सदानन्द योगीन्द्र रचित वेदान्तसार में अज्ञान की विक्षेप शक्ति द्वारा निर्मित इस दृश्य जगत और जीव के व्यवहार को प्रपञ्च कहा गया है। इस प्रपञ्च के अंतर्गत जीव (चैतन्य) अज्ञान की उपाधियों के कारण तीन शरीरों को धारण करता है और तीन विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव करता है।
अद्वैत वेदान्त में इन तीनों अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—का विश्लेषण करके यह सिद्ध किया जाता है कि आत्मा इन सबमें रहते हुए भी इनसे पूरी तरह परे (तुरीय) है।
नीचे इन तीनों अवस्थाओं, उनसे जुड़े शरीरों और चैतन्य के स्वरूप का प्रपञ्चनिरूपण दिया गया है:
१. जाग्रदवस्था (The Waking State)
यह जीव की वह अवस्था है जिसमें वह बाह्य संसार के विषयों का अनुभव अपनी इन्द्रियों के माध्यम से करता है।
परिभाषा: स्थूल इन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों) के माध्यम से बाह्य विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के ज्ञान की अवस्था को जाग्रदवस्था कहते हैं।
सम्बद्ध शरीर: इस अवस्था में जीव स्थूल शरीर (अन्नमय कोश) का अभिमानी होता है।
चैतन्य के नाम:
व्यष्टि स्तर पर (Individual): जाग्रदवस्था का अनुभव करने वाले व्यक्तिगत चैतन्य को ‘विश्व’ कहते हैं। यह दाहिनी आँख में विशेष रूप से स्थित माना जाता है और स्थूल भोग भोगता है।
समष्टि स्तर पर (Cosmic): सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्थूल शरीर के अभिमानी सामूहिक चैतन्य को ‘विराट्’ या ‘वैश्वानर’ कहा जाता है।
२. स्वप्नावस्था (The Dream State)
जब बाह्य इन्द्रियाँ सो जाती हैं (शान्त हो जाती हैं), तब मन जाग्रत अवस्था में देखे और सुने गए विषयों के संस्कारों के आधार पर एक काल्पनिक संसार की रचना करता है।
परिभाषा: जाग्रत काल के संस्कारों से उत्पन्न, केवल अन्तःकरण (मन और बुद्धि) के माध्यम से होने वाले आन्तरिक विषयों के भोग की अवस्था को स्वप्नावस्था कहते हैं।
सम्बद्ध शरीर: इस अवस्था में जीव सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) का अभिमानी होता है, जिसके अंतर्गत विज्ञानमय, मनोमय और प्राणमय कोश आते हैं।
चैतन्य के नाम:
व्यष्टि स्तर पर: स्वप्नावस्था के सूक्ष्म प्रपञ्च का अनुभव करने वाले व्यक्तिगत चैतन्य को ‘तैजस’ कहते हैं (क्योंकि यह केवल प्रकाशमय या मानस-संस्कारों का भोक्ता होता है)।
समष्टि स्तर पर: समूचे ब्रह्मांड के सूक्ष्म शरीर के अभिमानी सामूहिक चैतन्य को ‘हिरण्यगर्भ’ या ‘सूत्रात्मा’ कहा जाता है।
३. सुषुप्त्यवस्था (The Deep Sleep State)
यह प्रगाढ़ निद्रा (बिना सपने वाली नींद) की अवस्था है, जहाँ मन और बुद्धि सहित सभी इन्द्रियाँ अपने मूल कारण यानी अज्ञान में लीन हो जाती हैं।
परिभाषा: जहाँ किसी भी प्रकार के विशेष ज्ञान या स्वप्न का अभाव होता है और बुद्धि अपने कारण-अज्ञान में विलीन हो जाती है, उसे सुषुप्त्यवस्था कहते हैं। यहाँ जीव केवल अज्ञान रूपी पर्दे के पीछे रहकर स्वरूपभूत सुख का अनुभव करता है (तभी जागने पर व्यक्ति कहता है— “मैं सुख से सोया, मुझे कुछ पता नहीं चला”)।
सम्बद्ध शरीर: इस अवस्था में जीव केवल कारण शरीर (आनन्दमय कोश) से युक्त होता है।
चैतन्य के नाम:
व्यष्टि स्तर पर: इस अवस्था के चैतन्य को ‘प्राज्ञ’ कहा जाता है। यह ज्ञानघन और आनंदभोक्ता होता है, परंतु अज्ञान से ढका रहता है।
समष्टि स्तर पर: समस्त ब्रह्मांड के कारण-शरीर रूपी अज्ञान के अभिमानी सर्वज्ञ चैतन्य को ‘ईश्वर’ कहा जाता है।
जाग्रदादि अवस्थाओं एवं शरीरों की संक्षेप तालिका
वेदान्तसार के इस प्रपञ्चनिरूपण को नीचे दी गई तालिका से अत्यंत सुगमता से समझा जा सकता है:
अवस्था (State)
शरीर (Body)
सम्बद्ध कोश (Sheaths)
व्यष्टि चैतन्य (Individual)
समष्टि चैतन्य (Cosmic)
भोग का स्वरूप
१. जाग्रत
स्थूल शरीर
अन्नमय कोश
विश्व
विराट् / वैश्वानर
स्थूल बाह्य विषय
२. स्वप्न
सूक्ष्म शरीर
विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय
तैजस
हिरण्यगर्भ / सूत्रात्मा
सूक्ष्म आन्तरिक संस्कार
३. सुषुप्ति
कारण शरीर
आनन्दमय कोश
प्राज्ञ
ईश्वर
अज्ञान मिश्रित आनन्द
विशेष बिन्दु (तुरीय चैतन्य): अद्वैत वेदान्त के अनुसार, इन तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) में जो चैतन्य अनुस्यूत (लगातार विद्यमान) रहता है, वह इन तीनों उपाधियों से सर्वथा मुक्त है। उसे ‘तुरीय’ (चौथा) या शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म कहा जाता है। इस प्रपञ्च का निरूपण केवल इसलिए किया गया है ताकि ‘अपवाद’ पद्धति द्वारा इसका निषेध करके जीव को उसके वास्तविक ‘तुरीय’ स्वरूप का बोध कराया जा सके।
 
 
 
सदानन्द योगीन्द्र रचित वेदान्तसार में अद्वैत वेदान्त के अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धान्त ‘समष्टि’ (Universal/Cosmic) और ‘व्यष्टि’ (Individual) के माध्यम से पञ्चकोश, तीन शरीर और उनसे जुड़े चैतन्य का विस्तृत निरूपण किया गया है।
ग्रन्थकार ने अज्ञान की इस व्यवस्था को समझाने के लिए ‘वन और वृक्ष’ (Forest and Tree) अथवा ‘जलाशय और जल-बिन्दु’ (Lake and Water drop) का सुप्रसिद्ध उदाहरण दिया है। जिस प्रकार बहुत से वृक्षों के समूह को समष्टि रूप में ‘वन’ कहा जाता है और एक अकेले वृक्ष को व्यष्टि रूप में ‘वृक्ष’ कहा जाता है, उसी प्रकार अज्ञान भी समष्टि और व्यष्टि भेद से दो प्रकार का है।
नीचे शरीरों में व्याप्त पञ्चकोशोपेत (पाँच कोशों से युक्त) अज्ञान की समष्टि और व्यष्टि का पूर्ण वैज्ञानिक और दार्शनिक निरूपण दिया गया है:
१. कारण शरीर (The Causal Body)
यह शरीरों की सबसे मूल और बीजावस्था है। यहाँ केवल अज्ञान (अविद्या) रहता है जो आत्मा के आनंद स्वरूप को ढके रहता है।
व्याप्त कोश: आनन्दमय कोश (सत्त्वप्रधान अज्ञान की वृत्ति, जो प्रिय, मोद, प्रमोद रूप भोगों का कारण है)।
समष्टि (Cosmic Level):
यह शुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान का सामूहिक रूप है।
इससे उपहित (जुड़े हुए) चैतन्य को ईश्वर कहते हैं। वह सर्वज्ञ, सर्वेश्वर और जगत का अन्तर्यामी नियन्ता है।
यहाँ समष्टि की सुषुप्ति (Deep Sleep) अवस्था होती है।
व्यष्टि (Individual Level):
यह मलीन सत्त्वप्रधान (रज-तम मिश्रित) अज्ञान का व्यक्तिगत रूप है।
इससे उपहित चैतन्य को प्राज्ञ कहते हैं। यह अविद्या के वशीभूत होने के कारण अल्पज्ञ (कम जानने वाला) होता है।
यहाँ व्यष्टि की सुषुप्ति अवस्था होती है।
२. सूक्ष्म शरीर (The Subtle Body)
जब अज्ञान की विक्षेप शक्ति सक्रिय होती है, तो १७ अवयवों (५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ प्राण, बुद्धि और मन) से युक्त सूक्ष्म शरीर प्रकट होता है। यह तीन कोशों में बंटा होता है:
व्याप्त कोशत्रय:
विज्ञानमय कोश: बुद्धि + ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (यह ज्ञानशक्तिमान ‘कर्ता’ रूप है)।
मनोमय कोश: मन + ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (यह इच्छाशक्तिमान ‘करण’ या साधन रूप है)।
प्राणमय कोश: ५ प्राण + ५ कर्मेन्द्रियाँ (यह क्रियाशक्तिमान ‘कार्य’ रूप है)।
समष्टि (Cosmic Level):
सम्पूर्ण ब्रह्मांड के सूक्ष्म शरीरों के सामूहिक रूप को समष्टि सूक्ष्म शरीर कहते हैं।
इससे उपहित चैतन्य को हिरण्यगर्भ, सूत्रात्मा या प्राण कहा जाता है, क्योंकि वह धागे की तरह सभी जीवों में पिरोया रहता है।
यहाँ समष्टि की स्वप्नावस्था (Dream State) होती है।
व्यष्टि (Individual Level):
एक अकेले जीव के व्यक्तिगत सूक्ष्म शरीर को व्यष्टि सूक्ष्म शरीर कहते हैं।
इससे उपहित चैतन्य को तैजस कहा जाता है, क्योंकि यह केवल प्रकाशमय आन्तरिक मानस-संस्कारों का अनुभव करता है।
यहाँ व्यष्टि की स्वप्नावस्था होती है।
३. स्थूल शरीर (The Gross Body)
सृष्टि प्रक्रिया में पञ्चीकरण (स्थूलीकरण) के बाद जो दृश्य भौतिक जगत और हमारा दिखाई देने वाला शरीर बनता है, वह स्थूल शरीर है।
व्याप्त कोश: अन्नमय कोश (माता-पिता के अन्न के रस से निर्मित और पोषित भौतिक देह)।
समष्टि (Cosmic Level):
समस्त ब्रह्मांड के दृश्य रूप और चौदह भुवनों (लोकों) का सामूहिक रूप समष्टि स्थूल शरीर है।
इससे उपहित चैतन्य को विराट् या वैश्वानर कहते हैं।
यहाँ समष्टि की जाग्रदवस्था (Waking State) होती है।
व्यष्टि (Individual Level):
किसी एक जीव का अपना व्यक्तिगत भौतिक शरीर व्यष्टि स्थूल शरीर है।
इससे उपहित चैतन्य को विश्व कहा जाता है, जो बाह्य जगत के स्थूल भोग भोगता है।
यहाँ व्यष्टि की जाग्रदवस्था होती है।
समष्टि एवं व्यष्टि का पूर्ण समन्वय (महा-तालिका)
वेदान्तसार के इस गूढ़ सिद्धान्त को पूरी स्पष्टता से समझने के लिए नीचे दी गई तालिका सर्वोत्तम है:
शरीर (Body)
व्याप्त कोश (Sheaths)
समष्टि पक्ष (Cosmic)
व्यष्टि पक्ष (Individual)
अवस्था (State)
१. कारण शरीर
आनन्दमय कोश
उपाधि: ईश्वर (सर्वज्ञ)
उपाधि: प्राज्ञ (अल्पज्ञ)
सुषुप्ति (Deep Sleep)
२. सूक्ष्म शरीर
विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय
उपाधि: हिरण्यगर्भ / सूत्रात्मा
उपाधि: तैजस
स्वप्न (Dream State)
३. स्थूल शरीर
अन्नमय कोश
उपाधि: विराट् / वैश्वानर
उपाधि: विश्व
जाग्रत (Waking State)
महावाक्य की दृष्टि से समष्टि-व्यष्टि का अभेद्त्व
सदानन्द योगीन्द्र इस निरूपण का उपसंहार करते हुए अद्वैत सिद्धान्त की परम सत्यता को प्रकट करते हैं:
“वन-वृक्षयोः जलाशय-जलविन्द्वोरिव वा समष्टिव्यष्ट्योः अभेदः।”
जिस प्रकार ‘वन’ और ‘वृक्ष’ में अथवा ‘जलाशय’ और उसकी एक ‘जल-बिन्दु’ में पानी के स्तर पर कोई अंतर नहीं होता, ठीक उसी प्रकार अज्ञान की समष्टि (ईश्वर/हिरण्यगर्भ/विराट्) और व्यष्टि (प्राज्ञ/तैजस/विश्व) में भी तत्वतः कोई भेद नहीं है।
उपाधियों के हटते ही दोनों ओर केवल एक ही अखंड, सच्चिदानन्द, निर्गुण और शुद्ध चैतन्य शेष रह जाता है। इसी अभेदत्व को वेदान्त का महावाक्य “तत्त्वमसि” (वह ब्रह्म तुम ही हो) सिद्ध करता है, जहाँ ‘तत्’ (समष्टि का वाचक) और ‘त्वम्’ (व्यष्टि का वाचक) लक्षणा द्वारा एक ही शुद्ध चैतन्य ब्रह्म का बोध कराते हैं।
 

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