संस्कृत व्याकरण में यङन्त प्रक्रिया की पूर्ण रूपसिद्धि परीक्षा में अक्सर १० से १५ नंबर के दीर्घ उत्तरीय (Long Answer) प्रश्नों में पूछी जाती है। इसे कॉपी में बिल्कुल साफ-सुथरे और क्रमानुसार सूत्रों के साथ लिखना होता है।
यहाँ हम यङन्त के दो सबसे प्रामाणिक और प्रसिद्ध उदाहरणों (देदीप्यते और बोभूयते) की पूर्ण शास्त्रसम्मत रूपसिद्धि को समझेंगे।
१. देदीप्यते (दीप् धातु + यङ्) — ‘बार-बार अत्यधिक चमकना’
अर्थ: पौनःपुन्य (बार-बार) या भृशार्थ (अत्यधिक) चमकने के अर्थ में।
1.प्रत्यय विधान और अनुबन्ध लोप:दीप् + यङ्.
- सूत्र:
धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् (३.१.२२) - कार्य: क्रियासमभिहार (बार-बार या अत्यधिक होना) अर्थ में एकाच् और हलादि धातु से परे यङ् प्रत्यय होता है।
- अनुबन्ध लोप: ‘यङ्’ के ‘ङ्’ की
हलन्त्यम्से इत्संज्ञा औरतस्य लोपःसे लोप हो जाता है। केवल ‘य’ शेष रहता है। - स्थिति:
दीप् + य
2.द्वित्व (डबल करना):दीप् + दीप्य.
- सूत्र:
सन्यङोः (६.१.९) - कार्य: यङ् प्रत्यय परे होने पर अनभ्यास धातु (दीप्) को द्वित्व होता है।
- स्थिति:
दीप् + दीप् + य➔दीप् + दीप्य
3.अभ्यास कार्य (संज्ञा और ह्रस्व):दिप् + दीप्य.
- सूत्र:
पूर्वोऽभ्यासः (६.१.४)से पूर्व भाग (‘दीप्’) की अभ्यास संज्ञा होती है। - सूत्र:
हलादिः शेषः (७.४.६०)से अभ्यास के आदि व्यंजन ‘द्’ को छोड़कर अन्तिम व्यंजन ‘प्’ का लोप हो जाता है। - स्थिति:
दी + दीप्य - सूत्र:
ह्रस्वः (७.४.५९)से अभ्यास के दीर्घ ‘ई’ को ह्रस्व होकर ‘इ’ आदेश होता है। - स्थिति:
दि + दीप्य - (यहाँ
सनाद्यन्ता धातवःसे इस पूरे समुदाय ‘दिदीप्य’ की पुनः धातु संज्ञा होती है)
4.अभ्यास को गुण कार्य:दि ➔ दे.
- सूत्र:
सनि च (७.४.८२) - कार्य: सन् और यङ् प्रत्यय परे होने पर अभ्यास के इकार/उकार को गुण आदेश होता है। यहाँ ‘दि’ के ‘इ’ को गुण ‘ए’ हो जाता है।
- स्थिति:
दे + दीप्य➔देदीप्य(यह नया यङन्त धातु अङ्ग बना)।
5.लकार और आत्मनेपद प्रत्यय:देदीप्य + त.
- सूत्र:
वर्त्तमाने लट्से लट् लकार। - सूत्र:
अनुदात्तङित आत्मनेपदम् (१.३.१२)क्योंकि यङ् प्रत्यय ‘ङित्’ (ङ की इत्संज्ञा वाला) है, इसलिए इससे परे आत्मनेपद के ही प्रत्यय आते हैं। प्रथम पुरुष एकवचन की विवक्षा में ‘त’ प्रत्यय आता है। - स्थिति:
देदीप्य + लट्➔देदीप्य + त
6.विकरण आगमन और टेरेत्व:देदीप्यते.
- सूत्र:
कर्त्तरि शप् (३.१.६८)से ‘शप्’ (अ) विकरण का आगम होता है। - स्थिति:
देदीप्य + अ + त➔देदीप्य + त(यहाँअतो गुणेसे पररूप एकादेश होकर दोनों ‘अ’ मिलकर एक ही ‘अ’ रहते हैं)। - सूत्र:
टित आत्मनेपदानां टेरे (३.४.७९)से लट् (टित्) लकार के आत्मनेपद प्रत्यय ‘त’ की टि (अन्तिम स्वर ‘अ’) को ‘ए’ आदेश हो जाता है (त + ए = ते)। - वर्ण सम्मेलन:
देदीप्य + ते➔ देदीप्यते
इति रूपसिद्धम्।
२. बोभूयते (भू धातु + यङ्) — ‘बार-बार होना’
भू धातु का उदाहरण परीक्षा में सबसे ज्यादा पूछा जाता है क्योंकि इसमें अभ्यास को गुण करने का एक अलग विशेष सूत्र लगता है।
1.यङ् प्रत्यय और अनुबन्ध लोप:भू + य.
- सूत्र:
धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ्से भू धातु से परे ‘यङ्’ प्रत्यय और अनुबन्ध लोप होकर ‘य’ शेष रहा। - स्थिति:
भू + य
2.द्वित्व और हलादिः शेषः:भू + भूय.
- सूत्र:
सन्यङोःसे धातु को द्वित्व हुआ ➔भू + भू + य। - सूत्र:
पूर्वोऽभ्यासःसे पूर्व भाग की अभ्यास संज्ञा। - स्थिति:
भू + भूय
3.अभ्यास ह्रस्व और जश्त्व:भु ➔ बु.
- सूत्र:
ह्रस्वःसे अभ्यास के ‘ऊ’ को ह्रस्व ‘उ’ हुआ ➔भु + भूय। - सूत्र:
अभ्यासे चर्च (८.४.५४)से अभ्यास के चतुर्थ वर्ण (महाप्राण ‘भ’) के स्थान पर उसी वर्ग का तृतीय वर्ण (अल्पप्राण ‘ब’) जश्त्व/चर्त्व आदेश होता है। - स्थिति:
बु + भूय - (यहाँ
सनाद्यन्ता धातवःसे ‘बुभूय’ की धातु संज्ञा हुई)
4.विशेष सूत्र द्वारा गुण कार्य:बु ➔ बो.
- सूत्र:
गुणो यङ्लुकोः (७.४.८२) - कार्य: यङ् प्रत्यय या यङ्-लुक् परे होने पर अभ्यास के अङ्ग को गुण होता है। यहाँ ‘बु’ के ‘उ’ को गुण ‘ओ’ हो जाता है।
- स्थिति:
बो + भूय➔बोभूय(यङन्त धातु)।
5.लकार, विकरण और प्रत्यय कार्य:बोभूयते.
- लकार:
वर्त्तमाने लट्औरअनुदात्तङित आत्मनेपदम्से प्रथम पुरुष एकवचन में आत्मनेपद का ‘त’ प्रत्यय ➔बोभूय + त। - विकरण:
कर्त्तरि शप्से ‘शप्’ (अ) का आगम औरअतो गुणेसे पररूप ➔बोभूय + त। - टेरेत्व:
टित आत्मनेपदानां टेरेसूत्र से ‘त’ के अकार को ‘ए’ आदेश (ते)। - वर्ण सम्मेलन:
बोभूय + ते➔ बोभूयते
इति रूपसिद्धम्।
💡 परीक्षा टिप्स (Exam Special Points)
- सनाद्यन्ता धातवः सूत्र लिखना न भूलें: द्वित्व और अभ्यास कार्य करने के बाद जब नया प्रातिपदिक/अङ्ग (जैसे देदीप्य या बोभूय) बन जाता है, तो इस सूत्र को लिखकर बताना अनिवार्य है कि अब इसकी फिर से “धातु संज्ञा” हो गई है, तभी आगे लट् लकार आएगा।
- आत्मनेपद का तर्क: हमेशा कॉपी में लिखें कि
अनुदात्तङित आत्मनेपदम्से यहाँ आत्मनेपद प्रत्यय (‘त’) आया है क्योंकि यङ् में ‘ङ्’ की इत्संज्ञा हुई है।

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