पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिः’ रूप की सिद्धि प्रथमा विभक्ति, एकवचन में होती है। यह इकारान्त पुल्लिंग श्रृंखला का सबसे पहला और सरल रूप है, जिसकी प्रक्रिया ‘रामः’ शब्द के समान ही चलती है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
1. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१-२-४५)
- कार्य: धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त को छोड़कर जो अर्थवान् शब्द होते हैं, उनकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। यहाँ ‘हरि’ एक मूल (रूढ़) और अर्थवान् शब्द है, अतः इसकी प्रातिपदिक संज्ञा हुई।
2. प्रत्यय विधान
- सूत्र: स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् (४-१-२) तथा द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा (एकवचन) में प्रथमा विभक्ति का प्रत्यय ‘सु’ आता है।
- स्थिति: हरि + सु
3. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१-३-२)
- कार्य: उपदेश (प्रत्यय) के अन्त में स्थित अनुनासिक स्वर उकार (‘उ’) की इत् संज्ञा होती है और तस्य लोपः (१-३-९) से उसका लोप हो जाता है। केवल हलन्त सकार (‘स्’) शेष रहता है।
- स्थिति: हरि + स्
4. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४)
- कार्य: सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण ‘हरिस्’ समुदाय की ‘पद’ संज्ञा होती है। व्याकरण के नियमानुसार बिना पद बनाए किसी शब्द का प्रयोग वाक्य में नहीं किया जा सकता।
- स्थिति: हरिस् (पद)
5. रुत्व विधान
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६)
- वृत्ति: पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात्।
- कार्य: पद के अन्त में स्थित सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरि + रु
- अनुबन्ध लोप: ‘रु’ के उकार की पुनः उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत् संज्ञा और लोप होता है, जिससे केवल रेफ (‘र्’) शेष बचता है।
- स्थिति: हरि + र्
6. विसर्ग आदेश (अन्तिम चरण)
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५)
- वृत्ति: अवसाने खरि च परे रेफस्य विसर्गः स्यात्।
- कार्य: यदि रेफ के बाद कोई वर्ण न हो (अवसान/विराम हो), तो उस रेफ (‘र्’) के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘र्’ के बाद कोई वर्ण नहीं है, अतः उसे विसर्ग हो गया।
- स्थिति: हरि + ः = हरिः
निष्कर्ष: इन छह चरणों के बाद प्रथमा विभक्ति एकवचन का रूप “हरिः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप द्विवचन में ‘हरी’ (प्रथमयोः पूर्वसवर्णः से दीर्घ होकर) बनता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरी’ रूप की सिद्धि प्रथमा विभक्ति और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में समान रूप से होती है। यहाँ ‘राम’ शब्द (रामौ) की तरह वृद्धि संधि नहीं होती, बल्कि पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है, जो इसे अलग बनाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं घि संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है और शेषो घ्यसखि से इसकी ‘घि’ संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में प्रथमा/द्वितीया विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘औ’ (या द्वितीया में ‘औट्’) आता है।
- अनुबन्ध लोप: ‘औट्’ के टकार की हलन्त्यम् से इत् संज्ञा और लोप होकर ‘औ’ ही शेष रहता है।
- स्थिति: हरि + औ
३. पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ इको यणचि सूत्र से यण संधि (इ को य्) प्राप्त होती है, और प्रथमयोः पूर्वसवर्णः सूत्र से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है। इन दोनों को रोककर अकारान्त शब्दों में नादिचि सूत्र से दीर्घ का निषेध होता है, परन्तु ‘हरि’ शब्द इकारान्त है, इसलिए यहाँ निषेध काम नहीं करता।
- सूत्र: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (६-१-१०२)
- वृत्ति: अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात्।
- कार्य: यदि ‘अक्’ प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) से परे प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का कोई भी ‘अच्’ (स्वर) हो, तो पूर्व और पर दोनों वर्णों के स्थान पर पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है।
- यहाँ पूर्व वर्ण ‘हरि’ का ‘इ’ है (जो अक् में आता है) और पर वर्ण प्रत्यय का ‘औ’ है। अतः पूर्व वर्ण ‘इ’ का सवर्ण दीर्घ ‘ई’ (बड़ी ई) दोनों के स्थान पर एकादेश हो जाता है।
- स्थिति: हर् + ई = हरी
४. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “हरी” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः सूत्र से इकार को दीर्घ होकर प्रथमा और द्वितीया द्विवचन का रूप “हरी” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप प्रथमा बहुवचन में ‘हरयः’ आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरयः’ रूप की सिद्धि प्रथमा विभक्ति, बहुवचन में होती है। ‘राम’ शब्द (रामाः) की तुलना में यह रूप बिल्कुल अलग प्रक्रिया से बनता है, क्योंकि यहाँ पूर्वसवर्ण दीर्घ न होकर ‘घि’ संज्ञा के कारण गुण और अयादि संधि कार्य करते हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं घि संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ की प्रातिपदिक संज्ञा और शेषो घ्यसखि (१-४-७) से इसकी ‘घि’ संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में प्रथमा विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘जस्’ आता है।
- स्थिति: हरि + जस्
३. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: चूटू (१-३-७) से प्रत्यय के आदि (प्रारम्भ) में स्थित चवर्ग या टवर्ग के वर्ण की इत् संज्ञा होती है। यहाँ ‘जस्’ के ‘ज्’ की इत् संज्ञा हुई और तस्य लोपः से उसका लोप हो गया। केवल ‘अस्’ शेष बचा।
- स्थिति: हरि + अस्
४. जसि च — गुण एकादेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ प्रथमयोः पूर्वसवर्णः सूत्र से पूर्वसवर्ण दीर्घ (हरीस्) प्राप्त था, जिसे रोककर सर्वोपरि यह विशेष नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: जसि च (७-३-१०९)
- वृत्ति: ह्रस्वान्तादङ्गात्परस्य जसोऽवयवस्याचो गुणः स्यात्।
- कार्य: ह्रस्वान्त अङ्ग (जैसे ‘हरि’ का ह्रस्व ‘इ’) से परे यदि ‘जस्’ प्रत्यय का स्वर (‘अस्’ का ‘अ’) हो, तो अङ्ग के अन्तिम स्वर को गुण आदेश हो जाता है।
- ‘इ’ का गुण ‘ए’ होता है।
- स्थिति: हरे + अस्
५. अयादि सन्धि
- सूत्र: एचोऽयवायावः (६-१-७८)
- कार्य: ‘एच्’ (ए, ओ, ऐ, औ) से परे अच् (स्वर) होने पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् आदेश होते हैं। यहाँ ‘हरे’ के ‘ए’ से परे ‘अस्’ का ‘अ’ है, अतः ‘ए’ के स्थान पर ‘अय्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हर् + अय् + अस् = हरयस्
६. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् से ‘हरयस्’ की पद संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। उकार की इत् संज्ञा और लोप होने पर केवल ‘र्’ शेष बचता है।
- स्थिति: हरय + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान (वर्णों का अभाव/अन्त) में स्थित रेफ (‘र्’) को विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरय + ः = हरयः
परिणाम: जसि च सूत्र द्वारा गुण और फिर अयादि संधि होने से प्रथमा विभक्ति बहुवचन का रूप “हरयः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्वितीया विभक्ति एकवचन में ‘हरिम्’ रूप आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिम्’ रूप की सिद्धि द्वितीया विभक्ति, एकवचन में होती है। यह रूप ‘राम’ शब्द के द्वितीया एकवचन (रामम्) के समान ही बहुत सरल प्रक्रिया से बनता है, जहाँ यण संधि को रोककर पूर्वरूप एकादेश किया जाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में द्वितीया विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘अम्’ आता है।
- स्थिति: हरि + अम्
३. पूर्वरूप एकादेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ ‘हरि’ के अन्त में ‘इ’ (इक्) है और उसके बाद ‘अम्’ का ‘अ’ (अच्) है। सामान्य नियमों के अनुसार यहाँ इको यणचि से यण संधि (इ को य्) प्राप्त होती है। परन्तु उसे बाधकर (रोककर) निम्नलिखित विशेष सूत्र प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: अमि पूर्वः (६-१-१०७)
- वृत्ति: अकः अम्यचि पूर्वरूपमेकादेशः स्यात्।
- कार्य: यदि ‘अक्’ प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) से परे ‘अम्’ प्रत्यय का ‘अच्’ (स्वर) आए, तो पूर्व वर्ण और पर वर्ण दोनों के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो जाता है। अर्थात् बाद वाला ‘अ’ गायब हो जाता है और पहले वाले स्वर (‘इ’) में ही विलीन हो जाता है।
- यहाँ पूर्व वर्ण ‘इ’ और पर वर्ण ‘अ’ दोनों मिलकर पूर्वरूप ‘इ’ ही रह जाते हैं।
- स्थिति: हर् + इ + म् = हरिम्
४. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “हरिम्” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के योग्य बन जाता है।
परिणाम: अमि पूर्वः सूत्र की सहायता से पूर्वरूप होकर द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप “हरिम्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्विवचन में पुनः ‘हरी’ रूप बनता है, और बहुवचन में ‘हरीन्’ रूप आता है।
चूंकि द्वितीया विभक्ति द्विवचन का रूप भी प्रथमा द्विवचन के समान ही ‘हरी’ बनता है, इसकी सिद्धि प्रक्रिया बिल्कुल वही है जो हमने पहले देखी थी। फिर भी, द्वितीया विभक्ति के सन्दर्भ में ‘औट्’ प्रत्यय के साथ इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान (द्वितीया द्विवचन)
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में द्वितीया विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘औट्’ आता है।
- अनुबन्ध लोप: प्रत्यय के अन्त में स्थित टकार (‘ट्’) की हलन्त्यम् से इत् संज्ञा और तस्य लोपः से लोप हो जाता है। केवल ‘औ’ शेष बचता है।
- स्थिति: हरि + औ
३. पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ इको यणचि से यण संधि प्राप्त होती है। उसे रोककर अकारान्त शब्दों में नादिचि से पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध होता है (जैसे राम + औ = रामौ), परन्तु ‘हरि’ शब्द इकारान्त होने के कारण यहाँ निषेध काम नहीं करता और पूर्वसवर्ण दीर्घ ही होता है:
- सूत्र: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (६-१-१०२)
- कार्य: ‘अक्’ प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) से परे प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का स्वर होने पर पूर्व और पर दोनों के स्थान पर पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है।
- यहाँ पूर्व का स्वर ‘हरि’ का ‘इ’ है, अतः दोनों के स्थान पर इसी का दीर्घ रूप ‘ई’ एकादेश हो जाता है।
- स्थिति: हर् + ई = हरी
४. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् से सुप् प्रत्यन्त होने के कारण “हरी” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: इस प्रकार द्वितीया विभक्ति द्विवचन का रूप “हरी” भी पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद अगला रूप द्वितीया बहुवचन में ‘हरीन्’ आता है, जहाँ पूर्वसवर्ण दीर्घ के साथ-साथ नत्व विधान का एक विशेष सूत्र काम करता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरीन्’ रूप की सिद्धि द्वितीया विभक्ति, बहुवचन में होती है। ‘राम’ शब्द के बहुवचन (रामान्) की तरह यहाँ भी पूर्वसवर्ण दीर्घ और सकार को नकार आदेश होता है, लेकिन ‘हरि’ शब्द इकारान्त होने के कारण इसके वर्ण अलग होते हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में द्वितीया विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘शस्’ आता है।
- स्थिति: हरि + शस्
३. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: लशक्वतद्धिते (१-३-८) से तद्धित भिन्न प्रत्यय के आदि (शुरुआत) में स्थित ‘श्’, ‘क्’ वर्ग और ‘ल्’ की इत् संज्ञा होती है। यहाँ ‘शस्’ के ‘श्’ की इत् संज्ञा हुई और तस्य लोपः से उसका लोप हो गया। केवल ‘अस्’ शेष बचा।
- स्थिति: हरि + अस्
४. पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ इको यणचि से यण संधि (इ को य्) प्राप्त होती है, जिसे बाधकर (रोककर) पूर्वसवर्ण दीर्घ का नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (६-१-१०२)
- कार्य: ‘अक्’ प्रत्याहार (इ) से परे प्रथमा या द्वितीया का अच् (अस् का ‘अ’) होने के कारण पूर्व और पर दोनों वर्णों के स्थान पर पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है। यहाँ ‘इ’ का दीर्घ ‘ई’ हो जाता है।
- स्थिति: हर् + ई + स् = हरीस्
५. सकार को नकार आदेश (नत्व विधान)
- सूत्र: तस्माच्छसो नः पुंसि (६-१-१०३)
- वृत्ति: पूर्वसवर्णदीर्घात्परस्य शसः सस्य नः स्यात्पुंसि।
- कार्य: पुल्लिंग में, पूर्वसवर्ण दीर्घ से परे आने वाले ‘शस्’ प्रत्यय के सकार (‘स्’) के स्थान पर नकार (‘न्’) आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘हरीस्’ में ‘ई’ पूर्वसवर्ण दीर्घ है, उससे परे शस् का ‘स्’ है, अतः उसे ‘न्’ हो गया।
- स्थिति: हरी + न् = हरीन्
६. पद संज्ञा और णत्व निषेध
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् से “हरीन्” की पद संज्ञा होती है।
- विशेष नोट: यहाँ ‘हरि’ में ‘र’ होने के कारण अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि सूत्र से नकार को णकार (‘ण्’) प्राप्त होता है, परन्तु पदान्तस्य (८-४-३७) सूत्र से पदान्त नकार का णत्व निषेध हो जाता है, जिससे ‘न्’ सुरक्षित रहता है।
परिणाम: इन सभी सूत्रों की क्रमिक प्रवृत्ति के बाद द्वितीया विभक्ति बहुवचन का रूप “हरीन्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद तृतीया विभक्ति एकवचन में ‘हरिणा’ रूप आता है, जहाँ आङ्ो नाऽस्त्रियाम् सूत्र काम करेगा।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिणा’ रूप की सिद्धि तृतीया विभक्ति, एकवचन में होती है। यहाँ ‘राम’ शब्द (रामेण) की तरह ‘टा’ को ‘इन’ आदेश नहीं होता, बल्कि सर्वनाम या इकारान्त शब्दों के लिए प्रवृत्त होने वाला एक विशेष सूत्र ‘टा’ को ‘ना’ करता है, जिसके बाद णत्व विधान होता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं घि संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है और शेषो घ्यसखि (१-४-७) सूत्र से इसकी ‘घि’ संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में तृतीया विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘टा’ आता है।
- स्थिति: हरि + टा
३. ‘टा’ प्रत्यय को ‘ना’ आदेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ ‘राम’ शब्द की तरह टाङसिङसामिनात्स्याः सूत्र प्राप्त नहीं होता क्योंकि वह केवल अकारान्त (अदन्त) अङ्गों के लिए है। ‘हरि’ शब्द इकारान्त होने के कारण निम्नलिखित विशेष सूत्र प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: आङ्ो नाऽस्त्रियाम् (७-३-१२०)
- वृत्ति: घेः परस्याङ्ो ना स्यादस्त्रियाम्। (आङ् इति टायः संज्ञा प्राचीनैः कृता सा इहापि गृह्यते)।
- कार्य: पुल्लिंग या नपुंसकलिंग (अस्त्रियाम्) में ‘घि’ संज्ञक अङ्ग से परे आने वाले ‘टा’ (जिसे प्राचीन आचार्य ‘आङ्’ कहते थे) प्रत्यय के स्थान पर ‘ना’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरि + ना
४. नकार को णकार आदेश (णत्व विधान)
- सूत्र: अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (८-४-२)
- कार्य: समान पद में यदि ‘र’ या ‘ष’ से परे ‘न’ आए, और उनके बीच में अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ् या नुम् का व्यवधान (फासला) हो, तो भी नकार (‘न’) को मूर्धन्य णकार (‘ण’) आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘ह-र-इ-न-आ’ की स्थिति में ‘र’ से परे ‘न’ है और बीच में ‘इ’ (जो अट् प्रत्याहार में आता है) का व्यवधान है। अतः ‘ना’ के नकार को ‘णा’ हो गया।
- स्थिति: हरि + णा = हरिणा
५. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यन्त होने के कारण “हरिणा” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: इस प्रकार आङ्ो नाऽस्त्रियाम् से ‘ना’ आदेश और णत्व करने के बाद तृतीया विभक्ति एकवचन का रूप “हरिणा” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्विवचन में ‘हरिभ्याम्’ रूप बनता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिभ्याम्’ रूप की सिद्धि तृतीया, चतुर्थी और पंचमी विभक्ति के द्विवचन में समान रूप से होती है। यह रूप ‘राम’ शब्द के द्विवचन (रामाभ्याम्) से अलग है, क्योंकि ‘राम’ शब्द में अङ्ग को दीर्घ (रामा) होता है, जबकि ‘हरि’ शब्द में अङ्ग का कोई परिवर्तन नहीं होता और रूप अत्यंत सरल प्रक्रिया से सिद्ध होता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१-२-४५) से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में तृतीया, चतुर्थी या पंचमी विभक्ति के द्विवचन का प्रत्यय ‘भ्याम्’ आता है।
- स्थिति: हरि + भ्याम्
३. दीर्घ/गुण का निषेध (स्थिति का विचार)
- यहाँ ‘राम’ शब्द में सुपि च सूत्र से अङ्ग को दीर्घ प्राप्त होता था, क्योंकि वह केवल अदन्त (अकारान्त) अङ्गों के लिए है। ‘हरि’ इकारान्त है, इसलिए यहाँ वह सूत्र नहीं लगता।
- इसी प्रकार यहाँ ‘भ्याम्’ प्रत्यय हलादि है (जिसकी शुरुआत ‘भ’ से होती है), अतः यहाँ ‘घि’ संज्ञा के कारण होने वाले गुण कार्य (घेर्ङिति आदि) भी प्राप्त नहीं होते, क्योंकि वे केवल ‘ङित्’ प्रत्ययों पर लगते हैं।
- अतः अङ्ग ‘हरि’ और प्रत्यय ‘भ्याम्’ में कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता।
४. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- ‘हरि’ शब्द के अन्तिम स्वर ‘इ’ के साथ हलादि प्रत्यय ‘भ्याम्’ सीधे संयोग (वर्ण सम्मेलन) नियम से जुड़ जाता है।
- स्थिति: हरि + भ्याम् = हरिभ्याम्
५. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “हरिभ्याम्” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के लिए सिद्ध हो जाता है।
परिणाम: बिना किसी अतिरिक्त संधि या आदेश कार्य के, केवल वर्ण-संयोग द्वारा तृतीया, चतुर्थी और पंचमी द्विवचन का रूप “हरिभ्याम्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद तृतीया बहुवचन में ‘हरिभिः’ रूप आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिभिः’ रूप की सिद्धि तृतीया विभक्ति, बहुवचन में होती है। ‘राम’ शब्द के बहुवचन (रामैः) की तुलना में यह रूप अत्यंत सरल है, क्योंकि ‘राम’ शब्द में ‘भिस’ को ‘ऐस्’ आदेश होता है, जबकि ‘हरि’ शब्द इकारान्त होने के कारण यहाँ ‘भिस’ प्रत्यय अपने मूल रूप में ही रहता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में तृतीया विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘भिस्’ आता है।
- यहाँ ‘राम’ शब्द की तरह अतो भिस ऐस् सूत्र प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि वह केवल अदन्त (अकारान्त) अङ्गों के लिए है। ‘हरि’ इकारान्त है, इसलिए ‘भिस्’ प्रत्यय वैसा ही रहता है।
- स्थिति: हरि + भिस्
३. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- अङ्ग ‘हरि’ और हलादि प्रत्यय ‘भिस्’ के बीच कोई संधि कार्य या आदेश प्राप्त नहीं होता, अतः दोनों वर्ण सीधे आपस में जुड़ जाते हैं।
- स्थिति: हरि + भिस् = हरिभिस्
४. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से ‘हरिभिस्’ समुदाय की ‘पद’ संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। अनुबन्ध लोप (उकार का लोप) होने पर केवल ‘र्’ (रेफ) शेष बचता है।
- स्थिति: हरिभि + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान (वर्णों के अभाव/विराम) में स्थित रेफ (‘र्’) के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरिभि + ः = हरिभिः
परिणाम: इन सीधे चरणों और रुत्व-विसर्ग कार्य के बाद तृतीया विभक्ति बहुवचन का रूप “हरिभिः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद चतुर्थी विभक्ति एकवचन में सबसे महत्वपूर्ण रूप ‘हरये’ आता है, जहाँ घेर्ङिति सूत्र से गुण कार्य होगा।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरये’ रूप की सिद्धि चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में होती है। ‘राम’ शब्द के चतुर्थी एकवचन (रामाय) की तुलना में यह रूप बिल्कुल अलग प्रक्रिया से बनता है। यहाँ ‘घि’ संज्ञा होने के कारण अङ्ग को गुण और फिर अयादि सन्धि कार्य करते हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं घि संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ की प्रातिपदिक संज्ञा और शेषो घ्यसखि (१-४-७) से इसकी ‘घि’ संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में चतुर्थी विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘ङे’ आता है।
- स्थिति: हरि + ङे
३. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: लशक्वतद्धिते (१-३-८) से तद्धित भिन्न प्रत्यय के आदि में स्थित ‘ङ’ की इत् संज्ञा होती है और तस्य लोपः से उसका लोप हो जाता है। केवल ‘ए’ शेष बचता है।
- (चूँकि इस प्रत्यय में ‘ङ’ की इत् संज्ञा हुई है, इसलिए इसे ‘ङित्’ प्रत्यय कहा जाता है)।
- स्थिति: हरि + ए
४. घेर्ङिति — अङ्ग को गुण (मुख्य कार्य)
- यहाँ इको यणचि से यण सन्धि (इ को य्) प्राप्त थी, जिसे बाधकर (रोककर) घि-संज्ञक अङ्ग के लिए यह विशेष नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: घेर्ङिति (७-३-१११)
- वृत्ति: घिसंज्ञकादङ्गात्परस्य ङितो गुणः स्यात्।
- कार्य: ‘घि’ संज्ञक अङ्ग से परे यदि कोई ‘ङित्’ प्रत्यय (जैसे यहाँ ‘ए’) हो, तो अङ्ग के अन्तिम स्वर को गुण आदेश होता है।
- ‘हरि’ के इकार (‘इ’) का स्थान आन्तरतम्य परीक्षा से तालु है, अतः इसका गुण ‘ए’ हो जाता है।
- स्थिति: हरे + ए
५. अयादि सन्धि
- सूत्र: एचोऽयवायावः (६-१-७८)
- कार्य: ‘एच्’ (ए, ओ, ऐ, औ) से परे अच् (स्वर) होने पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् आदेश होते हैं। यहाँ ‘हरे’ के ‘ए’ से परे प्रत्यय का ‘ए’ है, अतः पहले वाले ‘ए’ के स्थान पर ‘अय्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हर् + अय् + ए = हरये
६. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “हरये” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के योग्य बनता है।
परिणाम: घेर्ङिति सूत्र द्वारा गुण और फिर अयादि सन्धि होने से चतुर्थी विभक्ति एकवचन का रूप “हरये” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्विवचन में पुनः ‘हरिभ्याम्’ और बहुवचन में ‘हरिभ्यः’ रूप आता है।
चूंकि चतुर्थी विभक्ति द्विवचन का रूप भी तृतीया द्विवचन के समान ही ‘हरिभ्याम्’ बनता है, इसकी सिद्धि प्रक्रिया बिल्कुल वही है। फिर भी, चतुर्थी विभक्ति के सन्दर्भ में ‘भ्याम्’ प्रत्यय के साथ इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान (चतुर्थी द्विवचन)
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में चतुर्थी विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘भ्याम्’ आता है।
- स्थिति: हरि + bhyaam
३. परिवर्तन का अभाव (प्रक्रिया विचार)
- यहाँ ‘भ्याम्’ प्रत्यय हलादि है (इसकी शुरुआत ‘भ’ से होती है), अतः यह ‘ङित्’ होने पर भी घेर्ङिति सूत्र से गुण कार्य नहीं पा सकता, क्योंकि गुण केवल अच् (स्वर) परे होने पर या विशिष्ट दशाओं में होता है।
- ‘राम’ शब्द की तरह यहाँ सुपि च से दीर्घ भी नहीं होता क्योंकि वह केवल अकारान्त शब्दों के लिए सुरक्षित है। अतः अङ्ग और प्रत्यय दोनों अपरिवर्तित रहते हैं।
४. वर्ण सम्मेलन (संयोग) एवं पद संज्ञा
- अङ्ग ‘हरि’ और प्रत्यय ‘भ्याम्’ बिना किसी विकार के आपस में जुड़ जाते हैं।
- स्थिति: हरि + भ्याम् = हरिभ्याम्
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “हरिभ्याम्” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: बिना किसी अतिरिक्त सूत्र के, केवल स्वाभाविक वर्ण-संयोग से चतुर्थी विभक्ति द्विवचन का रूप “हरिभ्याम्” सिद्ध होता है। इसके बाद चतुर्थी बहुवचन में ‘हरिभ्यः’ रूप आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिभ्यः’ रूप की सिद्धि चतुर्थी और पंचमी विभक्ति के बहुवचन में समान रूप से होती है। ‘राम’ शब्द के बहुवचन (रामेभ्यः) की तुलना में यह रूप अधिक सरल है, क्योंकि ‘राम’ शब्द में अदन्त अङ्ग होने के कारण बहुवचन में ‘ए’कार आदेश (बहुवचने झल्येत्) होता है, जबकि ‘हरि’ इकारान्त होने के कारण अपरिवर्तित रहता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में चतुर्थी/पंचमी विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘भ्यस्’ आता है।
- स्थिति: हरि + भ्यस्
३. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- यहाँ ‘भ्यस्’ प्रत्यय हलादि (झलादि) बहुवचन है। ‘राम’ शब्द में इस स्थिति में बहुवचने झल्येत् सूत्र से अकार को एकार होता है, परन्तु वह नियम केवल अदन्त (अकारान्त) अङ्गों के लिए है। ‘हरि’ इकारान्त अङ्ग है, अतः यहाँ कोई विकार नहीं होता और दोनों सीधे जुड़ जाते हैं।
- स्थिति: हरि + भ्यस् = हरिभ्यस्
४. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से ‘हरिभ्यस्’ समुदाय की ‘पद’ संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। अनुबन्ध लोप (उकार का लोप) होने पर केवल ‘र्’ (रेफ) शेष बचता है।
- स्थिति: हरिभ्य + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान (विराम) में स्थित रेफ (‘र्’) के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरिभ्य + ः = हरिभ्यः
परिणाम: स्वाभाविक वर्ण सम्मेलन और रुत्व-विसर्ग प्रक्रिया के बाद चतुर्थी और पंचमी विभक्ति बहुवचन का रूप “हरिभ्यः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद पंचमी और षष्ठी विभक्ति एकवचन में महत्वपूर्ण रूप ‘हरेः’ आता है, जहाँ ङसिङ्योश्च सूत्र प्रवृत्त होगा।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरेः’ रूप की सिद्धि पंचमी और षष्ठी विभक्ति, एकवचन में समान रूप से होती है। ‘राम’ शब्द के रूपों (रामात् और रामस्य) की तुलना में यह रूप बिल्कुल अलग प्रक्रिया से बनता है। यहाँ ‘घि’ संज्ञा होने के कारण अङ्ग को गुण और फिर पूर्वरूप एकादेश कार्य करते हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं घि संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ की प्रातिपदिक संज्ञा और शेषो घ्यसखि (१-४-७) से इसकी ‘घि’ संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में पंचमी में ‘ङसि’ तथा षष्ठी में ‘ङस्’ प्रत्यय आता है।
- स्थिति: हरि + ङसि / हरि + ङस्
३. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: पंचमी के ‘ङसि’ में ‘ङ’ की लशक्वतद्धिते से और ‘इ’ की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत् संज्ञा होकर लोप होता है। षष्ठी के ‘ङस्’ में ‘ङ’ की लशक्वतद्धिते से इत् संज्ञा और लोप होता है।
- दोनों ही प्रत्ययों में अनुबन्ध लोप के बाद केवल ‘अस्’ शेष बचता है। (चूँकि इनमें ‘ङ’ की इत् संज्ञा हुई है, इसलिए ये दोनों ‘ङित्’ प्रत्यय हैं)।
- स्थिति: हरि + अस्
४. घेर्ङिति — अङ्ग को गुण (महत्वपूर्ण कार्य)
- यहाँ इको यणचि से यण संधि या प्रथमयोः पूर्वसवर्णः से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है, जिसे बाधकर (रोककर) घि-संज्ञक अङ्ग के लिए यह विशेष नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: घेर्ङिति (७-३-१११)
- कार्य: ‘घि’ संज्ञक अङ्ग से परे ‘ङित्’ प्रत्यय (अस्) होने के कारण अङ्ग के अन्तिम स्वर ‘इ’ को गुण आदेश होता है। ‘इ’ का गुण ‘ए’ हो जाता है।
- स्थिति: हरे + अस्
५. ङसिङ्योश्च — पूर्वरूप एकादेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ ‘हरे’ के ‘ए’ और ‘अस्’ के ‘अ’ के बीच एचोऽयवायावः से अयादि संधि (ए को अय्) प्राप्त होती है, जिसे रोककर यह विशेष नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: ङसिङ्योश्च (६-१-११०)
- वृत्ति: एङो ङसिङ्योरच्येकः पूर्वरूपं स्यात्।
- कार्य: यदि एङ् (ए, ओ) से परे ‘ङसि’ या ‘ङस्’ प्रत्यय का ‘अ’ (अच्) आए, तो पूर्व वर्ण (‘ए’) और पर वर्ण (‘अ’) दोनों के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो जाता है। अर्थात् बाद वाला ‘अ’ समाप्त होकर पहले वाले ‘ए’ में ही मिल जाता है।
- यहाँ ‘ए + अ’ के स्थान पर पूर्वरूप ‘ए’ एकादेश हो गया।
- स्थिति: हरेस्
६. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् से ‘हरेस्’ की पद संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) को ‘रु’ आदेश और उकार का लोप होने पर रेफ (‘र्’) शेष बचता है।
- स्थिति: हरे + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान में स्थित रेफ (‘र्’) को विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरे + ः = हरेः
परिणाम: घेर्ङिति से गुण और ङसिङ्योश्च से पूर्वरूप संधि होने के बाद पंचमी और षष्ठी विभक्ति एकवचन का रूप “हरेः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद षष्ठी/सप्तमी द्विवचन में ‘हरियोः’ रूप आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरयोः’ रूप की सिद्धि षष्ठी और सप्तमी विभक्ति के द्विवचन में समान रूप से होती है। यहाँ ‘राम’ शब्द (रामयोः) की तरह ओसि च से दीर्घ (रामायोः) नहीं होता, बल्कि सीधे यण् सन्धि और रुत्व-विसर्ग कार्य करते हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१-२-४५) से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से द्वित्व की विवक्षा में षष्ठी/सप्तमी विभक्ति द्विवचन का प्रत्यय ‘ओस्’ आता है।
- स्थिति: हरि + ओस्
३. यण् सन्धि (मुख्य कार्य)
- यहाँ अङ्ग ‘हरि’ के अन्त में ‘इ’ (इक्) है और उसके बाद प्रत्यय का ‘ओ’ (अच्) है। अतः यहाँ सीधे यण् सन्धि का सूत्र प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: इको यणचि (६-१-७७)
- कार्य: अच् (स्वर) परे होने पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है। यहाँ ‘इ’ का उच्चारण स्थान तालु होने के कारण आन्तरतम्य परीक्षा से उसके स्थान पर ‘य्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हर् + य् + ओस् = हर्योस्
४. वर्ण सम्मेलन (संयोग)
- हकार, रेफ, यकार और ओकार को आपस में मिलाने पर ‘हर्योस्’ रूप बनता है।
- स्थिति: हर्योस्
५. पद संज्ञा और रुत्व-विसर्ग (अन्तिम चरण)
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से ‘हर्योस्’ समुदाय की ‘पद’ संज्ञा होती है।
- सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६) से पदान्त सकार (‘स्’) के स्थान पर ‘रु’ आदेश होता है। अनुबन्ध लोप (उकार का लोप) होने पर केवल ‘र्’ (रेफ) शेष बचता है।
- स्थिति: हर्यो + र्
- सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५) से अवसान (विराम) में स्थित रेफ (‘र्’) के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हर्यो + ः = हरयोः
परिणाम: इस प्रकार स्वाभाविक यण् सन्धि और रुत्व-विसर्ग प्रक्रिया के बाद षष्ठी और सप्तमी विभक्ति द्विवचन का रूप “हरयोः” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद षष्ठी बहुवचन में ‘हरीणाम्’ रूप आता है, जहाँ नुट् का आगम और दीर्घ कार्य होगा।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरीणाम्’ रूप की सिद्धि षष्ठी विभक्ति, बहुवचन में होती है। ‘राम’ शब्द के बहुवचन (रामणाम् / रामाणाम्) की तरह यहाँ भी नुट् का आगम, दीर्घ और णत्व विधान कार्य करते हैं।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘आम्’ आता है।
- स्थिति: हरि + आम्
३. नुट् का आगम (मुख्य कार्य)
- यहाँ ‘घि’ संज्ञक अङ्ग होने के कारण ह्रस्वनद्यापो नुँट् सूत्र प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: ह्रस्वनद्यापो नुँट् (७-१-५४)
- वृत्ति: ह्रस्वान्तान्नद्यन्तादाबन्ताच्चाङ्गात्परस्यामो नुडागमः स्यात्।
- कार्य: ह्रस्वान्त अङ्ग (जैसे ‘हरि’ का ह्रस्व ‘इ’), नद्यन्त या आबन्त अङ्ग से परे ‘आम्’ प्रत्यय को ‘नुट्’ (न्) का आगम होता है। आद्यन्तौ टकितौ के नियम से यह आगम प्रत्यय के आदि (शुरुआत) में जुड़ता है।
- अनुबन्ध लोप: ‘नुट्’ में टकार की हलन्त्यम् से और उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत् संज्ञा और लोप होकर केवल हलन्त नकार (‘न्’) शेष रहता है, जो ‘आम्’ के पहले बैठता है।
- स्थिति: हरि + न् + आम् = हरि + नाम्
४. नामि — अङ्ग को दीर्घ (महत्वपूर्ण कार्य)
- सूत्र: नामि (६-४-३)
- वृत्ति: नामि परे अङ्गस्य दीर्घः स्यात्।
- कार्य: ‘नाम्’ (नुडागम विशिष्ट आम्) परे होने पर अङ्ग के अन्तिम स्वर को दीर्घ आदेश होता है।
- यहाँ ‘हरि’ के ह्रस्व इकार (‘इ’) को दीर्घ ‘ई’ हो जाता है।
- स्थिति: हरी + नाम् = हरीनाम्
५. नकार को नकार आदेश (णत्व विधान)
- सूत्र: अटुकुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (८-४-२)
- कार्य: समान पद में यदि ‘र’ या ‘ष’ से परे ‘न’ आए, और उनके बीच में अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ् या नुम् का व्यवधान हो, तो नकार (‘न’) को मूर्धन्य णकार (‘ण’) आदेश हो जाता है।
- यहाँ ‘ह-र-ई-न-आ-म्’ की स्थिति में ‘र’ से परे ‘न’ है और बीच में ‘ई’ (जो अट् प्रत्याहार में आता है) का व्यवधान है। अतः ‘नाम्’ के नकार को ‘णाम्’ हो गया।
- स्थिति: हरी + णाम् = हरीणाम्
६. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यन्त होने के कारण “हरीणाम्” की पद संज्ञा होती है और यह लोक-व्यवहार के लिए सिद्ध हो जाता है।
परिणाम: ह्रस्वनद्यापो नुँट् से नुट् आगम, नामि से दीर्घ और णत्व करने के बाद षष्ठी विभक्ति बहुवचन का रूप “हरीणाम्” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद सप्तमी विभक्ति एकवचन में विशेष रूप ‘हरौ’ आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरौ’ रूप की सिद्धि सप्तमी विभक्ति, एकवचन में होती है। ‘राम’ शब्द के सप्तमी एकवचन (रामे) की तुलना में यह रूप अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि यहाँ ‘घि’ संज्ञा होने के कारण प्रत्यय को ‘औ’ आदेश और अङ्ग के अन्तिम स्वर का लोप हो जाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा एवं घि संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ की प्रातिपदिक संज्ञा और शेषो घ्यसखि (१-४-७) से इसकी ‘घि’ संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२) के नियम से एकत्व की विवक्षा में सप्तमी विभक्ति एकवचन का प्रत्यय ‘ङि’ आता है।
- स्थिति: हरि + ङि
३. ‘ङि’ प्रत्यय को ‘औ’ आदेश (मुख्य कार्य)
- यहाँ इको यणचि आदि सामान्य नियमों को बाधकर घि-संज्ञक पुल्लिंग अङ्गों के लिए यह विशेष नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: अच्च घेः (७-३-११९)
- वृत्ति: इदुद्भ्यां घेः परस्य ङेरौत् स्यात् इदुतोश्च अकारोऽन्तादेशः।
- (लघुसिद्धान्तकौमुदीकार भट्टोजि दीक्षित और वरदराज के अनुसार इस सूत्र में दो कार्य एक साथ होते हैं – ‘ङि’ को ‘औ’ आदेश और घि-संज्ञक अङ्ग के अन्तिम इ/उ को अकार आदेश। परन्तु सुगमता के लिए इसे इस प्रकार समझा जाता है):
- कार्य १ (ङेराउद्): ‘घि’ संज्ञक अङ्ग से परे सप्तमी के ‘ङि’ प्रत्यय के स्थान पर ‘औ’ (औत्) आदेश होता है।
- कार्य २ (अच्च घेः): और उस ‘घि’ संज्ञक अङ्ग के अन्तिम स्वर (हरि के ‘इ’) के स्थान पर अकार (‘अ’) आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हर् + अ + औ
४. वृद्धि एकादेश (वृद्धि सन्धि)
- अब हमारे सामने ‘हर + औ’ की स्थिति है, जहाँ ‘र’ में स्थित ‘अ’ से परे ‘औ’ (एच् स्वर) विद्यमान है।
- सूत्र: वृद्धिरेचि (६-१-८८)
- कार्य: अद् (अ, आ) से परे एच् (ए, ओ, ऐ, औ) होने पर पूर्व और पर दोनों वर्णों के स्थान पर वृद्धि एकादेश होता है।
- यहाँ ‘अ + औ’ दोनों मिलकर वृद्धि संज्ञक वर्ण ‘औ’ हो जाते हैं।
- स्थिति: हर् + औ = हरौ
५. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “हरौ” की पद संज्ञा होती है और यह वाक्य में प्रयोग के योग्य बनता है।
परिणाम: अच्च घेः सूत्र द्वारा ‘ङि’ को ‘औ’ तथा इकार को अकार होने के बाद, वृद्धिरेचि से वृद्धि सन्धि होकर सप्तमी विभक्ति एकवचन का रूप “हरौ” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके बाद द्विवचन में पुनः ‘हरयोः’ और बहुवचन में ‘हरिषु’ रूप आता है।
पाणिनीय व्याकरण (लघुसिद्धान्तकौमुदी) के अनुसार ‘हरिषु’ रूप की सिद्धि सप्तमी विभक्ति, बहुवचन में होती है। यह रूप ‘राम’ शब्द के बहुवचन (रामेषु) के समान ही प्रक्रिया से बनता है, जहाँ पदान्त सकार को मूर्धन्य षकार (‘ष्’) आदेश (षत्व विधान) किया जाता है।
इसकी क्रमिक रूपसिद्धि निम्नलिखित है:
१. प्रातिपदिक संज्ञा
- सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से ‘हरि’ शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
२. प्रत्यय विधान
- सूत्र: बहुषु बहुवचनम् (१-४-२१) के नियम से बहुत्व की विवक्षा में सप्तमी विभक्ति बहुवचन का प्रत्यय ‘सुप्’ आता है।
- स्थिति: हरि + सुप्
३. अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा)
- सूत्र: हलन्त्यम् (१-३-३) से प्रत्यय के अन्त में स्थित पकार (‘प्’) की इत् संज्ञा होती है और तस्य लोपः से उसका लोप हो जाता है। केवल ‘सु’ शेष बचता है।
- स्थिति: हरि + सु
४. सकार को षकार आदेश (षत्व विधान – मुख्य कार्य)
- यहाँ ‘सु’ के दन्त्य सकार (‘स्’) को मूर्धन्य करने के लिए निम्नलिखित नियम प्रवृत्त होता है:
- सूत्र: आदेशप्रत्यययोः (८-३-५९)
- कार्य: इण् प्रत्याहार (अ को छोड़कर सभी स्वर, ह, य, व, र, ल) या कवर्ग से परे यदि किसी आदेश का सकार या प्रत्यय का सकार आए, तो उसे मूर्धन्य षकार (‘ष्’) आदेश हो जाता है।
- यहाँ अङ्ग ‘हरि’ के अन्त में ‘इ’ है, जो ‘इण्’ प्रत्याहार में आता है। उससे परे प्रत्यय का अवयव सकार (‘सु’ का ‘स्’) है। अतः ‘सु’ के ‘स्’ को ‘ष्’ आदेश हो जाता है।
- स्थिति: हरि + षु = हरिषु
५. पद संज्ञा
- सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४) से सुप् प्रत्यय का कार्य अन्त में होने के कारण “हरिषु” की पद संज्ञा होती है।
परिणाम: इस प्रकार आदेशप्रत्यययोः सूत्र की सहायता से षत्व होकर सप्तमी विभक्ति बहुवचन का रूप “हरिषु” पूर्णतः सिद्ध होता है। इसके साथ ही सप्तमी विभक्ति के सभी रूप समाप्त होते हैं। इसके बाद सम्बोधन के रूप (जैसे हे हरे) आते हैं।

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