षोडशवर्गविवेकाध्याय (षोडश वर्गों का विस्तृत हिन्दी विवेचन)

यह अध्याय बृहत्पाराशर होराशास्त्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें महर्षि पराशर बताते हैं कि केवल जन्मकुण्डली (राशि कुण्डली) देखकर पूर्ण फलादेश नहीं किया जा सकता, बल्कि विभिन्न वर्ग कुण्डलियों (Divisional Charts) का भी विचार आवश्यक है।


षोडशवर्ग (16 Vargas) क्या हैं?

षोडश = 16

वर्ग = विभाजन

एक राशि 30 अंश की होती है। ज्योतिषाचार्यों ने इन राशियों को विभिन्न भागों में विभाजित करके अलग-अलग वर्ग बनाए हैं।

इन वर्गों के माध्यम से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।


1. लग्न (D1) – शरीर और सम्पूर्ण जीवन

श्लोक:

लग्नं देहस्य विज्ञानम्

अर्थ:

लग्न से विचार करें—

  • शरीर
  • स्वास्थ्य
  • रूप-रंग
  • स्वभाव
  • जीवन की दिशा
  • आयु का आधार

यदि लग्न और लग्नेश बलवान हों तो व्यक्ति सामान्यतः जीवन में उन्नति करता है।


2. होरा (D2) – धन

श्लोक:

होरायां सम्पदादिकम्

होरा से विचार:

  • धन
  • बचत
  • बैंक बैलेंस
  • आर्थिक स्थिति
  • धन प्राप्ति के साधन

यदि D2 मजबूत हो तो व्यक्ति धनवान बन सकता है, भले ही D1 सामान्य हो।


3. द्रेष्काण (D3) – भाई-बहन

श्लोक:

द्रेष्काणे भ्रातृजं सौख्यम्

इससे विचार:

  • भाई-बहन
  • साहस
  • पराक्रम
  • प्रयास

मंगल और तीसरे भाव का भी साथ में विचार किया जाता है।


4. चतुर्थांश (D4) – भाग्य एवं सम्पत्ति

श्लोक:

तुर्यांशे भाग्यचिन्तनम्

इससे विचार:

  • भूमि
  • मकान
  • पैतृक सम्पत्ति
  • वाहन
  • स्थायी सुख

5. सप्तमांश (D7) – सन्तान

श्लोक:

पुत्रपौत्रादिकानां वै चिन्तनं सप्तमांशके

इससे विचार:

  • सन्तान
  • सन्तान सुख
  • पोत्र-पोत्री
  • वंश वृद्धि

6. नवमांश (D9) – विवाह एवं धर्म

यह सबसे महत्वपूर्ण वर्गों में से एक है।

नवमांश से विचार:

  • विवाह
  • पति/पत्नी
  • वैवाहिक जीवन
  • धर्म
  • भाग्य
  • ग्रहों की वास्तविक शक्ति

कई ज्योतिषाचार्य कहते हैं:

“राशि कुण्डली शरीर है, नवमांश आत्मा है।”


7. दशमांश (D10) – व्यवसाय और करियर

श्लोक:

दशमांशे महत्फलम्

इससे विचार:

  • नौकरी
  • व्यवसाय
  • सरकारी पद
  • प्रतिष्ठा
  • सामाजिक सम्मान

8. द्वादशांश (D12) – माता-पिता

श्लोक:

द्वादशांशे तथा पित्रोः चिन्तनम्

इससे विचार:

  • पिता
  • माता
  • पूर्वज
  • पारिवारिक संस्कार

9. षोडशांश (D16) – वाहन और सुख

श्लोक:

सुखासुखस्य विज्ञानं वाहनानां तथैव च

इससे विचार:

  • वाहन
  • घर का सुख
  • विलासिता
  • आरामदायक जीवन

10. विंशांश (D20) – उपासना

श्लोक:

उपासनाया विज्ञानं साध्यं विशतिभागके

इससे विचार:

  • मंत्र सिद्धि
  • पूजा-पाठ
  • आध्यात्मिक उन्नति
  • गुरु कृपा

11. चतुर्विंशांश (D24) – शिक्षा

श्लोक:

विद्याया वेदवादंशे

इससे विचार:

  • शिक्षा
  • शास्त्र ज्ञान
  • विद्वत्ता
  • प्रतियोगी परीक्षा

12. सप्तविंशांश (D27) – बल

श्लोक:

भांशे चैव बलाबलम्

इससे विचार:

  • मानसिक शक्ति
  • शारीरिक शक्ति
  • संघर्ष क्षमता

13. त्रिंशांश (D30) – अरिष्ट

श्लोक:

त्रिशांशकेऽरिष्टफलम्

इससे विचार:

  • दुर्घटना
  • रोग
  • कष्ट
  • दुर्भाग्य

14. खवेदांश (D40)

शुभ-अशुभ कर्मों का विचार।


15. अक्षवेदांश (D45)

चरित्र और सूक्ष्म संस्कारों का विचार।


16. षष्ट्यंश (D60)

सबसे गूढ़ वर्ग।

श्लोक:

षष्ठ्यंशेऽखिलमीक्षयेत्

अर्थ:

D60 से सम्पूर्ण कर्मफल का विचार किया जाता है।

अनेक विद्वानों के अनुसार:

D60 पूर्वजन्म के कर्मों का दर्पण है।


विंशोपक बल (Viṁśopaka Bala)

इसके बाद पराशर ग्रहों की शक्ति बताते हैं।

यह बल 20 अंकों के आधार पर निकाला जाता है।


ग्रह यदि उच्च राशि में हो

उसे पूर्ण बल मिलता है।

उदाहरण:

  • सूर्य मेष में
  • गुरु कर्क में
  • मंगल मकर में

ग्रह यदि नीच राशि में हो

उसे लगभग शून्य बल मिलता है।

उदाहरण:

  • सूर्य तुला में
  • मंगल कर्क में

मित्रता के अनुसार बल

स्थितिबल
उच्च20
अधिमित्र18
मित्र15
सम10
शत्रु7
अधिशत्रु5

विंशोपक बल का फल

0–5

अत्यन्त निर्बल

फल देने में असमर्थ


5–10

अल्प फल


10–15

मध्यम फल


15–20

उत्तम फल


17.5–20

अतिउत्तम फल


भावों की संज्ञाएँ

केन्द्र

1, 4, 7, 10

जीवन के स्तम्भ

  • लग्न
  • गृह
  • विवाह
  • कर्म

त्रिकोण

1, 5, 9

सबसे शुभ भाव

  • भाग्य
  • धर्म
  • पूर्व पुण्य

पणफर

2, 5, 8, 11


आपोक्लिम

3, 6, 9, 12


त्रिक भाव

6, 8, 12

दुःख देने वाले भाव

  • रोग
  • मृत्यु
  • हानि

उपचय भाव

3, 6, 10, 11

विकास देने वाले भाव

विशेष बात:

पापग्रह यहाँ अच्छे फल दे सकते हैं।

उदाहरण:

मंगल 10वें भाव में नेतृत्व देता है।


बारह भावों के नाम

भावनाम
1तनु
2धन
3सहज
4बन्धु
5पुत्र
6अरि
7युवति
8रन्ध्र
9धर्म
10कर्म
11लाभ
12व्यय

इन्हें कंठस्थ कर लेना चाहिए।


विशेष नियम

महर्षि पराशर कहते हैं कि केवल लग्न से ही फल न देखें।

संबंधित कारक ग्रह से भी देखें।


पिता

  • लग्न से नवम
  • सूर्य से नवम

दोनों देखें।


माता

  • लग्न से चतुर्थ
  • चन्द्र से चतुर्थ

भाई

  • लग्न से तृतीय
  • मंगल से तृतीय

सन्तान

  • लग्न से पंचम
  • गुरु से पंचम

पत्नी

  • लग्न से सप्तम
  • शुक्र से सप्तम

रोग

  • लग्न से षष्ठ
  • बुध से षष्ठ

आयु

  • लग्न से अष्टम
  • शनि से अष्टम

इस अध्याय का मुख्य सिद्धान्त

महर्षि पराशर का स्पष्ट मत है:

किसी भी विषय का निर्णय केवल एक भाव देखकर नहीं करना चाहिए।

हर विषय के लिए देखें—

  1. सम्बन्धित भाव
  2. भावेश
  3. कारक ग्रह
  4. सम्बन्धित वर्ग कुण्डली
  5. विंशोपक बल

तभी सटीक फलादेश सम्भव है।

यही कारण है कि बृहत्पाराशर होराशास्त्र में षोडशवर्ग को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। यह अध्याय आगे आने वाले भावफल, योग, दशा और आयु-निर्णय अध्यायों की आधारशिला है।

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