पाणिनीय अष्टाध्यायी में संज्ञा सूत्र उन सूत्रों को कहा जाता है जो व्याकरण शास्त्र की विशेष तकनीकी शब्दावली (Technical Terms) का नामकरण करते हैं। जैसे लोक में किसी का नाम ‘राम’ या ‘श्याम’ रखा जाता है, वैसे ही व्याकरण में विशेष वर्णों या पदों का नाम ‘गुण’, ‘वृद्धि’, ‘इत्’ या ‘नदी’ रखा जाता है।

परीक्षा की दृष्टि से अष्टाध्यायी के 10 सबसे महत्वपूर्ण संज्ञा सूत्र, उनके पदच्छेद, अर्थ और सरल उदाहरण की सूची नीचे दी गई है:

1. वृद्धि संज्ञा सूत्र — वृद्धिरादैच् (१.१.१)

  • पदच्छेद: वृद्धिः + आत् + ऐच्
  • अर्थ: ‘आत्’ (आ) और ‘ऐच्’ प्रत्याहार के वर्ण (ऐ, औ) की वृद्धि संज्ञा होती है।
  • वर्ण: आ, ऐ, औ (इन तीन वर्णों का नाम व्याकरण में ‘वृद्धि’ है)।
  • उदाहरण: शाला + ईशः = शालैशः (यहाँ ‘ऐ’ वृद्धि एकादेश है)।

2. गुण संज्ञा सूत्र — अदेङ्गुणः (१.१.२)

  • पदच्छेद: अत् + एङ् + गुणः
  • अर्थ: ‘अत्’ (ह्रस्व ‘अ’) और ‘एङ्’ प्रत्याहार के वर्ण (ए, ओ) की गुण संज्ञा होती है।
  • वर्ण: अ, ए, ओ (इन तीन वर्णों का नाम ‘गुण’ है)।
  • उदाहरण: उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः (यहाँ ‘ए’ गुण एकादेश है)।

3. संयोग संज्ञा सूत्र — हलोऽनन्तराः संयोगः (१.१.७)

  • पदच्छेद: हलः + अनन्तराः + संयोगः
  • अर्थ: जब दो या दो से अधिक ‘हल्’ (व्यंजन) वर्णों के बीच में कोई ‘अच्’ (स्वर) वर्ण न आए, तो उन व्यंजनों के आपस के जुड़ाव की संयोग संज्ञा होती है।
  • सरल शब्दों में: स्वरों के व्यवधान से रहित व्यंजनों को संयोग कहते हैं।
  • उदाहरण: महर्षि में ‘र्’ और ‘ष्’ के बीच कोई स्वर नहीं है, अतः यहाँ ‘र्ष्’ की संयोग संज्ञा है। इसी तरह इन्द्र में ‘न् + द् + र्’ का संयोग है।

4. अनुनासिक संज्ञा सूत्र — मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (१.१.८)

  • पदच्छेद: मुख-नासिका-वचनः + अनुनासिकः
  • अर्थ: जो वर्ण मुख और नासिका (नाक) दोनों की सहायता से एक साथ बोला जाता है, उसकी अनुनासिक संज्ञा होती है।
  • उदाहरण: वर्ग के पंचम वर्ण (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) तथा चन्द्रबिन्दु युक्त स्वर (अँ, इँ)।

5. सवर्ण संज्ञा सूत्र — तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१.१.९)

  • पदच्छेद: तुल्य-आस्य-प्रयत्नम् + सवर्णम्
  • अर्थ: जिन दो या दो से अधिक वर्णों का ‘आस्य’ (उच्चारण स्थान – जैसे कण्ठ, तालु आदि) और ‘अभ्यन्तर प्रयत्न’ आपस में समान (तुल्य) होते हैं, उनकी आपस में सवर्ण संज्ञा (Homogeneous terms) होती है।
  • उदाहरण: ‘अ’ और ‘आ’ दोनों का उच्चारण स्थान कण्ठ है और अभ्यन्तर प्रयत्न विवृत है, अतः ये दोनों आपस में सवर्णी हैं।

6. प्रगृह्य संज्ञा सूत्र — ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् (१.१.११)

  • पदच्छेद: ईत्-ऊत्-एत् + द्विवचनम् + प्रगृह्यम्
  • अर्थ: यदि कोई पद द्विवचन (Dual code) का हो और उसके अन्त में ‘ई’ (दीर्घ ई), ‘ऊ’ (दीर्घ ऊ) या ‘ए’ आता हो, तो उसकी प्रगृह्य संज्ञा होती है। प्रगृह्य होने का फल यह है कि वहाँ प्रकृतिभाव संधि होती है (कोई संधि कार्य नहीं होता)।
  • उदाहरण: हरी एतौ (हरी द्विवचन है और अन्त में ‘ई’ है, इसलिए संधि नहीं हुई, रूप ‘हरी एतौ’ ही रहेगा)।

7. इत् संज्ञा सूत्र — उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२)

  • पदच्छेद: उपदेशे + अच् + अनुनासिकः + इत्
  • अर्थ: पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि के ‘उपदेश’ (मूल शास्त्रों/सूत्रों) में जो भी अनुनासिक स्वर (अच्) होता है, उसकी इत् संज्ञा होती है। (इत् संज्ञा होने के बाद ‘तस्य लोपः’ से उसका लोप हो जाता है)।
  • उदाहरण: डुकृञ् (करणे) धातु में ‘ञ्’ की इत् संज्ञा होती है।
  • (नोट: व्यंजनों की इत् संज्ञा के लिए मुख्य सूत्र हलन्त्यम्” है।)

8. धातु संज्ञा सूत्र — भूवादयो धातवः (१.३.१)

  • पदच्छेद: भू-वा-आदयः + धातवः
  • अर्थ: ‘भू’ आदि शब्द-समुदाय जो क्रिया (Action) को प्रकट करते हैं, उनकी धातु संज्ञा होती है।
  • उदाहरण: भू, पठ्, गम्, लिख् आदि।

9. प्रातिपदिक संज्ञा सूत्र — अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१.२.४५)

  • पदच्छेद: अर्थवत् + अधातुः + अप्रत्ययः + प्रातिपदिकम्
  • अर्थ: धातु (Verb), प्रत्यय (Suffix) और प्रत्ययान्त (जिसके अंत में प्रत्यय लगा हो) को छोड़कर, जो भी अर्थवान‘ (Meaningful) शब्द रूप होते हैं, उनकी प्रातिपदिक संज्ञा (Noun stem) होती है। प्रातिपदिक होने के बाद ही सुँ-औ-जस् आदि सुप् प्रत्यय लगते हैं।
  • उदाहरण: राम, कृष्ण, लता, ज्ञान (ये मूल सार्थक शब्द हैं)।
  • (नोट: कृदन्त, तद्धित और समास शब्दों की प्रातिपदिक संज्ञा के लिए अगला सूत्र कृत्तद्धितसमासाश्च” है।)

10. पद संज्ञा सूत्र — सुप्तिङन्तं पदम् (१.१.४३ / १.४.१४)

  • पदच्छेद: सुप्-तिङ्-अन्तम् + पदम्
  • अर्थ: जिसके अन्त में ‘सुप्’ प्रत्यय (शब्द रूपों के 21 प्रत्यय – सु, औ, जस्…) लगे हों या ‘तिङ्’ प्रत्यय (धातु रूपों के 18 प्रत्यय – तिप्, तस्, झि…) लगे हों, उस पूरे शब्द-समुदाय की पद संज्ञा होती है।
  • विशेष नियम: संस्कृत का कठोर नियम है— अपदं न प्रयुञ्जीत” अर्थात् बिना पद बनाए किसी शब्द का प्रयोग वाक्य में नहीं किया जा सकता।
  • उदाहरण: ‘राम’ एक प्रातिपदिक है, जब इसमें ‘सु’ प्रत्यय लगा तो रामः बना, जो कि एक ‘पद’ है। इसी तरह ‘पठ्’ धातु से पठति पद बनता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश तालिका (Quick Revision Table)

संज्ञा का नामविधायक सूत्रक्या समझें?मुख्य उदाहरण
वृद्धिवृद्धिरादैच्आ, ऐ, औ वर्णों का नामशालैशः
गुणअदेङ्गुणःअ, ए, ओ वर्णों का नामउपेन्द्रः
संयोगहलोऽनन्तराः संयोगःबीच में स्वर न हो, ऐसे व्यंजनों का जुड़ावइन्द्र
सवर्णतुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्समान स्थान और प्रयत्न वाले वर्णअ = आ
प्रगृह्यईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्द्विवचन के अंत में ई, ऊ, ए होनाहरी एतौ
धातुभूवादयो धातवःक्रियावाची मूल शब्दभू, पठ्, गम्
प्रातिपदिकअर्थवदधातुरप्रत्ययःमूल सार्थक शब्द (बिना प्रत्यय का)राम, लता
पदसुप्तिङन्तं पदम्सुप् या तिङ् प्रत्यय लगा हुआ पूर्ण शब्दरामः, पठति

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