ससजुषो रुः” पाणिनीय अष्टाध्यायी के आठवें अध्याय के दूसरे पाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधि सूत्र (Operational Rule) है (अष्टाध्यायी ८.२.६६)।

यह सूत्र संस्कृत व्याकरण की विसर्ग संधि और रुत्व संधि का आधार स्तंभ है। जब हम किसी पद के अंत में आने वाले ‘स्’ को विसर्ग (ः) में बदलते हैं, तो विसर्ग बनने की यात्रा में यह सूत्र सबसे पहला और मुख्य कदम होता है।

आइए इसे परीक्षा के दृष्टिकोण से पॉइंट-टू-पॉइंट और सरल भाषा में समझते हैं:

१. पदच्छेद (सूत्र के टुकड़े)

इस सूत्र में दो पद हैं:

  • ससजुषोः (स + सजुषोः $\rightarrow$ षष्ठी विभक्ति द्विवचन) = ‘स्’ (पदान्त सकार) और ‘सजुष्’ शब्द के।
  • रुः (प्रथमा विभक्ति एकवचन) = स्थान पर रु (र्) आदेश होता है।

२. अनुवृत्ति (पीछे से आने वाले पद)

इस सूत्र का पूरा अर्थ समझने के लिए पिछले सूत्रों से एक मुख्य पद की अनुवृत्ति आती है:

  • पदस्य (८.१.१६) सूत्र से ‘पदस्य’ का अधिकार यहाँ आता है, जिसका अर्थ है पद के अंत में”

३. सरल अर्थ (Simple Meaning)

यदि किसी पद (Word) के अंत में स्‘ (सकार) हो, या सजुष्शब्द का ष्‘ (षकार) हो, तो उसके स्थान पर रुआदेश हो जाता है।

इस ‘रु’ में से जो ‘उ’ है, उसकी उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल र् बचता है।

नियम का ढाँचा (Formula):

  1. पदान्त स् $\rightarrow$ रु $\rightarrow$ र्
  2. सजुष्का ष् $\rightarrow$ रु $\rightarrow$ र्

४. उदाहरण और रूप सिद्धि (Examples)

यह सूत्र किस तरह काम करता है, इसे दो प्रसिद्ध उदाहरणों से समझते हैं:

उदाहरण १: कविर्जयति (कविः + जयति)

  1. मूल स्थिति: कविस् + जयति (यहाँ ‘कविस्’ एक पद है और इसके अंत में ‘स्’ है)।
  2. सूत्र प्रवृत्ति: यहाँ ससजुषो रुः” सूत्र लगेगा क्योंकि पद के अंत में ‘स्’ आया है।
  3. यह सूत्र ‘स्’ को रु कर देगा $\rightarrow$ कवि + रु + जयति
  4. ‘रु’ के ‘उ’ का लोप होने पर केवल र् बचेगा $\rightarrow$ कवि + र् + जयति
  5. वर्ण संधान (मिलाने) करने पर रूप सिद्ध होगा $\rightarrow$ कविर्जयति

(यदि बाद में कोई वर्ण न हो या खर वर्ण हो, तो यही र्आगे जाकर विसर्ग बनता है, जैसे: कविस् $\rightarrow$ कविर $\rightarrow$ कविः)।

उदाहरण २: सजुष् (सजुष् शब्द का उदाहरण)

  1. मूल स्थिति: सजुष् + सुँ (प्रथमा एकवचन में) $\rightarrow$ प्रत्यय लोप होने पर पद बनता है: सजुष्
  2. सूत्र प्रवृत्ति: यह सूत्र स्पष्ट कहता है कि ‘सजुष्’ शब्द के अंत में आने वाले ‘ष्’ को भी रु आदेश होगा।
  3. ‘ष्’ के स्थान पर ‘रु’ हुआ $\rightarrow$ सजु + रु
  4. ‘उ’ का लोप होने पर र् बचा $\rightarrow$ सजुर्
  5. विराम की अवसान संज्ञा होकर ‘र्’ को विसर्ग (ः) हो जाता है और रूप सिद्ध होता है $\rightarrow$ सजुः

५. विसर्ग बनने की पूरी यात्रा (Exam Flowchart)

परीक्षा में परीक्षक को यह समझाने के लिए कि विसर्ग कैसे बनता है, आप इस क्रम को लिख सकते हैं:

 १. सकार (स्)

      ↓ [सूत्र: ससजुषो रुः]

 २. रुत्व (रु)

      ↓ [उ का लोप]

 ३. रेफ (र्)

      ↓ [सूत्र: खरवसानयोर्विसर्जनीयः]

 ४. विसर्ग (ः)

शॉर्ट ट्रिक: रामस् से रामः या हरिस् से हरिः बनाते समय बीच में जो रु‘ (र्) आता है, वह इसी सूत्र की देन है।

६. मुख्य बिंदु जो परीक्षा में अंक दिलाएंगे:

  • यह कैसा सूत्र है? यह एक विधि सूत्र है जो ‘रु’ आदेश करने का विधान करता है।
  • सजुष् शब्द का अर्थ: ‘सजुष्’ का अर्थ होता है ‘मित्र’ या ‘साथी’। पाणिनी जी ने इसे सूत्र में अलग से इसलिए पढ़ा क्योंकि यह सामान्य ‘स्’ के नियम में नहीं आ रहा था।

खरवसानयोर्विसर्जनीयः” पाणिनीय अष्टाध्यायी के आठवें अध्याय के तीसरे पाद का एक बेहद महत्वपूर्ण विधि सूत्र (Operational Rule) है (अष्टाध्यायी ८.३.१५)।

पिछले सूत्र में आपने जो ससजुषो रुः से रु‘ (र्) बनाया था, उसे अंतिम रूप से विसर्ग (ः) में बदलने का काम यही सूत्र करता है। संस्कृत व्याकरण में विसर्ग संधि का यह सबसे अंतिम और मुख्य सूत्र है।

आइए इसे परीक्षा के दृष्टिकोण से पॉइंट-टू-पॉइंट और सरल भाषा में समझते हैं:

१. पदच्छेद (सूत्र के टुकड़े)

इस सूत्र में दो पद हैं:

  • खरवसानयोः (खर् + अवसानयोः $\rightarrow$ सप्तमी विभक्ति द्विवचन) = ‘खर्’ प्रत्याहार का वर्ण परे (बाद में) होने पर, अथवा ‘अवसान’ (वाक्य या शब्द का अंत) होने पर।
  • विसर्जनीयः (प्रथमा विभक्ति एकवचन) = विसर्ग आदेश होता है। (व्याकरण शास्त्र में विसर्ग को ही विसर्जनीयकहा जाता है)

२. अनुवृत्ति (पीछे से आने वाले पद)

इस सूत्र में पिछले सूत्र से एक मुख्य पद की अनुवृत्ति आती है:

  • रोः (८.३.१४) सूत्र से ‘रोः’ (अर्थात् र्के स्थान पर) की अनुवृत्ति आती है।

३. सरल अर्थ (Simple Meaning)

यदि किसी पद के अंत में र्‘ (रेफ) हो, और उसके ठीक बाद या तो खर्प्रत्याहार का कोई वर्ण हो, या फिर कुछ भी न हो (अवसान हो), तो उस र्के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश हो जाता है।

इस सूत्र के प्रवृत्त होने की दो शर्तें हैं (इनमें से कोई भी एक पूरी होनी चाहिए):

  1. शर्त १ (खर् परे होने पर): पदान्त ‘र्’ + खर् वर्ण (वर्ग का १, २ अक्षर और श, ष, स) $\rightarrow$ विसर्ग (ः)
  2. शर्त २ (अवसान होने पर): पदान्त ‘र्’ + आगे कुछ भी न हो (Full Stop/End) $\rightarrow$ विसर्ग (ः)

खर् प्रत्याहार के वर्ण: ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स। (सरल शब्दों में: हर वर्ग का पहला और दूसरा अक्षर, और तीनों ‘श’)।

४. उदाहरण और रूप सिद्धि (Examples)

परीक्षा के लिए इसके दोनों प्रकार के उदाहरणों को लिखना आवश्यक है:

प्रकार क: अवसान (आगे कुछ न होने) का उदाहरण

जब हम सामान्य शब्द रूप लिखते हैं, जैसे वाक्य के अंत में केवल ‘राम’ या ‘हरि’ बोलना हो:

  1. स्थिति: रामस्
  2. ससजुषो रुः सूत्र से ‘स्’ को ‘रु’ (र्) हुआ $\rightarrow$ रामर्
  3. सूत्र प्रवृत्ति: यहाँ खरवसानयोर्विसर्जनीयः” सूत्र लगेगा, क्योंकि ‘रामर्’ के ‘र्’ के बाद आगे कोई भी वर्ण नहीं है (अवसान है)।
  4. यह सूत्र ‘र्’ को विसर्ग (ः) कर देगा $\rightarrow$ रामः

(इसी प्रकार: हरिर् $\rightarrow$ हरिः, गुरुर् $\rightarrow$ गुरुः)

प्रकार ख: खर्वर्ण परे (बाद में) होने का उदाहरण

जब संधि पद आ रहा हो और बाद में खर् वर्ण हो:

  1. स्थिति: रामर् + चिनोति
  2. यहाँ ‘र्’ के बाद आया है, जो ‘खर्’ प्रत्याहार का वर्ण है (च वर्ग का पहला अक्षर)।
  3. सूत्र प्रवृत्ति: यहाँ खरवसानयोर्विसर्जनीयः” सूत्र से ‘र्’ के स्थान पर विसर्ग हो जाएगा $\rightarrow$ रामः + चिनोति

(इसके बाद अग्रिम सूत्र विसर्जनीयस्य सःऔर स्तोः श्चुना श्चुःसे यह रामश्चिनोतिबनता है, लेकिन विसर्ग लाने का काम इसी सूत्र का है)

५. परीक्षा के लिए विशेष नोट (Counter Example)

यदि ‘र्’ के बाद ‘खर्’ वर्ण नहीं होगा (अर्थात् कोई स्वर या वर्ग का ३, ४, ५ वाँ अक्षर होगा), तो यह सूत्र विसर्ग नहीं करेगा। वहाँ ‘र्’ वैसा का वैसा ही रहेगा।

  • जैसे: कविर् + जयति $\rightarrow$ यहाँ ‘ज’ वर्ग का तीसरा अक्षर है, जो ‘खर्’ में नहीं आता। इसलिए यहाँ ‘र्’ को विसर्ग नहीं होगा और रूप कविर्जयति ही रहेगा।

६. क्विक एग्जाम समरी (Quick Exam Summary)

  • यह कैसा सूत्र है? यह एक विधि सूत्र है।
  • इसका मुख्य कार्य: पद के अंत में आने वाले ‘र्’ को ‘विसर्ग’ (ः) में बदलना।
  • शॉर्टकट ट्रिक: र् + खर् या विराम = विसर्ग (ः)

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