श्लोक
गुणा गुणेषु गुणा भवन्ति।
ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।
सुखादतोयाः प्रभवन्ति नद्यः।
समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः॥यह श्लोक सद्गुणों और दुर्गुणों के प्रभाव को बताता है।
पदच्छेद एवं शब्दार्थ
- गुणाः = अच्छे गुण
- गुणेषु = गुणवान लोगों में
- गुणाः भवन्ति = और अधिक श्रेष्ठ बन जाते हैं।
- ते = वही गुण
- निर्गुणम् = गुणहीन व्यक्ति को
- प्राप्य = प्राप्त होकर / मिलकर
- भवन्ति दोषाः = दोष (अवगुण) बन जाते हैं।
- सुखाद् तोयाः = मीठे जल से
- प्रभवन्ति = उत्पन्न होती हैं।
- नद्यः = नदियाँ
- समुद्रम् आसाद्य = समुद्र में पहुँचकर
- भवन्ति अपेयाः = पीने योग्य नहीं रहतीं।
सरल हिन्दी भावार्थ
अच्छे गुण, गुणवान व्यक्तियों के पास जाकर और अधिक चमकते हैं। वही गुण यदि किसी गुणहीन व्यक्ति में आ जाएँ, तो वे दोष का रूप ले लेते हैं। जैसे मीठे जल वाली नदियाँ समुद्र में मिलकर खारे जल के कारण पीने योग्य नहीं रहतीं।
उदाहरण से समझें
1. गुणवान व्यक्ति
यदि किसी व्यक्ति के पास ज्ञान, विनम्रता और साहस है, तो ये गुण समाज के लिए लाभदायक होते हैं।
2. गुणहीन व्यक्ति
यदि किसी अहंकारी या दुष्ट व्यक्ति के पास बुद्धि हो, तो वह उसी बुद्धि का उपयोग छल-कपट या दूसरों को नुकसान पहुँचाने में कर सकता है। तब वही बुद्धि दोष बन जाती है।
3. श्लोक का उदाहरण
- नदी का जल → मीठा और पीने योग्य।
- समुद्र में मिलने के बाद → खारा हो जाता है।
- इसी प्रकार संगति (किसके साथ रहते हैं) हमारे गुणों का प्रभाव बदल सकती है।
मुख्य शिक्षा (Moral)
- अच्छी संगति से गुणों का विकास होता है।
- बुरी संगति से वही गुण भी दोष में बदल सकते हैं।
- इसलिए सदैव गुणवान और श्रेष्ठ लोगों की संगति करनी चाहिए।
एक पंक्ति में परीक्षा हेतु भावार्थ
“गुणवान व्यक्तियों में गुणों की शोभा बढ़ती है, जबकि गुणहीन व्यक्तियों में वही गुण दोष बन जाते हैं; जैसे मीठे जल की नदियाँ समुद्र में मिलकर खारी और अपेय हो जाती हैं।”
यह श्लोक साहित्य (विद्या) के महत्त्व को बताता है।
श्लोक
साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः
साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः
तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥
पदच्छेद
साहित्य-सङ्गीत-कला-विहीनः।
साक्षात् पशुः पुच्छ-विषाण-हीनः।
तृणम् न खादन् अपि जीवमानः।
तत् भागधेयम् परम् पशूनाम्॥
शब्दार्थ
- साहित्य = विद्या, ज्ञान, साहित्य
- संगीत = संगीत
- कला = कलाएँ
- विहीनः = रहित, जिसके पास न हो
- साक्षात् = प्रत्यक्ष रूप से
- पशुः = पशु
- पुच्छ = पूँछ
- विषाण = सींग
- हीनः = रहित
- तृणम् = घास
- न खादन् = घास नहीं खाता
- अपि = भी
- जीवमानः = जीवित रहते हुए
- तत् भागधेयम् = यह पशुओं का सौभाग्य है
- परम् = बहुत बड़ा
सरल हिन्दी भावार्थ
जिस मनुष्य के पास साहित्य (ज्ञान), संगीत और कला का ज्ञान नहीं है, वह पूँछ और सींग रहित पशु के समान है। वह घास तो नहीं खाता, फिर भी जीवित रहता है। यह तो पशुओं का बड़ा सौभाग्य है कि ऐसा मनुष्य उन्हें खाने के लिए नहीं आता।
सरल व्याख्या
इस श्लोक में कवि कहना चाहता है कि—
- साहित्य मनुष्य को ज्ञान देता है।
- संगीत उसके मन को कोमल और संवेदनशील बनाता है।
- कला उसके व्यक्तित्व को सुंदर और रचनात्मक बनाती है।
यदि किसी मनुष्य में ये तीनों नहीं हैं, तो उसका जीवन केवल खाने-पीने और जीने तक सीमित रह जाता है। ऐसा जीवन पशु के जीवन जैसा माना गया है।
मुख्य शिक्षा (Moral)
- मनुष्य की वास्तविक पहचान ज्ञान, संगीत और कला से होती है।
- शिक्षा और संस्कृति मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती हैं।
- केवल जीवित रहना ही जीवन नहीं है, बल्कि ज्ञान और संस्कारों से युक्त जीवन ही सार्थक जीवन है।
परीक्षा हेतु संक्षिप्त भावार्थ
“जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से रहित है, वह पूँछ और सींग रहित पशु के समान है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को ज्ञान, संगीत और कलाओं का अध्ययन करके अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना चाहिए।”
श्लोक
लुब्धस्य नश्यति यशः पिशुनस्य मैत्री।
नष्टक्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः।
विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यं।
राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य॥
पदच्छेद
लुब्धस्य नश्यति यशः।
पिशुनस्य मैत्री।
नष्ट-क्रियस्य कुलम्।
अर्थ-परस्य धर्मः।
विद्या-फलम् व्यसनिनः।
कृपणस्य सौख्यम्।
राज्यम् प्रमत्त-सचिवस्य नराधिपस्य॥
शब्दार्थ
- लुब्धस्य = लोभी व्यक्ति का
- नश्यति = नष्ट हो जाता है
- यशः = यश, प्रतिष्ठा
- पिशुनस्य = चुगलखोर (निंदा करने वाले) का
- मैत्री = मित्रता
- नष्टक्रियस्य = जिसने अपने धार्मिक/सदाचार के कर्म छोड़ दिए हों
- कुलम् = कुल की प्रतिष्ठा
- अर्थपरस्य = जो केवल धन को ही सब कुछ मानता है
- धर्मः = धर्म
- विद्याफलम् = विद्या का फल
- व्यसनिनः = व्यसनी व्यक्ति का
- कृपणस्य = कंजूस व्यक्ति का
- सौख्यम् = सुख
- राज्यम् = राज्य
- प्रमत्तसचिवस्य = लापरवाह मंत्रियों वाला
- नराधिपस्य = राजा का
सरल हिन्दी भावार्थ
लोभी व्यक्ति का यश नष्ट हो जाता है। चुगलखोर व्यक्ति की मित्रता टिकती नहीं। जो अपने कर्तव्यों और अच्छे कर्मों को छोड़ देता है, उसके कुल की प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है। जो केवल धन को ही सब कुछ मानता है, उसका धर्म नष्ट हो जाता है। व्यसनी व्यक्ति अपनी विद्या का लाभ नहीं उठा पाता। कंजूस व्यक्ति कभी सुखी नहीं रहता। और जिस राजा के मंत्री लापरवाह होते हैं, उसका राज्य नष्ट हो जाता है।
सरल व्याख्या
इस श्लोक में कवि सात महत्वपूर्ण बातें बताते हैं—
- लोभ → यश (प्रतिष्ठा) को नष्ट करता है।
- चुगली → मित्रता को समाप्त कर देती है।
- कर्तव्य त्याग → परिवार और कुल की प्रतिष्ठा को नष्ट करता है।
- धन का अत्यधिक मोह → धर्म का नाश कर देता है।
- व्यसन (नशा आदि) → विद्या का लाभ समाप्त कर देता है।
- कंजूसी → सुख को नष्ट कर देती है।
- अयोग्य या लापरवाह मंत्री → पूरे राज्य का विनाश कर सकते हैं।
मुख्य शिक्षा (Moral)
- लोभ, चुगली और व्यसन से दूर रहना चाहिए।
- धन कमाना आवश्यक है, परन्तु धर्म और नैतिकता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
- अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
- अच्छे सलाहकार और योग्य सहयोगी किसी भी संस्था या शासन की सफलता के लिए आवश्यक हैं।
परीक्षा हेतु संक्षिप्त भावार्थ
“लोभ से यश, चुगली से मित्रता, कर्तव्यहीनता से कुल की प्रतिष्ठा, धनलोभ से धर्म, व्यसन से विद्या का फल, कंजूसी से सुख तथा लापरवाह मंत्रियों के कारण राजा का राज्य नष्ट हो जाता है। इसलिए मनुष्य को इन सभी दोषों से बचना चाहिए।”
(4) श्लोक
श्लोक
पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं
माधुर्यमेव जनयन्ति मधुमक्षिकास्ताः।
सन्तस्तथैव समदर्शनदुर्जनानां
श्रुत्वा वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति॥
(कुछ पुस्तकों में पाठभेद मिल सकता है, लेकिन भाव यही है।)
शब्दार्थ
- पीत्वा = पीकर
- रसम् = रस
- कटुकम् = कड़वा
- मधुरम् = मीठा
- समानम् = समान रूप से
- माधुर्यम् = मिठास
- जनयन्ति = उत्पन्न करती हैं
- मधुमक्षिकाः = मधुमक्खियाँ
- सन्तः = सज्जन लोग
- समदर्शनाः = सबके प्रति समान दृष्टि रखने वाले
- दुर्जनानाम् = दुर्जनों के
- श्रुत्वा = सुनकर
- वचः = वचन
- मधुरसूक्तरसम् = मधुर वाणी
- सृजन्ति = उत्पन्न करते हैं
सरल हिन्दी भावार्थ
जैसे मधुमक्खियाँ कड़वे और मीठे दोनों प्रकार के फूलों का रस पीकर भी केवल मीठा शहद ही बनाती हैं, उसी प्रकार सज्जन लोग अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोगों के बीच रहकर भी सदैव मधुर वचन ही बोलते हैं।
व्याख्या
- मधुमक्खी हर प्रकार के फूलों से रस लेती है।
- लेकिन वह शहद ही बनाती है, विष नहीं।
- उसी प्रकार महान व्यक्ति बुरे वातावरण में भी अपनी मधुरता और अच्छे स्वभाव को नहीं छोड़ते।
मुख्य शिक्षा
सज्जन व्यक्ति परिस्थितियाँ कैसी भी हों, अपनी मधुर वाणी और अच्छे आचरण को नहीं छोड़ते।
(5) श्लोक
श्लोक
विहाय पौरुषं यो हि दैवमेवावलम्बते।
प्रासादसिंहवत् तस्य मूर्ध्नि तिष्ठन्ति वायसाः॥
पदच्छेद
विहाय पौरुषम्।
यः हि दैवम् एव अवलम्बते।
प्रासाद-सिंहवत्।
तस्य मूर्ध्नि तिष्ठन्ति वायसाः॥
शब्दार्थ
- विहाय = छोड़कर
- पौरुषम् = पुरुषार्थ, परिश्रम
- यः = जो
- दैवम् = भाग्य
- एव = ही
- अवलम्बते = सहारा लेता है
- प्रासाद = महल
- सिंहवत् = महल के सिंह (पत्थर की सिंह-प्रतिमा) के समान
- तस्य = उसके
- मूर्ध्नि = सिर पर
- तिष्ठन्ति = बैठते हैं
- वायसाः = कौए
सरल हिन्दी भावार्थ
जो व्यक्ति पुरुषार्थ (मेहनत) छोड़कर केवल भाग्य के भरोसे रहता है, उसकी दशा महल के पत्थर के सिंह जैसी होती है, जिसके सिर पर कौए आकर बैठ जाते हैं।
व्याख्या
- महल का पत्थर का सिंह देखने में शक्तिशाली लगता है।
- लेकिन वह निष्क्रिय होता है, इसलिए कौए भी उसके सिर पर बैठ जाते हैं।
- उसी प्रकार जो व्यक्ति मेहनत नहीं करता और केवल भाग्य पर निर्भर रहता है, वह सम्मान और सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।
मुख्य शिक्षा
- भाग्य से अधिक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ (मेहनत) है।
- केवल भाग्य के भरोसे रहने वाला व्यक्ति जीवन में आगे नहीं बढ़ सकता।
परीक्षा हेतु संक्षिप्त भावार्थ
श्लोक 4
“जैसे मधुमक्खियाँ कड़वे और मीठे दोनों फूलों का रस लेकर भी मीठा शहद बनाती हैं, वैसे ही सज्जन व्यक्ति हर परिस्थिति में मधुर वचन बोलते हैं और अपना श्रेष्ठ स्वभाव बनाए रखते हैं।”
श्लोक 5
“जो व्यक्ति परिश्रम छोड़कर केवल भाग्य पर निर्भर रहता है, वह सम्मान और सफलता से वंचित रह जाता है। इसलिए जीवन में पुरुषार्थ ही सफलता का वास्तविक आधार है।”
(6) श्लोक
श्लोक
पुष्पपत्रफलच्छायामूलवल्कलदारुभिः।
धन्या महीरुहाः येषां विमुखं यान्ति नार्थिनः॥
पदच्छेद
पुष्प-पत्र-फल-च्छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः।
धन्याः महीरुहाः।
येषाम् विमुखम् यान्ति न अर्थिनः॥
शब्दार्थ
- पुष्प = फूल
- पत्र = पत्ते
- फल = फल
- च्छाया = छाया
- मूल = जड़
- वल्कल = वृक्ष की छाल
- दारु = लकड़ी
- धन्याः = धन्य, श्रेष्ठ
- महीरुहाः = वृक्ष
- येषाम् = जिनके
- अर्थिनः = याचक, आवश्यकता वाले लोग
- विमुखम् = निराश होकर
- यान्ति = जाते हैं
- न = नहीं
सरल हिन्दी भावार्थ
वे वृक्ष धन्य हैं, जो अपने फूल, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल और लकड़ी आदि से लोगों का उपकार करते हैं। उनके पास आने वाला कोई भी याचक कभी निराश होकर नहीं लौटता।
व्याख्या
इस श्लोक में वृक्षों की परोपकारी प्रकृति का वर्णन किया गया है।
- वृक्ष अपने लिए नहीं जीते।
- वे सभी को फूल, फल, छाया, लकड़ी, औषधि और अनेक प्रकार के लाभ देते हैं।
- वे बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का कल्याण करते हैं।
इसी प्रकार मनुष्य को भी परोपकारी बनना चाहिए।
मुख्य शिक्षा
वृक्षों की तरह निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना ही महानता है।
(7) श्लोक
श्लोक
चिन्तनीया हि विपदामादावेव प्रतिक्रिया।
न कूपखननं युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे॥
पदच्छेद
चिन्तनीया हि विपदाम्।
आदौ एव प्रतिक्रिया।
न कूप-खननम् युक्तम्।
प्रदीप्ते वह्निना गृहे॥
शब्दार्थ
- चिन्तनीया = विचार करनी चाहिए
- हि = निश्चय ही
- विपदाम् = विपत्तियों की
- आदौ एव = प्रारम्भ में ही
- प्रतिक्रिया = उपाय, समाधान
- कूपखननम् = कुआँ खोदना
- युक्तम् = उचित
- प्रदीप्ते = जलते हुए
- वह्निना = आग से
- गृहे = घर में
सरल हिन्दी भावार्थ
विपत्ति आने से पहले ही उसके उपाय के बारे में सोच लेना चाहिए। जब घर में आग लग जाए, तब कुआँ खोदना उचित नहीं होता।
व्याख्या
यह श्लोक हमें पूर्व तैयारी (Preparation) का महत्व बताता है।
- समझदार व्यक्ति संकट आने से पहले ही तैयारी कर लेता है।
- संकट आने के बाद उपाय करना अक्सर देर हो जाती है।
- जैसे आग लगने के बाद पानी के लिए कुआँ खोदना व्यर्थ है।
मुख्य शिक्षा
- संकट आने से पहले तैयारी करनी चाहिए।
- समय पर किया गया कार्य ही सफल होता है।
- दूरदर्शिता और पूर्व योजना सफलता की कुंजी है।
परीक्षा हेतु संक्षिप्त भावार्थ
श्लोक 6
“वृक्ष अपने फूल, फल, पत्ते, छाया, छाल और लकड़ी आदि से सबका उपकार करते हैं। इसलिए मनुष्य को भी वृक्षों की भाँति निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करनी चाहिए।”
श्लोक 7
“विपत्ति आने से पहले ही उसके निवारण का उपाय कर लेना चाहिए, क्योंकि संकट आने के बाद उपाय करना उतना लाभदायक नहीं होता; जैसे घर में आग लगने के बाद कुआँ खोदना व्यर्थ है।”
2. श्लोकेषु रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः।
(ख) ________ वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।
उत्तर: सन्तः
(ग) तद्भागधेयं परमं पशूनाम्।
(घ) विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यम्।
(ङ) पीत्वा विविधं रसं मधुरसूक्तरसं (यदि पुस्तक में “मधुरं” है तो वही लिखें)
(च) चिन्तनीया हि विपदाम् आदावेव प्रतिक्रिया।
3. प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत
(क) व्यसनिनः किं नश्यति?
उत्तर: विद्याफलम्।
(ख) कस्य यशः नश्यति?
उत्तर: लुब्धस्य।
(ग) मधुमक्षिका किं जनयति?
उत्तर: माधुर्यम्।
(घ) मधुमक्षिकावत् के सृजन्ति?
उत्तर: सन्तः।
(ङ) अर्थिनः केभ्यः विमुखाः न यान्ति?
उत्तर: महीरुहेभ्यः।
4. तत्सम-शब्दानि
| शब्द | तत्सम |
|---|---|
| कपड़ा | कर्पटः / वस्त्रम् (पुस्तक के अनुसार) |
| कुत्ता | श्वानः |
| पूँछ | पुच्छम् |
| लोभी | लुब्धः |
| मधुमक्खी | मधुमक्षिका |
| चिन्ता | चिन्ता |
5. कर्तृ तथा क्रिया
| वाक्य | कर्ता | क्रिया |
|---|---|---|
| मधुमक्षिका मधुरं सृजति। | मधुमक्षिका | सृजति |
| निर्धनः नवं भवनं याचते। | निर्धनः | याचते |
| वृक्षाः गुणाः भवन्ति। | वृक्षाः | भवन्ति |
| मधुमक्षिका माधुर्यं जनयति। | मधुमक्षिका | जनयति |
| पिशुनस्य मैत्री यशः नश्यति। | मैत्री | नश्यति |
| नद्यः समुद्रमासाद्य अपेयाः भवन्ति। | नद्यः | भवन्ति |
6. एकवचन से बहुवचन
(क) गुणः → गुणाः
(ख) नदी → नद्यः
(ग) उपकारः → उपकाराः
(घ) मधुमक्षिका → मधुमक्षिकाः
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