सदानन्द योगीन्द्र रचित वेदान्तसार में जब अज्ञान की समष्टि और व्यष्टि का वर्गीकरण किया जाता है, तो उसके साथ जुड़े शुद्ध चैतन्य के भिन्न-भिन्न रूपों का विवेचन आता है। वेदान्त की भाषा में ‘उपाधि’ (जैसे अज्ञान, शरीर या कोश) से युक्त या घिरे हुए चैतन्य को ‘उपहित चैतन्य’ (Associated/Conditioned Consciousness) कहा जाता है।
वेदान्तसार के अनुसार, यद्यपि मूल चैतन्य (आत्मा/ब्रह्म) एक और अखंड ही है, परन्तु अज्ञान की समष्टि-व्यष्टि और शरीरों की भिन्नता के कारण वह व्यावहारिक स्तर पर छह रूपों में प्रतिभासित होता है।
नीचे तदुपहित (उन उपाधियों से युक्त) चैतन्यों का पूर्ण निरूपण समष्टि और व्यष्टि के भेदों के साथ दिया गया है:
१. कारण शरीर से उपहित चैतन्य (Causal Level)
अज्ञान की मूल अवस्था (बीजावस्था) या आनन्दमय कोश से युक्त चैतन्य के दो रूप हैं:
समष्टि उपहित चैतन्य — ‘ईश्वर’:
उपाधि: शुद्ध सत्त्वप्रधान समष्टि अज्ञान।
स्वरूप: यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड के कारण रूप से जुड़ा चैतन्य है। यह सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला), सर्वेश्वर (सबका स्वामी), अन्तर्यामी (सबके भीतर रहने वाला) और जगत का साक्षात् नियन्ता है।
व्यष्टि उपहित चैतन्य — ‘प्राज्ञ’:
उपाधि: मलीन सत्त्वप्रधान (रज-तम मिश्रित) व्यष्टि अज्ञान।
स्वरूप: यह एक अकेले जीव का कारण चैतन्य है। मलीन उपाधि के कारण यह ‘अल्पज्ञ’ (कम जानने वाला) और ‘अनीश्वर’ (असमर्थ) प्रतीत होता है। यह सुषुप्ति काल में केवल अज्ञान की सूक्ष्म वृत्ति से आनंद का अनुभव करता है।
२. सूक्ष्म शरीर से उपहित चैतन्य (Subtle Level)
१७ अवयवों वाले सूक्ष्म शरीर (विज्ञानमय, मनोमय और प्राणमय कोश) से युक्त चैतन्य के दो रूप हैं:
समष्टि उपहित चैतन्य — ‘हिरण्यगर्भ’ (या सूत्रात्मा/प्राण):
उपाधि: ब्रह्माण्ड का समष्टि सूक्ष्म शरीर।
स्वरूप: इसे ‘सूत्रात्मा’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह धागे (सूत्र) की तरह मणियों के समान समस्त सूक्ष्म शरीरों में अनुस्यूत (पिरोया हुआ) रहता है। यह ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति से सम्पन्न ब्रह्माण्डीय मन और बुद्धि का प्रतीक है।
व्यष्टि उपहित चैतन्य — ‘तैजस’:
उपाधि: जीव का व्यक्तिगत व्यष्टि सूक्ष्म शरीर।
स्वरूप: इसे ‘तैजस’ (तेजस्वी/प्रकाशमय) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह बाह्य इन्द्रियों के शान्त होने पर केवल अन्तःकरण के प्रकाशमय मानस-संस्कारों (सपनों) का भोक्ता होता है।
३. स्थूल शरीर से उपहित चैतन्य (Gross Level)
पञ्चीकृत भूतों से बने दृश्य भौतिक शरीर (अन्नमय कोश) से युक्त चैतन्य के दो रूप हैं:
समष्टि उपहित चैतन्य — ‘विराट्’ (या वैश्वानर):
उपाधि: चौदह भुवनों (लोकों) से युक्त समष्टि स्थूल शरीर।
स्वरूप: यह ईश्वर का वह रूप है जिसका स्थूल शरीर यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड है (जैसे- सूर्य-चन्द्रमा जिसकी आँखें हैं, आकाश जिसका सिर है)। यह जाग्रत काल में समष्टिगत स्थूल प्रपञ्च का नियंत्रण और उपभोग करता है।
व्यष्टि उपहित चैतन्य — ‘विश्व’:
उपाधि: जीव का अपना व्यक्तिगत दृश्य भौतिक शरीर।
स्वरूप: यह जाग्रदवस्था में रहने वाला साधारण जीव है, जो अपनी अपनी आँखों, कानों और त्वचा आदि बाह्य इन्द्रियों के माध्यम से संसार के स्थूल विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप आदि) का भोग करता है।
तदुपहित चैतन्यों की वर्गीकरण तालिका
स्तर (Level)
उपाधि (कोश/शरीर)
समष्टि उपहित चैतन्य (Cosmic)
व्यष्टि उपहित चैतन्य (Individual)
कारण स्तर
आनन्दमय कोश (कारण शरीर)
ईश्वर (सर्वज्ञ)
प्राज्ञ (अल्पज्ञ)
सूक्ष्म स्तर
विज्ञान, मनो, प्राणमय (सूक्ष्म शरीर)
हिरण्यगर्भ / सूत्रात्मा
तैजस (स्वप्नभोक्ता)
स्थूल स्तर
अन्नमय कोश (स्थूल शरीर)
विराट् / वैश्वानर
विश्व (स्थूलभोक्ता)
उपहित चैतन्यों का परम सत्य: ‘शुद्ध चैतन्य’
सदानन्द योगीन्द्र इस निरूपण के अंत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक रहस्य प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार इन छह प्रकार के उपहित चैतन्यों को देखने से ऐसा लगता है कि चैतन्य बहुत सारे हैं, वैसे ही जैसे अलग-अलग बर्तनों में भरा हुआ पानी अलग-अलग दिखाई देता है।
परन्तु, यदि इन उपाधियों (अज्ञान और शरीरों) को हटाकर देखा जाए, तो समष्टि उपहित चैतन्य (ईश्वर) और व्यष्टि उपहित चैतन्य (जीव) में कोई वास्तविक अन्तर नहीं है।
शुद्ध चैतन्य (तुरीय): इन छहों उपहित चैतन्यों का जो मूल आधार है, जो अज्ञान की समष्टि और व्यष्टि दोनों से सर्वथा परे, निर्गुण, निराकार और अखंड है, उसे ही वेदान्त में ‘शुद्ध चैतन्य’ या ‘तुरीय’ कहा जाता है। वही एकमात्र परम सत्य ब्रह्म है। ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य इसी शुद्ध चैतन्य के स्तर पर जीव और ब्रह्म की पूर्ण एकता सिद्ध करता है।
 
 
 
 
सदानन्द योगीन्द्र रचित वेदान्तसार में अज्ञान की ‘विक्षेप शक्ति’ (Power of Projection) के कार्य के रूप में सृष्टिप्रक्रिया और पञ्चीकरण का अत्यंत वैज्ञानिक और क्रमिक विवेचन किया गया है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार यह सृष्टि वास्तविक (विवर्त) न होकर केवल ब्रह्म पर अज्ञान का पसारा है।
वेदान्तसार के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति अमूर्त (सूक्ष्म) से मूर्त (स्थूल) की ओर दो चरणों में होती है:
अपञ्चीकृत (सूक्ष्म) सृष्टि की उत्पत्ति
पञ्चीकृत (स्थूल) सृष्टि की उत्पत्ति (पञ्चीकरण)
१. सूक्ष्म सृष्टि की प्रक्रिया (The Subtle Creation)
सृष्टि के प्रारम्भ में विक्षेप शक्ति से युक्त अज्ञान से सबसे पहले पाँच सूक्ष्म भूत (जिन्हें ‘तन्मात्रा’ या अपञ्चीकृत महाभूत कहा जाता है) क्रमिक रूप से उत्पन्न होते हैं।
उत्पत्ति का क्रम:
विक्षेप शक्ति प्रधान अज्ञान से युक्त चैतन्य (ब्रह्म) से सबसे पहले आकाश उत्पन्न होता है। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है।
$$\text{अज्ञानोपहित ब्रह्म} \longrightarrow \text{आकाश} \longrightarrow \text{वायु} \longrightarrow \text{अग्नि} \longrightarrow \text{जल} \longrightarrow \text{पृथ्वी}$$
इन पाँचों सूक्ष्म भूतों के तीन गुण होते हैं— सत्त्व, रज और तम। इन्हीं गुणों से आगे चलकर हमारे सूक्ष्म शरीर (१७ अवयव) का निर्माण होता है:
सत्त्व गुण से: पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण) और अन्तःकरण (बुद्धि व मन) बनते हैं।
रज गुण से: पाँचों कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) और पाँच प्राण बनते हैं।
तम गुण से: तमोगुण की प्रधानता के कारण ये सूक्ष्म भूत स्थूलीकरण की ओर बढ़ते हैं, जिसे पञ्चीकरण कहा जाता है।
२. पञ्चीकरण प्रक्रिया (Quintuplication)
ये शुरुआत में उत्पन्न हुए पाँचों महाभूत ‘अपञ्चीकृत’ (सूक्ष्म) होते हैं। इनसे न तो दृश्य जगत बन सकता है और न ही हमारा भौतिक शरीर। इन्हें आँखों से देखने योग्य (स्थूल) बनाने के लिए जो मिश्रण की प्रक्रिया होती है, उसे ही पञ्चीकरण कहते हैं।
पञ्चीकरण का सिद्धान्त: प्रत्येक सूक्ष्म भूत को दो बराबर भागों में बांटा जाता है। फिर उसके दूसरे आधे भाग को पुनः चार बराबर भागों में बांटकर अन्य भूतों के आधे भागों में मिला दिया जाता है।


पञ्चीकरण की व्यावहारिक तालिका
इस गणितीय प्रक्रिया को नीचे दी गई तालिका से बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
निर्मित स्थूल भूत
आकाश का अंश
वायु का अंश
अग्नि का अंश
जल का अंश
पृथ्वी का अंश
१. स्थूल आकाश
1/2
1/8
1/8
1/8
1/8
२. स्थूल वायु
1/8
1/2
1/8
1/8
1/8
३. स्थूल अग्नि
1/8
1/8
1/2
1/8
1/8
४. स्थूल जल
1/8
1/8
1/8
1/2
1/8
५. स्थूल पृथ्वी
1/8
1/8
1/8
1/8
1/2
ध्यान देने योग्य बिंदु: स्थूल पृथ्वी में भी आधा हिस्सा पृथ्वी का ही है और शेष आधे में आकाश, वायु, अग्नि और जल मिले हुए हैं। चूंकि प्रत्येक स्थूल भूत में आधा भाग उसी का होता है, इसीलिए अधिकता के कारण उसका नाम वही रहता है (इसे शास्त्र में ‘वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः’ कहा गया है)।
पञ्चीकरण का परिणाम (स्थूल प्रपञ्च)
जब पञ्चीकरण की यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है, तब तमोगुण प्रधान अज्ञान के कार्य रूप में निम्नलिखित तत्वों का निर्माण होता है:
चौदह भुवन (लोक): ऊपर के सात लोक (भूर्, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) और नीचे के सात लोक (अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, पाताल)।
ब्रह्माण्ड: यह सम्पूर्ण दृश्य जगत।
चार प्रकार के स्थूल शरीर:
जरायुज (मनुष्य, पशु आदि – जो गर्भ से जन्म लेते हैं)
अण्डज (पक्षी, सर्प आदि – जो अण्डे से जन्म लेते हैं)
स्वेदज (जूँ, खटमल आदि – जो पसीने/गंदगी से जन्म लेते हैं)
उद्भिज्ज (पेड़-पौधे आदि – जो पृथ्वी को फाड़कर निकलते हैं)
निष्कर्ष
वेदान्तसार के अनुसार, इस पूरी सृष्टि प्रक्रिया और पञ्चीकरण को समझने का प्रयोजन संसार को सत्य सिद्ध करना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि यह सब अज्ञान का विवर्त (भ्रम) है। जब साधक विवेक द्वारा इस पञ्चीकृत संसार का बाध (निषेध) करता है, तो उसे समझ आता है कि नाम-रूप के पीछे केवल एक अखंड चैतन्य ब्रह्म ही सत्य है।
 
 

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