सदानन्द योगीन्द्र रचित वेदान्तसार के अनुसार, किसी भी विषय या शास्त्र के अध्ययन से पूर्व यह निश्चित करना आवश्यक है कि उसका अधिकारी कौन है। अद्वैत वेदान्त का ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और गम्भीर है, इसलिए हर कोई इसका अधिकारी नहीं हो सकता।
वेदान्तसार में अधिकारी का लक्षण अत्यंत सुस्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है:
“अधिकारी तु विधिवदधीतवेदवेदाङ्गत्वेन आपातातः अधिगत-अखिलवेदार्थः अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा काम्यनिषिद्धवर्जनपुरःसरं नित्यनैमित्तिकप्रायश्चित्तोपासनानुष्ठानेन निर्गतनिखिलकल्मषतया नितान्तनिर्मलस्वान्तः साधनचतुष्टयसम्पन्नः प्रमाता।”
इस मूल लक्षण के आधार पर अधिकारी की योग्यताओं को तीन मुख्य भागों में समझा जा सकता है:
1. बौद्धिक एवं शास्त्रपरक योग्यता
वेद-वेदाङ्ग का अध्ययन: जिसने विधिपूर्वक (गुरुमुख से) वेदों और उनके छः अङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) का अध्ययन कर लिया हो।
वेदार्थ का सामान्य ज्ञान: जिसे वेदों के वास्तविक अर्थ और तात्पर्य का सामान्य रूप से बोध (आपाततः ज्ञान) हो चुका हो।
2. व्यावहारिक एवं मानसिक शुद्धता (कर्म और उपासना)
चित्त की शुद्धि के लिए अधिकारी को इस जन्म में या पूर्व जन्मों में कर्मों के अनुष्ठान और वर्जन की एक विशेष प्रक्रिया से गुजरना होता है:
वर्जनीय कर्म (जिन्हें छोड़ना है):
काम्य कर्म: स्वर्ग आदि सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कर्म (जैसे- ज्योतिष्टोम यज्ञ)। इन्हें छोड़ना होता है क्योंकि ये पुनर्जन्म का कारण बनते हैं।
निषिद्ध कर्म: नरक आदि अनिष्ट फल देने वाले शास्त्र-विरुद्ध कर्म (जैसे- ब्रह्महत्या या परनिन्दा)।
अनुष्ठेय कर्म (जिन्हें करना है):
नित्य कर्म: जिन्हें न करने से प्रत्यवाय (पाप) लगता है और करने से चित्त शुद्ध होता है (जैसे- सन्ध्यावन्दन)।
नैमित्तिक कर्म: जो किसी विशेष निमित्त या अवसर पर किए जाते हैं (जैसे- पुत्र जन्मोत्सव पर जातकर्मादि या श्राद्ध कर्म)।
प्रायश्चित्त कर्म: पूर्व में हुए पापों के क्षय के लिए किए जाने वाले कर्म (जैसे- चान्द्रायण व्रत)।
उपासना: मन को एकाग्र करने के लिए किए जाने वाले मानसिक व्यापार (जैसे- शाण्डिल्य विद्या या सगुण ब्रह्म का ध्यान)।
कर्मों का परिणाम: नित्य, नैमित्तिक और प्रायश्चित्त कर्मों से चित्त की शुद्धि (पापों का नाश) होती है, और उपासना से चित्त की एकाग्रता सिद्ध होती है। जब चित्त पूरी तरह निष्पाप और निर्मल हो जाता है, तब वह ज्ञान के योग्य बनता है।
3. साधन-चतुष्टय सम्पन्नता (आन्तरिक योग्यता)
चित्त शुद्ध और एकाग्र होने के बाद साधक में चार विशेष गुण प्रकट होते हैं, जिन्हें साधन-चतुष्टय कहा जाता है। वेदान्त का अधिकारी होने की यह सबसे अनिवार्य शर्त है:
                  ┌─────────────────────────────┐
                  │       साधन-चतुष्टय         │
                  └──────────────┬──────────────┘
         ┌──────────────┬────────┴──────┬──────────────┐
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     1. विवेक       2. वैराग्य    3. शमदमादि-षट्क   4. मुमुक्षुत्व
१. विवेक (नित्यानित्यवस्तुविवेक)
यह समझने की क्षमता कि केवल ‘ब्रह्म’ ही नित्य (सत्य) है और उसके अतिरिक्त यह सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च (संसार) अनित्य (क्षणिक/असत्य) है।
२. वैराग्य (इहामुत्रार्थफलभोगविराग)
इस लोक के भौतिक सुखों (जैसे- धन, स्त्री, मान-सम्मान) और परलोक के दिव्य सुखों (जैसे- स्वर्ग के भोग) की प्राप्ति की इच्छा का पूरी तरह से त्याग कर देना।
३. शमदमादि-षट्क सम्पत्ति
यह छह मानसिक और व्यावहारिक विधाओं का समूह है:
शम: श्रवण आदि वेदान्त साधनों के अतिरिक्त अन्य सभी अनात्म विषयों से मन को हटाकर उसे अन्तर्मुखी करना (मन का निग्रह)।
दम: बाह्य ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को उनके विषयों (रूप, रस, गन्ध आदि) से बलपूर्वक रोकना (इन्द्रिय निग्रह)।
उपरति: विषयों से हटाई गई इन्द्रियों का पुनः उन विषयों में न जाना, या विहित कर्मों का संन्यास कर लेना।
तितिक्षा: शीतोष्ण (सर्दी-गर्मी), सुख-दुःख, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को बिना किसी क्षोभ या शिकायत के सहन करना।
श्रद्धा: गुरु के उपदेशों और वेदान्त के वाक्यों (शास्त्र) में परम विश्वास रखना।
समाधान: निद्रा, आलस्य और विक्षेप को छोड़कर चित्त को केवल श्रवण, मनन आदि और ब्रह्म में एकाग्र करना।
४. मुमुक्षुत्व
संसार के जन्म-मरण और त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) के बन्धन से छूटकर मोक्ष प्राप्त करने की अत्यंत तीव्र इच्छा होना। जिस प्रकार आग से घिरे हुए व्यक्ति की इच्छा वहाँ से भागने की होती है, वैसी ही व्याकुलता मुक्ति के लिए होना।
निष्कर्ष (प्रमाता)
जब यह साधन-चतुष्टय सम्पन्न पुरुष निष्कपट भाव से गुरु के समीप जाता है, तब उसे ‘प्रमाता’ (यथार्थ ज्ञान को ग्रहण करने वाला सच्चा ज्ञाता) या वेदान्त का सच्चा अधिकारी कहा जाता है। ऐसा ही अधिकारी गुरु द्वारा दिए गए “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्यों के उपदेश को सुनकर आत्मसाक्षात्कार (जीव-ब्रह्म की एकता) करने में समर्थ होता है।
 
 
भारतीय दर्शन और विशेषकर अद्वैत वेदान्त की परम्परा में किसी भी गम्भीर ग्रन्थ अथवा शास्त्र को प्रारम्भ करने से पूर्व अनुबन्ध-चतुष्टय का निरूपण अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
सदानन्द योगीन्द्र ने अपने ग्रन्थ वेदान्तसार के आरम्भ में ही स्पष्ट किया है कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति (प्रेक्षावान् पुरुष) तब तक किसी विषय में प्रवृत्त नहीं होता, जब तक उसे यह न पता हो कि वह किसके लिए है, उसका विषय क्या है और उससे क्या लाभ होगा।
“तत्र अनुबन्धो नाम अधिकारी-विषय-सम्बन्ध-प्रयोजनानि।”
अर्थात— अनुबन्ध का तात्पर्य अधिकारी, विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन से है। इन चारों के समूह को ‘अनुबन्ध-चतुष्टय’ कहते हैं।
ये चारों तत्व आपस में एक-दूसरे से बंधे (अनुबद्ध) होते हैं, इसलिए इन्हें अनुबन्ध कहा जाता है। वेदान्तसार के अनुसार इनका विस्तृत विवेचन निम्नलिखित है:
1. अधिकारी (The Qualified Seeker)
अधिकारी वह व्यक्ति है जो इस शास्त्र के अध्ययन का वास्तविक पात्र है। वेदान्तसार के अनुसार, हर व्यक्ति इस परम ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। इसके लिए आन्तरिक और व्यावहारिक पात्रता अनिवार्य है।
लक्षण: जिसने विधिपूर्वक वेदों और वेदाङ्गों का अध्ययन कर लिया हो, जिसके पाप कर्म और उपासना के अनुष्ठान से नष्ट हो चुके हों, जिसका चित्त अत्यंत निर्मल और एकाग्र हो चुका हो, और जो साधन-चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, शमदमादि षट्कसम्पत्ति, और मुमुक्षुत्व) से सम्पन्न हो, वही इस शास्त्र का वास्तविक अधिकारी या ‘प्रमाता’ है।
2. विषय (The Subject Matter)
विषय का अर्थ है वह मुख्य प्रतिपाद्य तत्व जिसे इस ग्रन्थ के माध्यम से जाना या सिद्ध किया जाना है।
लक्षण: वेदान्तसार के अनुसार इस शास्त्र का मुख्य विषय जीव और ब्रह्म की एकता है।
स्पष्टीकरण: अज्ञान के कारण जो जीव स्वयं को ब्रह्म से अलग और संसारी (सुख-दुःख का भोगी) मानता है, उसे यह समझाना कि वास्तविक स्वरूप में वह शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ‘चैतन्य’ (ब्रह्म) ही है। यह शुद्ध चैतन्य ही वेदान्त का एकमात्र प्रतिपाद्य विषय है।
3. सम्बन्ध (The Relationship)
सम्बन्ध का अर्थ है विषय और शास्त्र (ग्रन्थ) के बीच का पारस्परिक जुड़ाव। वेदान्त में यह सम्बन्ध ‘प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव’ कहलाता है।
लक्षण: यहाँ वेदान्तशास्त्र ‘प्रतिपादक’ (बोध कराने वाला या समझाने वाला साधन) है, और ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ (शुद्ध चैतन्य) इसका ‘प्रतिपाद्य’ (समझा जाने वाला विषय) है।
जैसे किसी मार्गदर्शक (Guide) और लक्ष्य (Destination) के बीच बोधक और बोध्य का सम्बन्ध होता है, वैसे ही वेदान्त ग्रन्थ और ब्रह्मज्ञान के बीच सम्बन्ध है।
4. प्रयोजन (The Goal / Purpose)
प्रयोजन का अर्थ है वह अन्तिम फल या उद्देश्य जिसे प्राप्त करने के लिए अधिकारी इस शास्त्र का अध्ययन करता है। बिना प्रयोजन के कोई मन्द बुद्धि व्यक्ति भी किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता (“प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्त्तते” )।
लक्षण: वेदान्त का परम प्रयोजन है— “तदैक्यप्रमेयगताज्ञाननिवृत्तिः स्वस्वरूपानन्दावाप्तिश्च।”
स्पष्टीकरण:
अज्ञान की निवृत्ति: जीव और ब्रह्म की एकता के विषय में जो अज्ञान (मूल अविद्या) हृदय में बैठा है, उसका समूल नाश करना।
आनन्द की प्राप्ति: अज्ञान हटते ही अपने वास्तविक स्वरूपभूत परमानन्द (मोक्ष) का अनुभव करना।
अनुबन्ध-चतुष्टय की संक्षेप तालिका
अनुबन्ध
वेदान्तसार के अनुसार स्वरूप
सरल शब्दों में
१. अधिकारी
साधन-चतुष्टय सम्पन्न प्रमाता
योग्य अध्येता (Who)
२. विषय
जीव-ब्रह्म की अभिन्नता (शुद्ध चैतन्य)
मुख्य पाठ्य-वस्तु (What)
३. सम्बन्ध
प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव
शास्त्र और विषय का जुड़ाव (How)
४. प्रयोजन
अज्ञान की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति
अन्तिम फल या लक्ष्य (Why)
निष्कर्ष
इस प्रकार, वेदान्तसार का अनुबन्ध-चतुष्टय यह सिद्ध करता है कि जब एक साधन-चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी (अध्येता), प्रतिपाद्य-प्रतिपादक सम्बन्ध के माध्यम से इस ग्रन्थ को पढ़ता है, तो वह इसके मुख्य विषय (जीव-ब्रह्म की एकता) को जानकर अपने परम प्रयोजन (मोक्ष और दुःखनिवृत्ति) को सिद्ध कर लेता है।
 

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