यङ्लुगन्त (यङ् + लुक् + अन्त) प्रक्रिया संस्कृत व्याकरण की एक बेहद विशिष्ट और कठिन प्रक्रिया मानी जाती है। जब यङ् प्रत्यय (बार-बार या अत्यधिक अर्थ में) लगने के बाद, यङो वा (२.४.७४) सूत्र से उस ‘यङ्’ (य) प्रत्यय का ‘लुक्’ (पूर्ण लोप) कर दिया जाता है, तो उसे यङ्लुगन्त कहते हैं।
इसकी दो सबसे बड़ी विशेषताएँ हैं जो इसे सामान्य यङ् से अलग करती हैं:
- इसमें यङ् का ‘य’ दिखाई नहीं देता (जैसे: बोभूयते का ‘य’ गायब होकर बोभोति बनता है)।
- यङ् प्रत्यय का लोप होने के कारण इसके रूप परस्मैपद (ति, तः, अन्ति) में चलते हैं, आत्मनेपद में नहीं।
आइए परीक्षा में सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले दो सर्वप्रमुख रूपों—‘बोभोति’ और ‘दाधर्ति’ की पूर्ण शास्त्रीय रूपसिद्धि को समझते हैं।
१. बोभोति (भू धातु + यङ्-लुक्) — ‘वह बार-बार या अत्यधिक होता है’
यह यङ्लुगन्त का सबसे प्रसिद्ध और मानक उदाहरण है।
1.यङ् प्रत्यय और द्वित्व कार्य:भू + यङ् ➔ बुभूय.
- प्रत्यय: क्रियासमभिहार (बार-बार होना) अर्थ में भू धातु से परे
धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ्से यङ् प्रत्यय हुआ। अनुबन्ध लोप के बादभू + य। - द्वित्व:
सन्यङोःसे धातु को द्वित्व (डबल) हुआ ➔भू + भू + य। - अभ्यास कार्य:
पूर्वोऽभ्यासःसे अभ्यास संज्ञा,हलादिः शेषःसे ‘भा’ का ‘ऊ’ लुप्त हुआ ➔भू + भूय।ह्रस्वःसे अभ्यास को ह्रस्व होकरभु + भूयतथाअभ्यासे चर्चासे भकार को जश्त्व ‘ब’ आदेश हुआ। - स्थिति:
बु + भूय
2.यङ् प्रत्यय का लुक् (लोप):बुभूय ➔ बुभू.
- सूत्र:
यङो वा (२.४.७४) - कार्य: विकल्प से (Optionally) यङ् प्रत्यय का ‘लुक्’ (अदर्शन/लोप) हो जाता है। जैसे ही ‘य’ का लोप होता है, प्रत्यय का ‘ङित्’ भाव खत्म हो जाता है और पद परस्मैपद बन जाता है।
- स्थिति:
बु + भू
3.अभ्यास को गुण कार्य:बु ➔ बो.
- सूत्र:
गुणो यङ्लुकोः (७.४.८२) - कार्य: यङ्-लुक् परे रहने पर भी स्थानिवद्भाव के कारण अभ्यास के ‘उ’ को गुण ‘ओ’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति:
बो + भू(सनाद्यन्ता धातवः से इसकी पुनः धातु संज्ञा होती है)।
4.लकार और प्रत्यय विधान:बोभू + तिप्.
- लकार:
वर्त्तमाने लट्से वर्तमान काल में लट् लकार। परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन की विवक्षा में ‘तिप्’ प्रत्यय (‘ति’ शेष)। - स्थिति:
बोभू + ति - (विशेष: यहाँ यङ्लुगन्त धातु ‘अदादिगण’ की तरह व्यवहार करती है, इसलिए
अदिप्रभृतिभ्यः शपःसूत्र से विकरण ‘शप्’ का लुक/लोप हो जाता है, बीच में ‘अ’ नहीं आता)।
5.धातु अङ्ग को गुण (अन्तिम रूप):बोभू ➔ बोभोति.
- सूत्र:
सार्वधातुकार्धधातुकयोः (७.३.८४) - कार्य: पित् सार्वधातुक प्रत्यय (‘ति’) परे होने के कारण इगन्त अङ्ग ‘बोभू’ के ‘ऊ’ को गुण ‘ओ’ आदेश हो जाता है।
- वर्ण सम्मेलन: बो + भो + ति = बोभोति।
इति रूपसिद्धम्। (विकल्प में ‘बोभवीति’ रूप भी बनता है)।
२. दाधर्ति (धृ धातु + यङ्-लुक्) — ‘वह बार-बार धारण करता है’
परीक्षा की दृष्टि से यह रूप भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अभ्यास को दीर्घ ‘आ’ होता है।
1.प्रत्यय, द्वित्व और अभ्यास कार्य:धृ ➔ धृ + धृ + य.
धातोरेकाचो...से धृ धातु से यङ् प्रत्यय हुआ ➔धृ + य।सन्यङोःसे धातु को द्वित्व हुआ ➔धृ + धृ + य।पूर्वोऽभ्यासःऔरहलादिः शेषःसे अभ्यास के ऋकार और रेफ का लोप होकर केवल ‘धृ’ शेष रहा ➔धृ + ध्रिय।ह्रस्वःसे अभ्यास के ऋकार को ह्रस्व होकर ‘धृ’ ही रहा।अभ्यासे चर्चसे अभ्यास के महाप्राण ‘ध’ को वर्ग का तृतीय अक्षर ‘द’ आदेश हुआ।- स्थिति:
द + ध्रिय
2.यङ् का लुक् और अभ्यास दीर्घ:द ➔ दा.
- सूत्र:
यङो वासे यङ् प्रत्यय का ‘लुक्’ (लोप) हो गया ➔द + धृ। - सूत्र:
दीर्घोऽकितः (७.४.८३) - कार्य: यङ्-लुक् प्रक्रिया में अ-किद् अभ्यास (द) के अकार को दीर्घ (आ) आदेश होता है। इसलिए ‘द’ का ‘दा’ बन जाता है।
- स्थिति:
दा + धृ➔दाधृ(धातु संज्ञा)।
3.लकार और प्रत्यय:दाधृ + ति.
- वर्तमान में लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन में परस्मैपद प्रत्यय ‘तिप्’ आया।
अदिप्रभृतिभ्यः शपःसे विकरण शप् का लोप हुआ। - स्थिति:
दाधृ + ति
4.गुण और र्परत्व (अन्तिम रूप):दाधृ ➔ दाधर्ति.
- सूत्र:
सार्वधातुकार्धधातुकयोःसे ऋकारान्त अङ्ग (‘दाधृ’ के ‘ऋ’) को गुण ‘अ’ आदेश होता है। - सूत्र:
उरण् र्परःके नियम से वह गुण रँ-परक होकर ‘अर्’ के रूप में बदल जाता है (धृ ➔ धर्)। - वर्ण सम्मेलन: दा + धर् + ति = दाधर्ति।
इति रूपसिद्धम्।
💡 यङ्लुगन्त याद रखने की एग्जाम “शॉर्ट ट्रिक”
- पहचानने की ट्रिक: एग्जाम में अगर आपको कोई ऐसा क्रियापद दिखे जिसमें आगे का अक्षर डबल हो (जैसे बोभो…, दाध…, चंचू…), लेकिन पीछे सामान्य यङ् की तरह ‘य’ न होकर ‘ति’ लगा हो, तो वह शत-प्रतिशत यङ्लुगन्त का रूप है।
- याद रखने योग्य ३ मुख्य सूत्र:
यङो वा— (यङ् प्रत्यय को गायब करने के लिए)।अदिप्रभृतिभ्यः शपः— (बीच के ‘शप्’ विकरण का लोप करने के लिए)।गुणो यङ्लुकोःयादीर्घोऽकितः— (आगे वाले अक्षर को गुण या दीर्घ ‘आ’ की मात्रा देने के लिए)।
Leave a Reply