संस्कृत व्याकरण (पाणिनीय अष्टाध्यायी) के अनुसार “रामः” शब्द की रूपसिद्धि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) निम्नलिखित चरणों में होती है:

1. प्रातिपदिक संज्ञा (शब्द का मूल रूप तय करना)

“राम” शब्द ‘रमुँ क्रीडायाम्’ धातु से ‘हलश्च’ सूत्र द्वारा ‘घञ्’ प्रत्यय लगाकर बनता है। कृत प्रत्यय अन्त में होने के कारण यह कृदन्त है।

  • सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च (१-२-४६)
  • कार्य: इस सूत्र से “राम” की प्रातिपदिक संज्ञा होती है।

2. प्रत्यय विधान (विभक्ति लाना)

  • सूत्र: ज्ञाप्प्रातिपदिकात् (४-१-१), प्रत्ययः (३-१-१), परश्च (३-१-२) तथा स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् (४-१-२)
  • कार्य: प्रातिपदिक “राम” से परे स्वादि २१ प्रत्ययों की प्राप्ति होती है।

3. विभक्ति एवं वचन निर्धारण

  • सूत्र: सुपः (१-४-१०३) और द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१-४-२२)
  • कार्य: प्रथमा विभक्ति, एकवचन की विवक्षा (इच्छा) में २१ प्रत्ययों में से केवल ‘सु’ प्रत्यय आता है।
  • स्थिति: राम + सु

4. अनुबन्ध लोप (प्रत्यय को शुद्ध करना)

  • सूत्र: उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१-३-२) और तस्य लोपः (१-३-९)
  • कार्य: ‘सु’ प्रत्यय के उकार (उ) की इत् संज्ञा होती है और उसका लोप हो जाता है। केवल ‘स्’ शेष बचता है।
  • स्थिति: राम + स्

5. पद संज्ञा

  • सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१-४-१४)
  • कार्य: सुप् प्रत्यय अन्त में होने के कारण “रामस्” की पद संज्ञा होती है (क्योंकि पद बने बिना शब्द का प्रयोग भाषा में नहीं हो सकता)।

6. रुत्व विधान (स् को र् करना)

  • सूत्र: ससजुषो रुः (८-२-६६)
  • कार्य: पद के अन्त में स्थित ‘स्’ को ‘रु’ (रुँ) आदेश होता है।
  • स्थिति: राम + रु

7. पुनः अनुबन्ध लोप

  • सूत्र: उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१-३-२) और तस्य लोपः (१-३-९)
  • कार्य: ‘रु’ के उकार की पुनः इत् संज्ञा और लोप होता है। केवल ‘र्’ (रेफ) शेष बचता है।
  • स्थिति: राम + र्

8. अवसान संज्ञा और विसर्ग (अन्तिम चरण)

  • सूत्र: विरामोऽवसानम् (१-४-११०)
  • कार्य: वर्णों के उच्चारण के अभाव (full stop) को अवसान कहते हैं। यहाँ ‘र्’ के बाद कोई वर्ण नहीं है, अतः इसकी अवसान संज्ञा होती है।
  • सूत्र: खरावसानयोर्विसर्जनीयः (८-३-१५)
  • कार्य: अवसान में स्थित रेफ (‘र्’) के स्थान पर विसर्ग (ः) आदेश होता है।
  • स्थिति: राम + ः

परिणाम: इस प्रकार “रामः” रूप पूर्णतः सिद्ध होता है।

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