“स्यतासी लृलुटोः” पाणिनीय अष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय के प्रथम पाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधि सूत्र (Operational Rule) है (अष्टाध्यायी ३.१.३३)।
यह सूत्र संस्कृत व्याकरण की तिङन्त प्रक्रिया (धातु रूप / Verb Forms) के अंतर्गत भविष्यत् काल (Future Tense) और अनद्यतन भविष्यत् काल के रूपों को सिद्ध करने के लिए प्रत्ययों (विकरण) का विधान करता है।
आइए इसे परीक्षा के दृष्टिकोण से पॉइंट-टू-पॉइंट और बहुत सरल भाषा में समझते हैं:
१. पदच्छेद (सूत्र के टुकड़े)
इस सूत्र में दो पद हैं:
- स्य-तासी (प्रथमा विभक्ति द्विवचन) = ‘स्य’ और ‘तासि’ प्रत्यय होते हैं।
- लृ-लुटोः (सप्तमी विभक्ति द्विवचन) = ‘लृ’ (लृट् और लृङ्) तथा ‘लुट्’ लकार परे होने पर।
२. अनुवृत्ति और अधिकार (पीछे से आने वाले पद)
इस सूत्र का पूरा अर्थ समझने के लिए निम्नलिखित पदों का संबंध जुड़ता है:
- धातोरः (३.१.९१): अर्थात् धातु से परे (बाद में)।
- प्रत्ययः (३.१.१) / परश्च (३.१.२): अर्थात् ये प्रत्यय हैं और धातु के बाद जुड़ते हैं।
३. सरल अर्थ (Simple Meaning)
धातु से परे (बाद में) क्रमशः ‘स्य‘ और ‘तासि‘ प्रत्यय (विकरण) होते हैं, यदि बाद में ‘लृ‘ (लृट् और लृङ् लकार) या ‘लुट्‘ लकार आया हो।
यहाँ यथासंख्य नियम (क्रमशः/Respectively) काम करता है:
- लृ (लृट् और लृङ्) लकार परे होने पर $\rightarrow$ ‘स्य‘ प्रत्यय होता है।
- लुट् लकार परे होने पर –‘तासि’ प्रत्यय होता है।
(नोट: ‘लृ‘ से यहाँ दो लकारों का ग्रहण होता है— लृट् (सामान्य भविष्यत् काल) और लृङ् (हेतुहेतुमद्भाव/Conditional mood)।)
नियम का ढाँचा (Formula):
- धातु + लृट् / लृङ् – धातु + स्य + लृट् / लृङ्
- धातु + लुट् -धातु + तासि + लुट्
४. उदाहरण और रूप सिद्धि में उपयोग (Examples)
परीक्षा में उत्तर को पूरा करने के लिए इन दोनों प्रत्ययों के उदाहरण देना आवश्यक है:
क) ‘स्य‘ प्रत्यय का उदाहरण (लृट् लकार — सामान्य भविष्यत्)
जब हम ‘पठिष्यति’ या ‘भविष्यति’ रूप बनाते हैं:
- स्थिति: भू + लृट् (भविष्यत् काल में)
- सूत्र प्रवृत्ति: यहाँ “स्यतासी लृलुटोः” सूत्र से लृट् लकार परे होने के कारण ‘भू’ धातु के बाद ‘स्य‘ प्रत्यय का आगम होगा।
- स्थिति: भू + स्य + लृट्
- (इडागम, गुण और ‘षत्व’ होने के बाद ‘स्य’ का ‘ष्य‘ बन जाता है) $\rightarrow$ भवि + ष्य + ति
- रूप सिद्ध होता है – भविष्यति (वह होगा)।
(इसी प्रकार: पठिष्यति, गमिष्यति, लेखिष्यति)
ख) ‘तासि‘ प्रत्यय का उदाहरण (लुट् लकार — अनद्यतन भविष्यत् / जो आज न हो)
जब हम ‘भविता’ या ‘पठिता’ रूप बनाते हैं:
- स्थिति: भू + लुट् (लुट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन का प्रत्यय ‘तिप्’ $\rightarrow$ ‘डा’)
- सूत्र प्रवृत्ति: इस सूत्र से लुट् लकार परे होने के कारण धातु के बाद ‘तासि‘ प्रत्यय होगा।
- स्थिति: भू + तासि + लुट् (डा)
- ‘तासि’ के इकार का लोप होकर केवल ‘तास्‘ बचता है $\rightarrow$ भू + तास् + आ
- (गुण और इडागम होने पर) $\rightarrow$ भवि + तास् + आ (यहाँ ‘डिटि च’ सूत्र से ‘स्’ का लोप हो जाता है)।
- रूप सिद्ध होता है $\rightarrow$ भविता (वह होगा — आने वाले दिनों में)।
(इसी प्रकार: पठिता, गन्ता, दाता)
५.
- यह कैसा सूत्र है? यह एक विधि सूत्र है जो ‘स्य’ और ‘तासि’ प्रत्ययों का विधान करता है।
- मुख्य कार्य: संस्कृत में भविष्यत् काल के क्रियापदों (Verbs) की रचना करना।
- शॉर्टकट ट्रिक:
- वाक्य में जहाँ भी ‘ष्य‘ दिखे (जैसे- पठिष्यति), वहाँ लृट् लकार और ‘स्य‘ प्रत्यय है।
- जहाँ भी ‘ता‘ दिखे (जैसे- भविता), वहाँ लुट् लकार और ‘तासि‘ प्रत्यय है।
“तिङ्शित्सार्वधातुकम्” पाणिनीय अष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय के चौथे पाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संज्ञा सूत्र (Definition / Naming Rule) है (अष्टाध्यायी ३.४.११३)।
यह सूत्र संस्कृत व्याकरण की तिङन्त (धातु रूप) और कृदन्त (प्रत्यय) प्रक्रिया में प्रत्ययों का नाम ‘सार्वधातुक‘ रखने का कार्य करता है। यह अभी पिछले सूत्र में पढ़े गए आर्धधातुकं शेषः का ठीक साथी सूत्र है।
आइए इसे परीक्षा के दृष्टिकोण से पॉइंट-टू-पॉइंट और बहुत सरल भाषा में समझते हैं:
१. पदच्छेद (सूत्र के टुकड़े)
इस सूत्र में दो पद हैं:
- तिङ्-शित् (प्रथमा विभक्ति द्विवचन) = ‘तिङ्’ और ‘शित्’ प्रत्यय।
- सार्वधातुकम् (प्रथमा विभक्ति एकवचन) = ‘सार्वधातुक’ संज्ञा (नाम) वाले होते हैं।
२. सरल अर्थ (Simple Meaning)
धातुओं से जुड़ने वाले वे सभी प्रत्यय जो ‘तिङ्‘ हैं, या जिनमें ‘श्‘ (शकार) की इत् संज्ञा (लोप) होती है (शित्), उनका नाम व्याकरण में ‘सार्वधातुक‘ होता है।
इस सूत्र के अनुसार केवल दो प्रकार के प्रत्यय ही सार्वधातुक कहलाते हैं:
- तिङ् (18 प्रत्यय): धातु रूप (Verb conjugations) बनाने वाले सभी 18 प्रत्यय $\rightarrow$ तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस् (परस्मैपद) तथा त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिङ् (आत्मनेपद)।
- शित् (श् की इत् संज्ञा वाले): वे सभी प्रत्यय या विकरण जिनमें से ‘श्’ वर्ण गायब हो जाता है। जैसे— भ्वादिगण का विकरण शप् (शप् में ‘श्’ और ‘प्’ का लोप होकर केवल ‘अ’ बचता है), दिवादिगण का श्यन् (य), स्वादिगण का श्नु (नु) आदि। इसके अलावा कृदन्त प्रत्ययों में शतृ (अत्) और शानच् (आन) भी शित् प्रत्यय हैं।
३. उदाहरण (Examples)
परीक्षा में उत्तर को सिद्ध करने के लिए इन दोनों श्रेणियों के उदाहरण देना सबसे अच्छा रहता है:
क) ‘तिङ्‘ प्रत्यय का उदाहरण:
जब हम पठ् + तिप् करते हैं, तो यहाँ ‘तिप्‘ एक तिङ् प्रत्यय है। अतः “तिङ्शित्सार्वधातुकम्” सूत्र से इसकी सार्वधातुक संज्ञा होती है।
ख) ‘शित्‘ प्रत्यय का उदाहरण:
जब हम पठ् + अ + ति (पठति) बनाते हैं, तो बीच में जो ‘शप्’ (अ) आता है, उसकी ‘श्’ के कारण सार्वधातुक संज्ञा होती है। इसी तरह शतृ प्रत्यय (पठ् + शतृ – पठत्) में भी ‘श्’ की इत् संज्ञा होने के कारण इसकी सार्वधातुक संज्ञा होती है।
४. सार्वधातुक संज्ञा का फल / महत्व (Why it Matters?)
व्याकरण में किसी प्रत्यय को ‘सार्वधातुक’ घोषित करने का क्या लाभ होता है?
- विकरण प्रत्ययों का आना: अष्टाध्यायी का प्रसिद्ध सूत्र है “कर्तरि शप्” (३.१.६८)। यह कहता है कि यदि बाद में कोई ‘सार्वधातुक‘ प्रत्यय हो, तो कर्तृवाच्य में धातु और प्रत्यय के बीच में ‘शप्‘ (अ) का आगम होता है।
- उदाहरण: पठ् + तिप् में ‘तिप्’ की सार्वधातुक संज्ञा हुई, तभी बीच में ‘शप्’ (अ) आकर ‘पठति‘ रूप बन पाया।
- गुण निषेध (क्ङिति च): कई जगहों पर सार्वधातुक प्रत्ययों को ‘ङित्’ (ङ की इत् संज्ञा जैसा) मान लिया जाता है, जिससे धातु के स्वर को गुण या वृद्धि कार्य नहीं होते। जैसे पठ् + तस् $\rightarrow$ पठतः (यहाँ पठ् को गुण नहीं होता)।
५.
परीक्षा में परीक्षक को प्रभावित करने के लिए आप इन दोनों सूत्रों का अंतर एक छोटी तालिका में दिखा सकते हैं:
| सूत्र | संज्ञा (नाम) | कौन-से प्रत्यय आते हैं? | मुख्य कार्य |
| तिङ्शित्सार्वधातुकम् | सार्वधातुक | १८ तिङ् प्रत्यय + शित् प्रत्यय (जैसे- शप्, शतृ, शानच्) | बीच में विकरण (शप् आदि) लाना। |
| आर्धधातुकं शेषः | आर्धधातुक | तिङ् और शित् को छोड़कर बाकी सभी (जैसे- तुमुन्, क्त्वा, स्य) | बीच में इडागम (‘इ’ की मात्रा) लाना। |
“आर्धधातुकं शेषः” पाणिनीय अष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय के चौथे पाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संज्ञा सूत्र (Definition / Naming Rule) है (अष्टाध्यायी ३.४.११४)।
यह सूत्र संस्कृत व्याकरण की तिङन्त (धातु रूप) और कृदन्त (प्रत्यय) प्रक्रिया में प्रत्ययों का वर्गीकरण (Classification) करने के लिए बहुत जरूरी है। यह मूल रूप से प्रत्ययों का नाम ‘आर्धधातुक‘ रखता है।
आइए इसे परीक्षा के दृष्टिकोण से पॉइंट-टू-पॉइंट और बहुत सरल भाषा में समझते हैं:
१. पदच्छेद (सूत्र के टुकड़े)
इस सूत्र में दो पद हैं:
- आर्धधातुकम् (प्रथमा विभक्ति एकवचन) = ‘आर्धधातुक’ संज्ञा (नाम) होती है।
- शेषः (प्रथमा विभक्ति एकवचन) = बचे हुए (प्रत्ययों) की।
२. सूत्र का संदर्भ (Context & Connection)
इस सूत्र को अच्छी तरह समझने के लिए इसके ठीक पहले वाले सूत्र “तिङ्शित्सार्वधातुकम्” (३.४.११३) को जानना आवश्यक है:
- तिङ्शित्सार्वधातुकम् का नियम है: सभी ‘तिङ्’ प्रत्यय (तिप्, तस्, झि…) और ‘शित्’ प्रत्यय (जिनमें ‘श्’ की इत् संज्ञा होती है, जैसे- शप्, श्यन्, श्नम्…) ‘सार्वधातुक‘ कहलाते हैं।
- इसके तुरंत बाद पाणिनि जी ने यह सूत्र दिया: “आर्धधातुकं शेषः”।
३. सरल अर्थ (Simple Meaning)
‘सार्वधातुक‘ प्रत्ययों (तिङ् और शित्) को छोड़कर, धातुओं से जुड़ने वाले जितने भी ‘शेष‘ (बचे हुए) प्रत्यय हैं, उन सब का नाम ‘आर्धधातुक‘ होता है।
सरल शब्दों में कहें तो यह एक पारिभाषिक (Elimination) सूत्र है। जो प्रत्यय ‘तिङ्’ (18 प्रत्यय) नहीं है और जो ‘शित्’ (जिसमें श् का लोप हो) नहीं है, वह सब अपने आप ही आर्धधातुक नाम वाला हो जाता है।
वर्गीकरण का ढाँचा (Chart):
धातु से लगने वाले प्रत्यय
│
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
▼ ▼
सार्वधातुक प्रत्यय आर्धधातुक प्रत्यय
(तिङ् प्रत्यय + शित् प्रत्यय) (तिङ् और शित् को छोड़कर “शेष”)
जैसे: तिप्, तस्, झि, शप्… जैसे: तुमुन्, क्त्वा, तव्यत्, अनीयर्, स्य…
४. उदाहरण (Examples)
परीक्षा में उत्तर को पुष्ट करने के लिए कृदन्त और तिङन्त दोनों प्रकार के उदाहरण लिखना आवश्यक है:
क) कृदन्त प्रत्ययों में उदाहरण:
जब हम पठ् धातु से तुमुन् या क्त्वा प्रत्यय लगाते हैं:
- पठ् + तुमुन् (पठितुम्) या पठ् + क्त्वा (पठित्वा)।
- यहाँ ‘तुमुन्’ और ‘क्त्वा’ न तो तिङ् प्रत्यय हैं और न ही इनमें ‘श्’ की इत् संज्ञा होती है।
- अतः “आर्धधातुकं शेषः” सूत्र से इनकी आर्धधातुक संज्ञा होती है।
ख) तिङन्त (लकार) प्रक्रिया में उदाहरण:
अभी पिछले सूत्र में आपने “स्यतासी लृलुटोः” से जो ‘स्य‘ और ‘तासि‘ प्रत्यय पढ़े थे:
- भविष्यत् काल में होने वाले स्य और तासि प्रत्यय भी न तो तिङ् हैं, न शित् हैं।
- इसलिए इस सूत्र से इनकी भी आर्धधातुक संज्ञा होती है।
५. आर्धधातुक संज्ञा का फल / महत्व (Why it Matters?)
व्याकरण में किसी प्रत्यय का नाम ‘आर्धधातुक’ रखने का सबसे बड़ा फायदा क्या है?
- इडागम (इट् का आगम – ‘इ‘ की मात्रा जुड़ना): अष्टाध्यायी का एक बहुत प्रसिद्ध सूत्र है— “आर्धधातुकस्येड्वलादेः” (७.२.३५)। यह कहता है कि यदि बाद में कोई ‘आर्धधातुक’ प्रत्यय हो (जो वल् प्रत्याहार से शुरू हो), तो धातु और प्रत्यय के बीच में ‘इट्‘ (इ) जुड़ जाता है।
- उदाहरण: पठ् + तुमुन् में तुमुन् की आर्धधातुक संज्ञा हुई, तभी बीच में ‘इ’ जुड़कर ‘पठितुम्‘ बना। यदि सार्वधातुक संज्ञा होती, तो यह ‘इ’ नहीं जुड़ पाता।
- इसके अलावा गुण और वृद्धि कार्य भी आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर होते हैं।
६.
- यह कैसा सूत्र है? यह एक संज्ञा सूत्र है जो ‘आर्धधातुक’ नाम रखता है।
- शॉर्टकट ट्रिक: तिङ् (धातु रूप के प्रत्यय) और शित् (विकरण) को छोड़ दें, तो कृदन्त के अधिकांश प्रत्यय (तव्यत्, अनीयर्, क्त, क्तवतु, शतृ-शgroup को छोड़कर बाकी) आर्धधातुक होते हैं।

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