भाग १: प्रमाण का लक्षण (Definition of Pramāṇa)

केशव मिश्र ने तर्कभाषा के मंगलाचरण के तुरंत बाद ‘प्रमाण’ का बहुत ही संक्षिप्त और अकाट्य लक्षण दिया है:

प्रमाकरणं प्रमाणम्।

अर्थात् प्रमा’ (यथार्थ ज्ञान) के ‘करण’ (असाधारण कारण) को प्रमाण कहते हैं। इस लक्षण को पूरी तरह समझने के लिए हमें इसके दो अंगों को समझना होगा— (क) प्रमा क्या है? और (ख) करण क्या है?

(क) प्रमा का स्वरूप (What is Pramā?)

न्यायदर्शन के अनुसार ज्ञान दो प्रकार का होता है— यथार्थ (सच्चा) और अयथार्थ (झूठा)। यथार्थ ज्ञान को ही शास्त्र में प्रमा’ कहा गया है। केशव मिश्र प्रमा का लक्षण इस प्रकार करते हैं:

  • यथार्थानुभवः प्रमा। * अर्थात् जो वस्तु जैसी है, उसका वैसा ही अनुभव होना ‘प्रमा’ है। जैसे— अंधकार में रखे घड़े को देखकर यह जानना कि “यह घड़ा है”, प्रमा है। इसके विपरीत, सीप में चांदी का भ्रम होना (शुक्तिका में रजत ज्ञान) ‘अप्रमा’ या अयथार्थ ज्ञान है।

(ख) करण का स्वरूप (What is Karaṇa?)

प्रमा को उत्पन्न करने वाले अनेक कारण होते हैं, लेकिन उनमें से जो सबसे मुख्य होता है, उसे ‘करण’ कहते हैं। केशव मिश्र के अनुसार:

  • साधकतमं करणम्।” (अथवा असाधारणं कारणं करणम्’)
  • जो कार्य की सिद्धि में साधकतम’ (सबसे अधिक सहायक या जिसके व्यापार के तुरंत बाद कार्य उत्पन्न हो जाए) हो, उसे करण कहते हैं। जैसे— कुल्हाड़ी से पेड़ काटने में कुल्हाड़ी ‘करण’ है।

निष्कर्ष: यथार्थ ज्ञान (प्रमा) को उत्पन्न करने वाले सबसे प्रधान और असाधारण साधन को ही प्रमाण कहा जाता है।

भाग २: कारणत्रय का विवेचन (Three Types of Causes)

चूँकि प्रमाण का लक्षण करते समय ‘कारण’ और ‘करण’ शब्द आए हैं, इसलिए केशव मिश्र कार्य-कारण सिद्धांत (Causation) को स्पष्ट करते हैं। वे सबसे पहले कारण का सामान्य लक्षण देते हैं:

  • यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत् कारणम्।”
  • अर्थात् जो कार्य की उत्पत्ति से पहले (पूर्वभाव) निश्चित रूप से विद्यमान हो (नियत) और जो अनन्यथासिद्ध (जिसके बिना कार्य हो ही न सके) हो, उसे कारण कहते हैं। जैसे— घट (घड़े) के प्रति मिट्टी और कुम्हार कारण हैं।

न्याय-वैशेषिक दर्शन के अनुसार कारण तीन प्रकार (कारणत्रय) के होते हैं:

१. समवायी कारण (Inherent/Material Cause)

  • लक्षण: यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत् समवायिकारणम्।”
  • अर्थ: जिस कारण में समवाय सम्बन्ध’ (नित्य या अटूट सम्बन्ध) से रहकर कार्य उत्पन्न होता है, उसे समवायी कारण कहते हैं। यह किसी भी वस्तु का उपादान (Material) कारण होता है।
  • उदाहरण: * तन्तु (धागे): ‘पट’ (कपड़े) के प्रति तन्तु समवायी कारण हैं, क्योंकि कपड़ा धागों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है। धागों से अलग कपड़े का कोई अस्तित्व नहीं है।
    • मिट्टी (मृत्तिका): ‘घट’ (घड़े) के प्रति मिट्टी समवायी कारण है।

२. असमवायी कारण (Non-inherent/Formal Cause)

  • लक्षण: यत् कार्येण वा कारणेन वा सह एकस्मिन्नर्थे समवेतत्त्वे सति जनकं तद् असमवायिकारणम्।”
  • अर्थ: जो कारण स्वयं तो कार्य नहीं होता, परन्तु समवायी कारण के भीतर समवाय सम्बन्ध से रहकर कार्य को उत्पन्न करने में सहायता करता है, उसे असमवायी कारण कहते हैं। यह मुख्य रूप से गुण या क्रिया के रूप में होता है।
  • उदाहरण:
    • तन्तु-संयोग (धागों का आपस में जुड़ना): ‘पट’ (कपड़े) के प्रति धागों का आपस में जुड़ना असमवायी कारण है। धागे (समवायी कारण) तब तक कपड़ा नहीं बन सकते जब तक वे आपस में संयोग न करें।
    • तन्तु-रूप (धागों का रंग): कपड़े के रंग (पट-रूप) के प्रति धागों का रंग असमवायी कारण है।

३. निमित्त कारण (Efficient/Instrumental Cause)

  • लक्षण: तदुभयभिन्नं कारणं निमित्तकारणम्।”
  • अर्थ: जो समवायी और असमवायी—इन दोनों कारणों से भिन्न (अलग) होता है, फिर भी कार्य को बनाने में अनिवार्य भूमिका निभाता है, उसे निमित्त कारण कहते हैं। यह कार्य का कर्ता या बनाने वाला साधन होता है।
  • उदाहरण:
    • वेमा, तुरी और जुलाहा: कपड़ा बनाने के लिए जुलाहा (कुविन्द), करघा (वेमा) और तुरी आदि निमित्त कारण हैं।
    • कुम्हार और चाक: घड़े को बनाने वाला कुम्हार (कर्ता) और उसका चाक निमित्त कारण हैं।

उत्तर का उपसंहार

इस प्रकार केशव मिश्र ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कार्य (जैसे प्रमा या यथार्थ ज्ञान) की उत्पत्ति के लिए इन तीनों कारणों का होना आवश्यक है। इनमें से जो सबसे उत्कृष्ट या असाधारण निमित्त कारण होता है, वही करण’ बनता है। चूँकि इन्द्रिय-सन्निकर्ष आदि प्रमा (ज्ञान) के प्रति असाधारण कारण (करण) हैं, इसलिए उन्हें प्रमाण’ कहा जाता है।

१. कारण का सामान्य लक्षण (Definition of Cause)

केशव मिश्र ने ‘तर्कभाषा’ में कारण का प्रामाणिक लक्षण इस प्रकार दिया है:

यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत् कारणम्।”

इस लक्षण के अनुसार किसी भी वस्तु को कारण बनने के लिए तीन अनिवार्य शर्तों को पूरा करना पड़ता है:

  • १. पूर्वभाव (Antecedence): कारण को कार्य की उत्पत्ति से पहले विद्यमान होना चाहिए। जो कार्य के बाद आए, वह कारण नहीं हो सकता।
  • २. नियतपूर्वभाव (Invariable Antecedence): वह पूर्वभाव ‘नियत’ (हमेशा होने वाला) होना चाहिए। ऐसा नहीं कि कभी हो और कभी न हो। जैसे- घड़ा बनने से पहले कुम्हार का होना नियत है।
  • ३. अनन्यथासिद्धत्व (Unconditional/Necessary): वह पूर्वभाव ‘अन्यथासिद्ध’ (फालतू या अप्रासंगिक) नहीं होना चाहिए। अर्थात् जिसके बिना कार्य का होना वैज्ञानिक रूप से असम्भव हो। (जैसे- कुम्हार का गधा भी घड़ा बनने से पहले खड़ा रहता है, पर वह अन्यथासिद्ध है, इसलिए कारण नहीं है)।

२. कारण के त्रिविध भेद (Three Types of Causes)

तर्कभाषाकार के अनुसार कारण तीन प्रकार के होते हैं। न्याय-वैशेषिक दर्शन का पूरा कार्य-कारण सिद्धांत इन्हीं तीन पर टिका है:

क. समवायी कारण (Inherent Cause)

  • लक्षण: यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत् समवायिकारणम्।”
  • सरल अर्थ: जिस वस्तु में समवाय सम्बन्ध (Inseparable Relation) से रहकर कार्य उत्पन्न होता है, उसे समवायी कारण कहते हैं। यह द्रव्य रूप में ही होता है।
  • शास्त्रीय उदाहरण: तन्तु (धागे) – पट (कपड़े) के प्रति। कपड़ा हमेशा अपने धागों के भीतर ही समवाय सम्बन्ध से पैदा होता है और वहीं रहता है। धागों के नष्ट होते ही कपड़ा स्वतः नष्ट हो जाता है।
  • अन्य उदाहरण: मिट्टी (घट के प्रति), स्वर्ण (कुण्डल के प्रति)।

ख. असमवायी कारण (Non-inherent Cause)

  • लक्षण: यत् कार्येण वा कारणेन वा सह एकस्मिन्नर्थे समवेतत्त्वे सति जनकं तद् असमवायिकारणम्।”
  • सरल अर्थ: जो कारण स्वयं समवायी कारण के भीतर समवाय सम्बन्ध से रहता है और कार्य को उत्पन्न करने में साक्षात् मदद करता है। यह हमेशा कोई गुण या क्रिया होती है, द्रव्य नहीं।
  • शास्त्रीय उदाहरण: तन्तु-संयोग (धागों का आपसी जुड़ाव) – पट के प्रति। धागे अकेले रखे रहें तो कपड़ा नहीं बनेगा, जब वे आपस में क्रिया करके जुड़ते हैं (संयोग गुण), तब कपड़ा बनता है। यह संयोग धागों (समवायी कारण) के भीतर रहता है।
  • अन्य उदाहरण: कपाल-संयोग (घड़े के दो टुकड़ों का जुड़ना – घट के प्रति)।

ग. निमित्त कारण (Efficient Cause)

  • लक्षण: तदुभयभिन्नं कारणं निमित्तकारणम्।”
  • सरल अर्थ: जो समवायी और असमवायी दोनों से बिल्कुल अलग होता है, लेकिन जिसके बिना कार्य की शुरुआत या निर्माण सम्भव ही नहीं है। इसमें कार्य को बनाने वाला कर्ता, उसके औजार और इच्छा शामिल हैं।
  • शास्त्रीय उदाहरण: तुरी, वेमा (करघा) और कुविन्द (जुलाहा) – पट के प्रति। जुलाहा अपनी बुद्धि और करघे की मदद से धागों को कपड़े का रूप देता है।
  • अन्य उदाहरण: कुम्हार, दण्ड, चाक (घट के प्रति)।

उत्तर का तार्किक निष्कर्ष (Conclusion)

इस प्रकार तर्कभाषा के अनुसार कारण की अवधारणा केवल एक पूर्ववर्ती वस्तु मात्र नहीं है, बल्कि वह कार्य की उत्पत्ति की नियत और तार्किक आवश्यकता है। परीक्षा में जब भी यह प्रश्न आए, तो पट (कपड़ा) और तन्तु का उदाहरण देकर तीनों भेदों को एक साथ घटित करके अवश्य दिखाएं, जिससे उत्तर अत्यंत स्पष्ट और प्रामाणिक प्रतीत होता है।

सरल शब्दों में, प्रामाण्यवाद का अर्थ है— जब हमें कोई ज्ञान होता है, तो वह ज्ञान सच्चा (प्रामाणिक) है या झूठा (अप्रामाणिक), इसका पता कैसे चलता है?” इस विषय को लेकर मुख्य रूप से न्याय दर्शन और मीमांसा दर्शन के बीच महा-संग्राम है। आइए इसे परीक्षा के प्रारूप के अनुसार बहुत ही स्पष्ट और तार्किक ढंग से समझते हैं।

१. प्रामाण्यवाद का मूल विभाजन (Core Classification)

प्रामाण्यवाद की विवेचना दो दृष्टिकोणों से की जाती है:

  1. उत्पत्तिवाद (Genesis): ज्ञान में प्रामाणिकता (सच्चाई) पैदा कैसे होती है? क्या वह ज्ञान के साथ ही पैदा होती है या किसी बाहरी कारण से?
  2. ज्ञप्तिवाद (Cognition/Discovery): हमें उस प्रामाणिकता का पता (निश्चय) कैसे चलता है? क्या मन ज्ञान होते ही उसे स्वतः सच्चा मान लेता है या हमें कोई टेस्ट (परीक्षा) करना पड़ता है?

इन्हीं दो आधारों पर भारतीय दर्शन में दो मुख्य विचारधाराएं बनी हैं:

  • स्वतःप्रामाण्यवाद (Intrinsic Validity): इसे मीमांसक मानते हैं।
  • परतःप्रामाण्यवाद (Extrinsic Validity): इसे नैयायिक (तर्कभाषाकार) मानते हैं।

२. मीमांसा दर्शन का मत: स्वतःप्रामाण्यवाद (Intrinsic View)

मीमांसकों (कुमारिल भट्ट और प्रभाकर) का कहना है कि ज्ञान स्वभाव से ही सच्चा होता है।

  • उत्पत्ति में स्वतः: ज्ञान को पैदा करने वाली जो सामग्री है (जैसे आँख और घड़ा), वही ज्ञान में सच्चाई भी पैदा कर देती है। उसके लिए किसी बाहरी गुण की ज़रूरत नहीं है।
  • ज्ञप्ति में स्वतः: जैसे ही हमें कोई ज्ञान होता है, हमारा मन उसे तुरंत सच्चा मान लेता है। हमें कोई संशय नहीं होता। (जैसे— आपने सामने पानी देखा, तो बुद्धि ने तुरंत मान लिया कि वह पानी है)।
  • अप्रामाण्य परतः: मीमांसक कहते हैं कि ज्ञान में झूठ (अप्रामाण्य) बाहरी कारणों (जैसे आँख का दोष या अंधेरा) से आता है। जब तक कोई दोष सिद्ध न हो, तब तक हर ज्ञान स्वतः प्रामाणिक है।

३. न्याय दर्शन (तर्कभाषा) का मत: परतःप्रामाण्यवाद (Extrinsic View)

केशव मिश्र मीमांसकों के मत का खण्डन करते हुए न्याय के परतःप्रामाण्यवाद’ की स्थापना करते हैं। न्यायशास्त्र के अनुसार ज्ञान न तो स्वतः पैदा होता है और न ही स्वतः जाना जाता है। इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं:

(क) उत्पत्ति में परतः (Extrinsic in Genesis)

न्याय के अनुसार केवल सामान्य ज्ञान-सामग्री से काम नहीं चलता। ज्ञान को सच्चा (प्रामाणिक) होने के लिए कारणों में एक विशेष गुण’ (Excellence) होना अनिवार्य है।

  • यदि कारणों में दोष होगा, तो अप्रमा (भ्रम) पैदा होगी।
  • यदि कारणों में गुण’ होगा, तभी प्रमा (सच्चा ज्ञान) पैदा होगी।
  • उदाहरण: पीलिया (Jaundice) के रोगी को शंख पीला दिखता है। यहाँ आँख (कारण) में दोष है। जब आँख पूरी तरह स्वस्थ (गुणयुक्त) होगी, तभी शंख का सफेद और वास्तविक ज्ञान पैदा होगा। अतः प्रामाण्य बाहरी ‘गुण’ से पैदा होने के कारण परतः है।

(ख) ज्ञप्ति में परतः (Extrinsic in Cognition)

यह न्यायदर्शन का सबसे व्यावहारिक पक्ष है। नैयायिक कहते हैं कि ज्ञान होते ही हमें तुरंत यह नहीं पता चल जाता कि वह १००% सच है। अगर ऐसा होता, तो दुनिया में कभी कोई भ्रम या रेगिस्तान में मृगतृष्णा (Mirage) नहीं होती।

  • ज्ञान की सच्चाई का निश्चय हमेशा सफल प्रवृत्ति’ (Successful Action/Pragmatic Verification) के बाद होता है।

न्याय की तार्किक प्रक्रिया (The Verification Chain):

  1. ज्ञान: आपने दूर एक गड्ढे में चमकता हुआ जल देखा।
  2. संशय: “क्या वहाँ सचमुच पानी है या केवल रेत चमक रही है?” (यदि ज्ञप्ति स्वतः होती, तो यह संशय कभी नहीं आता)।
  3. प्रवृत्ति: आप पानी पीने के लिए उस गड्ढे की ओर आगे बढ़ीं।
  4. अर्थक्रियास्थिति (सफलता): आपने वहाँ पहुँचकर पानी पिया और आपकी प्यास बुझ गई।
  5. अनुमान द्वारा निश्चय: प्यास बुझने के बाद आपके मन में यह अनुमान जागता है— यह ज्ञान सच्चा था, क्योंकि इसने मेरी प्यास बुझाई (सफल प्रवृत्ति कराई)”

अतः सिद्ध हुआ कि ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः नहीं, बल्कि बाहरी क्रिया की सफलता (अनुमान) से जाना जाता है, इसलिए यह परतः ज्ञायते’ है।

केशव मिश्र ने ‘तर्कभाषा’ में प्रत्यक्ष प्रमाण (Perception) की विवेचना अत्यंत वैज्ञानिक और क्रमिक ढंग से की है। आइए इसे एक आदर्श विश्वविद्यालयीय उत्तर के रूप में विस्तृत और बिंदुवार रूप से समझते हैं।

१. प्रत्यक्ष का मूल लक्षण (Definition of Pratyaksha)

केशव मिश्र ने न्यायसूत्रकार महर्षि गौतम के मत का अनुसरण करते हुए प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण दो स्तरों पर किया है— पहले प्रमाण के रूप में और फिर ज्ञान के रूप में।

(क) प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण

अक्षस्य अक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः प्रत्यक्षम्।”

अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय की अपने-अपने अनुकूल विषय के साथ जो वृत्ति’ (व्यापार या सन्निकर्ष) होती है, उसे प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं।

इसे ग्रन्थकार ने और अधिक प्राविधिक (Technical) करते हुए लिखा है:

साक्षात्प्रमाकरणं प्रत्यक्षम्।”

अर्थात् साक्षात् (Axiomatic/Direct) यथार्थ ज्ञान (प्रमा) के असाधारण कारण (करण) को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। अनुमान या शब्द प्रमाण में ज्ञान किसी ‘लिङ्ग’ (धुएँ) या ‘शब्द’ के माध्यम से घूमकर होता है, परन्तु प्रत्यक्ष में इन्द्रिय और विषय का सीधा आमना-सामना होता है, इसलिए इसे ‘साक्षात्’ कहा गया है।

(ख) प्रत्यक्ष प्रमा (ज्ञान) का लक्षण

इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्।”

अर्थात् इन्द्रिय (Sense Organ) और अर्थ (Object/विषय) के सन्निकर्ष (भौतिक संपर्क) से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमा कहते हैं।

२. प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद (Two Stages of Perception)

केशव मिश्र के अनुसार जब इन्द्रिय और विषय का सन्निकर्ष होता है, तो प्रत्यक्ष ज्ञान एक क्षण में नहीं होता, बल्कि उसके दो क्रमिक चरण होते हैं:

१. निर्विकल्पक प्रत्यक्ष (Indeterminate Perception)

  • स्वरूप: यह प्रत्यक्ष का प्रथम क्षण है। जब इन्द्रिय विषय से टकराती है, तो वस्तु का एक धुंधला या प्रारंभिक ज्ञान होता है, जिसमें वस्तु का नाम, जाति या गुण स्पष्ट नहीं होते।
  • लक्षण: नामजात्यादियोजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि ज्ञानं निर्विकल्पकम्।”
  • उदाहरण: जैसे घने अंधकार में या अचानक किसी वस्तु पर आँख पड़ने पर केवल इतना आभास होना कि— कुछ है” (इदं किञ्चित्)। इसमें “यह घट है” या “यह नील वर्ण का है”, ऐसा कोई विशेष ज्ञान नहीं होता। यह ज्ञान गूढ़ और अव्यक्त होता है।

२. सविकल्पक प्रत्यक्ष (Determinate Perception)

  • स्वरूप: यह प्रत्यक्ष का द्वितीय क्षण है। इसमें निर्विकल्पक ज्ञान के तुरंत बाद बुद्धि वस्तु के नाम, गुण और जाति का विश्लेषण करके एक निश्चित रूप देती है।
  • लक्षण: नामजात्यादिसहितं वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानं सविकल्पकम्।”
  • उदाहरण: जैसे वस्तु को साफ़ प्रकाश में देखकर यह निश्चित ज्ञान होना कि— यह देवदत्त है”, यह ब्राह्मण है”, या यह घट है”। यह ज्ञान सशब्द और व्यावहारिक होता है।

३. षड्विध सन्निकर्ष (Six Types of Sense-Object Contacts)

प्रत्यक्ष प्रमाण की असली रीढ़ इसके छह सन्निकर्ष (Six Connections) हैं। इन्द्रियाँ द्रव्य, गुण और अभाव को अलग-अलग सम्बन्धों से देखती हैं। केशव मिश्र ने इन छहों को बहुत सुंदर ढंग से समझाया है:

  • १. संयोग सन्निकर्ष (Conjunction): जब दो द्रव्यों का साक्षात् भौतिक जुड़ाव हो।
    • उदाहरण: चक्षुषा घटप्रत्यक्षम् (आँख से घड़े को देखना)। यहाँ आँख भी द्रव्य है और घड़ा भी द्रव्य है।
  • २. संयुक्त-समवाय सन्निकर्ष (Inherence in the Conjoined): जो वस्तु संयुक्त है, उसके भीतर समवाय सम्बन्ध से रहने वाली चीज़ को देखना।
    • उदाहरण: घटगत-रूप-प्रत्यक्षम् (घड़े के लाल या नील रंग को देखना)। आँख घड़े से ‘संयुक्त’ होती है, और रंग घड़े में ‘समवाय’ सम्बन्ध से रहता है।
  • ३. संयुक्त-समवेत-समवाय सन्निकर्ष (Inherence in the Inherent of the Conjoined): संयुक्त वस्तु के समवेत् भाग में रहने वाली जाति को देखना।
    • उदाहरण: घटरूपगत-रूपत्व-जाति-प्रत्यक्षम् (घड़े के रंग में रहने वाली ‘रूपत्व’ जाति को देखना)।
  • ४. समवाय सन्निकर्ष (Inherence): जहाँ सम्बन्ध स्वयं नित्य हो।
    • उदाहरण: श्रोत्रेण शब्दप्रत्यक्षम् (कान से शब्द को सुनना)। न्याय के अनुसार कान का पर्दा ‘आकाश’ है और शब्द आकाश का गुण है, जो उसमें ‘समवाय’ सम्बन्ध से रहता है।
  • ५. समवेत-समवाय सन्निकर्ष (Inherence in the Inherent): समवाय सम्बन्ध से रहने वाली वस्तु की जाति को सुनना।
    • उदाहरण: शब्दगत-शब्दत्व-जाति-प्रत्यक्षम् (कान से ‘शब्दत्व’ जाति को सुनना)।
  • ६. विशेषण-विशेष्यभाव सन्निकर्ष (Qualifier and Qualified Relation): यह सबसे विशिष्ट सन्निकर्ष है जो अभाव’ को देखता है।
    • उदाहरण: भूतले घटाभाव-प्रत्यक्षम् (ज़मीन पर घड़े के न होने को देखना)। यहाँ खाली ज़मीन विशेष्य है और घड़े का अभाव उसका विशेषण है।

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