सदानन्द योगीन्द्र रचित वेदान्तसार में अद्वैत वेदान्त की प्रसिद्ध बोध-प्रक्रिया “अध्यारोपापवाद” का विस्तार से वर्णन किया गया है। ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को समझाने के लिए वेदान्त जिस पद्धति का आश्रय लेता है, उसकी पहली सीढ़ी ‘अध्यारोप’ है।
शास्त्र का सुप्रसिद्ध सिद्धान्त है:
“अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते।”
अर्थात— प्रपञ्च (संसार) से रहित शुद्ध ब्रह्म का बोध अध्यारोप और अपवाद की पद्धति से कराया जाता है।
अध्यारोप का लक्षण (परिभाषा)
वेदान्तसार में अध्यारोप का लक्षण इस प्रकार दिया गया है:
“असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद् वस्तुन्यवस्त्वारोपः अध्यारोपः।”
सरल अर्थ: जिस प्रकार जो वास्तव में सर्प (साँप) नहीं है, ऐसी रस्सी में ‘यह साँँप है’ ऐसा आरोप कर लिया जाता है, ठीक उसी प्रकार वस्तु (सत्य) में अवस्तु (असत्य) का आरोप करना ही अध्यारोप है।
यहाँ दो पदों को समझना अनिवार्य है:
वस्तु (The Reality): वेदान्त के अनुसार एकमात्र सच्चिदानन्द अद्वैत ब्रह्म ही ‘वस्तु’ है, क्योंकि वही त्रिकालबाधित (भूत, भविष्य, वर्तमान में न बदलने वाला) सत्य है।
अवस्तु (The Unreality): ब्रह्म को छोड़कर अज्ञान (अविद्या) से लेकर इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च (जगत) तक जितने भी नाम-रूप हैं, वे सब ‘अवस्तु’ हैं, क्योंकि वे परिवर्तनशील और मिथ्या हैं।
अध्यारोप की प्रक्रिया (उदाहरण सहित)
अध्यारोप को समझने के लिए वेदान्त का सबसे प्रिय उदाहरण ‘रज्जु-सर्प’ (रस्सी और साँप) का है:
लौकिक उदाहरण: मन्द प्रकाश (अँधेरे) में भूमि पर एक रस्सी पड़ी है। कोई राहगीर अज्ञानवश उस रस्सी के वास्तविक रूप को नहीं देख पाता और भयभीत होकर चिल्लाता है— “यहाँ साँप है!” यहाँ रस्सी सत्य (वस्तु) है, परन्तु अज्ञान के कारण उस पर मिथ्या साँप (अवस्तु) का आरोप हो गया है। इसी मानसिक क्रिया को अध्यारोप कहते हैं।
दार्शनिक समन्वय: इसी प्रकार, जीव माया या अज्ञान के कारण अपने मूल स्वरूप ‘परम ब्रह्म’ (वस्तु) को नहीं देख पाता। उस शुद्ध चैतन्य ब्रह्म पर ही वह मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, स्थूल शरीर और इस चराचर जगत (अवस्तु) का आरोप कर लेता है और स्वयं को संसारी, सुखी-दुःखी समझने लगता है।
अध्यारोप का मूल कारण: अज्ञान
यह अध्यारोप अपने आप नहीं होता, इसके पीछे अज्ञान (अविद्या) की दो शक्तियाँ काम करती हैं:
आवरण शक्ति (Power of Concealment): यह शक्ति सबसे पहले मूल वस्तु के स्वरूप को ढक देती है। (जैसे अँधेरा रस्सी के ‘रस्सीपन’ को ढक देता है; वैसे ही अज्ञान ब्रह्म के ‘सच्चिदानन्द स्वरूप’ को ढक देता है)।
विक्षेप शक्ति (Power of Projection): यह शक्ति ढकी हुई वस्तु पर किसी नई, असत्य वस्तु की रचना कर देती है। (जैसे रस्सी पर साँप की कल्पना; वैसे ही ब्रह्म पर इस नाम-रूपात्मक प्रपञ्च या संसार की सृष्टि)।
अध्यारोप की तालिका
पद
रज्जु-सर्प न्याय (उदाहरण)
वेदान्त सिद्धान्त (दार्शनिक पक्ष)
अधिष्ठान (आधार)
रज्जु (रस्सी)
सच्चिदानन्द ब्रह्म
आरोपित वस्तु
सर्प (साँप)
अज्ञान और नाम-रूपात्मक जगत
भ्रम का कारण
मन्द अन्धकार
मूल अज्ञान (माया)
परिणाम
भय, कम्पन और दुःख
जन्म-मरण का बन्धन, सुख-दुःख का भोग
निष्कर्ष
अध्यारोप वह स्थिति है जिसके कारण एक जीव मुक्त होते हुए भी स्वयं को बन्धन में महसूस करता है। वेदान्तसार में सृष्टि-प्रक्रिया (उत्पत्ति) का जितना भी वर्णन आता है— जैसे पञ्चतन्मात्राएँ, सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर और पञ्चीकरण— वह सब अध्यारोप के अंतर्गत ही आता है।
जब साधक इस अध्यारोप को समझ लेता है, तब विवेक के द्वारा इसका निवारण किया जाता है, जिसे ‘अपवाद’ (बाध या निषेध) कहते हैं, जिससे आत्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार होता है।

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