐ बहुत महत्वपूर्ण

यह एक सीधी प्रार्थना और क्षमा/कृपा की याचना है।

श्रुधि → सुनो
मृळय → कृपा करो / प्रसन्न होओ
अवस्यु → सहायता चाहने वाला


मन्त्र 20 ⭐

त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि।
स यामनि प्रति श्रुधि॥२०॥

सरल अर्थ

हे बुद्धिमान वरुण! तुम सम्पूर्ण संसार, स्वर्ग और पृथ्वी—सब पर शासन करते हो। हमारी इस प्रार्थना के समय हमारी पुकार सुनो।

⭐ NET Point

वरुण → दिवः + ग्मः (पृथ्वी) दोनों के अधिपति

अर्थात् वरुण का क्षेत्र केवल जल तक सीमित नहीं है; उनका स्वरूप विश्वव्यापी शासन और ऋत से जुड़ा है।


मन्त्र 21 ⭐⭐⭐ सबसे महत्वपूर्ण

उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत।
अवाधमानि जीवसे॥२१॥

सरल हिन्दी अर्थ

हे वरुण! हमारे ऊपरी पाश को खोल दो, मध्य के पाश को खोल दो और नीचे के पाश को भी हटा दो, ताकि हम बिना बाधा के जीवित रह सकें। (Wikisource)

⭐⭐⭐ UGC NET के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण

यहाँ वरुण-पाश का स्पष्ट उल्लेख है।

वरुण → पाश → बन्धन → मुक्ति

यह इस सूक्त का बहुत महत्वपूर्ण concluding idea है।


🔥 मन्त्र 10–21 का Master Revision

मन्त्रमुख्य विषयNET Keyword
10वरुण का शासनसाम्राज्य, धृतव्रत
11भूत-भविष्य का ज्ञानसर्वज्ञता
12शुभ मार्ग और आयुसुपथा, आयु
13वरुण का स्वरूपहिरण्य वस्त्र, स्पशः
14सुरक्षारक्षक
15यशकीर्ति
16वरुण की ओर प्रार्थनागाय–गव्यूति उपमा
17स्तुतिहोता
18वरुण का दर्शनविश्वदर्शत
19सहायता/कृपा की प्रार्थनाश्रुधि, मृळय
20विश्व पर शासनदिवः + पृथ्वी
21पाश से मुक्ति⭐ वरुण-पाश

🧠 पूरे 1.25 को एक कहानी की तरह याद करो

मन्त्र 1–2
→ मनुष्य अपनी भूल स्वीकार करता है और वरुण के क्रोध से बचने की प्रार्थना करता है।

मन्त्र 3–6
→ वरुण को प्रसन्न करने, उनकी कृपा पाने और उनके व्रत का वर्णन।

मन्त्र 7–9
→ वरुण की सर्वज्ञता — पक्षियों, नावों, महीनों और वायु के मार्ग तक का ज्ञान।

मन्त्र 10–15
→ वरुण साम्राट्, सर्वदर्शी और रक्षक हैं।

मन्त्र 16–20
→ उपासक वरुण की ओर मुड़ता है और उनसे सुनने, कृपा करने तथा रक्षा करने की प्रार्थना करता है।

मन्त्र 21
→ ⭐ वरुण-पाश से मुक्ति की अंतिम प्रार्थना।

🎯

वरुण = ऋत + व्रत + सर्वज्ञता + साम्राज्य + स्पशः + पाश + क्षमा/मुक्ति

“उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं…”
→ वरुण से पाशों से मुक्त करने की प्रार्थना।

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