यह सूत्र आचार्य पाणिनि की अष्टाध्यायी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संज्ञा सूत्र है। यह ‘प्रातिपदिक’ (Base word/Stem) की परिभाषा निर्धारित करता है।

विस्तृत विवरण


सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१.२.४५)

इस सूत्र का पदच्छेद (शब्दों को अलग करना) इस प्रकार है: अर्थवत् + अधातुः + अप्रत्ययः + प्रातिपदिकम्

१. सूत्र का सरल अर्थ

ऐसा शब्द जो अर्थवान (Meaningful) हो, लेकिन वह न तो धातु (Root) हो और न ही प्रत्यय (Suffix) हो, उसकी ‘प्रातिपदिक’ संज्ञा होती है।

२. सूत्र के तीन मुख्य घटक

इस परिभाषा को समझने के लिए इसके तीन विशेषणों को समझना आवश्यक है:

  • अर्थवत् (Meaningful): शब्द का कोई न कोई अर्थ होना चाहिए। व्याकरण में ‘डित्थ’, ‘कपित्थ’ जैसे सार्थक शब्दों की ही प्रातिपदिक संज्ञा होती है। निरर्थक ध्वनियों (जैसे ‘क-च-ट-त’) की प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होती।
  • अधातुः (Non-root): वह शब्द क्रिया का मूल रूप (धातु) नहीं होना चाहिए। जैसे ‘भू’, ‘पठ्’, ‘गम्’ आदि धातुएँ हैं। इनकी प्रातिपदिक संज्ञा इस सूत्र से नहीं होती, क्योंकि इनके लिए ‘भूवादयो धातवः’ सूत्र अलग से है।
  • अप्रत्ययः (Non-suffix): वह शब्द स्वयं में कोई प्रत्यय नहीं होना चाहिए (जैसे- सु, जस्, तिप्, तस् आदि)। साथ ही, जिस शब्द के अंत में प्रत्यय लगा हो (प्रत्ययान्त), उसकी भी इस सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होती (उसके लिए अगला सूत्र ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’ आता है)।

प्रातिपदिक होने का फल क्या है?

जब किसी शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा हो जाती है, तभी उसके पीछे ‘सुँप्’ प्रत्यय (सु, औ, जस् आदि) लग सकते हैं।

  • बिना प्रातिपदिक संज्ञा के विभक्ति नहीं जुड़ सकती।
  • बिना विभक्ति के वह ‘पद’ नहीं बन सकता।
  • बिना पद बने उसका संस्कृत वाक्य में प्रयोग नहीं हो सकता।

उदाहरण: ‘राम’ एक सार्थक शब्द है। यह न तो धातु है और न ही प्रत्यय। इसलिए इस सूत्र से ‘राम’ की प्रातिपदिक संज्ञा हुई। संज्ञा होने के बाद ही ‘स्वौजसमौट्…’ सूत्र से प्रथमा विभक्ति का ‘सुँ’ प्रत्यय आकर ‘रामः’ रूप सिद्ध हुआ।


विशेष नोट (तुलना)

पाणिनि ने प्रातिपदिक संज्ञा के लिए दो सूत्र दिए हैं:

  1. अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्: यह मूल (Original/Uncompounded) शब्दों के लिए है।
  2. कृत्तद्धितसमासाश्च (१.२.४६): यह कृदन्त (Verb-derivatives), तद्धित (Noun-derivatives) और समास (Compounds) युक्त शब्दों के लिए है।

निष्कर्ष: यदि आपको किसी ऐसे शब्द की सिद्धि करनी है जो न बनावटी है, न धातु है और न प्रत्यय (जैसे: कृष्ण, श्री, ज्ञान), तो वहां ‘अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्’ सूत्र का ही प्रयोग किया जाता है।

सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च (१.२.४६)

इसका पदच्छेद है: कृत्-तद्धित-समासाः + च

१. सूत्र का अर्थ

इस सूत्र के अनुसार निम्नलिखित तीन प्रकार के शब्द-समूहों की भी ‘प्रातिपदिक’ संज्ञा होती है:

  1. कृत् (Krit): वे शब्द जिनके अंत में कृत् प्रत्यय लगा हो (धातु + कृत् प्रत्यय)।
  2. तद्धित (Taddhita): वे शब्द जिनके अंत में तद्धित प्रत्यय लगा हो (संज्ञा + तद्धित प्रत्यय)।
  3. समास (Samasa): जहाँ दो या दो से अधिक पदों का मेल हुआ हो।

‘च’ शब्द का अर्थ है कि पिछले सूत्र से ‘प्रातिपदिकम्’ की अनुवृत्ति यहाँ भी आ रही है।


२. विस्तृत व्याख्या

क) कृदन्त (Krit)

जब किसी धातु में कृत् प्रत्यय (जैसे तव्यत्, अनीयर्, क्त, क्त्वा आदि) जुड़ता है, तो वह ‘कृदन्त’ कहलाता है।

  • उदाहरण: ‘कृ’ (धातु) + ‘तव्यत्’ (प्रत्यय) = कर्तव्य
  • यहाँ ‘कर्तव्य’ शब्द न तो मूल शब्द है और न केवल धातु, इसलिए इसकी प्रातिपदिक संज्ञा इस सूत्र (कृत्तद्धितसमासाश्च) से होगी।

ख) तद्धितान्त (Taddhita)

जब किसी प्रातिपदिक (संज्ञा) में तद्धित प्रत्यय (जैसे अण्, मतुप्, ईयस् आदि) जुड़ता है।

  • उदाहरण: ‘उपगु’ + ‘अण्’ = औपगव (उपगु की संतान)।
  • ‘दशरथ’ + ‘इञ्’ = दाशरथि (दशरथ का पुत्र)।
  • इन शब्दों की प्रातिपदिक संज्ञा इसी सूत्र से होती है।

ग) समास (Samasa)

जब दो पद मिलकर एक नया अर्थ देते हैं।

  • उदाहरण: ‘राज्ञः’ + ‘पुरुषः’ = राजपुरुषः
  • समास होने के बाद ‘राजपुरुष’ एक पूरा पद बन जाता है। इस पूरे समूह की प्रातिपदिक संज्ञा इस सूत्र से होती है, जिसके बाद इसके अंदर की विभक्तियों का लोप (सुपो धातु-प्रातिपदिकयोः) किया जाता है।

३. दोनों सूत्रों में अंतर क्यों?

पाणिनि ने दो अलग सूत्र क्यों बनाए? इसका कारण वैज्ञानिक है:

सूत्रकिस पर लागू होता है?उदाहरण
अर्थवदधातुरप्रत्ययः…जो शब्द “अखण्ड” हैं (जिनके टुकड़े नहीं किए जा सकते)।राम, कृष्ण, वृक्ष, ज्ञान
कृत्तद्धितसमासाश्चजो शब्द “व्युत्पन्न” हैं (जो प्रत्यय या समास से बने हैं)।कारक (कृ+ण्वुल्), दाशरथि, राजपुरुष

प्रातिपदिक संज्ञा का मुख्य कार्य

चाहे संज्ञा पहले सूत्र से हो या दूसरे से, संज्ञा होने का फल एक ही है:

  1. विभक्ति उत्पत्ति: शब्द के पीछे ‘सु, औ, जस्’ आदि २१ प्रत्यय लगाने का अधिकार मिलना।
  2. सुप-लुक्: समास की स्थिति में प्रातिपदिक के अवयव (अंदर की विभक्तियों) का लोप होना।

निष्कर्ष:

यदि ‘राम’ शब्द की सिद्धि करनी है तो पहला सूत्र लगेगा, लेकिन यदि ‘पाचक’ (पच् + ण्वुल्) या ‘उपकृष्णम्’ (समास) की सिद्धि करनी है, तो ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’ सूत्र का प्रयोग अनिवार्य है।

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