1. ससजुषो रुः (पाणिनि सूत्र 8.2.66)
वृत्ति: पदस्य सस्य सजुषश्च षस्य ‘रु’ स्यात्।
अर्थ: यदि किसी पद के अन्त में ‘स्’ (सकार) हो, या ‘सजुष्’ शब्द का ‘ष्’ (षकार) हो, तो उसके स्थान पर ‘रु’ आदेश हो जाता है।
प्रक्रिया: यहाँ ‘रु’ में ‘उ’ की इत्संज्ञा (उपदेशेऽजनुनासिक इत्) होकर केवल ‘र्’ शेष बचता है।
उदाहरण:
रामस् + अत्र
‘ससजुषो रुः’ से ‘स्’ को ‘रु’ (र्) हुआ।
रामर् + अत्र (इसके बाद अन्य सूत्रों से ‘रामोऽत्र’ बनता है)।

2. खरवसानयोर्विसर्जनीयः (पाणिनि सूत्र 8.3.15)
वृत्ति: खरि अवसाने च परतः पदान्तस्य रेफस्य विसर्गः स्यात्।
अर्थ: यह सूत्र बताता है कि ‘र्’ विसर्ग में कब बदलता है। इसके लिए दो स्थितियाँ अनिवार्य हैं:
खर परे होने पर: यदि ‘र्’ के बाद ‘खर्’ प्रत्याहार का वर्ण (वर्ग का पहला, दूसरा अक्षर और श, ष, स) आए।
अवसान में: यदि ‘र्’ के बाद कोई भी वर्ण न हो (वाक्य का अंत हो)।
प्रक्रिया: ऐसी स्थिति में पदान्त ‘र्’ के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
उदाहरण:
खर् परे होने पर: रामर् + पठति ➔ रामः पठति (यहाँ ‘प्’ खर् वर्ण है)।
अवसान में: रामर् ➔ रामः (यहाँ ‘र्’ के बाद कुछ नहीं है)।

संयोजित सिद्धि-प्रक्रिया (Synthesis)
जब हम ‘रामः’ या ‘भवतः’ जैसे रूप सिद्ध करते हैं, तो ये दोनों सूत्र एक के बाद एक कार्य करते हैं:
मूल स्थिति: भवतस् (प्रथम पुरुष, द्विवचन)
ससजुषो रुः: पद के अन्त में स्थित ‘स्’ को ‘रु’ (र्) आदेश हुआ। ➔ भवतर्
खरवसानयोर्विसर्जनीयः: चूंकि ‘र्’ के बाद कोई वर्ण नहीं है (अवसान है), इसलिए ‘र्’ के स्थान पर विसर्ग हुआ। ➔ भवतः
संक्षेप में:
ससजुषो रुः ‘स’ को ‘र’ बनाता है।
खरवसानयोर्विसर्जनीयः उस ‘र’ को ‘ः’ (विसर्ग) बनाता है।
सार्वधातुकार्धधातुकयोः (पाणिनि सूत्र 7.3.84) संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है जो ‘गुण’ सन्धि/कार्य का विधान करता है।
सूत्र का विवरण
सूत्र: सार्वधातुकार्धधातुकयोः
पदच्छेद: सार्वधातुक-आर्धधातुकयोः (सप्तमी विभक्ति, द्विवचन)
अनुवृत्ति: इस सूत्र में ‘इगन्त्यङ्गस्य’ (इक्), ‘अङ्गस्य’ और ‘गुणः’ की अनुवृत्ति आती है।

सूत्र का अर्थ
“इगन्त अङ्ग को गुण होता है, यदि उसके बाद कोई सार्वधातुक या आर्धधातुक प्रत्यय लगा हो।”
इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है:
इगन्त अङ्ग: जिस धातु या अङ्ग के अन्त में इ, उ, ऋ, ऌ (इक् प्रत्याहार) हो।
प्रत्यय: उसके पीछे या तो सार्वधातुक प्रत्यय (जैसे: तिप्, तस्, झि आदि) हो या आर्धधातुक प्रत्यय (जैसे: तुमुन्, तव्यत् आदि) हो।
कार्य: उस ‘इक्’ वर्ण के स्थान पर गुण (अ, ए, ओ) हो जाता है।

उदाहरणों के माध्यम से स्पष्टीकरण
1. सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर (लट् लकार):
भू + ति (तिप्):
यहाँ ‘भू’ एक इगन्त अङ्ग है (अन्त में ‘ऊ’ है)।
‘ति’ एक सार्वधातुक प्रत्यय है।
सार्वधातुकार्धधातुकयोः सूत्र से ‘ऊ’ को गुण ‘ओ’ हो गया।
भो + ति (आगे ‘अव्’ आदेश होकर ‘भवति’ बनता है)।
जि + ति:
‘जि’ के अन्त में ‘इ’ है।
‘इ’ को गुण ‘ए’ हुआ।
जे + ति (आगे ‘जयति’)।
2. आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर (तुमुन्/तव्यत्):
नी + तुमुन्:
‘नी’ इगन्त अङ्ग है। ‘तुमुन्’ आर्धधातुक प्रत्यय है।
‘ई’ को गुण ‘ए’ हुआ।
रूप बना: नेतुम्
श्रु + तव्यत्:
‘श्रु’ के ‘उ’ को गुण ‘ओ’ हुआ।
रूप बना: श्रोतव्यम्

प्रमुख शर्तें (Conditions)
केवल इगन्त: यह गुण तभी होगा जब अङ्ग के अन्त में इ, उ, ऋ, या ऌ हो। यदि अन्त में ‘अ’ है (जैसे ‘पठ्’ में ‘अ’ उपधा में है, अन्त में नहीं), तो यह सूत्र नहीं लगेगा।
निषेध: यदि प्रत्यय ‘कित्’ (जिसमें ‘क्’ की इत्संज्ञा हो) या ‘ङित्’ (जिसमें ‘ङ्’ की इत्संज्ञा हो) है, तो ‘क्ङिति च’ सूत्र से इस गुण का निषेध हो जाता है। (जैसे: भू + क्त = भूतः, यहाँ गुण नहीं हुआ)।
गुण तालिका (Quick Reference)
इगन्त वर्ण
गुण आदेश
इ / ई

उ / ऊ

ऋ / ॠ
अर्

अल्

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