सूत्र: स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् (४.१.२)

यह सूत्र अष्टाध्यायी के चौथे अध्याय के प्रथम पाद का दूसरा सूत्र है।

१. सूत्र का अर्थ

यह सूत्र प्रातिपदिक के बाद लगने वाले २१ प्रत्ययों का विधान करता है। इन प्रत्ययों को सामूहिक रूप से ‘सुँप्’ (Sup) कहा जाता है। ये प्रत्यय तीनों वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) और सातों विभक्तियों (प्रथमा से सप्तमी) में प्रयुक्त होते हैं।


२. २१ प्रत्ययों की तालिका (The 21 Affixes)

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासुँ (स्)जस् (अस्)
द्वितीयाअम्औट् (औ)शस् (अस्)
तृतीयाटा (आ)भ्याम्भिस्
चतुर्थीङे (ए)भ्याम्भ्यस्
पञ्चमीङसि (अस्)भ्याम्भ्यस्
षष्ठीङस् (अस्)ओस्आम्
सप्तमीङि (इ)ओस्सुप् (सु)

३. सूत्र की व्याख्या और शर्तें

इस सूत्र को लागू करने के लिए कुछ सहायक सूत्रों और अधिकारों की आवश्यकता होती है:

  1. ङ्याप्प्रातिपदिकात् (४.१.१): यह ‘अधिकार सूत्र’ है। यह कहता है कि ये २१ प्रत्यय केवल उन्हीं शब्दों के पीछे लगेंगे जो ङ्यन्त (ई-कारान्त स्त्री.), आबन्त (आ-कारान्त स्त्री.) या प्रातिपदिक (Base stems) हों।
  2. प्रत्ययः और परश्च: ये सूत्र बताते हैं कि ये ‘सुँ’ आदि शब्द के पीछे ही जुड़ेंगे।
  3. सुपः (१.४.१०३): यह सूत्र इन २१ प्रत्ययों को तीन-तीन के समूह में बांटता है, जिन्हें ‘विभक्ति’ कहा जाता है।
  4. एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि (१.४.१०२): यह प्रत्येक त्रिक (Group of 3) में क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन की संज्ञा देता है।

४. उदाहरण: ‘राम’ शब्द की सिद्धि में प्रयोग

  • राम + सुँ (प्रथमा, एकवचन): ‘सुँ’ में से ‘उ’ का लोप होता है, ‘स’ का विसर्ग होकर ‘रामः’ बनता है।
  • राम + औ (प्रथमा, द्विवचन): वृद्धि सन्धि होकर ‘रामौ’ बनता है।
  • राम + जस् (प्रथमा, बहुवचन): जस् में से ‘अस्’ बचता है, दीर्घ होकर ‘रामाः’ बनता है।

५. ‘सुँप्’ नाम क्यों पड़ा?

व्याकरण की ‘प्रत्याहार’ विधि के अनुसार, पहले प्रत्यय के ‘सु’ से लेकर अंतिम प्रत्यय के ‘प्’ (सुप् का प) को मिलाकर “सुँप्” नाम दिया गया है। इसीलिए शब्द रूपों को ‘सुबन्त’ (सुप+अन्त) कहा जाता है।

निष्कर्ष:

बिना इस सूत्र के संस्कृत में किसी भी संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण का रूप (जैसे- बालकः, लता, फलम्) बनाना असंभव है। यह सूत्र ही प्रातिपदिक को ‘पद’ की शक्ति प्रदान करता है।

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