
हिन्दी-
ऋग्वेदभाष्यभूमिका
पृष्ठ १ :
वागीशाद्याः सुमनसः सर्वार्थानामुपक्रमे ।
यं नत्वा कृतकृत्याः स्युस्तं नमामि गजाननम् ॥ १ ॥
वागीश (ब्रह्मा) आदि देवता सब प्रकार के कार्यों के आरम्भ में जिसको नमन करके कृतकृत्य होते हैं, अर्थात् उनके कार्य जिसको प्रणाम कर लेने पर पूरे हो जाते हैं ऐसे हाथी के मुख वाले गणेश जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थमहेश्वरम् (१) ॥ २ ॥
विद्यातीर्थ के रूप में उन महेश्वर की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके निःश्वास के रूप में वेद हैं और जिन्होंने समस्त जगन्मण्डल को वेदों से रचा है।
यत्कटाक्षेण तद्रूपं दधद् बुक्कमहीपतिः ।
आदिशन्माधवाचार्यं वेदार्थस्य प्रकाशने ॥ ३ ॥
जिन विद्यातीर्थ महेश्वर की कृपाकटाक्ष से उनके स्वरूप को धारण करते हुए राजा बुक्कराय ने माधवाचार्य को वेद के अर्थ को प्रकाशित करने (वेद की व्याख्या करने) के लिए आदेश दिया(२)।
ये पूर्वोत्तरमीमांसे ते व्याख्यायातिसङ्ग्रहात् ।
कृपालुर्माधवाचार्यो वेदार्थं वक्तुमुद्यतः ॥ ४ ॥
जो पूर्वमीमांसा (वेद का कर्मकाण्डविषयक विचार) और उत्तरमीमांसा (वेद का ज्ञानकाण्डविषयक विचार) हैं, उनकी बहुत विस्तार से व्याख्या करने के पश्चात् वेद के जिज्ञासुओं पर अनुग्रह करके माधवाचार्य वेद के अर्थ के प्रकाशन में उद्यत हुए।
आध्वर्यवस्य यज्ञेषु प्राधान्याद् व्याकृतः पुरा ।
यजुर्वेदोऽथ हौत्रार्थमृग्वेदी व्यांकरिष्यते ॥ ५ ॥
यज्ञ के कार्यों में अध्वर्यु ऋत्विक्-सम्बन्धी कर्म के प्रधान होने के कारण पहले यजुर्वेद का व्याख्यान किया, अब होता नामक ऋत्विक्-सम्बन्धी कर्म के लिए ऋग्वेद का व्याख्यान करेंगे।
एतस्मिन् प्रथमोऽध्यायः श्रोतव्यः सम्प्रदायतः ।
व्युत्पन्नस्तावता सर्वं बोद्धुं शक्नोति बुद्धिमान् ॥ ६ ॥
इस ऋग्वेद में प्रथम अध्याय को सम्प्रदाय के अनुसार सुनना चाहिए, इतने ही से व्युत्पन्न हुआ बुद्धिमान् व्यक्ति अपने आप सब (पूरे ऋग्वेद) को समझ सकता है।
पूर्व पक्ष
कुछ लोग कहते हैं कि जहाँ कहीं भी वेदों की चर्चा है प्रायः वहाँ ऋग्वेद का ही सर्वप्रथम उल्लेख किया गया है और समस्त वेदों में ऋग्वेद को ही अभ्यर्हित अर्थात् सर्वाधिक सम्मानित अथवा श्रेष्ठ माना गया है, इस प्रकार ऋग्वेद के प्रथम आम्नात एवं अभ्यर्हित होने के कारण उसीका व्याख्यान पहले होना चाहिए। जैसा कि ऋग्वेद का सबसे पहले होना पुरुष सूक्त में स्पष्ट रूप से मिलता है—
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ (ऋ० १०।९०।९)
अर्थात् यजन (पूजन) करने योग्य, एवं समस्त लोगों द्वारा हूयमान बुलाए गए उस परमेश्वर (जिसका वर्णन सहस्रशीर्षा पुरुष आदि द्वारा किया जाता है) से ही ऋक्, साम, छन्द और यजु उत्पन्न हुए। यद्यपि जैसा कि मन्त्रों में देखा जाता है इन्द्र आदि देवताओं का भी यज्ञ में आह्वान होता है, तथापि वहाँ इन्द्रादि रूप से अवस्थित परमेश्वर (सहस्रशीर्षा पुरुष) का उन मन्त्रों द्वारा आह्वान किया जाता है। इस प्रकार समझ लेने से मन्त्रों में किसी प्रकार के परस्पर-विरोध की सम्भावना नहीं रह जाती।
पृष्ठ २ : जैसा कि मन्त्र है—
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ॥
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥’
(ऋ० १।१६४।४६)
अर्थात् यह (परमेश्वर) एक है तथापि उसे विप्रों ने इन्द्र, मित्र (सूर्य), वरुण, अग्नि, दिव्य सुपर्ण, गरुत्मान्, यम, मातरिश्वा (वायु) इस प्रकार बहुत नामों से कहा है।
और वाजसनेयी (याजसनेय शाखा के अध्येता) लोग भी ऐसा ही कहते हैं—
‘तद् यद् इदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवम् ।
एतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवाः ॥’ (बृ० १।४।६)
(जो कि एक-एक देवता के प्रति ‘इसे यजन करो’ ‘इसे यजन करो’ ऐसा कहा है, वह इस (परमेश्वर) की ही विसृष्टि है अर्थात् निर्माण है, उसके रूप में सब देवता हैं।)
इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि सर्वत्र भिन्न-भिन्न रूप में अवस्थित एक ही देवता (परमेश्वर) का आह्वान किया जाता है।
ऋग्वेद का अभ्यर्हित (श्रेष्ठ) होना न केवल ऋचाओं में इस प्रकार पाठ-प्राथम्य को देख कर ही सिद्ध होता है बल्कि यज्ञाङ्गों को दृढ़ करने के कारण भी उसका अभ्यर्हितत्व सिद्ध होता है। जैसा कि तैत्तिरीय लोग आम्नात करते हैं—
‘यद्वै यज्ञस्य साम्ना यजुषा क्रियते शिथिलं तद्,
यदृचा तद् दृढम् ।’ (तै० सं० ६।५।१०।३)
अर्थात् यज्ञ-सम्बन्धी जो कुछ कार्य साम या यजु से सम्पन्न किया जाता है वह शिथिल होता है और जो ऋक् द्वारा किया जाता है वह दृढ़ होता है।
दूसरे यह कि समस्त वेदों के ब्राह्मण-भाग अपने वक्तव्य के सम्बन्ध में विश्वास को दृढ़ करने के लिये ‘तदेतद् ऋचा अभ्युक्तम्’ (अर्थात् इस प्रकार ऋक् ने भी कहा है) ऐसा कहकर ऋक् को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेदगत मन्त्र-काण्डों में उन-उन स्थलों में अध्वर्यु द्वारा बहुत सी ऋचाओं का उल्लेख (आम्नात) मिलता है। समस्त सामों के बारे में तो यह प्रसिद्ध ही है कि वे ऋगाश्रित होते हैं। आथर्वणिक लोग भी अपनी संहिता में बहुशः ऋचाओं का ही पाठ करते हैं। इस प्रकार अन्य समस्त वेदों द्वारा ऋचाओं के आदृत होने के कारण उनका ही अभ्यर्हित होना सिद्ध होता है।
छान्दोग लोग (छान्दोग्योपनिषद् के अध्येता) भी सनत्कुमार के प्रति नारद के वाक्य को इस प्रकार आम्नात करते हैं—
‘ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थम् ।’ (छा० ७।१।२)
मुण्डकोपनिषद् में भी इस प्रकार कहा है—
‘ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः ।’ (मु० १।१।५)
तापनीयोपनिषद् में मन्त्रराज के पादों में क्रम से अध्ययन का इस प्रकार उल्लेख है—
‘ऋग्यजुःसामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाश्चत्वारः पादा भवन्ति ।’ (नृ० ता० उ० १।२)
इसी प्रकार सर्वत्र उदाहरणीय है। अतः ऋग्वेद के अभ्यर्हित होने के कारण उसका ही व्याख्यान आरम्भ में उचित है।
उत्तर पक्ष
पृष्ठ ३ : माना कि समस्त वेद का अध्ययन, पारायण आदि में ऋग्वेद को ही प्रथम कहा है तथापि अर्थ-ज्ञान यज्ञ के अनुष्ठान को दृष्टि में रख कर ही अपेक्षित होता है और यज्ञ के अनुष्ठान में यजुर्वेद की प्रधानता है अतः यजुर्वेद का व्याख्यान आरम्भ में जो किया गया वह उचित है।
यजुर्वेद की प्रधानता किसी ऋक् के द्वारा ही सुनिए—
ऋचां त्वः पोपमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।
ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः ॥
(ऋ० १०।७१।११)
निरुक्तकार यास्क ने इस ऋक् का तात्पर्य संक्षेप में इस प्रकार स्पष्ट किया है (नि० २।८)—”ऋत्विक् के कर्मों का विनियोग कहते हैं” यह कह कर उन्होंने ही इस ऋक् के प्रथम पाद का विवरण किया—‘ऋचामेकः पोपमास्ते पुपुष्वान् होतर्गचैनौ’ अर्थात् ऊपर की ऋक् में प्रयुक्त त्वशब्द का अर्थ ‘एक’ है जो होता का विशेषण है। तात्पर्य यह हुआ कि होता नाम का एक ऋत्विक् यज्ञ के अवसर में स्वकीय वेदगत ऋचाओं की ‘पुष्टि’ करता है। ‘भिन्न-भिन्न स्थलों में आम्नात ऋचाओं का एक संघात बनाकर ‘यह इतना शस्त्र है’ ऐसा निश्चय करना ही ‘पुष्टि’ होती है। व्युत्पत्ति के अनुसार ‘ऋक्’ उसे कहते हैं जिसके द्वारा देवविशेष, क्रियाविशेष अथवा साधनविशेष की प्रशंसा की जाती है, अतः ऋक् ही ‘अर्चनी’ है।
द्वितीय पाद का विवरण करते हैं— ‘गायत्रमेको गायति शक्वरीषूद्गाता । गायत्रं गायतैः स्तुतिकर्मणः शक्पर्य ऋचः, शक्नोतेस्तद्वद्, यदमित्रान्न प्रमशकदन्तुं तच्छक्करीणां शक्वरीत्वमिति विज्ञायते’ (कौ० २३।२)। स्तुतिकर्मक ‘गायति’ से गायत्र निष्पन्न हुआ है; शक्वरी अर्थात् ऋचार्ये, शक्नोति से निष्पन्न; तात्पर्य यह कि जिन ऋचाओं के द्वारा इन्द्र वृत्र नामक असुर को मार सके। इसी कारण उन ऋचाओं को ‘शक्वरी’ कहा है। वाक्यार्थ यह हुआ कि उद्गाता नाम का एक ऋत्विक् गायत्र नामक स्तोत्र को शक्वरी नामक ऋचाओं में गान करता है। धातुओं के अनेक अर्थ होते हैं अतः स्तुत्यर्थ ‘गायति’ से प्रस्तुत में ‘गायत्र’ शब्द को निष्पन्न समझना चाहिये । ‘शक्वरी’
शब्द ‘शक्नोति’ धातु से निष्पन्न है, जैसा कि किसी ब्राह्मण में इस प्रकार निर्देश है— ‘वृत्रं शत्रुं हन्तुं शक्नोति आभिऋग्भिः’।
पृष्ठ ४ : तृतीय पाद का विवरण— ‘ब्रह्मा हो जाते जाते विद्यां वदति, ब्रह्मा सर्ववित् ।’ इसका अर्थ यह हुआ कि ब्रह्मा नाम का एक ऋत्विक् यज्ञ के अवसर में जब-जब प्रणव आदि कर्मों का प्रसङ्ग उपस्थित होगा तब-तब अनुज्ञा देता है, अर्थात् जब उसे सम्बोधित करके यह कहा जाता है कि ‘ब्रह्मन् अपः प्रणेष्यामि’ तब वह ‘ॐ प्रणय’ कहकर अनुज्ञा देता है। ब्रह्मा नाम का यह ऋत्विक् ‘सर्वविद्’ होता है, अर्थात् इसे वेदत्रयोक्त समस्त कर्मों का पूरा पता रहता है। इसलिए योग्यता के अनुसार उन-उन कर्मों की अनुज्ञा देने एवं प्रमाद होने पर समाधान करने में वह समर्थ माना जाता है। जैसा कि छान्दोग लोग उसकी सामर्थ्य के सम्बन्ध में कहते हैं—
‘एष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक् च वर्तनी । तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्युरुद्गाता चान्यतराम् ।’ (छा० ४।१६।१-२)
अर्थात् यज्ञ में किसी प्रकार का प्रमाद न हो जाय, इसलिए मन के द्वारा यज्ञ का सम्यक् अनुसन्धान होना चाहिये और वाणी के द्वारा तीनों वेदों के मन्त्रों का पाठ करना चाहिये, क्योंकि मन और वाणी ये दोनों यज्ञ के मार्ग हैं। होता, उद्गाता और अध्वर्यु ये तीनों मिलकर वाग्रूप यज्ञमार्ग का संस्कार करते हैं और एक ब्रह्मा मनोरूप यज्ञमार्ग का संस्कार करता है। इस प्रकार ब्रह्मा की सामर्थ्य सूचित है।
चतुर्थ पाद का विवरण— ‘यज्ञस्य मात्रां विमिमीत एकाऽध्वर्युः । अध्वर्युरध्वरयु रध्वरं युनक्ति अध्वरस्य नेता’। इसका अर्थ यह है कि अध्वर्यु नाम का एक ऋत्विक् यज्ञ की मात्रा (स्वरूप) को विशेष रूप से निष्पन्न करता है। ‘मात्रा’ यहाँ ‘स्वरूप’ के अर्थ में प्रयुक्त है। ‘अध्वर्यु’ की स्वरूप निष्पादकता इस शब्द के निर्वचन से अवगत होती है। छान्दस प्रक्रिया के अनुसार लुप्त अकार को पुनः प्रक्षिप्त करके ‘अध्वर्यु’ यह नाम बनाना चाहिये। तब इसका अर्थ होगा, जो अध्वर अर्थात् यज्ञ को निष्पन्न करता है (युनक्ति), अर्थात् यज्ञ का नेता।
इसी बात को मन में रखकर यास्क ने यजुर्वेद के यागनिष्पादकत्व को द्योतन करनेवाला निर्वचन किया है—
‘मन्त्रा मननात्, छन्दांसि छादनात, स्तोमः स्तवनात, यजुर्यजतेः ।’
(नि० ७।१२)
इस प्रकार अध्वर्युसम्बन्धी यजुर्वेद में यज्ञ का शरीर निष्पन्न हो जाता है, उसी को लेकर स्तोत्र और शस्त्र रूप इतर दो अवयव सामवेद और ऋग्वेद के द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं। अतः उपजीव्य होने के कारण यजुर्वेद का ही व्याख्यान सबसे पहले करना ठीक है, तत्पश्चात् साम और ऋक् इन दोनों में सामों के ऋगाश्रित होने के कारण पहले प्रस्तुत में ऋग्वेद की व्याख्या करते हैं।
पूर्वपक्ष— वेद नहीं है।
जब वेद का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं है, ऐसी स्थिति में वेद के अवान्तर विशेष ऋग्वेद का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः प्रश्न यह है कि, वेद है क्या? ‘वेद’ का न कोई लक्षण है अथवा तत्साधक न कोई प्रमाण है। बिना लक्षण और प्रमाण के किसी वस्तु की सिद्धि नहीं होती, जैसा कि न्यायशास्त्र के विद्वान् लोग भी कहते हैं— ‘लक्षणप्रमाणाभ्यां हि वस्तुसिद्धिः’ ।
पृष्ठ ५ : स्यात्, यह लक्षण बनाया जाय कि ‘वेद’ प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम इन प्रमाण विशेषों में अन्तिम अर्थात् ‘आगमप्रमाण’ है तब मनु आदि के द्वारा प्रणीत स्मृतियों में इस लक्षण की अतिव्याप्ति होती है, क्योंकि स्मृतियाँ भी आगमप्रमाण हैं, क्योंकि वैसा आगम का लक्षण है— ‘समयबलेन सम्यक् परोक्षानुभवसाधनम्’ अर्थात् ‘संकेत’ के सहारे जो सम्यक् प्रकार से परोक्ष वस्तु के अनुमान का साधन हो उसे आगम या शब्दप्रमाण कहते हैं। ‘आगम’ का यह लक्षण उन स्मृतियों में भी संघटित हो जाता है।
अगर उपर्युक्त लक्षण में अतिव्याप्ति दोष के निवारणार्थ यह कहा जाय कि पौरुषेय न होकर जो अन्तिम प्रमाण हो वह वेद है, तब भी परमेश्वर द्वारा वेद के निर्मित होने के कारण वेद भी पौरुषेय होता है। अगर यह कहें कि इस प्रसङ्ग में अपौरुषेयत्व शरीरधारि-जीव निमित्तत्वाभावरूप विवक्षित है, अर्थात् वेद का निर्माता परमेश्वर कोई शरीरधारी जीव नहीं है, अतः उसके द्वारा निर्मित होने पर भी वेद की अपौरुषेयता सुरक्षित रहती है, तब भी जैसा कि ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’ इत्यादि श्रुतियों द्वारा परमेश्वर को भी शरीरी कहा है, अतः शरीरधारी पुरुष परमेश्वर के द्वारा वेद के निर्मित होने के कारण उसकी अपौरुषेयता सिद्ध नहीं। फिर जब ऐसा कहेंगे कि कर्मफल के रूप में शरीरधारण करनेवाले जीव द्वारा जो निर्मित न हो, वह यहाँ अपौरुषेयत्व से विवक्षित है, तब भी अग्नि, वायु, आदित्य के द्वारा वेदों का उत्पादित होना जो कहा है, इससे उपर्युक्त निवेश भी कट जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण (५।३२) में कहा है— ‘ऋग्वेद एवाग्नेरजायत यजुर्वेदो वायोः सामवेद आदित्यात्’ अर्थात् ऋग्वेद अग्नि से, यजुर्वेद वायु से और सामवेद आदित्य से उत्पन्न हुआ। ईश्वर अग्नि आदि का प्रेरक है अतः वह वेदों का निर्माता सिद्ध होता है।
अगर दूसरा यह लक्षण करते हैं कि ‘मन्त्रब्राह्मणात्मकः शब्दराशिर्वेदः’ तब भी यह आज तक निर्णय भी नहीं हो सका कि मन्त्र और ब्राह्मण के कौन से प्रकार हैं। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि वेद का कोई लक्षण नहीं है।
दूसरे हम यह भी मानने के लिये तैयार नहीं हैं कि वेद नाम की कोई वस्तु भी है, क्योंकि उसके अस्तित्व में कोई प्रमाण नहीं। यदि ‘ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमथर्वणं चतुर्थम्’ इत्यादि वाक्य को वेद का सद्भाव सिद्ध करने के लिये प्रमाण-स्वरूप उद्धृत करते हैं तब आत्माश्रय दोष लगता है। क्योंकि वेद के सद्भाव को प्रमाणित करने के लिये वेद की पंक्ति उद्धृत नहीं कर सकते। कितना भी चालाक आदमी होगा वह हजार प्रयत्न करने पर भी अपने कंधे पर नहीं चढ़ सकता। फिर यदि याज्ञवल्क्य स्मृति के इस वस्तु को…
‘वेद एव द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः’—प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करते हैं तब भी वेद के स्मृतियों का मूल होने से इस स्मृतिवाक्य का भी निराकरण हो जाता है।
यदि कहिये कि वेद का सद्भाव प्रत्यक्षादि प्रमाण से सिद्ध होता है, ऐसी स्थिति में हम कहेंगे कि ऐसी शंका भी करना उचित नहीं, क्योंकि वेद के सम्बन्ध में लोकप्रसिद्धि सार्वजनीन होने पर भी उसी प्रकार भ्रान्त है जिस प्रकार ‘आकाश नीला है’ यह लोकप्रसिद्धि भ्रान्त है। अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी वेद का सद्भाव सिद्ध नहीं होता। निष्कर्ष यह है कि लक्षण और प्रमाण से रहित वेद का सद्भाव किसी प्रकार स्वीकार नहीं किया जा सकता।
समाधान—वेद है।
इस प्रसंग में कहते हैं, जैसा कि मन्त्र-ब्राह्मणात्मकत्व रूप वेद का लक्षण किया गया वह सर्वथा दोषरहित है। अतएव आपस्तम्ब ने यज्ञ की परिभाषा में ऐसा कहा है—‘मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’ (आप० परि० १।३३)। मन्त्र और ब्राह्मण के स्वरूप की चर्चा आगे करेंगे। वेद का ‘अपौरुषेयत्वकथ्यत्व’ ऐसा जो हमारा विवक्षित है आगे चलकर स्पष्ट होगा। वेद के सद्भाव में यथोक्त श्रुतियों, स्मृतियों और लोकप्रसिद्धियों को प्रमाण के रूप में देखना चाहिये। जिस प्रकार घट-पटादि द्रव्य स्वयं अपने प्रकाशक नहीं होते, बल्कि किसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं ऐसी स्थिति में सूर्य और चन्द्र आदि का स्वयं-प्रकाश होना निर्विवाद है, उसी प्रकार मनुष्य अपने कन्धे पर स्वयं चढ़ नहीं सकता तथापि वेद, जिसकी शक्ति सर्वथा अकुण्ठित है, जो इतर समस्त वस्तुओं का प्रतिपादक है, इसी प्रकार स्वयं वह अपना भी प्रतिपादक हो सकता है। जैसा कि वैदिक सम्प्रदाय के लोग वेद की अकुण्ठित शक्ति के सम्बन्ध में कहा करते हैं—‘चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टमित्येवंजातीयकमर्थं शक्नोत्यवगमयितुम्’ (शा० भा० १।१।२) अर्थात् वेदवाक्य के द्वारा भूत, वर्तमान, भविष्य, सूक्ष्म, छिपी हुई एवं दूर की वस्तु का ज्ञान हो सकता है। ऐसी स्थिति में वेद के अस्तित्व के सम्बन्ध में जो लोक-प्रसिद्धि है उसका प्रामाण्य भी हटाया नहीं जा सकता। इस प्रकार यह स्थिर है कि लक्षण और प्रमाणों द्वारा सिद्ध वेद का निराकरण चार्वाक आदि कोई भी विरोधी नहीं कर सकता।
पृष्ठ ६ : पूर्वपक्ष—वेद व्याख्यान के योग्य नहीं।
यह हमने मान लिया कि वेद नाम का कोई पदार्थ है, तथापि हम यह स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं कि वेद व्याख्यान के योग्य भी हैं, वेद के अप्रमाण होने के कारण उसके व्याख्यान की कोई उपयोगिता नहीं है। क्योंकि वेद इसलिए प्रमाण नहीं है कि प्रमाण का जो लक्षण आचार्यों ने स्थिर किया है वह वेद में सङ्गत नहीं होता। प्रमाण का लक्षण आचार्यों ने दो प्रकार से स्थिर किया है, कुछ के अनुसार ‘सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्’ यह प्रमाण का लक्षण है, अर्थात् प्रमाण वह होता है जो सम्यक् अनुभव का साधन हो, तात्पर्य यह कि जिसके द्वारा सम्यक् अनुभव प्राप्त किया जाय वह प्रमाण होता है। कुछ आचार्य—‘अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्’ ऐसा प्रमाण का लक्षण करते हैं, अर्थात् प्रमाण वह है जो अनधिगत, अश्रुत, अज्ञातपूर्व अर्थ का बोध कराता है। ये दोनों प्रकार…
के प्रमाण-लक्षण वेद में सङ्गत नहीं होते। जैसा कि वेद मन्त्रब्राह्मणात्मक है; अब हम यहाँ उपर्युक्त प्रमाण-लक्षणों की मन्त्र और ब्राह्मण में असङ्गति दिखाते हैं, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण के अतिरिक्त वेद कुछ भी नहीं, अतः अगर मन्त्र भाग में भी कहीं इन दोनों लक्षणों की सङ्गति न हो सकी तो वेद का प्रमाण होना सिद्ध नहीं हो सकता। अब लीजिए, कुछ मन्त्र ऐसे मिलते हैं जो अबोधक हैं, अर्थात् वे अर्थ का बोध नहीं कराते हैं। जैसे—
‘(१) अम्यक् सा त इन्द्र ऋष्टिः’ (ऋ० १।१६९।५)
‘यादृस्मिन् धायि तमपस्यया विदत्’ (ऋ० ५।४४।१४)
‘सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू’ (ऋ० १०।१०६।६)
‘आपांतमन्युस्तृपलप्रभर्मा’ (ऋ० १०।८९।५)
पृष्ठ ७ : उपर्युक्त मन्त्रों का कोई भी अर्थ प्रतीत नहीं होता, ऐसी स्थिति में जब इन मन्त्रों में कोई अनुभव ही नहीं है तब अनुभव का सम्यक् होना एवं इन मन्त्रों का सम्यगनुभव साधन होना बहुत दूर की बात है।
दूसरे, ‘अधःस्विदासीदुपरिस्विदासीत्’ यह मन्त्र (ऋ० १०।१२९।५) ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ की भाँति विषय के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न कर देता है, अतः ऐसे वाक्य का प्रामाण्य नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार ‘ओषधे त्रायस्व’ यह मन्त्र (तै० सं० १।२।१।१) दर्भविषयक है, ‘स्वधिते नैनं हिंसीः’ यह मन्त्र (तै० सं० १।२।१।१) क्षुर-विषयक है, ‘शृणोत ग्रावाणः’ यह मन्त्र (तै० सं० १।१।११।१) पाषाण विषयक है। इन मन्त्रों में चेतनारहित पदार्थ दर्भ, क्षुर और पाषाण को चेतन की भाँति सम्बोधित किया गया है। (जब कोई व्यक्ति किसी चेतन व्यक्ति से कहे कि ‘तुम इसकी रक्षा करो, तुम इसे मत मारो’ एवं ‘सुनो’ तो यह बात सङ्गत होती है, अब अगर पत्थरों से कोई कहे कि ‘हे पत्थरों! तुम सुनो’ तो ऐसे व्यक्ति की वाणी को कहाँ तक प्रमाण माना जा सकता है? इन उपर्युक्त मन्त्रों का अप्रामाण्य ‘द्वौ चन्द्रौ’ इस वाक्य की भाँति विपरीत अर्थ के बोधक होने से सिद्ध होता है। ‘एक एव रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे’ यह एक मन्त्र (तै० सं० १।८।६।१) है, अर्थात् रुद्र एक है दूसरा नहीं। फिर दूसरा मन्त्र यह है ‘सहस्राणि सहस्रशो ये रुद्रा अधिभूम्याम्’ (तै० सं० ४।५।११।१), अर्थात् इस पृथिवी पर जो हजारों हजार रुद्र हैं। ये दोनों मन्त्र व्याघातबोधक (अर्थात् परस्पर विरुद्ध अर्थ के बोधक) होने के कारण ‘मैं जीवन भर मौनी हूँ’ इस वाक्य की भाँति अप्रमाण हैं।
पृष्ठ ८ : जैसा कि दूसरा प्रमाण-लक्षण ‘अनधिगतार्थगन्तृ’ है वह भी मन्त्र भाग में घटित नहीं होता। जैसा कि ‘आप उन्दन्तु’ यह मन्त्र (तै० सं० १।२।१।१) क्षौरकाल में यजमान के सिर को जल से भिगोने के लिए प्रयुक्त होता है। एक दूसरा मन्त्र है ‘शुन्धिके शिर आरोह शोभयन्ती मुखं मम’ (आप० मं० पा० २।८।९) अर्थात् हे फूल की माला !…
..मेरे मुख को शोभित करती हुई तू मेरे सिर पर चढ़। इस मन्त्र के द्वारा विवाह के अवसर में मङ्गलाचार के रूप में शुम्भिका (फूल की माला) को वर-कन्या के सिर पर रखते हैं। उपर्युक्त ये दोनों मन्त्र उसी बात को दुहराते हैं जो लोक में प्रसिद्ध है अतः इन मन्त्रों में अनधिगतार्थगन्तृत्व अर्थात् उस अर्थ का बोधक होना जो किसी अन्य प्रमाण के द्वारा अधिगत न हो, यह प्रमाण का लक्षण सङ्गत नहीं होता। इस प्रकार द्विविध प्रमाण-लक्षणों के मन्त्रभाग में सङ्गत न होने के कारण मन्त्रभाग का प्रमाण होना सिद्ध नहीं हो सकता। अतः वेद का सद्भाव मान कर भी हम मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद को प्रमाण नहीं मानते।
उत्तर पक्ष
‘अम्यक् सा०’ इत्यादि चार दुरुह मन्त्रों को जो ऊपर उद्धृत किया गया है उनका अर्थ यास्क ने अपने निरुक्त में स्पष्ट किया है अगर यास्क के द्वारा किए गए उन मन्त्रार्थों का जिन्हें परिचय प्राप्त नहीं हैं तो इसमें उन बेचारे मन्त्रों का क्या दोष? इस प्रसङ्ग में एक लोकोक्ति—‘नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति, पुरुषअपराधः स भवतिति’ अर्थात् ठूंठ पेड़ का कोई अपराध नहीं, जो उसे अंधा आदमी नहीं देखता, वह तो उस अंधे का अपराध है।
‘अधःस्विदा०’ यह मन्त्र संदेह के बोधन के लिए प्रवृत्त नहीं है, बल्कि जगत् का कारण जो कोई पर वस्तु है उसकी अति गम्भीरता का निश्चय कराने के लिए प्रवृत्त है। ऊपर और नीचे दोनों स्थानों में रहने वाली चीज निश्चय ही अत्यन्त गम्भीर होगी। जो लोग गुरु, शास्त्र एवं सम्प्रदाय की परम्परा से रहित होते हैं उन्हें वह जगत्कारण स्वरूप पर वस्तु कठिनाई से समझ में आती है इस बात को ‘अधःस्विदासीदुपरि स्विदासीत्’ इस वचोभङ्गी द्वारा प्रकट किया है। आगे के मन्त्र ‘को अद्धा वेद’ (ऋ० १०।१२९।६) आदि में इसी अभिप्राय को स्पष्ट किया है।
‘ओषधि०’ इत्यादि मन्त्रों से जिनको सम्बोधित किया गया है वे उनमें उन जड़ पदार्थों में रहने वाली अभिमानिनी चेतन देवताएँ हैं। भगवान् बादरायण ने ‘अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतित्वाभ्याम्’ इस (ब्र० सू० वे० २।१।५) में उन देवताओं को सूत्रित किया है। श्रुतियों में ‘मृदब्रवीत्’ को देख कर ऐसा नहीं समझ लेना चाहिये कि जड़ मृत्तिका के बोलने का यहाँ उल्लेख किया गया है, बल्कि यहाँ ‘मृत्’ शब्द से मृद्गत अभिमानिनी देवता की सूचना है, क्योंकि चेतन ही वाग्व्यवहार करता है न कि जड़ की मृत्तिका। इसी प्रकार जिन मन्त्रों में ‘ओषधि, पाषाण आदि’ सम्बोधित किये गये हैं वहाँ भी अभिमानिव्यपदेश ही समझना चाहिये।
ऊपर जिस मन्त्र में एक ही रुद्र की चर्चा है, उसके विपरीत दूसरे मन्त्र में हजारों की संख्या में रुद्रों की चर्चा है उसमें परस्पर व्याघात इसलिये नहीं कि एक ही रुद्र अपनी महिमा के कारण हजारों मूर्तियों में प्रकट हो सकता है।
जल द्वारा सिर से भिगोने और शुम्भिका (पुष्पमाला) को सिर पर चढ़ाने के जो मन्त्र ऊपर उद्धृत किए गए हैं, वे लोक-व्यवहार के होने से प्रसिद्ध हो सकते हैं तथापि इन कर्मों से उन-उन अभिमानिनी देवताओं का अनुग्रह तो लोक में सर्वथा अप्रसिद्ध होने के…
कारण अनधिगत है, अतः दूसरा प्रमाण-लक्षण भी उन मन्त्रों में सङ्गत हो जाता है। इस प्रकार मन्त्रों का अज्ञात अर्थ का ज्ञापक होना सिद्ध होता है।
इस प्रकार प्रमाण-लक्षणों के सङ्गत हो जाने से मन्त्र भाग का प्रामाण्य सिद्ध हुआ। इसी अभिप्राय से भगवान् जैमिनि ने मन्त्राधिकरण में मन्त्रों के विवक्षितार्थत्व को सूत्रित किया है। हम इस प्रसङ्ग में उन सूत्रों को क्रम से उद्धृत करके व्याख्यान करेंगे। पहले पूर्वपक्ष (अर्थात् मन्त्रों के अर्थ विवक्षित नहीं होते) के सूत्र इस क्रम से हैं—
पूर्वपक्ष—वैदिक मन्त्रों में अर्थ-विवक्षा नहीं है।
‘तदर्थशास्त्रात्’ (जै० १।२।३१)
पृष्ठ ९ : मन्त्र जिस अर्थ का अभिधान करता है, शास्त्र अर्थात् ब्राह्मण का भी वही अर्थ अभिधेय है। मन्त्र के ही अभिधेय अर्थ को अपना अभिधेय बना लेने वाला शास्त्र यह सिद्ध करता है कि मन्त्र की अर्थ-विवक्षा नहीं होती। अन्यथा जो मन्त्र स्वयं एक अर्थ को व्यक्त कर देता है, ठीक उसी अर्थ को व्यक्त करने वाला ब्राह्मण-वाक्य आखिर क्योंकर प्रयुक्त होता है, इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि मन्त्र भाग अपना कोई अर्थ नहीं रखता। उदाहरण के लिये ‘उरु प्रथस्व’ (तै० सं० १।१।८।१ वा० सं० १।२२) इस मन्त्र से पुरोडाश (यज्ञसम्बन्धी अन्न) का प्रथन अर्थात् फैलाना अभिहित होता है और ‘पुरोडाशं प्रथयति’ (तै० ब्रा० १।१।८।४) यह ब्राह्मण भी वही पुरोडाश-प्रथन का अभिधान करता है। ऐसी स्थिति में यदि यह मान लिया जाय कि पुरोडाश-प्रथन मन्त्र से ही प्रतीत हो जाता है, तब इस अर्थ के बोध के लिये प्रवृत्त ब्राह्मण-वाक्य अनर्थक हो जाता है। और जब यह स्वीकार करते हैं कि मन्त्र की अर्थ-विवक्षा नहीं है तब इस मन्त्र के विनियोग को बतानेके लिये ब्राह्मणवाक्य की उपयोगिता बन जाती है। इस युक्ति के बल से यह सिद्ध हुआ कि मन्त्र केवल उच्चारण से अनुष्ठान में उपकार करते हैं, उनमें अर्थविवक्षा नहीं होती।
यह शंका होती है कि यदि मन्त्रों को केवल उच्चारणार्थ मानते हैं तब तक उसका एकमात्र अदृष्ट ही प्रयोजन माना जायेगा। और यदि उन्हें अर्थाभिधायक मानते हैं तो दृष्ट प्रयोजन का लाभ होता है। दृष्ट प्रयोजन के रहते अदृष्ट प्रयोजन को मानना उचित नहीं। अतः ब्राह्मण मन्त्रार्थ का अनुवाद करता है, यह स्वीकार करके भी मन्त्र को विवक्षितार्थ मानना चाहिये इस शंका का उत्तर देते हैं—
‘वाक्यनियमात्’ (जै० १।२।३२)
‘अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्’ (ऋ० सं० ८।४४।१६) इत्यादि मन्त्र-वाक्य इसी रूप में पढ़ा जाना चाहिये, ऐसा मन्त्र में नियम पाया जाता है। यदि इसको व्युत्क्रम करके ‘मूर्धाग्निः’ ऐसा कर देते हैं तब भी उसी अर्थ का बोध होता है। इसलिये यह सिद्ध होता है कि ऐसा पाठ-क्रम नियत हो चुका है उसके साफल्य के लिये उच्चारण ही मन्त्र का प्रयोजन है, अर्थ नहीं।
यद्यपि पाठ-क्रम के नियम को अदृष्ट के लिए मान लेते हैं तथापि मन्त्र का पाठ अर्थ बोध के लिए होता है। तब दोषान्तर उपस्थित करते हैं—
‘बुद्धशास्त्रात्’ (जै० १।२।३३)
‘अग्नीदग्नीन् विहर’ (तै० सं० ६।३।१।२) यह प्रैषमन्त्र प्रयोग के समय में पढ़ा जाता है जो आग्नीध्र अर्थात् यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करनेवाला पुरोहित होता है, वह अपने अध्ययन-काल में ही अग्नि-विहरणार्दि कर्म को अपने कर्तव्य के रूप में समझा रहता है। (अग्नि का विहरण अर्थात् एक मण्डप से दूसरे मण्डप में अग्नि को ले जाना) जब कि उस आग्नीध्र को अग्निविहरण ज्ञात है, फिर उपर्युक्त मन्त्र का उच्चारण करके शासन करना व्यर्थ सिद्ध होता है। जिस पैर में उपानह है उसमें पुनः उपानह नहीं धारण करते। इसी प्रकार जिस अर्थ का ज्ञान है उसका पुनः शासन नहीं करते। ऐसी स्थिति में यह सिद्ध होता है कि मन्त्र विवक्षितार्थ नहीं होते, बल्कि उच्चारण मात्र के लिये उनका उपयोग है।
इसका उत्तर यह है कि अध्ययन काल में जो अर्थ ज्ञात है उसका कहीं प्रमादवश विस्मरण न हो जाय, अतः मन्त्र के द्वारा स्मरण करा दिया जाता है। तब फिर दोषान्तर देते हैं—
‘अविद्यमानवचनात्’ (जै० १।२।३४)
‘चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्तहस्तासो अस्य ।’
(ऋ० सं० ४।५८।३)
इस मन्त्र का उच्चारण करते हैं। जब कि प्रामादिक विस्मरण के परिहार के लिए मन्त्र के द्वारा चार सींगों वाले, तीन पैरों वाले, दो सिर वाले और सात हाथ वाले, यज्ञ के साधनीभूत किसी पदार्थ का सम्भव ही नहीं, ऐसी स्थिति में मन्त्र द्वारा स्मरण किसका होगा।
तब कहते हैं कि चार सींगों आदि चिह्नों वाली कोई देवता ही हो जिनका अनुस्मरण मन्त्र के द्वारा प्रसंग-प्राप्त हो, तब तो मन्त्र में अर्थविवक्षा बन जाती है। फिर दूसरा दोष देते हैं—
‘अचेतनेऽर्थबन्धनात्’ (जै० १।२।३५)
‘ओषधे त्रायस्वैनं’ ‘शृणोत ग्रावाणः’ इत्यादि मन्त्रों में अचेतन द्रव्य के प्रति चेतनोचित रक्षण-श्रवण का प्रयोग है जो ठीक नहीं बैठता, अतः मन्त्र में अर्थविवक्षा नहीं।
पृ० १० : इसका समाधान ‘अभिमानिव्यपदेशस्त्व०’ (ब्र० सू० २।१।५) इस सूत्र में भगवान् बादरायण ने दे दिया है, अतः इस प्रसंग में ओषध्याद्यभिमानिनी देवता के विवक्षित होने के कारण मन्त्र में अर्थविवक्षा बन जाती है। तब दूसरा दोष इस सूत्र से देते हैं—
‘अर्थविप्रतिषेधात्’ (जै० १।२।३६)
‘अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षम्’ (ऋ० सं० १।८९।१०) यह मन्त्र आम्नात होता है जो अदिति द्यौ है वही अन्तरिक्ष है यह बात परस्पर विरुद्ध होती है। इसी प्रकार ‘एक ही रुद्र’ है और ‘हजारों रुद्र’ ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। इस प्रकार मन्त्रों में अर्थविप्रतिषेध को देखकर कहा जा सकता है कि उनमें अर्थविवक्षा नहीं होती।
उत्तर में कहते हैं कि ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ की भाँति अन्तरिक्ष आदि रूप से अदिति की स्तुति इस मन्त्र में की गई है। इसी प्रकार एक ही रुद्र का योग के…
बल से बहुत रूपों में आना सम्भव हो सकता है। अतः अर्थविप्रतिषेध की सम्भावना ठीक नहीं। तब दोषान्तर देते हैं—
‘स्वाध्यायवद्वचनाव्’ (जै० १।२।३७)
पूर्णिका नाम की कोई स्त्री अवघात अर्थात् तुषविमोचन के लिये व्रीहि का अवहनन करती है। उसके समीप बैठकर माणवक स्वाध्याय कर रहा है। ऐसे ही प्रसङ्ग में वह माणवक अवघात-मन्त्र का पाठ करने लगता है। यद्यपि यहाँ अवघात एवं अवघातमन्त्र का पाठ दोनों एक ही अवसर पर हो रहे हैं, तथापि उस मन्त्र में अर्थ के प्रकाशन की विवक्षा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक मुसल के प्रहार के समय वह अवघात-मन्त्र पढ़ा नहीं जा रहा है, केवल उसे याद करने के उद्देश्य से अन्य मन्त्रों के साथ उसका माणवक अभ्यास कर रहा है। माणवक के स्वाध्यायकाल में पठित अवघात-मन्त्र जिस प्रकार पूर्णिका के प्रति अपना अर्थ नहीं कहता उसी प्रकार यज्ञ के अवसर में भी उसे अपना अर्थ विवक्षित नहीं होगा।
इस पर कहना यह है कि माणवक उस मन्त्र का अभ्यास करते हुए अर्थ की विवक्षा नहीं रखता और न पूर्णिका ही उस अवघात-मन्त्र के अर्थ को समझ सकती है। लेकिन यज्ञकाल में मन्त्रोच्चारण करने वाले अध्वर्यु को अर्थ की विवक्षा रहती है और उसे मन्त्रार्थ का बोध भी होता है, अतः उपर्युक्त दोष खण्डित हो जाता है। तब दूसरा दोष देते हैं—
‘अविज्ञेयात्’ (जै० १।२।३८)
अर्थात् कुछ ऐसे मन्त्र होते हैं जिनका अर्थ समझ में नहीं आता। जैसे ‘अम्यक् सा त इन्द्र०’ और ‘सृण्येव जर्भरी तुर्फरी तु०’ इत्यादि।
इसका समाधान यह है कि अर्थज्ञान के लिए निगम, निरुक्त तथा व्याकरण का अभ्यास करना चाहिए। इनकी प्रवृत्ति इसी के लिए तो है। तब दूसरा दोष देते हैं—
‘अनित्यसंयोगात् मन्त्रानर्थक्यम्’ (जै० १।२।३९)
‘किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु’ इस मन्त्र में कीकट नाम के जनपद का उल्लेख है। इस प्रकार ‘नैचाशाखं नाम नगरं प्रमगन्दो राजा’ ये अनित्य अर्थ मन्त्रों में आम्नात हैं। इससे सिद्ध होता है कि प्रमगन्द नामक राजा से मन्त्र पहले का नहीं है। इस प्रकार मन्त्र के साथ अनित्य पदार्थों का संयोग देख कर मन्त्रों का अनर्थक होना प्रतीत होता है (क्योंकि यदि यह मान लेते हैं कि मन्त्र में अर्थ-विवक्षा होती है तब तो स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रमगन्द राजा के बाद ही मन्त्र की रचना हुई, यह स्वीकार करना सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है, अतः अगत्या कह सकते हैं कि मन्त्रों में अर्थविवक्षा नहीं होती, फिर मन्त्र के पहले प्रमगन्द के होने की आशंका ही नहीं रह जाती)।
पृष्ठ ११ : इस प्रकार ‘तदर्थशास्त्रात्’ आदि हेतुओं से मन्त्रों की अर्थ-विवक्षा सिद्ध नहीं होती, किन्तु उनके उच्चारण मात्र से अदृष्ट प्रयोजन का लाभ होता है यह पूर्वपक्ष यहाँ स्थापित हुआ।
अब सिद्धान्त-पक्ष को सूत्र-बद्ध करते हैं—
उत्तर पक्ष—मन्त्रों में अर्थ-विवक्षा है।
‘अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः’ (जै० १।२।४०)
इस सूत्र में प्रयुक्त ‘तु’ शब्द पूर्वपक्षी का अभिमत मन्त्रों के अदृष्ट के लिए उच्चारणमात्र का निवारण करता है। सूत्रार्थ यह है कि जिस प्रकार लोक में क्रिया और कारक के सम्बन्ध से वाक्यार्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार वेद में भी जब क्रिया-कारक से सम्बद्ध वाक्य का प्रयोग होता है तब उसका भी उद्देश्य अर्थ का ज्ञान ही होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि अर्थ-प्रत्यायन के उद्देश्य से वाक्य का उच्चारण लोक और वेद में अविशेष रूप से होने के कारण यज्ञ के प्रयोग में भी मन्त्रवाक्य अपना अर्थ अभिधान करते हैं। मन्त्र से प्रकाशित अर्थ का ही अनुष्ठान किया जा सकता है, अप्रकाशित अर्थ का नहीं। इसलिये मन्त्रोच्चारण का अर्थ प्रकाशन रूप दृष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है।
यहाँ शंका होती है— ‘अग्निरसि नारिरसि’ (वा० सं० ११।१२) से लेकर ‘त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसादुदे’ (तै० सं० ४।१।१।१-४) तक मन्त्र आम्नात है। इसी मन्त्र से अभ्रि (फावड़ा) का ग्रहण करना प्रतीत हो जाता है, फिर ब्राह्मण विधान करता है ‘चतुर्भिराव्रिमादत्ते’ (तै० सं० ५।१।१।४) अर्थात् चार मन्त्रों से अभ्रि (फावड़ा) को पकड़ता है। ऐसी स्थिति में जब कि मन्त्र के द्वारा अभ्रआदान पूर्व में सूचित ही हो गया है, फिर ब्राह्मण का अभ्रआदान का विधान करना मन्त्रार्थविवक्षावादी के मत में व्यर्थ सिद्ध होता है। इसका उत्तर इस सूत्र से देते हैं—
‘गुणार्थेन पुनः श्रुतिः’ (जै० १।२।४१)
मन्त्र से अभ्रआदान रूप अर्थ की प्रतीति के हो जाने पर भी ब्राह्मण में पुनः अभ्रआदान का श्रवण जो हुआ उसका उपयोग ‘चतुर्भिः’ के द्वारा चार संख्या के विशेष गुण के विधान के लिये माना जा सकता है। अगर ब्राह्मण ऐसा विधान नहीं करता तब चार मन्त्रों में जिस किसी एक मन्त्र से अभ्रआदान की सिद्धि हो जाती। इस प्रकार ब्राह्मण व्यर्थ सिद्ध नहीं होता।
शंका होती है कि ‘इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य’ (वा० सं० २२।२) इस मन्त्र की सामर्थ्य से ही अवगत हो जाता है कि रशना अर्थात् लगाम का आदान करे अर्थात् हाथ में पकड़े। इस प्रकार जब कि मन्त्र के द्वारा रशनादान की बात मालूम हो आती है, फिर इसी कार्य के लिए प्रयुक्त, इस मन्त्र का विनियोग बताने वाला ‘इत्यश्वाभिधानीमादत्ते’ अर्थात् अश्व की रशना ग्रहण करे यह ब्राह्मणवाक्य ऐसी स्थिति में व्यर्थ सिद्ध होता है। इसका समाधान करते हुए सूत्रकार कहते हैं—
‘परिसंख्या’(१) (जै० १।२।४२)
पृष्ठ १२ : अर्थात् वर्जनबुद्धि ही परिसंख्या है, अर्थात् ‘अश्व की रशना को ग्रहण करे’ यह ब्राह्मणवाक्य ‘गर्दभ की रशना को ग्रहण न करे’ इस प्रकार की वर्जनबुद्धि उत्पन्न करता है। यही इस ब्राह्मणवाक्य का प्रयोजन है।
यहाँ पर शंका होती है कि परिसंख्या में तीन दोष होते हैं—श्रुतहानि, अश्रुत कल्पना और प्राप्तबाध। जैसे, ‘अश्वाभिधानीमादत्ते’ इस वाक्य में अश्व की रशना का आदान प्रतीत होता है उसे हम छोड़ देते हैं यह दोष श्रुतहानि है, और अश्व से अतिरिक्त जो गर्दभ है उसकी रशना को ग्रहण करना यह दूसरा अश्रुत अर्थ कल्पित कर लेते हैं, अश्रुतकल्पना है, क्योंकि यह अर्थ वाक्य की शक्तिमर्यादा से प्राप्त नहीं होता और सामान्य रशनादान से जो गर्दभ का रशनादान प्राप्त था उसका बाध होता है। यहाँ अभिधा से यह तीनों अर्थ नहीं गृहीत होते हैं, किन्तु लक्षणा माननी पड़ती है, इस लिए दोष माना जाता है। परिसंख्या दो प्रकार की होती है श्रौती और लाक्षणिकी। जहाँ एवकार अथवा नञ् श्रुत है वहाँ शक्ति के द्वारा इतरव्यावृत्ति मालूम होती है इसलिए इसे श्रौती परिसंख्या कहते हैं। जहाँ इतरव्यावृत्ति का बोधक शब्द नहीं रहता वहाँ लक्षणा द्वारा इतरव्यावृत्ति मानी जाती है अतः इसे लाक्षणिकी परिसंख्या कहते हैं। प्रकृत में दोष का समाधान करते हुए कहते हैं कि ‘इमामगृभ्णन्’ यह मन्त्र रशनाग्रहण-प्रकाशन सामर्थ्य से अश्वरशना और गर्दभ-रशना दोनों के आदान में प्रवृत्त होता है, इसी समय ‘इत्यश्वाभिधानीमादत्ते’ यह ब्राह्मणवाक्य अश्वरशना के ग्रहण में मन्त्र का विनियोग बता देता है। तब लिङ्ग से श्रुति की कल्पना नहीं होने के कारण गर्दभरशना के ग्रहण में मन्त्र की जो अप्राप्ति है उसी को ग्रन्थकार ने परिसंख्या शब्द से व्यवहार किया है। जब कि मन्त्र-वाक्य से गर्दभरशना…
…की प्राप्ति होती तब प्राप्तबाध का दोष माना जाता। यहाँ तो वह प्राप्त ही नहीं है। फिर प्राप्तबाध दोष की सम्भावना ही कैसे हो सकती है? मन्त्र तो गर्दभरशना के आदान के अंश में सर्वथा निराकांक्ष हो जाता है। इस प्रकार निषेधार्थ गर्दभरशनादान की कल्पना अश्रुतकल्पना नहीं होती और रशनादान रूप विध्यर्थ का त्याग नहीं होता। इस प्रकार विध्यर्थ का त्याग, अश्रुतकल्पना और प्राप्तबाध परिसंख्या के निर्दिष्ट इन तीनों दोषों का निराकरण हो जाता है।
लेकिन जो ‘उरु प्रथस्व’ इस मन्त्र में ‘प्रथयति’ इस ब्राह्मण के व्यर्थ होने की शंका तदवस्थ बनी है उसका समाधान करते हैं—
‘अर्थवादो वा’ (जै० १।२।४३)
सूत्र में प्रयुक्त ‘वा’ शब्द ब्राह्मण के वैयर्थ्य का निवारण करता है। यहाँ ब्राह्मण के द्वारा अर्थवाद किया गया है। अर्थात् पुरोडाश यज्ञपति (यजमान) को बढ़ाता-सम्पन्न करता है, इस अर्थवाद के लिये ब्राह्मण में भी विधि का पाठ होता है। अगर कोई यह शंका करे कि ‘प्रथयति’ इस विधि का शब्द द्वारा प्रथन को उद्देश्य करके ‘यज्ञपतिमेव’ इत्यादि अर्थवाद के द्वारा स्तुति करते तो ठीक था। प्रस्तुत में यज्ञपति का प्रथन कैसे प्राप्त होता है? इसका उत्तर देते हैं कि अध्वर्यु मन्त्र के कथनानुसार पुरोडाश को उद्देश्य करके ‘प्रथस्व’ यह कहता है। इस कथन से अध्वर्यु द्वारा किया हुआ प्रथन प्राप्त होता है। जिस प्रकार लोक में जो कोई कहता है कि ‘करो’ तो इससे उससे कराना भी सिद्ध होता है। उसी प्रकार जो अध्वर्यु ‘प्रथस्व’ कहता है उसका ‘प्रथन कराना’ भी सिद्ध होता है।
जैसा कि ‘अग्निर्मूर्धा दिवः’ (ऋ० सं० ८।४४।१६) इस मन्त्र में पाठक्रम के नियम को देख कर मन्त्रों का अदृष्टार्थ होना सिद्ध किया था, उसका उत्तर देते हैं—
पृष्ठ १३ :
‘अविरुद्धं परम्’ (जै० १।२।४४)
‘वाक्यनियमात्’ इस दूसरे सूत्र में मन्त्रों में पाठक्रम का नियम माना है वह हमारे पक्ष में भी सम्मत सिद्धान्त है, क्योंकि हम पाठक्रम के नियम से अदृष्ट का निवारण नहीं करते। यह कहते हुए भी हम इतना ही विशेष कहते हैं कि जब मन्त्र के उच्चारण से यह अर्थ का प्रत्यायन रूप दृष्ट प्रयोजन प्राप्त है तब उसकी उपेक्षा न करनी चाहिये।
शंका है कि ‘प्रोक्षणीरासादय’ यह मन्त्र (वा० सं० १।२८) अध्ययन काल में जानी हुई बात को करने के लिये आज्ञा देता है, यह ठीक नहीं उपानहधारी दूसरा उपानह ग्रहण नहीं करना। इसका परिहार करते हैं—
‘सम्प्रेषे कर्मगार्हाऽनुपलम्भः संस्कारत्वात्’ (जै० १।२।४५)
जिस कर्म में निर्देश या आज्ञा अथवा शासन है उसकी आलोचना ठीक नहीं, जो अर्थ पहले से ज्ञात है उसका अनुस्मरण मन्त्र के द्वारा जो होता है उसमें नियमादृष्ट रूप संस्कार उत्पन्न होता है। इस अंश में उनका उपयोग अवश्य है।
और जैसा है कि ‘चत्वारि शृङ्गा०’ (ऋ० सं० ४।५८।३) यह मन्त्र उस अर्थ का अभिधान करता है जो वस्तुतः नहीं है—असत् है। इसका समाधान देते हैं—
‘अभिधानेऽर्थवादः’ (जै० १।२।४६)
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