स्वरः

परिभाषा :
स्वराणाम् उच्चारणं स्वतन्त्ररूपेण भवति।
अर्थात् जिन वर्णों का उच्चारण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना स्वतन्त्र रूप से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं।

स्वर द्विविधाः सन्ति—

  1. समानाक्षरणी स्वर
  2. सन्ध्यक्षरणी स्वर

१. समानाक्षरणी स्वर

वर्णमाला में जो सामान्य स्वर पाए जाते हैं, उन्हें समानाक्षरणी स्वर कहते हैं।

ये दो प्रकार के होते हैं—

(क) ह्रस्व स्वर (एक मात्रा वाले)

(ख) दीर्घ स्वर (दो मात्रा वाले)

ध्यान दें :
का दीर्घ रूप नहीं होता।


२. सन्ध्यक्षरणी स्वर

जो स्वर दो स्वरों के संयोग (सन्धि) से बनते हैं, उन्हें सन्ध्यक्षरणी स्वर कहते हैं।

ये हैं—

निर्माण

  • अ + इ / ई = ए
  • अ + ए = ऐ
  • अ + उ / ऊ = ओ
  • अ + ओ = औ

अनुस्वारिक स्वर

जो स्वर मुख तथा नासिका दोनों से उच्चारित होते हैं, उन्हें अनुस्वारिक (अनुनासिक) स्वर कहते हैं।

उदाहरण—

  • अँ
  • आँ
  • इँ
  • ईँ
  • उँ
  • ऊँ
  • ऋँ
  • ॠँ
  • ऌँ
  • एँ
  • ऐँ
  • ओँ
  • औँ

इनमें ँ (चन्द्रबिन्दु) का प्रयोग होता है।


महत्वपूर्ण तथ्य

✅ स्वर का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है।

✅ स्वर दो प्रकार के होते हैं—

  • समानाक्षरणी
  • सन्ध्यक्षरणी

✅ समानाक्षरणी स्वर—

  • ह्रस्व: अ, इ, उ, ऋ, ऌ
  • दीर्घ: आ, ई, ऊ, ॠ

ऌ का दीर्घ रूप नहीं होता।

✅ सन्ध्यक्षरणी स्वर—

✅ निर्माण सूत्र—

  • अ + इ / ई = ए
  • अ + ए = ऐ
  • अ + उ / ऊ = ओ
  • अ + ओ = औ

त्वरित पुनरावृत्ति (Revision)

स्वर
├── समानाक्षरणी
│ ├── ह्रस्व – अ, इ, उ, ऋ, ऌ
│ └── दीर्घ – आ, ई, ऊ, ॠ
└── सन्ध्यक्षरणी
├── ए
├── ऐ
├── ओ
└── औ

स्मरणीय सूत्र:
“स्वर द्विविधाः—समानाक्षरणी तथा सन्ध्यक्षरणी। समानाक्षरणी स्वराः ह्रस्व-दीर्घभेदेन भवन्ति, सन्ध्यक्षरणी स्वराः ए, ऐ, ओ, औ इति।”

व्यञ्जनानि

व्यञ्जनानाम् उच्चारणे कस्यचित् स्वरस्य सहाय्यतायाः अपेक्षा अवश्यं भवति। अतः वर्णमालायां व्यञ्जनानाम् उच्चारणार्थं सर्वत्र ‘अ’ स्वरस्य योजनं भवति।

उदाहरणम्—

क् + अ = क

ख् + अ = ख

ग् + अ = ग

घ् + अ = घ

अतः व्यञ्जनं केवलम्—

क्, ख्, ग्, घ् इत्येव अस्ति।

अत्र स्वरः केवलम् उच्चारणार्थं योजितः अस्ति।


व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः सन्ति—

१. स्पर्शाः (वर्गीयाः) वर्णाः

क-वर्गः

क ख ग घ ङ

च-वर्गः

च छ ज झ ञ

ट-वर्गः

ट ठ ड ढ ण

त-वर्गः

त थ द ध न

प-वर्गः

प फ ब भ म

परिभाषा

स्पर्शाः (वर्गीयाः) व्यञ्जनवर्णाः स्वकीय-उच्चारण-स्थानानुसारेण परस्परं वायोः विघ्नं कुर्वन्ति।


२. अन्तःस्थाः वर्णाः

य र ल व

परिभाषा

अन्तःस्थाः वर्णाः बहुषु स्वरवर्णानां स्थाने जायन्ते। अतः एते अर्धस्वराः इत्यपि उच्यन्ते।

उदाहरणानि

इ + अ → य् + अ

ऋ + अ → र् + अ

ऌ + अ → ल् + अ

उ + अ → व् + अ

यथा—

यदि + अपि = यद्यपि

पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

लृ + आकृतिः = लाकृतिः

सु + आगतम् = स्वागतम्


३. ऊष्म-वर्णाः

श ष स ह

परिभाषा

ऊष्मवर्णेषु व्यञ्जनवर्णानाम् उच्चारणसमये मुखात् उष्णः वायुः निःसरति।


४. अयोगवाहाः वर्णाः

अं

अः

परिभाषा

अयोगवाहाः विशिष्टाः व्यञ्जनवर्णाः सन्ति। अत्र उच्चारणार्थम् स्वरस्य संयोजनं पूर्वं भवति, न तु पश्चात्।

अं = अ + ं → अनुस्वारः

अः = अ + ः → विसर्गः

अपि च—

अनुस्वारः केवलम्

विसर्गः केवलम्

एवमेव अपि पूर्वं योजितः स्वरः केवलम् उच्चारणार्थम् अस्ति।


व्यञ्जन के 4 भेद

  1. स्पर्श (वर्गीय) वर्ण
    • क ख ग घ ङ
    • च छ ज झ ञ
    • ट ठ ड ढ ण
    • त थ द ध न
    • प फ ब भ म
  2. अन्तःस्थ वर्ण
    • य र ल व
  3. ऊष्म वर्ण
    • श ष स ह
  4. अयोगवाह वर्ण
    • अं (अनुस्वार)
    • अः (विसर्ग)

स्मरण सूत्र

कचटतप = स्पर्श वर्ण

यरलव = अन्तःस्थ वर्ण

शषसह = ऊष्म वर्ण

अं, अः = अयोगवाह

,

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