संस्कृत व्याकरण में सन्नन्त (सन् + अन्त) प्रक्रिया भी ण्यन्त की तरह ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण सनाद्यन्त धातु प्रक्रिया है। जब किसी धातु से ‘इच्छा’ (Desire) के अर्थ में ‘सन्’ प्रत्यय लगाया जाता है, तो उसे सन्नन्त रूप कहते हैं।
जैसे: पठितुम् इच्छति = पिपठिषति (वह पढ़ने की इच्छा करता है)।
सन्नन्त रूपों की सिद्धि में द्वित्व (Doubling) और षत्व (स को ष होना) कार्य मुख्य होते हैं। आइए सन्नन्त के सबसे प्रसिद्ध और मानक रूप ‘पिपठिषति’ की पूरी पद-सिद्धि (रूपसिद्धि) को सूत्रों के साथ समझते हैं।
उदाहरण: ‘पिपठिषति’ (पठ् धातु + सन् + लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)
प्रकृति: पठ् धातु (पढ़ना), इच्छा अर्थ में।
१. सन् प्रत्यय विधान और अनुबन्ध लोप
- सूत्र:
धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा (३.१.७) - कार्य: समान कर्ता वाले इच्छा अर्थ में धातु से परे ‘सन्’ प्रत्यय होता है।
- स्थिति:
पठ् + सन् - अनुबन्ध लोप: ‘सन्’ के ‘न्’ की
हलन्त्यम्से इत्संज्ञा औरतस्य लोपःसे लोप हो जाता है। केवल ‘स’ शेष रहता है। - स्थिति:
पठ् + स
२. इट् (इ) का आगम
- सूत्र:
आर्धधातुकस्येड्वलादेः (७.२.३५) - कार्य: वलादि आर्धधातुक प्रत्यय (‘स’) परे होने के कारण धातु को ‘इट्’ (इ) का आगम होता है।
- स्थिति:
पठ् + इ + स➔पठिस
३. द्वित्व कार्य (Doubling)
- सूत्र:
सन्यङोः (६.१.९) - कार्य: सन् प्रत्यय परे होने पर अनभ्यास धातु के प्रथम एकाच् (प्रथम स्वर सहित हिस्से) को द्वित्व (double) होता है। यहाँ ‘पठि’ को द्वित्व होगा।
- स्थिति:
पठि + पठिस
४. अभ्यास कार्य (अभ्यास संज्ञा और ह्रस्व)
- सूत्र:
पूर्वोऽभ्यासः (६.१.४)से पहले वाले ‘पठि’ की अभ्यास संज्ञा होती है। - सूत्र:
हलादिः शेषः (७.४.६०)से अभ्यास के आदि हल् (व्यंजन) ‘प’ को छोड़कर बाकी व्यंजनों (‘ठ्’) का लोप हो जाता है। - स्थिति:
प + पठिस
५. अभ्यास के ‘अ’ को ‘इ’ (अभ्यास-इत्त्व)
- सूत्र:
सन्यतः (७.४.७९) - कार्य: सन् प्रत्यय परे होने पर अभ्यास के ‘अ’ (प का ‘अ’) को ‘इ’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति:
पि + पठिस➔पिपठिस - (अब ‘सनाद्यन्ता धातवः’ सूत्र से ‘पिपठिस’ की पुनः धातु संज्ञा हो जाती है)
६. षत्व विधान (स को ष)
- सूत्र:
आदेशप्रत्यययोः (८.३.५९) - कार्य: इण् प्रत्याहार (यहाँ ‘पठि’ का ‘इ’) से परे प्रत्यय के सकार (‘स’) को मूर्धन्य ‘ष’ आदेश होता है।
- स्थिति:
पिपठि + ष➔पिपठिष(यह नया सन्नन्त धातु अङ्ग बना)।
७. लकार, प्रत्यय और शप् (विकरण)
- लकार:
वर्त्तमाने लट्से लट् लकार औरतिप्तस्झि...से प्रथम पुरुष एकवचन में ‘तिप्’ प्रत्यय। (प् का लोप ➔ ‘ति’)। - स्थिति:
पिपठिष + ति - विकरण:
कर्त्तरि शप्से ‘शप्’ (अ) का आगम। - स्थिति:
पिपठिष + अ + ति
८. वर्ण सम्मेलन (अन्तिम रूप)
पिपठिषके अन्तिम ‘अ’ और शप् के ‘अ’ मेंअतो गुणेसूत्र से पररूप एकादेश (दोनों ‘अ’ मिलकर एक ‘अ’) हो जाता है।- स्थिति:
पिपठिष + ति➔पिपठिषति
इति रूपसिद्धम्। (इस प्रकार ‘पिपठिषति’ रूप सिद्ध होता है)।
सन्नन्त के कुछ अन्य प्रमुख उदाहरण (परीक्षा की दृष्टि से)
सन्नन्त प्रक्रिया में कुछ धातुओं के रूप थोड़े अलग और विशिष्ट बनते हैं, जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं:
- जिगमिषति (गम् + सन्): जाने की इच्छा करता है।
- चिकीर्षति (कृ + सन्): करने की इच्छा करता है (यहाँ दीर्घ और र्परत्व कार्य होता है)।
- बुभूषति (भू + सन्): होने या रहने की इच्छा करता है।
- जिज्ञासते (ज्ञा + सन्): जानने की इच्छा करता है (यह आत्मनेपद में चलता है)।
क्या आपको इनमें से किसी विशिष्ट धातु (जैसे कृ या ज्ञा) की रूपसिद्धि विस्तार से समझनी है?

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