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🔱 यम–यमी संवाद सूक्त — ऋग्वेद 10.10
UGC NET Sanskrit के लिए महत्वपूर्ण नोट्स
यम–यमी संवाद सूक्त ऋग्वेद के प्रसिद्ध संवाद सूक्तों में से एक है। इसमें यम और यमी, जो जुड़वाँ भाई-बहन हैं, के बीच संवाद प्रस्तुत किया गया है। सूक्त का मुख्य विषय कामना और धर्म/नैतिक मर्यादा के बीच संघर्ष है।
📌 1. मूल परिचय
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| सूक्त | यम–यमी संवाद सूक्त |
| वेद | ऋग्वेद |
| मण्डल | दशम मण्डल |
| सूक्त संख्या | 10.10 |
| ऋचाएँ | 14 |
| प्रकार | संवाद सूक्त |
| मुख्य पात्र | यम और यमी |
| यम | यमी के जुड़वाँ भाई; मृत्यु/धर्म से संबद्ध |
| यमी | यम की जुड़वाँ बहन |
| मुख्य विषय | कामना बनाम नैतिक मर्यादा |
| मुख्य संघर्ष | यमी की इच्छा और यम का धर्मसम्मत निषेध |
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ऋग्वेद → मण्डल 10 → सूक्त 10 → यम–यमी संवाद → 14 ऋचाएँ
📜 ऋचा 1
मूल मन्त्र
ओ चित् सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू विदर्णवं जगन्वान्।
पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः ॥१॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- सखायम् — मित्र/सखा
- सख्या — मित्रता/सख्यभाव
- ववृत्याम् — प्राप्त करना/पुनः प्राप्त करना
- विदर्णवम् — विस्तृत समुद्र
- पितुः नपातम् — पिता का वंशज/पुत्र
- वेधा — विधाता/व्यवस्था करने वाला
- क्षमि — पृथ्वी पर
- प्रतरम् — आगे बढ़ने वाला/पार जाने वाला
सरल व्याख्या
यमी यम को संबोधित करते हुए अपनी इच्छा प्रकट करती है। वह उनके बीच के अत्यंत निकट संबंध और साथ-साथ उत्पन्न होने की बात को आधार बनाती है। उसके मन में सृष्टि की निरंतरता और संतान उत्पत्ति की इच्छा है।
यहाँ से संवाद में यमी की कामना और उसके द्वारा दिए जाने वाले तर्कों का आरम्भ होता है।
⭐ NET Point
ऋचा 1 → यमी की इच्छा का प्रारम्भ → सख्य/निकटता → सृष्टि-विस्तार की भावना
📜 ऋचा 2
मूल मन्त्र
न ते सखा सख्यं वष्टयेतत् सलक्ष्मा यद्विपुरुषा भवाति।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परिख्यन् ॥२॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- न ते — तुम्हारा नहीं
- सखा — मित्र
- सख्यम् — मित्रता/सख्यभाव
- सलक्ष्मा — समान लक्षण वाली
- महः पुत्रासः — महान् के पुत्र
- वीराः — वीर/शक्तिशाली
- दिवः धर्तारः — आकाश को धारण करने वाले
- परिख्यन् — देखते/निरीक्षण करते हैं
सरल व्याख्या
यम यमी की इच्छा को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं। वे संकेत करते हैं कि भाई-बहन के बीच इस प्रकार का संबंध उचित नहीं है। यम यह भी बताते हैं कि देवताओं की शक्तियाँ सब कुछ देखती हैं; अतः कोई भी कार्य पूर्णतः छिपा हुआ नहीं है।
यहाँ यम धर्म और मर्यादा के पक्षधर दिखाई देते हैं।
⭐ NET Point
ऋचा 2 → यम का प्रथम स्पष्ट निषेध → देवताओं के साक्षी होने की भावना।
📜 ऋचा 3
मूल मन्त्र
उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित् त्यजसं मर्त्यस्य।
नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्वमा विविश्याः ॥३॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- अमृतासः — अमर देवता
- एतत् — यह
- त्यजसम् — इच्छा/कामना
- मर्त्यस्य — मनुष्य का
- मनः — मन
- पतिः — पति
- तन्वम् — शरीर
- विविश्याः — प्रवेश करो
सरल व्याख्या
यमी अपने आग्रह को आगे बढ़ाती है। वह अपने तर्क के समर्थन में देवताओं की इच्छा का उल्लेख करती है और यम को पति के रूप में स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त करती है।
इस ऋचा में यमी की कामना और आग्रह अधिक स्पष्ट हो जाता है।
⭐ NET Point
ऋचा 3 → यमी का आग्रह → देवताओं का उल्लेख → पति-पत्नी संबंध की इच्छा।
📜 ऋचा 4
मूल मन्त्र
न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम।
गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नो नाभिः परमं जामि तन्नौ ॥४॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- पुरा — पहले
- चकृमा — हमने किया
- ऋता वदन्तः — सत्य बोलने वाले
- अनृतम् — असत्य/अधर्म
- गन्धर्वः — गन्धर्व
- अप्सु — जल में
- योषा — स्त्री
- नाभिः — संबंध/केन्द्र
- जामि — सहोदर/संबंधी
सरल व्याख्या
यम कहते हैं कि उन्होंने पहले कभी ऐसा अनुचित कार्य नहीं किया है। वे सत्य और धर्म के मार्ग को छोड़कर अधर्म स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। भाई-बहन के संबंध को वे पवित्र और मर्यादित मानते हैं।
⭐ NET Point
ऋचा 4 → सत्य बनाम अनृत → यम का नैतिक पक्ष → जामि = सहोदर संबंध।
📜 ऋचा 5
मूल मन्त्र
गर्भे नु नौ जनिता दम्पती कर्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः।
नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथ्वी उत द्यौः ॥५॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- गर्भे — गर्भ में
- जनिता — उत्पन्न करने वाला
- दम्पती — पति-पत्नी
- त्वष्टा — सृष्टिकर्ता देवता
- सविता — सविता देव
- विश्वरूपः — अनेक रूपों वाला
- व्रतानि — नियम/व्रत
- पृथ्वी — पृथ्वी
- द्यौः — आकाश
सरल व्याख्या
यमी अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए सृष्टि-व्यवस्था और देवताओं का उल्लेख करती है। वह जन्म और सृष्टि की व्यवस्था को अपने तर्क का आधार बनाती है।
यहाँ सृष्टि-विस्तार और नियति का विचार महत्वपूर्ण है।
⭐ NET Point
ऋचा 5 → त्वष्टा और सविता का उल्लेख → सृष्टि एवं नियम की चर्चा।
📜 ऋचा 6
मूल मन्त्र
को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ई ददर्श क इह प्रवोचत्।
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आह्वो वीच्या नृन् ॥६॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- कः — कौन
- वेद — जानता है
- प्रथमस्य अह्नः — प्रथम दिन का
- ददर्श — देखा
- प्रवोचत् — बताए
- मित्रस्य — मित्र देव का
- वरुणस्य — वरुण देव का
- धाम — स्थान/व्यवस्था
- नृन् — मनुष्यों को
सरल व्याख्या
यमी यम के नैतिक तर्क पर प्रश्न उठाती है। वह पूछती है कि सृष्टि के प्रारम्भिक समय की व्यवस्था को वास्तव में किसने देखा और कौन उसके बारे में निश्चित रूप से बता सकता है?
इस प्रकार यमी यम के धर्म-संबंधी तर्क को चुनौती देती है।
⭐ NET Point
ऋचा 6 → प्रथम दिवस/सृष्टि का प्रश्न → मित्र-वरुण का उल्लेख।
📜 ऋचा 7
मूल मन्त्र
यमस्य मा यम्यं काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय।
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिहेव रथ्येव चक्रा ॥७॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- यमस्य — यम का
- यम्यम् — यम से संबंधित
- कामः — इच्छा/कामना
- समाने योनौ — एक ही स्थान/उत्पत्ति में
- सहशेय्याय — साथ सोने के लिए
- जाया — पत्नी
- पतिः — पति
- तनुम् — शरीर
- रथ्येव चक्रा — रथ के पहियों के समान
सरल व्याख्या
यमी अब अपनी कामना को अत्यंत स्पष्ट रूप में व्यक्त करती है। वह यम के साथ रहने की इच्छा प्रकट करती है और पति-पत्नी तथा रथ के दो पहियों जैसी उपमाओं के माध्यम से अपने तर्क को प्रस्तुत करती है।
⭐ NET Point
ऋचा 7 → यमी की कामना का चरम → पत्नी-पति और रथ के पहियों की उपमा।
📜 ऋचा 8
मूल मन्त्र
न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति।
अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा ॥८॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- न तिष्ठन्ति — नहीं रुकते
- न निमिषन्ति — पलक नहीं झपकते
- देवानाम् स्पशः — देवताओं के दूत/गुप्तचर
- चरन्ति — घूमते/विचरण करते हैं
- अन्येन — किसी अन्य के साथ
- याहि — जाओ
- तूयम् — शीघ्र
- रथ्येव चक्रा — रथ के पहियों के समान
सरल व्याख्या
यम यमी को पुनः समझाते हैं कि देवताओं के दूत सब कुछ देखते हैं। वे कभी सोते या पलक नहीं झपकाते। इसलिए यम यमी से कहते हैं कि वह किसी अन्य योग्य पुरुष को अपना पति बनाए।
⭐ NET Point
ऋचा 8 → देवताओं के स्पशः → सर्वदर्शी/साक्षी की अवधारणा → यम का पुनः निषेध।
📜 ऋचा 9
मूल मन्त्र
रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत् सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्।
दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि ॥९॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- रात्रीभिः — रातों द्वारा
- अहभिः — दिनों द्वारा
- सूर्यस्य चक्षुः — सूर्य की आँख
- मुहुः — बार-बार
- दिवा — दिन में
- पृथिव्या — पृथ्वी के
- मिथुना — युगल
- सबन्धू — संबंधी
- अजामि — जो सहोदर नहीं है
सरल व्याख्या
यम पुनः प्राकृतिक शक्तियों को साक्षी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। दिन, रात और सूर्य की दृष्टि के माध्यम से वे बताते हैं कि संसार में नैतिक व्यवस्था और मर्यादा का महत्व है।
यम यमी को अपने अतिरिक्त किसी अजामि, अर्थात् सहोदर न होने वाले पुरुष को पति के रूप में स्वीकार करने की सलाह देते हैं।
⭐ Important Word
जामि = सहोदर/संबंधी
अजामि = जो सहोदर न हो
📜 ऋचा 10
मूल मन्त्र
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि।
उप बर्वृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत् ॥१०॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- युगानि — युग
- जामयः — सहोदर/संबंधी
- अजामि — असहोदर
- वृषभ — शक्तिशाली पुरुष
- बाहुम् — भुजा
- अन्यम् — अन्य
- पतिम् — पति
- सुभगे — हे सौभाग्यवती
सरल व्याख्या
यम यमी को भविष्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि वह किसी अन्य पुरुष को अपना पति बनाए। वे उसे किसी योग्य और शक्तिशाली पुरुष को स्वीकार करने की सलाह देते हैं।
ध्यान दें: इस ऋचा को सीधे “कलियुग का वर्णन” मानना उचित नहीं है। यहाँ मुख्यतः आगामी युगों और बदलती सामाजिक स्थिति का संकेत मिलता है।
⭐ NET Point
ऋचा 10 → अन्य पुरुष को पति बनाने की सलाह → वृषभ शब्द महत्वपूर्ण।
📜 ऋचा 11
मूल मन्त्र
किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यत्रिऋतिर्निगच्छात्।
काममूता वह्वेतद्रापामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि ॥११॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- भ्राता — भाई
- अनाथम् — असहाय/अनाथ
- स्वसा — बहन
- ऋति — गति/दुःख की स्थिति
- काममूता — काम से मोहित
- तन्वा — शरीर से
- सं पिपृग्धि — मिलाओ/पूरा करो
सरल व्याख्या
यमी भावनात्मक तर्क प्रस्तुत करती है। वह कहती है कि भाई वह कैसा जो अपनी बहन की सहायता न करे और बहन वह कैसी जो भाई से सहायता न पाए?
वह स्वीकार करती है कि उसकी इच्छा काम से प्रेरित है और पुनः यम से अपने आग्रह को स्वीकार करने की प्रार्थना करती है।
⭐ NET Point
ऋचा 11 → यमी का भावनात्मक तर्क → काममूता शब्द विशेष महत्वपूर्ण।
📜 ऋचा 12
मूल मन्त्र
न वा उ ते तन्वा तन्वं सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्।
अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत् ॥१२॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- तन्वा — शरीर से
- सं पपृच्याम् — मिलना/संयोग करना
- पापम् आहुः — पाप कहते हैं
- स्वसारम् — बहन को
- निगच्छात् — गमन करे
- अन्येन — किसी अन्य के साथ
- प्रमुदः — प्रसन्न हो
- भ्राता — भाई
- वष्टि — चाहता है
⭐ सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति
“पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्।”
सरल अर्थ
जो अपनी बहन के साथ इस प्रकार का संबंध स्थापित करता है, उसे पापी कहा जाता है।
सरल व्याख्या
यह यम के उत्तर की सबसे महत्वपूर्ण ऋचाओं में से एक है। यम व्यक्तिगत इच्छा की अपेक्षा नैतिक और सामाजिक मर्यादा को प्राथमिकता देते हैं। वे स्पष्ट रूप से यमी के प्रस्ताव को अस्वीकार करते हैं और उसे किसी अन्य पुरुष के साथ जीवन बिताने की सलाह देते हैं।
🔥 UGC NET MUST REMEMBER
ऋचा 12 → पाप + स्वसारम् + यम का स्पष्ट नैतिक निषेध
📜 ऋचा 13
मूल मन्त्र
बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम।
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ॥१३॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- बतो बत — हाय! हाय!
- मनः — मन
- हृदयम् — हृदय
- अन्या — दूसरी स्त्री
- कक्षा इव — बेल्ट/लता के समान
- परिष्वजाते — आलिंगन करती है
- लिबुजा इव वृक्षम् — वृक्ष को लता के समान
सरल व्याख्या
यमी यम के कठोर निषेध से दुखी और क्रोधित हो जाती है। वह शिकायत करती है कि यम उसके मन और हृदय की भावना को नहीं समझते। वह कल्पना करती है कि भविष्य में कोई दूसरी स्त्री यम को उसी प्रकार आलिंगन करेगी जैसे लता वृक्ष को घेर लेती है।
⭐ NET Point
ऋचा 13 → यमी का आक्रोश/उपालम्भ → लता-वृक्ष की उपमा।
📜 ऋचा 14
मूल मन्त्र
अन्यमू षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्।
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाऽधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥१४॥
🔤 प्रमुख शब्दार्थ
- अन्यम् — अन्य पुरुष
- परिष्वजाते — आलिंगन करे
- लिबुजा इव वृक्षम् — लता के समान वृक्ष को
- तस्य — उसका
- मनः — मन
- इच्छ — चाहो/जीतो
- संविदम् — समझौता/संबंध
- सुभद्राम् — मंगलमय/कल्याणकारी
सरल व्याख्या
अंतिम ऋचा में यम शांत भाव से यमी को समझाते हैं कि वह किसी अन्य पुरुष को अपना जीवनसाथी बनाए। वह उसके मन को समझे और वह पुरुष भी उसके प्रति अनुराग रखे। इसी प्रकार उसका जीवन मंगलमय हो सकता है।
इस प्रकार यम अपने धर्म, मर्यादा और नैतिक सिद्धान्त पर अंत तक दृढ़ रहते हैं।
🧠 पूरे यम–यमी संवाद का सार
यम–यमी संवाद मूलतः इच्छा और धर्म के संघर्ष को प्रस्तुत करता है।
यमी का पक्ष
कामना → सृष्टि-विस्तार → तर्क → भावनात्मक आग्रह → पुनः आग्रह
यम का पक्ष
धर्म → मर्यादा → देवताओं की साक्षी → सामाजिक नियम → स्पष्ट निषेध
इस प्रकार यम व्यक्तिगत इच्छा की अपेक्षा धर्म और मर्यादा को अधिक महत्व देते हैं।
🔥 UGC NET के लिए TOP 15 Important Points
- यम–यमी संवाद सूक्त — ऋग्वेद 10.10
- यह ऋग्वेद के दशम मण्डल में है।
- इसमें 14 ऋचाएँ हैं।
- यह एक प्रमुख संवाद सूक्त है।
- संवाद के मुख्य पात्र यम और यमी हैं।
- यम और यमी जुड़वाँ भाई-बहन हैं।
- यमी यम के सामने कामना/संबंध की इच्छा व्यक्त करती है।
- यम उसके प्रस्ताव को अस्वीकार करते हैं।
- यम के चरित्र में धर्म एवं नैतिक मर्यादा प्रमुख है।
- यमी का प्रमुख पक्ष कामना एवं सृष्टि-विस्तार से संबंधित है।
- देवानां स्पशः — देवताओं के दूत/निरीक्षक — महत्वपूर्ण पद है।
- जामि — सहोदर/संबंधी; अजामि — असहोदर।
- “पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्” — अत्यंत महत्वपूर्ण पंक्ति।
- ऋचा 7 में रथ के पहियों की उपमा मिलती है।
- ऋचा 13–14 में लता और वृक्ष की उपमा मिलती है।
📊 ऋचा-wise Quick Revision Table
| ऋचा | मुख्य विषय | परीक्षा हेतु संकेत |
|---|---|---|
| 1 | यमी की इच्छा का प्रारम्भ | सखा, सृष्टि-विस्तार |
| 2 | यम का निषेध | देवताओं के साक्षी |
| 3 | यमी का आग्रह | देवताओं का उल्लेख |
| 4 | यम का नैतिक तर्क | ऋत–अनृत, जामि |
| 5 | सृष्टि एवं देव-व्यवस्था | त्वष्टा, सविता |
| 6 | यमी की चुनौती | प्रथम दिवस, मित्र-वरुण |
| 7 | कामना का उत्कर्ष | रथ के पहिए |
| 8 | यम की चेतावनी | देवानां स्पशः |
| 9 | प्राकृतिक साक्षी | सूर्य, दिन-रात, अजामि |
| 10 | अन्य पुरुष को स्वीकारने की सलाह | वृषभ |
| 11 | भावनात्मक आग्रह | काममूता |
| 12 | स्पष्ट नैतिक निषेध | पापमाहुः |
| 13 | यमी का आक्रोश | लता-वृक्ष उपमा |
| 14 | अंतिम यम का उत्तर | सुभद्राम् संविदम् |
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ऋग्वेद 10.10 = यम–यमी संवाद = 14 ऋचाएँ = यमी की कामना + यम का धर्मसम्मत निषेध।
याद रखने की Trick
“10–10–14–यम–यमी”
➡️ मण्डल 10
➡️ सूक्त 10
➡️ 14 ऋचाएँ
➡️ पात्र — यम और यमी
➡️ विषय — कामना बनाम धर्म/मर्यादा
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