सर्व (पुल्लिंग) शब्द की रूपसिद्धि में जो 5 विशेष सूत्र प्रवृत्त होते हैं (जो इसे ‘राम’ शब्द से अलग बनाते हैं), उनकी परिभाषा, वृत्ति और सरल हिंदी व्याख्या नीचे दी गई है। लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार ये बहुत महत्वपूर्ण सूत्र हैं:
1. जसः शी (७-१-१७)
यह सूत्र प्रथमा विभक्ति, बहुवचन में प्रवृत्त होकर ‘सर्वे’ रूप बनाता है।
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्नो जसः शी स्यात्।
- सरल हिंदी परिभाषा: यदि किसी अदन्त (जिसके अन्त में ह्रस्व ‘अ’ हो) सर्वनाम शब्द से परे प्रथमा विभक्ति बहुवचन का ‘जस्’ प्रत्यय आए, तो उस ‘जस्’ के स्थान पर ‘शी’ आदेश हो जाता है।
- उदाहरण: सर्व + जस् – सर्व + शी – सर्व + ई =’आद्गुणः’ से गुण होकर सर्वे बनता है।
2. सर्वनाम्नः स्मै (७-१-१४)
यह सूत्र चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में प्रवृत्त होकर ‘सर्वस्मै’ रूप बनाता है।
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्नो ङेः स्मै स्यात्।
- सरल हिंदी परिभाषा: अदन्त सर्वनाम अङ्ग से परे चतुर्थी विभक्ति एकवचन के प्रत्यय ‘ङे’ के स्थान पर ‘स्मै’ आदेश हो जाता है।
- उदाहरण: सर्व + ङे – ‘ङे’ को ‘स्मै’ आदेश =सर्वस्मै। (जबकि राम शब्द में ङेर्यः से ‘य’ होकर ‘रामाय’ बनता है)।
3. ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (७-१-१५)
यह सूत्र दो जगह काम करता है — पंचमी विभक्ति एकवचन (‘सर्वस्मात्’) और सप्तमी विभक्ति एकवचन (‘सर्वस्मिन्’) में।
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्न एतयोः स्मात्स्मिनौ स्तः।
- सरल हिंदी परिभाषा: अदन्त सर्वनाम शब्द से परे आने वाले ‘ङसि’ (पंचमी एकवचन) प्रत्यय को क्रमशः ‘स्मात्’ आदेश होता है, और ‘ङि’ (सप्तमी एकवचन) प्रत्यय को ‘स्मिन्’ आदेश होता है।
- उदाहरण:
- पंचमी में: सर्व + ङसि = सर्वस्मात्
- सप्तमी में: सर्व + ङि = सर्वस्मिन्
4. आमि सर्वनाम्नः सुट् (७-१-५२)
यह सूत्र षष्ठी विभक्ति, बहुवचन में प्रवृत्त होकर ‘सर्वेषाम्’ रूप बनाने में सहायता करता है।
- वृत्ति: अवर्णान्तात् सर्वनाम्नः परस्यामः सुडागमः स्यात्।
- सरल हिंदी परिभाषा: यदि अवर्णान्त (जिसके अन्त में ‘अ’ या ‘आ’ हो) सर्वनाम शब्द से परे षष्ठी बहुवचन का ‘आम्’ प्रत्यय हो, तो उस ‘आम्’ को ‘सुट्’ का आगम (prefix/शुरुआत में जुड़ना) होता है। अनुबन्ध लोप के बाद केवल ‘स्’ शेष बचता है, जिससे ‘आम्’ बदलकर ‘साम्’ हो जाता है।
- उदाहरण: सर्व + आम् $\rightarrow$ सर्व + सुट् + आम् = सर्व + साम्। (इसके बाद बहुवचने झल्येत् से ‘सर्वेसाम्’ और आदेशप्रत्यययोः से षत्व होकर सर्वेषाम् बनता है)।
- विशेष: यह सूत्र राम शब्द में लगने वाले ह्रस्वनद्यापो नुट् (जो ‘नाम्’ बनाता है) का अपवाद/बाधक है।
5. बहुवचने झल्येत् (७-३-१०३)
यह सूत्र राम शब्द में भी लगता है, लेकिन सर्व शब्द के षष्ठी बहुवचन (‘सर्वेषाम्’) को समझने के लिए यह बहुत जरूरी है।
- वृत्ति: झलादौ बहुवचने सुपि परतोऽङ्गस्यैकारः स्यात्।
- सरल हिंदी परिभाषा: यदि अदन्त अङ्ग से परे कोई ऐसा बहुवचन का सुप् प्रत्यय हो जिसके आदि (प्रारम्भ) में ‘झल्’ प्रत्याहार (वर्ग का १, २, ३, ४ अक्षर या श, ष, स, ह) का वर्ण हो, तो अङ्ग के अन्तिम ‘अ’ को ‘ए’ (एकार) हो जाता है।
- सर्वनाम में प्रयोग: जब ‘सर्व + साम्’ की स्थिति होती है, तो ‘साम्’ का ‘स्’ झल् प्रत्याहार में आता है। इस नियम से सर्व के ‘अ’ को ‘ए’ होकर ‘सर्वेसाम्’ बनता है।
एक छोटा सहायक सूत्र (णत्व/षत्व के लिए):
आदेशप्रत्यययोः (८-३-५९): इस सूत्र से ‘सर्वेसाम्’ और सप्तमी बहुवचन ‘सर्वेसु’ के दन्त्य सकार (‘स्’) को मूर्धन्य ‘ष्’ हो जाता है, जिससे ‘सर्वेषाम्’ और ‘सर्वेषु’ रूप सिद्ध होते हैं।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वः’ रूप की सिद्धि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) निम्नलिखित चरणों में होती है। चूँकि यह एकवचन का रूप है, इसलिए इसमें सर्वनाम का कोई विशेष सूत्र नहीं लगता, बल्कि साधारण ‘रामः’ की तरह ही इसकी सिद्धि होती है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि (१-१-२७) सूत्र से ‘सर्व’ शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है (यद्यपि इस पद में सर्वनाम का कोई विशेष कार्य दिखाई नहीं देता, फिर भी संज्ञा अवश्य होती है)।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङ्ेभ्याम्भ्यस्ङ्सिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् (४-१-२) तथा द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में प्रथमा विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘सु’ आता है।
- स्थिति: सर्व + सु
3. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१-३-२) से ‘सु’ प्रत्यय में स्थित अनुनासिक उकार (‘उ’) की इत् संज्ञा होती है और तस्य लोपः (१-३-९) से उसका लोप हो जाता है। केवल ‘स्’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्व + स्
4. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण ‘सर्वस्’ की पद संज्ञा होती है (पद बनने के बाद ही सकार को रुत्व-विसर्ग कार्य हो सकते हैं)।
5. रुत्व विधान (स् को र् करना)
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६)
- कार्य: पद के अन्त में स्थित सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ (रुँ) आदेश होता है।
- स्थिति: सर्व + रु
- अनुबन्ध लोप: पुनः उकार की इत् संज्ञा और लोप होकर केवल रेफ ‘र्’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्व + र्
6. अवसान संज्ञा और विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: विरामोऽवसानम् (१-४-११०) से वर्णों के अभाव (अन्त) की अवसान संज्ञा होती है।
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान में स्थित रेफ (‘र्’) के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व + ः = सर्वः
परिणाम: इस प्रकार सभी पाणिनीय नियमों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद “सर्वः” रूप पूर्णतः सिद्ध होता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वौ’ रूप की सिद्धि प्रथमा विभक्ति और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में समान रूप से होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामौ’ शब्द के समान ही है, जिसमें वृद्धि संधि मुख्य कार्य है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में प्रथमा/द्वितीया विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘औ’ (द्वितीया में ‘औट्’) आता है।
- स्थिति: सर्व + औ (द्वितीया में ‘औट्’ के ‘ट्’ का हलन्त्यम् से लोप होने पर भी ‘औ’ ही शेष रहता है)।
3. पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध (बाध)
- सूत्र: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (६-१-१०२) से यहाँ पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वसवर्ण दीर्घ (सर्व + औ = सर्वा) प्राप्त होता है, लेकिन तभी एक निषेध सूत्र प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: नादिचि (६-१-१०४)
- वृत्ति: आद् इचि परे पूर्वसवर्णदीर्घो न स्यात्।
- कार्य: यदि अवर्ण (अ या आ) से परे ‘इच्’ प्रत्याहार (इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ) का कोई वर्ण हो, तो पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश नहीं होता। यहाँ ‘सर्व’ के अन्त में ‘अ’ है और परे ‘औ’ है, इसलिए पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध हो जाता है।
4. वृद्धि एकादेश (मुख्य संधि कार्य)
- सूत्र: वृद्धिरेचि (६-१-८८)
- कार्य: अवर्ण (‘सर्व’ का ‘अ’) से परे ‘एच्’ (ए, ओ, ऐ, औ) होने पर पूर्व और पर दोनों के स्थान पर वृद्धि एकादेश होता है।
- यहाँ ‘अ + औ’ दोनों के स्थान पर वृद्धि एकादेश ‘औ’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + औ = सर्वौ
5. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “सर्वौ” की पद संज्ञा होती है और यह प्रयोग के योग्य बनता है।
निष्कर्ष: पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध होकर वृद्धिरेचि सूत्र की सहायता से “सर्वौ” रूप पूर्णतः सिद्ध होता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वे’ रूप की सिद्धि प्रथमा विभक्ति, बहुवचन में होती है। यह ‘सर्व’ शब्द का पहला ऐसा रूप है जहाँ सर्वनाम संज्ञा होने के कारण एक विशेष नियम काम करता है, जो इसे ‘राम’ शब्द के रूप (रामाः) से अलग बनाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि (१-१-२७) से ‘सर्व’ शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में प्रथमा विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘जस्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + जस्
3. ‘जस्’ को ‘शी’ आदेश (सर्वनाम का विशेष नियम)
- सूत्र: जसः शी (७-१-१७)
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्नो जसः शी स्यात्।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (वह शब्द जिसके अन्त में ह्रस्व ‘अ’ हो, जैसे- सर्व) यदि सर्वनाम संज्ञक हो, तो उससे परे आने वाले ‘जस्’ प्रत्यय के स्थान पर ‘शी’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व + शी
4. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: लशक्वतद्धिते (१-३-८) से ‘शी’ प्रत्यय के आदि में स्थित तालव्य शकार (‘श’) की इत् संज्ञा होती है और तस्य लोपः (१-३-९) से उसका लोप हो जाता है। ‘शी’ में से केवल दीर्घ ‘ई’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्व + ई
5. गुण एकादेश (मुख्य संधि कार्य)
- सूत्र: आद्गुणः (६-१-८७)
- कार्य: अवर्ण (‘सर्व’ के वकार में स्थित ‘अ’) से परे अच् (स्वर ‘ई’) होने पर पूर्व और पर (अ + ई) दोनों के स्थान पर गुण एकादेश ‘ए’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + ए = सर्वे
6. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वे” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: इन सभी सूत्रों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद प्रथमा विभक्ति बहुवचन का रूप “सर्वे” पूर्णतः सिद्ध होता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वम्’ रूप की सिद्धि द्वितीया विभक्ति, एकवचन में होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामम्’ शब्द के समान ही है, जिसमें पूर्वरूप संधि मुख्य कार्य है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में द्वितीया विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘अम्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + अम्
3. पूर्वरूप एकादेश (मुख्य संधि कार्य)
- सूत्र: अमि पूर्वः (६-१-१०७)
- वृत्ति: अकः अम्यचि परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात्।
- कार्य: यदि ‘अक्’ प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) से परे ‘अम्’ प्रत्यय का कोई अच् (स्वर) हो, तो पूर्व और पर दोनों वर्णों के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश (यानी पहले वाला वर्ण ही रह जाता है, बाद वाला उसमें विलीन हो जाता है) होता है।
- यहाँ ‘सर्व’ के अन्त में ‘अ’ है और उसके बाद ‘अम्’ का भी ‘अ’ है। इस सूत्र से दोनों ‘अ + अ’ के स्थान पर केवल पूर्व वाला ‘अ’ शेष रह जाता है।
- स्थिति: सर्व् + अ + म् = सर्वम्
4. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “सर्वम्” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के सर्वथा योग्य बनता है।
परिणाम: अमि पूर्वः सूत्र की सहायता से बहुत ही सरल प्रक्रिया द्वारा द्वितीया एकवचन का रूप “सर्वम्” पूर्णतः सिद्ध होता है।
‘सर्वौ’ रूप की सिद्धि द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में भी ठीक उसी प्रकार होती है जैसे प्रथमा विभक्ति के द्विवचन में हुई था। पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार इसके चरण निम्नलिखित हैं:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में द्वितीया विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘औट्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + औट्
- अनुबन्ध लोप: हलन्त्यम् से टकार (‘ट्’) की इत् संज्ञा और तस्य लोपः से उसका लोप हो जाता है। केवल ‘औ’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्व + औ
3. पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध
- सूत्र: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (६-१-१०२) से यहाँ पूर्वसवर्ण दीर्घ (सर्व + औ = सर्वा) प्राप्त होता है, जिसे रोकने के लिए निषेध सूत्र आता है:
- सूत्र: नादिचि (६-१-१०४)
- कार्य: अवर्ण (‘सर्व’ का ‘अ’) से परे ‘इच्’ प्रत्याहार (औ) का वर्ण होने के कारण पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध हो जाता है।
4. वृद्धि एकादेश (मुख्य संधि कार्य)
- सूत्र: वृद्धिरेचि (६-१-८८)
- कार्य: अवर्ण से परे ‘एच्’ (औ) होने पर पूर्व और पर दोनों वर्णों (‘अ + औ’) के स्थान पर वृद्धि एकादेश ‘औ’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + औ = सर्वौ
5. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वौ” की पद संज्ञा होती है।
विशेष: प्रथमा द्विवचन और द्वितीया द्विवचन दोनों में मूल रूप से ‘औ’ शेष रहने के कारण प्रक्रिया बिल्कुल समान रहती है और “सर्वौ” रूप सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वान्’ (द्वितीया बहुवचन) आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वान्’ रूप की सिद्धि द्वितीया विभक्ति, बहुवचन में होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामन्’ (यानी रामान्) शब्द के समान ही चलती है, जिसमें पूर्वसवर्ण दीर्घ और सकार को नकार करना मुख्य कार्य हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में द्वितीया विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘शस’ (शस्) आता है।
- स्थिति: सर्व + शस्
3. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: लशक्वतद्धिते (१-३-८) से प्रत्यय के आदि में स्थित शकार (‘श’) की इत् संज्ञा होती है और तस्य लोपः से उसका लोप हो जाता है। केवल ‘अस्’ शेष रहता है।
- स्थिति: सर्व + अस्
4. पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश
- सूत्र: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (६-१-१०२)
- वृत्ति: अकः प्रथमाद्वितीययो रचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात्।
- कार्य: यदि ‘अक’ प्रत्याहार (सर्व का ‘अ’) से परे प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का अच् (अस् का ‘अ’) हो, तो पूर्व और पर दोनों के स्थान पर पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है। यहाँ ‘अ + अ’ के स्थान पर पूर्व का दीर्घ रूप यानी ‘आ’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + आ + स् = सर्वास
5. सकार को नकार करना (मुख्य कार्य)
- सूत्र: तस्माच्छसो नः पुंसि (६-१-१०३)
- वृत्ति: पूर्वसवर्णदीर्घात् परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात् पुंसि।
- कार्य: पुल्लिंग में, पूर्वसवर्ण दीर्घ के बाद आने वाले ‘शस्’ प्रत्यय के सकार (‘स्’) के स्थान पर नकार (‘न्’) आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘सर्वास’ में दीर्घ ‘आ’ के बाद ‘शस्’ का ‘स्’ है, अतः उसे ‘न्’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्वा + न् = सर्वान्
6. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वान्” की पद संज्ञा होती है।
विशेष नोट (णत्व निषेध): आपके मन में यह प्रश्न आ सकता है कि ‘सर्वान्’ में ‘र’ होने के बाद भी ‘न’ को ‘ण’ क्यों नहीं हुआ (जैसे रामाणाम् या सर्वेण में होता है)? इसका कारण पाणिनी का सूत्र पदान्तस्य (८-४-३७) है, जो नियम देता है कि यदि नकार पद के बिल्कुल अन्त में (पदान्त) हो, तो उसे णत्व नहीं होता। यहाँ ‘न्’ पद के अन्त में है, इसलिए सर्वान् ही रहता है, सर्वार्ण नहीं बनता।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वेण’ रूप की सिद्धि तृतीया विभक्ति, एकवचन में होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामेण’ शब्द के समान ही चलती है, जिसमें ‘टा’ को ‘इन’ आदेश, गुण संधि और णत्व विधान (न् को ण् करना) मुख्य कार्य हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में तृतीया विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘टा’ आता है।
- स्थिति: सर्व + टा
3. ‘टा’ को ‘इन’ आदेश
- सूत्र: टाङसिङसामिनात्स्याः (७-१-१२)
- वृत्ति: अकारान्तादङ्गात्परोषां टा-ङसि-ङसाम् इनात्-स्या एते स्युः।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (सर्व) से परे ‘टा’ प्रत्यय के स्थान पर ‘इन’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व + इन
4. गुण एकादेश (मुख्य संधि कार्य)
- सूत्र: आद्गुणः (६-१-८७)
- कार्य: अवर्ण (‘सर्व’ के ‘व’ में स्थित ‘अ’) से परे अच् (‘इन’ का ‘इ’) होने पर पूर्व और पर (अ + इ) दोनों के स्थान पर गुण एकादेश ‘ए’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + ए + न = सर्वेन
5. णत्व विधान (न् को ण् करना)
- सूत्र: अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (८-४-२)
- कार्य: एक ही पद में यदि ‘र’ या ‘ष’ से परे ‘न’ आए, तो उस ‘न’ को मूर्धन्य ‘ण’ हो जाता है, भले ही बीच में अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ् या नुम् का व्यवधान (फासला) हो।
- यहाँ ‘सर्वेन’ में ‘र’ से परे ‘न’ है। उनके बीच में ‘व’, ‘ए’ का व्यवधान है, जो ‘अट्’ प्रत्याहार में आते हैं। अतः इस सूत्र से नकार (‘न’) के स्थान पर णकार (‘ण’) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + ण = सर्वेण
6. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वेण” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: इन सभी सूत्रों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद तृतीया विभक्ति एकवचन का रूप “सर्वेण” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वाभ्याम्’ (तृतीया द्विवचन) आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वाभ्याम्’ रूप की सिद्धि तृतीया, चतुर्थी और पंचमी विभक्ति के द्विवचन में समान रूप से होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामाभ्याम्’ शब्द के समान ही है, जिसमें अङ्ग के अन्तिम स्वर को दीर्घ करना मुख्य कार्य है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में तृतीया/चतुर्थी/पंचमी विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘भ्याम्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + भ्याम्
3. अङ्ग को दीर्घ करना (मुख्य कार्य)
- सूत्र: सुपि च (७-३-१०२)
- वृत्ति: यञादौ सुपि परतोऽतोऽङ्गस्य दीर्घः स्यात्।
- कार्य: यदि अदन्त अङ्ग (सर्व) से परे कोई ऐसा ‘सुप्’ प्रत्यय हो जिसके आदि (प्रारम्भ) में ‘यञ्’ प्रत्याहार (य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ) का वर्ण हो, तो अङ्ग के अन्तिम ‘अ’ को दीर्घ (आ) हो जाता है।
- यहाँ ‘भ्याम्’ प्रत्यय का ‘भ’ यञ् प्रत्याहार में आता है। अतः ‘सर्व’ के ‘व’ में स्थित ‘अ’ को दीर्घ होकर ‘रा’ (यानी ‘सर्वा’) हो जाता है।
- स्थिति: सर्वा + भ्याम् = सर्वाभ्याम्
4. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वाभ्याम्” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: सुपि च सूत्र द्वारा दीर्घ एकादेश होने पर “सर्वाभ्याम्” रूप पूर्णतः सिद्ध होता है। यही रूप तृतीया, चतुर्थी और पंचमी तीनों विभक्तियों के द्विवचन में बनता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वैः’ (तृतीया बहुवचन) आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वैः’ रूप की सिद्धि तृतीया विभक्ति, बहुवचन में होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामैः’ शब्द के समान ही है, जिसमें ‘भिस्’ को ‘ऐस्’ आदेश और वृद्धि संधि मुख्य कार्य हैं:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में तृतीया विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘भिस्’ आता. है।
- स्थिति: सर्व + भिस्
3. ‘भिस्’ को ‘ऐस्’ आदेश (मुख्य कार्य)
- सूत्र: अतो भिस ऐस् (७-१-९)
- वृत्ति: अकारान्तादङ्गात्परस्य भिस ऐस् स्यात्।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (सर्व) से परे आने वाले ‘भिस्’ प्रत्यय के स्थान पर ‘ऐस्’ आदेश हो जाता है। यह आदेश अनेकवाल् (अनेक वर्णों वाला) होने के कारण सम्पूर्ण ‘भिस्’ के स्थान पर बैठता है।
- स्थिति: सर्व + ऐस्
4. वृद्धि एकादेश (संधि कार्य)
- सूत्र: वृद्धिरेचि (६-१-८८)
- कार्य: अवर्ण (‘सर्व’ का ‘अ’) से परे ‘एच्’ (‘ऐस्’ का ‘ऐ’) होने पर पूर्व और पर दोनों वर्णों के स्थान पर वृद्धि एकादेश ‘ऐ’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + ऐ + स् = सर्वैस्
5. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् से ‘सर्वैस्’ की पद संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। अनुबन्ध लोप (उकार का लोप) होने पर केवल ‘र्’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्वै + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान में स्थित रेफ (‘र्’) को विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वै + ः = सर्वैः
परिणाम: इन सभी सूत्रों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद तृतीया विभक्ति बहुवचन का रूप “सर्वैः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वस्मै’ (चतुर्थी एकवचन) आता है, जहाँ सर्वनाम का विशेष नियम लगेगा।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वस्मै’ रूप की सिद्धि चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में होती है। यह ‘सर्व’ शब्द का दूसरा ऐसा रूप है जहाँ सर्वनाम संज्ञा होने के कारण एक विशेष नियम काम करता है, जो इसे ‘राम’ शब्द के रूप (रामाय) से बिल्कुल अलग बनाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि (१-१-२७) से ‘सर्व’ शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में चतुर्थी विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘ङे’ आता है।
- स्थिति: सर्व + ङे
3. ‘ङे’ को ‘स्मै’ आदेश (सर्वनाम का विशेष नियम)
- सूत्र: सर्वनाम्नः स्मै (७-१-१४)
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्नो ङेः स्मै स्यात्।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (जिस शब्द के अन्त में ह्रस्व ‘अ’ हो, जैसे- सर्व) यदि सर्वनाम संज्ञक हो, तो उससे परे आने वाले चतुर्थी एकवचन के प्रत्यय ‘ङे’ के स्थान पर ‘स्मै’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व + स्मै
4. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- ‘सर्व’ शब्द के अन्तिम हलन्त वकार (‘व्’) में ‘स्मै’ प्रत्यय सीधा जुड़ जाता है क्योंकि यहाँ किसी अन्य संधि नियम की आवश्यकता नहीं होती।
- स्थिति: सर्व् + स्मै = सर्वस्मै
5. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “सर्वस्मै” की पद संज्ञा होती है और यह प्रयोग के योग्य बनता है।
परिणाम: सर्वनाम्नः स्मै सूत्र की विशिष्ट प्रवृत्ति के कारण चतुर्थी एकवचन का रूप “सर्वस्मै” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वाभ्याम्’ (चतुर्थी द्विवचन) और फिर ‘सर्वेभ्यः’ (चतुर्थी बहुवचन) आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वेभ्यः’ रूप की सिद्धि चतुर्थी और पंचमी विभक्ति के बहुवचन में समान रूप से होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामेभ्यः’ शब्द के समान ही चलती है, जिसमें अङ्ग के ‘अ’ को ‘ए’ करना और रुत्व-विसर्ग मुख्य कार्य हैं:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में चतुर्थी/पंचमी विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘भ्यस्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + भ्यस्
3. अङ्ग के ‘अ’ को ‘ए’ करना (मुख्य कार्य)
- सूत्र: बहुवचने झल्येत् (७-३-१०३)
- वृत्ति: झलादौ बहुवचने सुपि परतोऽङ्गस्यैकारः स्यात्।
- कार्य: यदि अदन्त अङ्ग (सर्व) से परे कोई ऐसा बहुवचन का सुप् प्रत्यय हो जिसके आदि (प्रारम्भ) में ‘झल्’ प्रत्याहार का वर्ण हो, तो अङ्ग के अन्तिम ‘अ’ को ‘ए’ (एकार) आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘भ्यस्’ प्रत्यय का पहला वर्ण ‘भ’ ‘झल्’ प्रत्याहार में आता है और यह बहुवचन का प्रत्यय भी है। अतः ‘सर्व’ के ‘अ’ को बदलकर ‘ए’ हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + भ्यस् = सर्वेभ्यस्
4. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से ‘सर्वेभ्यस्’ की पद संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। अनुबन्ध लोप (उकार का लोप) होने पर केवल ‘र्’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्वेभ्य + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान (वर्णों के अभाव/अन्त) में स्थित रेफ (‘र्’) को विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वेभ्य + ः = सर्वेभ्यः
परिणाम: इन नियमों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद चतुर्थी और पंचमी बहुवचन का रूप “सर्वेभ्यः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वस्मात्’ (पंचमी एकवचन) आता है, जहाँ फिर से सर्वनाम का विशेष सूत्र काम करेगा।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वस्मात्’ रूप की सिद्धि पंचमी विभक्ति, एकवचन में होती है। सर्वनाम संज्ञा होने के कारण यहाँ एक विशेष नियम काम करता है, जो इसे ‘राम’ शब्द के रूप (रामात्) से अलग बनाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि (१-१-२७) से ‘सर्व’ शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में पंचमी विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘ङसि’ आता है।
- स्थिति: सर्व + ङसि
३. ‘ङसि’ को ‘स्मात्’ आदेश (सर्वनाम का विशेष नियम)
- सूत्र: ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (७-१-१५)
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्न एतयोः स्मात्स्मिनौ स्तः।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (सर्व) यदि सर्वनाम संज्ञक हो, तो उससे परे आने वाले ‘ङसि’ (पंचमी एकवचन) प्रत्यय के स्थान पर ‘स्मात्’ आदेश होता है (और ‘ङि’ को ‘स्मिन्’ होता है)।
- स्थिति: सर्व + स्मात्
४. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- ‘सर्व’ शब्द के अन्तिम हलन्त वकार (‘व्’) में ‘स्मात्’ प्रत्यय सीधे जुड़ जाता है।
- स्थिति: सर्व् + स्मात् = सर्वस्मात्
५. पद संज्ञा और वैकल्पिक जश्त्व (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से “सर्वस्मात्” की पद संज्ञा होती है।
- वैकल्पिक कार्य (जश्त्व): झलां जशोऽन्ते (८-२-३९) सूत्र से पदान्त तकार (‘त्’) को अपने ही वर्ग का तीसरा अक्षर यानी दकार (‘द्’) आदेश भी हो जाता है।
- स्थिति: सर्वस्मात् या सर्वस्माद्
परिणाम: ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ सूत्र की विशिष्ट प्रवृत्ति के कारण पंचमी एकवचन का रूप “सर्वस्मात्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्विवचन में ‘सर्वाभ्याम्’ और बहुवचन में ‘सर्वेभ्यः’ रूप बनते हैं।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वस्य’ रूप की सिद्धि षष्ठी विभक्ति, एकवचन में होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामस्य’ शब्द के बिल्कुल समान ही चलती है, क्योंकि इस विशिष्ट स्थान पर सर्वनाम का कोई अलग नियम नहीं लगता बल्कि अकारान्त शब्दों का सामान्य नियम ही काम करता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (1-4-22) के नियम से एकत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘ङस्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + ङस्
3. ‘ङस्’ को ‘स्य’ आदेश (मुख्य कार्य)
- सूत्र: टाङसिङसामिनात्स्याः (7-1-12)
- वृत्ति: अकारान्तादङ्गात्परोषां टा-ङसि-ङसाम् इनात्-स्या एते स्युः।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (सर्व) से परे आने वाले षष्ठी एकवचन के प्रत्यय ‘ङस्’ के स्थान पर ‘स्य’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व + स्य
4. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- ‘सर्व’ शब्द के अन्तिम अकारयुक्त वकार में ‘स्य’ प्रत्यय सीधा जुड़ जाता है क्योंकि यहाँ किसी अन्य संधि कार्य की आवश्यकता नहीं होती।
- स्थिति: सर्व + स्य = सर्वस्य
5. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (1-4-14) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वस्य” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के लिए पूरी तरह सिद्ध हो जाता है।
परिणाम: इस प्रकार टाङसिङसामिनात्स्याः सूत्र की सहायता से षष्ठी विभक्ति एकवचन का रूप “सर्वस्य” सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वयोः’ (षष्ठी द्विवचन) आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वयोः’ रूप की सिद्धि षष्ठी और सप्तमी विभक्ति के द्विवचन में समान रूप से होती है। इसकी प्रक्रिया ‘रामयोः’ शब्द के समान ही है, जिसमें ‘ओस्’ प्रत्यय, अङ्ग को एकार, अयादि संधि और रुत्व-विसर्ग मुख्य कार्य हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में षष्ठी/सप्तमी विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘ओस्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + ओस्
3. अङ्ग के ‘अ’ को ‘ए’ करना (ओसि च)
- सूत्र: ओसि च (७-३-१०४)
- वृत्ति: ओसि परतोऽतोऽङ्गस्यैकारः स्यात्।
- कार्य: यदि अदन्त अङ्ग (‘सर्व’ जिसके अन्त में ‘अ’ है) से परे ‘ओस्’ प्रत्यय हो, तो अङ्ग के अन्तिम अकार को ‘ए’ (एकार) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + ओस्
4. अयादि एकादेश (संधि कार्य)
- सूत्र: एचोऽयवायावः (६-१-७८)
- कार्य: ‘ए’ से परे अच् (स्वर ‘ओ’) होने के कारण एकार (‘ए’) के स्थान पर ‘अय्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व् + अय् + ओस् = सर्वयोस्
5. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से ‘सर्वयोस्’ की पद संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। अनुबन्ध लोप (उकार का लोप) होने पर केवल ‘र्’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्वयो + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान में स्थित रेफ (‘र्’) को विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वयो + ः = सर्वयोः
परिणाम: इन सभी सूत्रों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद षष्ठी और सप्तमी द्विवचन का रूप “सर्वयोः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वेषाम्’ (षष्ठी बहुवचन) आता है, जहाँ सर्वनाम का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र प्रवृत्त होता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वेषाम्’ रूप की सिद्धि षष्ठी विभक्ति, बहुवचन में होती है। यह ‘सर्व’ शब्द का सबसे महत्वपूर्ण रूप माना जाता है क्योंकि यहाँ सर्वनाम संज्ञा के कारण ‘सुट्’ का आगम होता है जो इसे ‘राम’ शब्द के रूप (रामाणाम्) से बिल्कुल अलग और विशिष्ट बनाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि (१-१-२७) से ‘सर्व’ शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘आम्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + आम्
3. ‘सुट्’ का आगम (सर्वनाम का विशेष नियम)
- सूत्र: आमि सर्वनाम्नः सुट् (७-१-५२)
- वृत्ति: अवर्णान्तात् सर्वनाम्नः परस्यामः सुडागमः स्यात्।
- कार्य: अवर्णान्त (जिसके अन्त में अ या आ हो) सर्वनाम अङ्ग से परे आने वाले ‘आम्’ प्रत्यय को ‘सुट्’ का आगम होता है। आद्यन्तौ टकितौ नियम से ‘सुट्’ टकारयुक्त (टित्) होने के कारण ‘आम्’ के आदि (शुरुआत) में जुड़ता है।
- स्थिति: सर्व + सुट् आम्
- अनुबन्ध लोप: ‘सुट्’ में उकार और टकार की इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, केवल ‘स्’ शेष बचता है जो ‘आम्’ से मिलकर ‘साम्’ बन जाता है।
- स्थिति: सर्व + साम्
4. अङ्ग के ‘अ’ को ‘ए’ करना
- सूत्र: बहुवचने झल्येत् (७-३-१०३)
- कार्य: झलादि बहुवचन का सुप् प्रत्यय (‘साम्’ का ‘स्’ झल् में आता है) परे होने के कारण अदन्त अङ्ग ‘सर्व’ के अन्तिम अकार को ‘ए’ (एकार) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + साम्
5. सकार को षकार करना (षत्व विधान)
- सूत्र: आदेशप्रत्यययोः (८-३-५९)
- कार्य: इण् प्रत्याहार (इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल) या कवर्ग से परे यदि आदेश का सकार या प्रत्यय का अवयव सकार हो, तो उसे मूर्धन्य ‘ष’ आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘सर्वे’ के अन्त में ‘ए’ है जो ‘इण्’ प्रत्याहार में आता है, और उसके बाद प्रत्यय का सकार (‘स्’) है। अतः इस सकार को ‘ष्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + षाम् = सर्वेषाम्
6. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “सर्वेषाम्” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: इन सभी सूत्रों की क्रमिक और विशिष्ट प्रवृत्ति के बाद षष्ठी विभक्ति बहुवचन का रूप “सर्वेषाम्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप ‘सर्वस्मिन्’ (सप्तमी एकवचन) आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वस्मिन्’ रूप की सिद्धि सप्तमी विभक्ति, एकवचन में होती है। सर्वनाम संज्ञा होने के कारण यहाँ एक विशेष नियम काम करता है, जो इसे ‘राम’ शब्द के रूप (रामे) से पूरी तरह अलग बनाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
- सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि (१-१-२७) से ‘सर्व’ शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में सप्तमी विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘ङि’ आता है।
- स्थिति: सर्व + ङि
३. ‘ङि’ को ‘स्मिन्’ आदेश (सर्वनाम का विशेष नियम)
- सूत्र: ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (७-१-१५)
- वृत्ति: अदन्तात् सर्वनाम्न एतयोः स्मात्स्मिनौ स्तः।
- कार्य: अदन्त अङ्ग (सर्व) यदि सर्वनाम संज्ञक हो, तो उससे परे आने वाले सप्तमी एकवचन के प्रत्यय ‘ङि’ के स्थान पर ‘स्मिन्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्व + स्मिन्
४. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- ‘सर्व’ शब्द के अन्तिम हलन्त वकार (‘व्’) में ‘स्मिन्’ प्रत्यय सीधा जुड़ जाता है क्योंकि यहाँ किसी अन्य संधि नियम की आवश्यकता नहीं होती।
- स्थिति: सर्व् + स्मिन् = सर्वस्मिन्
५. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “सर्वस्मिन्” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के योग्य बनता है।
परिणाम: ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ सूत्र की विशिष्ट प्रवृत्ति के कारण सप्तमी एकवचन का रूप “सर्वस्मिन्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्विवचन में ‘सर्वयोः’ और बहुवचन में ‘सर्वेषु’ रूप बनता है, जिसके साथ ही सर्व शब्द के पुल्लिंग रूपों की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘सर्वेषु’ रूप की सिद्धि सप्तमी विभक्ति, बहुवचन में होती है। पुल्लिंग शब्द रूप की श्रृंखला में यह अन्तिम रूप है, और इसकी प्रक्रिया ‘रामेषु’ शब्द के बिल्कुल समान ही चलती है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा एवं सर्वनाम संज्ञा
- सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च से ‘सर्व’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा और सर्वादीनि सर्वनामानि से इसकी सर्वनाम संज्ञा होती है।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में सप्तमी विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘सुप्’ आता है।
- स्थिति: सर्व + सुप्
- अनुबन्ध लोप: हलन्त्यम् से पकार (‘प्’) की इत् संज्ञा और तस्य लोपः से उसका लोप हो जाता है। केवल ‘सु’ शेष बचता है।
- स्थिति: सर्व + सु
3. अङ्ग के ‘अ’ को ‘ए’ करना
- सूत्र: बहुवचने झल्येत् (७-३-१०३)
- कार्य: झलादि बहुवचन का सुप् प्रत्यय (‘सु’ का ‘स्’ झल् में आता है) परे होने के कारण अदन्त अङ्ग ‘सर्व’ के अन्तिम अकार को ‘ए’ (एकार) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + सु
4. सकार को षकार करना (षत्व विधान – मुख्य कार्य)
- सूत्र: आदेशप्रत्यययोः (८-३-५९)
- कार्य: इण् प्रत्याहार (स्वर, ह, य, व, र, ल) या कवर्ग से परे यदि आदेश का सकार या प्रत्यय का अवयव सकार हो, तो उसे मूर्धन्य ‘ष’ आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘सर्वे’ के अन्त में ‘ए’ है जो ‘इण्’ प्रत्याहार में आता है, और उसके ठीक बाद प्रत्यय का सकार (‘सु’ का ‘स्’) है। अतः इस सकार को ‘ष्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: सर्वे + षु = सर्वेषु
5. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “सर्वेषु” की पद संज्ञा होती है।

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