ऋग्वेद के इस संवाद (10.10) में कुल 14 मंत्र हैं। इसमें यमी (बहन) का आग्रह और यम (भाई) का दृढ़ उत्तर है। यहाँ मैं कुछ प्रमुख श्लोकों के माध्यम से इस संवाद का विस्तृत अर्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ:
१. यमी का प्रथम आग्रह (मंत्र १)
यमी अपने भाई के प्रति अपना प्रेम प्रकट करते हुए कहती है:
“आ घा त्वा गन्म सधस्थे सखायः नि षसाद वृषणं पत्ये अहम्।
आ मा गन्म मनसा मनस्तं पत्युः पतिस्तनुवमा विवेश॥”
अर्थ: यमी कहती है—हे यम! मैं तुम्हारे साथ रहने के लिए आई हूँ। मैं अपने हृदय के प्रेम के साथ तुम्हारे पास आई हूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे पति बनो और हम दोनों मिलकर इस संसार की सृष्टि को आगे बढ़ाएं।
२. यम का प्रथम निषेध (मंत्र २)
यम यमी की इस भावना को ‘अधर्म’ मानते हुए मना करते हैं:
“न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत् यत् सापिब्यं न विरूपं भवाति।
दिवो नपाता विदथे जनानम वि ये तस्थुर्वरुणो मित्रो अग्नी॥”
अर्थ: यम कहते हैं—हे यमी! जो तुम कह रही हो, वह धर्म के विरुद्ध है। हम एक ही गर्भ से जन्मे हैं, इसलिए हमारा संबंध भाई-बहन का है, पति-पत्नी का नहीं। वरुण, मित्र और अग्नि जैसे देवता हमारे इस आचरण को देख रहे हैं। यदि हम ऐसा करेंगे, तो यह व्यवस्था (ऋत) के विरुद्ध होगा।
३. यमी का पुनः तर्क (मंत्र ३)
यमी हार नहीं मानती और एक तर्क देती है कि मृत्यु तो निश्चित है, फिर क्यों न संतान पैदा करके अमरता प्राप्त की जाए:
“एवा तत त्वष्टा सविता विश्वरूपो नपातम नपते दातु तन्वा।
अस्य कस्ता वि मुमोच दुष्टिम को अस्य वेद कतिधा वि योजन्॥”
अर्थ: यमी तर्क देती है कि संसार का सृष्टा (त्वष्टा) तो यही चाहता है कि हम अपनी संतान के माध्यम से जीवित रहें। कोई भी इस संसार के चक्र को रोक नहीं सकता, तो हम क्यों संकोच कर रहे हैं?
४. यम का अंतिम और कठोर उत्तर (मंत्र ४)
यम उसे समझाते हैं कि मर्यादा से ही संसार सुरक्षित है:
“न तत सखायः वयं वि नश्यामः यत् तद् यदा सत्यम् वदामः।
गन्धर्वो अप्सु व्यानः द्वितीयः नाभिर्नो द्वितीयो नृतः पतिर्नः॥”
अर्थ: यम कहते हैं कि जो मर्यादाएं हमने बनाई हैं, उन्हीं से हम सुरक्षित हैं। यदि हम उन मर्यादाओं को तोड़ देंगे, तो हम भी नष्ट हो जाएंगे। नैतिकता ही हमें मनुष्य बनाती है।
इस संवाद का सार (विश्लेषण)
इस पूरे सूक्त में दो विचारधाराओं का संघर्ष है:
- यमी का दृष्टिकोण (प्रवृत्ति मार्ग): यमी का मानना है कि सृष्टि की निरंतरता के लिए, प्राकृतिक आवेगों का पालन करना सही है। वह शारीरिक संबंध को केवल ‘सृजन’ (Creation) के साधन के रूप में देखती है।
- यम का दृष्टिकोण (निवृत्ति/धर्म मार्ग): यम का मानना है कि मनुष्य और पशु में यही अंतर है कि मनुष्य अपनी इंद्रियों और भावनाओं पर संयम रखता है। उनके लिए ‘ऋत’ (Moral Order) सर्वोपरि है। वे कहते हैं कि “आगामी पीढ़ियाँ हमें क्या कहेंगी?” (अर्थात्, हम आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या उदाहरण छोड़कर जाएंगे)।
मंत्र 5-8: यमी का मोह और यम का वैराग्य
इन मंत्रों में यमी यम को प्रभावित करने के लिए कहती है कि रातें बहुत लंबी हैं और वे अकेले हैं। वह कहती है कि सृष्टि की रचना के लिए यह अनिवार्य है।
यम का उत्तर (मंत्र 8 का भाव):
“न वा उ ते तन्वा तन्वं सं पिपृच्छन, पतिर्यमस्य कृणवाव भागम्।”
भावार्थ: यम स्पष्ट कहते हैं कि मैं अपने शरीर का मिलन तुम्हारे शरीर से नहीं करूँगा। जो पुरुष अपनी बहन के साथ ऐसा करता है, वह पतित माना जाता है। वे यमी को समझाते हैं कि जिस प्रकार देवता अपने मार्ग पर चलते हैं, हमें भी अपने धर्म-मार्ग पर चलना चाहिए।
मंत्र 9-10: यमी की निराशा और यम की चेतना
यमी दुखी होकर कहती है कि शायद कोई दूसरा पुरुष मुझे पति के रूप में मिल जाएगा। यम उसे एक बहुत गहरी बात कहते हैं:
यम का संदेश:
“न ते मित्रावरुणावा चशाते, यद् बिभ्रतो नदं पूर्णं वनायुम्।”
भावार्थ: यम कहते हैं कि जो लोग धर्म के मार्ग से भटकते हैं, उन्हें मित्र और वरुण जैसे दिव्य शक्तियाँ भी स्वीकार नहीं करतीं। वे कहते हैं कि “नग्नता” और “असंयम” को समाज में स्थान नहीं मिलना चाहिए।
मंत्र 11-12: सृष्टि की निरंतरता पर चर्चा
यमी यहाँ एक दार्शनिक तर्क देती है कि क्या यह संसार बिना किसी संतान के आगे बढ़ पाएगा? क्या हम मरकर मिट जाएंगे?
यम का तर्क:
“न तत नृतम यदवदन्निदाहम्… यमस्य मा परिमृशन्ति गात्राः।”
भावार्थ: यम उत्तर देते हैं कि सृष्टि का चक्र देवताओं के अधीन है। हमारा कार्य अपनी वासनाओं को तृप्त करना नहीं, बल्कि ‘धर्म’ की रक्षा करना है। यदि हम अधर्म करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें श्राप देंगी।
मंत्र 13-14: संवाद का समापन
अंतिम मंत्रों में यमी अपनी जिद छोड़ती नहीं, लेकिन यम उसे पूरी तरह नकार देते हैं। यम कहते हैं कि जो ‘यम’ (अर्थात् नियंत्रण) का पालन नहीं करता, वह जीवन के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ सकता।
अंतिम संदेश: ये मंत्र यम की दृढ़ता को दर्शाते हैं। वे कहते हैं:
- भाई-बहन का रिश्ता पवित्र है।
- वासना (काम) को धर्म की सीमा में रहना चाहिए।
- जो व्यक्ति अपनी मर्यादा को भूल जाता है, उसका पतन निश्चित है।
इस संवाद का निष्कर्ष (महत्वपूर्ण बिंदु)
- सामाजिक मर्यादा का इतिहास: यह सूक्त इस बात का प्रमाण है कि वैदिक समाज में ‘Incest Taboo’ (अगम्य गमन निषेध) का नियम कितना कठोर था।
- यम का चरित्र: यम को यहाँ केवल मृत्यु के देवता के रूप में नहीं, बल्कि ‘धर्म के रक्षक’ के रूप में दिखाया गया है। उन्होंने अपनी सगी बहन के अनुचित प्रस्ताव को ठुकराकर यह सिद्ध किया कि इंद्रियों पर विजय पाना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
- यमी का प्रतिनिधित्व: यमी यहाँ एक ऐसी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो अपनी इच्छाओं को प्राथमिकता देती है, लेकिन अंततः उसे यह समझना पड़ता है कि मानवीय संबंधों की गरिमा शारीरिक सुख से कहीं अधिक ऊँची है।
संक्षेप में: यह सूक्त ‘काम’ (इच्छा) और ‘धर्म’ (कर्तव्य) के बीच का संघर्ष है, जहाँ अंत में ‘धर्म’ की विजय होती है।

Leave a Reply