विषय: संज्ञाप्रकरणम् – स्वरों का वर्गीकरण (काल और धर्म के आधार पर)
इस भाग में हम यह जानेंगे कि स्वरों (अच्) को उनके उच्चारण काल (समय) और उच्चारण करने की विधि (स्थान के भाग) के आधार पर कैसे विभाजित किया गया है।
१. ऊकालो ऽज्झस्व-दीर्घ-प्लुतः (१।२।२७)
यह सूत्र स्वरों के समय (मात्रा) के आधार पर उनके भेद बताता है।
- अर्थ: ‘उ’, ‘ऊ’, और ‘ऊ३’ (त्रिमात्रिक) के उच्चारण में लगने वाला जितना समय है, वैसा ही समय जिन स्वरों के उच्चारण में लगता है, वे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत कहलाते हैं।
- मात्रा का आधार:
- ह्रस्व: एकमात्रिक (जैसे: अ, इ, उ)।
- दीर्घ: द्विमात्रिक (जैसे: आ, ई, ऊ)।
- प्लुत: त्रिमात्रिक (जैसे: ओ३म् – जहाँ ‘३’ का अंक यह दर्शाता है कि यह स्वर प्लुत है)।
श्लोक:
एकमात्रो भवेद्ध्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं चार्धमात्रकम्॥
(अर्थ: एकमात्रिक ह्रस्व, द्विमात्रिक दीर्घ और त्रिमात्रिक प्लुत होता है। व्यंजन अर्धमात्रिक होते हैं।)
२. उदात्त, अनुदात्त और स्वरित (स्वरों के धर्म)
ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत में से प्रत्येक के तीन-तीन भेद होते हैं, जो उच्चारण स्थान (तालु, कण्ठ आदि) के आधार पर तय होते हैं।
| सूत्र | संज्ञा | अर्थ (उच्चारण स्थान का भाग) |
| उच्चैरुदात्तः | उदात्त | तालु आदि स्थानों के ऊपरी भाग से उच्चरित स्वर। |
| नीचैरनुदात्तः | अनुदात्त | तालु आदि स्थानों के निचले भाग से उच्चरित स्वर। |
| समाहारः स्वरितः | स्वरित | जहाँ उदात्त और अनुदात्त का समाहार (मिश्रण) हो। |
- विशेष: ये भेद मुख्य रूप से वैदिक संस्कृत में प्रयुक्त होते हैं। लौकिक संस्कृत में इनका उच्चारण रूप स्पष्ट नहीं होता।
- चिह्न:
- उदात्त: कोई चिह्न नहीं।
- अनुदात्त: स्वर के नीचे पड़ी रेखा (जैसे: अ॒)।
- स्वरित: स्वर के ऊपर खड़ी रेखा (जैसे: अ॑)।
३. अनुनासिक और अननुनासिक भेद
ऊपर बताए गए उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भेदों में से प्रत्येक के पुनः दो भेद हो जाते हैं:
- अनुनासिक: जो मुख और नासिका दोनों की सहायता से बोला जाए (जैसे: ‘अँ’)।
- अननुनासिक: जो केवल मुख की सहायता से बोला जाए (जैसे: ‘अ’)।
महत्वपूर्ण बिन्दु (संक्षेप में)
- ह्रस्व/दीर्घ/प्लुत: समय (मात्रा) के आधार पर।
- उदात्त/अनुदात्त/स्वरित: उच्चारण स्थान (ऊपरी/निचले भाग) के आधार पर।
- अनुनासिक/अननुनासिक: नासिका के प्रयोग के आधार पर।
निष्कर्ष: इस प्रकार एक स्वर (जैसे ‘अ’) के कई भेद हो जाते हैं (ह्रस्व-उदात्त-अनुनासिक, ह्रस्व-उदात्त-अननुनासिक, आदि)। यह वर्गीकरण पाणिनि के व्याकरण में शब्दों की सूक्ष्म शुद्धता के लिए आवश्यक है।

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