“अतो दीर्घो यञि” पाणिनीय अष्टाध्यायी के छठे अध्याय के पहले पाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधि सूत्र (Operational Rule) है (अष्टाध्यायी ६.१.१०१ / कुछ संस्करणों में ६.१.१०२)।
यह सूत्र मुख्य रूप से तिङन्त प्रक्रिया (धातु रूप/Verb forms) में रूप सिद्धि के समय दीर्घ (Long vowel) करने का कार्य करता है। परीक्षा के दृष्टिकोण से इसे सरल चरणों में समझते हैं:
१. पदच्छेद (सूत्र के टुकड़े)
इस सूत्र में तीन पद हैं:
- अतः (अत् $\rightarrow$ अतः) = ह्रस्व ‘अ’ (Short ‘a’) के स्थान पर।
- दीर्घः = दीर्घ आदेश (Long vowel) होता है (अर्थात् ‘अ’ का ‘आ’ हो जाता है)।
- यञि = ‘यञ्’ प्रत्याहार का वर्ण परे (बाद में) होने पर।
२. अनुवृत्ति (पीछे से आने वाले पद)
इस सूत्र का पूरा अर्थ समझने के लिए पिछले सूत्रों से कुछ पदों की सहायता (अनुवृत्ति) ली जाती है:
- ‘अङ्गस्य‘ (६.४.१) सूत्र से ‘अङ्गस्य’ पद आता है।
३. सरल अर्थ (Simple Meaning)
यदि किसी अङ्ग (Stem) के अंत में ह्रस्व ‘अ‘ (Short ‘a’) हो, और उसके ठीक बाद ‘यञ्‘ प्रत्याहार से शुरू होने वाला कोई प्रत्यय आ रहा हो, तो उस ह्रस्व ‘अ‘ के स्थान पर ‘दीर्घ‘ (आ) हो जाता है।
नियम का ढाँचा (Formula):
$$\text{अदन्त अङ्ग (अ)} + \text{यञ् प्रत्याहार का वर्ण (प्रत्यय)} \rightarrow \text{‘अ’ का ‘आ’ (दीर्घ)}$$
यञ् प्रत्याहार में कौन-से वर्ण आते हैं?
यञ् = य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ। (महेश्वर सूत्र के ‘हयवरट्’ के ‘य’ से लेकर ‘ञमङणनम्’ या ‘झभञ्’ के ‘ञ’ तक)। सामान्य रूप से धातु रूपों में ‘व‘ और ‘म‘ सबसे ज्यादा सामने आते हैं।
४. उदाहरण और रूप सिद्धि (Examples)
यह सूत्र सबसे ज्यादा लट् लकार (Present Tense) के उत्तम पुरुष (First Person) के रूपों को सिद्ध करने में काम आता है, जैसे— पठामि, पठावः, पठामः।
उदाहरण १: पठावः (पठ् धातु, उत्तम पुरुष, द्विवचन)
- स्थिति: पठ् + वस् (लट् लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन का प्रत्यय ‘वस्’)
- शप् आगम (विकरण): पठ् + अ + वस् $\rightarrow$ पठ (यह एक अदन्त अङ्ग है, जिसके अंत में ‘अ’ है)।
- अब स्थिति है: पठ + वस् (यहाँ प्रत्यय का पहला अक्षर ‘व‘ है, जो ‘यञ्’ प्रत्याहार में आता है)।
- सूत्र प्रवृत्ति: यहाँ “अतो दीर्घो यञि” सूत्र लगेगा, क्योंकि अङ्ग ‘पठ’ के अंत में ‘अ’ है और बाद में यञ् वर्ण ‘व’ है।
- यह सूत्र ‘पठ’ के ‘अ’ को ‘आ‘ (दीर्घ) कर देगा $\rightarrow$ पठा + वस्
- सकार को रुत्व-विसर्ग करने पर रूप सिद्ध होता है $\rightarrow$ पठावः।
उदाहरण २: पठामः (पठ् धातु, उत्तम पुरुष, बहुवचन)
- स्थिति: पठ् + मस् $\rightarrow$ शप् प्रत्यय होकर $\rightarrow$ पठ + मस्
- यहाँ बाद में ‘म‘ है, जो ‘यञ्’ प्रत्याहार में आता है।
- “अतो दीर्घो यञि” सूत्र से ‘पठ’ के ‘अ’ को दीर्घ ‘आ’ हुआ $\rightarrow$ पठा + मस्
- विसर्ग करने पर रूप सिद्ध हुआ $\rightarrow$ पठामः।
इसी प्रकार अन्य रूप:
- भवामि, भवावः, भवामः (भू धातु)
- गच्छामि, गच्छावः, गच्छामः (गम् धातु)
- लिखामि, लिखावः, लिखामः (लिख् धातु)
५. परीक्षा के लिए विशेष नोट (Counter Example)
यह सूत्र तभी लगेगा जब बाद वाला प्रत्यय ‘यञ्‘ वर्ण से शुरू हो। अगर प्रत्यय किसी और वर्ण से शुरू होगा, तो दीर्घ नहीं होगा।
- जैसे: पठ + ति (प्रथम पुरुष एकवचन) $\rightarrow$ यहाँ ‘त’ यञ् प्रत्याहार में नहीं आता, इसलिए यहाँ दीर्घ नहीं होता और रूप ‘पठति‘ ही रहता है (‘पठाति’ नहीं बनता)।
सारांश (Quick Summary)
एग्जाम में याद रखने की साधारण ट्रिक: “धातु रूप बनाते समय जब भी अन्त में ‘व‘ (वः) या ‘म‘ (मः/मि) आए, तो उससे पहले वाले ‘अ‘ को ‘आ‘ की मात्रा में बदल देना ही इस सूत्र का काम है।”

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