ग्रहों के रस, बल, वस्त्र, ऋतु, वृक्ष और उच्च-नीच राशियाँ: बृहत्पाराशर होरा शास्त्र का गूढ़ विवेचन

प्रस्तावना

वैदिक ज्योतिष केवल ग्रहों की स्थिति का अध्ययन नहीं है, बल्कि प्रत्येक ग्रह के स्वभाव, शक्ति, गुण, वस्त्र, रंग, ऋतु, वृक्ष, धातु और राशियों के साथ उसके संबंध को भी समझाता है। महर्षि पराशर ने ग्रहस्वरूप अध्याय में इन सूक्ष्म विषयों का विस्तार से वर्णन किया है।

इन जानकारियों का उपयोग केवल फलित ज्योतिष में ही नहीं, बल्कि मुहूर्त, प्रश्न, चिकित्सा ज्योतिष तथा उपाय-विज्ञान में भी किया जाता है।


ग्रहों के प्रिय रस (स्वाद)

महर्षि पराशर के अनुसार प्रत्येक ग्रह का एक विशेष रस होता है।

ग्रहरस
सूर्यकटु (तीखा)
चन्द्रमालवण (नमकीन)
मंगलतिक्त (कड़वा)
बुधमिश्रित रस
गुरुमधुर (मीठा)
शुक्रअम्ल (खट्टा)
शनिकषाय (कसैला)

ज्योतिषीय महत्व

जब किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति की कुंडली में अधिक होता है, तो उस ग्रह से संबंधित स्वादों के प्रति विशेष रुचि देखी जा सकती है।


दिशाओं में ग्रहों का बल

सभी ग्रह प्रत्येक दिशा में समान रूप से शक्तिशाली नहीं होते।

पूर्व दिशा में बलवान

  • बुध
  • गुरु

दक्षिण दिशा में बलवान

  • सूर्य
  • मंगल

पश्चिम दिशा में बलवान

  • शनि

उत्तर दिशा में बलवान

  • चन्द्रमा
  • शुक्र

इसी सिद्धांत को ज्योतिष में “दिग्बल” कहा जाता है।


दिन और रात में ग्रहों का बल

महर्षि पराशर बताते हैं कि कुछ ग्रह दिन में अधिक प्रभावशाली होते हैं जबकि कुछ रात्रि में।

रात्रि में बलवान ग्रह

  • चन्द्रमा
  • मंगल
  • शनि

दिन और रात दोनों में बलवान

  • बुध

दिन में बलवान

  • सूर्य
  • गुरु
  • शुक्र

यह जानकारी मुहूर्त और प्रश्न ज्योतिष में अत्यंत उपयोगी मानी जाती है।


शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में ग्रहों का प्रभाव

कृष्ण पक्ष में बलवान

  • पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि आदि)

शुक्ल पक्ष में बलवान

  • शुभ ग्रह (चन्द्र, गुरु, शुक्र आदि)

इसी प्रकार—

उत्तरायण में

शुभ ग्रह अधिक प्रभावशाली होते हैं।

दक्षिणायन में

पाप ग्रह अधिक बलवान माने जाते हैं।


ग्रह और वृक्षों का संबंध

प्राचीन ज्योतिष में वृक्षों का वर्गीकरण भी ग्रहों के आधार पर किया गया है।

सूर्य

बड़े और विशाल वृक्षों के कारक।

चन्द्रमा

दूध या रस वाले वृक्षों के कारक।

मंगल

काँटेदार वृक्षों के कारक।

बुध और गुरु

फल देने वाले वृक्षों के कारक।

शुक्र

फूलों वाले वृक्षों के कारक।

शनि

नीरस और शुष्क वृक्षों के कारक।

यह वर्गीकरण कृषि ज्योतिष में विशेष महत्व रखता है।


राहु और केतु का सामाजिक स्वरूप

महर्षि पराशर के अनुसार—

  • राहु चाण्डाल जाति का प्रतिनिधि है।
  • केतु मिश्रित अथवा वर्णसंकर जाति का प्रतिनिधि माना गया है।

यह वर्गीकरण सामाजिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और ज्योतिषीय अर्थों में प्रयोग किया गया है।


राहु और केतु के प्रिय वस्त्र

राहु

अनेक रंगों के पुराने अथवा पैबंद लगे वस्त्र।

केतु

छिद्रयुक्त अथवा फटे हुए वस्त्र।

इन प्रतीकों के माध्यम से राहु और केतु की रहस्यमयी एवं असामान्य प्रकृति को दर्शाया गया है।


ग्रहों के प्रिय वस्त्र

गुरु

पीले वस्त्र।

शुक्र

रेशमी वस्त्र।

सूर्य

लाल वस्त्र।

चन्द्रमा

श्वेत रेशमी वस्त्र।

बुध

काले अथवा गहरे रंग के वस्त्र।

मंगल

लाल रंग के वस्त्र।

शनि

बहुरंगी अथवा चित्र-विचित्र वस्त्र।

ज्योतिषीय उपायों में इन रंगों का विशेष महत्व माना गया है।


ग्रह और ऋतुएँ

भारतीय कालगणना में प्रत्येक ऋतु का संबंध किसी न किसी ग्रह से बताया गया है।

ग्रहऋतु
शुक्रवसन्त
सूर्यग्रीष्म
मंगलग्रीष्म
चन्द्रमावर्षा
बुधशरद
गुरुहेमन्त
शनिशिशिर

ग्रहों का धातु, मूल और जीव से संबंध

महर्षि पराशर तीन प्रकार की वस्तुओं का उल्लेख करते हैं—

धातु ग्रह

  • राहु
  • मंगल
  • चन्द्रमा

मूल ग्रह

  • सूर्य
  • शुक्र

जीव ग्रह

  • बुध
  • गुरु
  • केतु

प्रश्न ज्योतिष में खोई हुई वस्तु खोजने के लिए यह वर्गीकरण अत्यंत उपयोगी माना जाता है।


शनि और आयु

सभी ग्रहों में शनि को वृद्ध ग्रह कहा गया है।

यद्यपि शनि कष्ट और संघर्ष प्रदान करता है, फिर भी दीर्घायु देने में उसका विशेष योगदान माना गया है।

इसी कारण आयुष्य-विचार में शनि का अत्यधिक महत्व है।


ग्रहों की उच्च और नीच राशियाँ

महर्षि पराशर ग्रहों की उच्च (Exaltation) और नीच (Debilitation) राशियों का वर्णन करते हैं।

ग्रहउच्च राशिउच्च अंश
सूर्यमेष10°
चन्द्रमावृषभ3°
मंगलमकर28°
बुधकन्या15°
गुरुकर्क5°
शुक्रमीन27°
शनितुला20°

नीच राशियाँ

उच्च राशि से सातवीं राशि में ग्रह नीच होते हैं।

उदाहरण:

  • सूर्य मेष में उच्च और तुला में नीच।
  • चन्द्रमा वृषभ में उच्च और वृश्चिक में नीच।
  • मंगल मकर में उच्च और कर्क में नीच।

आदि।


ग्रहों का मूलत्रिकोण

उच्च और स्वराशि के अतिरिक्त ग्रहों की एक विशेष स्थिति होती है जिसे मूलत्रिकोण कहा जाता है।

सूर्य

सिंह राशि के प्रथम 20 अंश तक मूलत्रिकोण।

चन्द्रमा

वृषभ राशि के प्रथम 3 अंश उच्च तथा शेष भाग मूलत्रिकोण।

मंगल

मेष राशि के प्रथम 12 अंश मूलत्रिकोण तथा शेष भाग स्वराशि।

मूलत्रिकोण में ग्रह अपनी शक्ति का अत्यंत शुभ और संतुलित परिणाम प्रदान करता है।


निष्कर्ष

महर्षि पराशर द्वारा वर्णित ग्रहों के रस, वस्त्र, वृक्ष, ऋतु, दिशा, बल, उच्च-नीच राशियाँ और मूलत्रिकोण ज्योतिष के अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं। ये केवल प्रतीकात्मक विवरण नहीं हैं, बल्कि फलित ज्योतिष, प्रश्न ज्योतिष, चिकित्सा ज्योतिष तथा उपाय-विज्ञान के मूल आधार हैं।

जो विद्यार्थी ज्योतिष का गहन अध्ययन करना चाहते हैं, उन्हें ग्रहों के इन सूक्ष्म स्वरूपों का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए। यही ज्ञान आगे चलकर कुंडली विश्लेषण को अधिक सटीक और प्रभावशाली बनाता है।

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