संज्ञाप्रकरणम् (अष्टाध्यायी)
Introduction
संज्ञाप्रकरणम् पाणिनीय व्याकरण का प्रथम और अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग है। इस प्रकरण में महर्षि पाणिनि ने अनेक तकनीकी शब्दों (Technical Terms) की परिभाषा दी है। इन संज्ञाओं को समझे बिना अष्टाध्यायी के किसी भी सूत्र का सही अर्थ समझना सम्भव नहीं है।
सरल शब्दों में
संज्ञा = किसी विशेष वस्तु, वर्ण, शब्द अथवा व्याकरणीय प्रक्रिया को दिया गया निश्चित नाम।
उदाहरण—
- अच्
- हल्
- पद
- संयोग
- सवर्ण
- उदात्त
- अनुदात्त
- स्वरित
ये सभी संज्ञाएँ हैं।
१. माहेश्वरसूत्राणि
महर्षि पाणिनि ने सम्पूर्ण संस्कृत वर्णमाला को 14 माहेश्वर सूत्रों में व्यवस्थित किया।
१४ माहेश्वरसूत्र
१. अइउण्२. ऋऌक्३. एओङ्४. ऐऔच्५. हयवरट्६. लण्७. ञमङणनम्८. झभञ्९. घढधष्१०. जबगडदश्११. खफछठथचटतव्१२. कपय्१३. शषसर्१४. हल्
महत्व
इन सूत्रों के आधार पर प्रत्याहार बनते हैं।
उदाहरण
- अच्
- हल्
- इक्
- यण्
- झल्
- जश्
यदि माहेश्वरसूत्र ज्ञात नहीं होंगे तो अष्टाध्यायी के अधिकांश सूत्र समझना कठिन होगा।
२. हलन्त्यम् (१.३.३)
सूत्र
हलन्त्यम्
हिन्दी अर्थ
किसी प्रत्यय या उपदेश के अन्त में स्थित व्यंजन को इत् संज्ञा प्राप्त होती है।
सरल व्याख्या
यदि किसी प्रत्यय के अन्त में व्यंजन हो तो वह उच्चारण में प्रयुक्त नहीं होता। वह केवल व्याकरणीय कार्य बताता है।
उदाहरण
क्तअन्तिम 'त्'→ इत्
३. अदर्शनं लोपः (१.१.६०)
सूत्र
अदर्शनं लोपः
हिन्दी अर्थ
जिसका दिखाई न देना (लुप्त हो जाना) लोप कहलाता है।
सरल व्याख्या
जब कोई वर्ण नियम के अनुसार हट जाता है, उसे लोप कहते हैं।
उदाहरण
राम + स→ रामः
बीच की प्रक्रिया में कुछ वर्णों का लोप होता है।
४. तस्य लोपः (१.३.९)
सूत्र
तस्य लोपः
हिन्दी अर्थ
जिस वर्ण को इत् संज्ञा प्राप्त होती है उसका लोप हो जाता है।
उदाहरण
क्त्वाइत् वर्ण↓लोप
५. आदिरन्त्येन सहेता (१.१.७१)
सूत्र
आदिरन्त्येन सहेता
हिन्दी अर्थ
प्रत्याहार में प्रथम वर्ण से लेकर अन्तिम इत् वर्ण से पहले तक के सभी वर्ण ग्रहण किए जाते हैं।
महत्व
इसी सूत्र से अच्, हल्, इक्, यण्, झल् आदि प्रत्याहार बनते हैं।
उदाहरण
अच्अ↓च्=अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ
६. ऊकालोऽज्झस्वदीर्घप्लुतः (१.२.२७)
हिन्दी अर्थ
स्वर तीन प्रकार के होते हैं—
- ह्रस्व
- दीर्घ
- प्लुत
उदाहरण
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| ह्रस्व | अ |
| दीर्घ | आ |
| प्लुत | आ३ |
७. उच्चैरुदात्तः (१.२.२९)
अर्थ
जो स्वर ऊँचे स्वर में बोला जाए उसे उदात्त कहते हैं।
उदाहरण
वैदिक पाठ में।
८. नीचैरनुदात्तः (१.२.३०)
अर्थ
जो स्वर नीचे स्वर में बोला जाए वह अनुदात्त कहलाता है।
९. समाहारः स्वरितः (१.२.३१)
अर्थ
उदात्त और अनुदात्त के संयोग से बनने वाला स्वर स्वरित कहलाता है।
१०. मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (१.१.८)
अर्थ
जो वर्ण मुख और नासिका दोनों से उच्चारित हो वह अनुनासिक कहलाता है।
उदाहरण
ङञणनम
११. तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१.१.९)
अर्थ
जिन वर्णों का उच्चारण स्थान और प्रयत्न समान हो, वे सवर्ण कहलाते हैं।
उदाहरण
अ - आइ - ईउ - ऊ
१२. अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः (१.१.६९)
अर्थ
अण् प्रत्याहार तथा उदित् वर्णों के साथ उनके सवर्ण वर्ण भी ग्रहण किए जाते हैं, यदि वे प्रत्यय न हों।
महत्व
यह सूत्र सवर्ण ग्रहण का आधार है।
१३. परः सन्निकर्षः संहिता (१.४.१०९)
अर्थ
जब दो वर्ण बिना किसी अन्तर के एक साथ हों, उसे संहिता कहते हैं।
उदाहरण
रामः अस्ति↓रामोऽस्ति
१४. हलोऽनन्तराः संयोगः (१.१.७)
अर्थ
दो या दो से अधिक व्यंजन बिना स्वर के लगातार आएँ तो उसे संयोग कहते हैं।
उदाहरण
क्तस्तज्ञत्र
१५. सुप्तिङन्तं पदम् (१.४.१४)
सूत्र
सुप्तिङन्तं पदम्
हिन्दी अर्थ
जिस शब्द के अन्त में सुप् (सुबन्त) अथवा तिङ् (तिडन्त) प्रत्यय हो, उसे पद कहते हैं।
उदाहरण
सुबन्त
रामःफलम्बालकः
तिडन्त
गच्छतिपठतिलिखति
निष्कर्ष
संज्ञाप्रकरणम् अष्टाध्यायी का आधार है। इसमें वर्णों, स्वरों, प्रत्याहारों, संयोग, संहिता, पद, सवर्ण आदि की परिभाषाएँ दी गई हैं। इन संज्ञाओं का ज्ञान होने पर ही विद्यार्थी संधि, समास, प्रत्यय, धातु, कारक तथा अन्य व्याकरणिक विषयों का अध्ययन सरलता से कर सकता है।
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