श्लोक (21):
दधति कुहरभाजामत्र भल्लूकयूना-
मनुरसितगुरूणि स्त्यानमम्बूकृतानि ।
शिशिरकटुकषायः स्त्यायते शल्लकीनाम्
इभदलितविकीर्णग्रन्थिनिष्यन्दगन्धः ॥ २१ ॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- दधति = धारण करते हैं / रखते हैं
- कुहरभाजाम् = गुफाओं में रहने वालों के
- अत्र = यहाँ
- भल्लूकयूना = युवा भालू
- अनुरसित = चाटा हुआ
- गुरूणि = भारी / गाढ़े
- स्त्यानम् = जमे हुए / गाढ़े
- अम्बूकृतानि = द्रव रूप में बने (रस रूप)
- शिशिर = शीत (ठंड)
- कटुक = कड़वा
- कषायः = कसैला
- स्त्यायते = जम जाता है
- शल्लकीनाम् = शल्लकी वृक्षों का
- इभदलित = हाथियों द्वारा तोड़ा हुआ
- विकीर्ण = फैला हुआ
- ग्रन्थि = गाँठ (पेड़ का भाग)
- निष्यन्द = बहता हुआ रस
- गन्धः = सुगंध
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
यहाँ गुफाओं में रहने वाले युवा भालू पेड़ों से निकले हुए रस (गोंद) को चाटकर उसे और अधिक गाढ़ा बना देते हैं।
शीत ऋतु के कारण शल्लकी वृक्षों का रस कड़वा और कसैला होकर जम जाता है। यह रस हाथियों द्वारा पेड़ों को तोड़ने पर निकलता है और उसकी सुगंध चारों ओर फैल जाती है।
श्लोक (22):
एतत्पुनर्वनमहो कथमद्य दृष्टं
यस्मिन्नभूम चिरमेव पुरा वसन्तः ।
आरण्यकाश्च गृहिणश्चरताः स्वधर्मे
सांसारिकेषु च सुखेषु वयं रसज्ञाः ॥२२ ॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- एतत् = यह
- पुनः = फिर से / पुनः
- वनम् = वन (जंगल)
- अहो = अरे! / आश्चर्य सूचक
- कथम् = कैसे
- अद्य = आज
- दृष्टम् = देखा गया
- यस्मिन् = जिसमें
- अभू्म = हम थे / रहे
- चिरम् एव = बहुत समय तक
- पुरा = पहले
- वसन्तः = रहते हुए
- आरण्यकाः = वनवासी
- च = और
- गृहिणः = गृहस्थ
- चरताः = आचरण करते हुए / पालन करते हुए
- स्वधर्मे = अपने-अपने धर्म में
- सांसारिकेषु = सांसारिक
- च = और
- सुखेषु = सुखों में
- वयम् = हम
- रसज्ञाः = रस का अनुभव करने वाले / आनन्द लेने वाले
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
अरे! यह वही वन आज फिर से कैसे दिखाई दे रहा है, जिसमें हम पहले बहुत समय तक रहते थे।
जहाँ वनवासी और गृहस्थ लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए रहते थे, और हम भी सांसारिक सुखों का अनुभव करने वाले थे।
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इस श्लोक में कवि पुराने वन को देखकर आश्चर्य करता है और अपने पूर्व निवास तथा जीवन के सुखद अनुभवों को याद करता है।
श्लोक (23):
एते ते एव गिरयो विरुवन्मयूराः
तान्येव मत्तहरिणानि वनस्थलानि ।
आमञ्जुवञ्जुललतानि च तान्यमूनि,
नीरन्ध्रनीपनिचुलानि सरित्तटानि ॥२३ ॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- एते ते एव = ये वही (पहले वाले ही)
- गिरयः = पर्वत
- विरुवन् = पुकारते हुए / ध्वनि करते हुए
- मयूराः = मोर
- तानि एव = वे ही
- मत्त-हरिणानि = मतवाले (उल्लासित) हिरण
- वन-स्थलानि = वन-भूमियाँ / जंगल के स्थान
- आमञ्जु-वञ्जुल-लतानि = सुंदर वञ्जुल लताएँ (लताएँ = बेलें)
- च = और
- तानि अमूनि = वे ही (दूर स्थित)
- नीरन्ध्र = घने / बिना खाली स्थान के
- नीप-निचुलानि = नीप (कदंब) और निचुल वृक्षों से युक्त
- सरित्-तटानि = नदी के किनारे
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
ये वही पर्वत हैं, जहाँ मोर पुकार रहे हैं। ये वही वन-स्थल हैं, जहाँ मतवाले हिरण घूम रहे हैं।
और ये वही सुन्दर लताओं से युक्त स्थान हैं, तथा ये वही नदी के किनारे हैं जो नीप (कदंब) और निचुल वृक्षों से घने रूप में आच्छादित हैं।
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इस श्लोक में कवि वन के उसी पुराने रूप का वर्णन करता है—पर्वत, मोर, हिरण, लताएँ और नदी के तट सब पहले जैसे ही दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक (24):
मेघमालेव यश्चायमारादिव विभाव्यते ।
गिरिप्रस्त्रवणः सोऽयं यत्र गोदावरी नदी ॥२४॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- मेघमाला इव = मेघों की माला के समान
- यः = जो
- च अयम् = और यह
- आरात् इव = दूर से मानो
- विभाव्यते = दिखाई देता है / प्रतीत होता है
- गिरि-प्रस्त्रवणः = पर्वत से बहने वाला जल / झरना
- सः अयम् = वही यह
- यत्र = जहाँ
- गोदावरी नदी = गोदावरी नाम की नदी
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
जो यह दूर से मेघों की माला के समान दिखाई देता है, वह वास्तव में पर्वत से बहने वाला झरना है, जहाँ गोदावरी नदी स्थित है।
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इस श्लोक में कवि दूर से दिखने वाले मेघ-जैसे दृश्य को वास्तव में पर्वत के झरने और गोदावरी नदी के रूप में पहचानता है।
श्लोक (25):
अस्यैवासीन्महति शिखरे गृध्रराजस्य वासः
तस्याधस्ताद् वयमपि रतास्तेषु पर्णोटजेषु ।
गोदावर्याः पयसि विततानोकदृश्यामलश्रीः
अन्तः कूजन्मुखरशकुनो यत्र रम्यो वनान्तः ॥२५॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- अस्य एव = इसी (पर्वत के)
- आसीत् = था
- महति शिखरे = ऊँचे शिखर पर
- गृध्र-राजस्य = गिद्धों के राजा (जटायु) का
- वासः = निवास
- तस्य अधस्तात् = उसके नीचे
- वयम् अपि = हम भी
- रताः = रहते थे / लगे हुए थे
- तेषु = उन
- पर्ण-उटजेषु = पत्तों की झोपड़ियों में
- गोदावर्याः पयसि = गोदावरी नदी के जल में
- विततान-उकः = फैले हुए आश्रय (घर/आवास)
- दृश्य-अमल-श्रीः = देखने में निर्मल और सुन्दर शोभा वाला
- अन्तः = भीतर
- कूजन-मुखर-शकुनः = पक्षियों के कलरव से गूँजता हुआ
- यत्र = जहाँ
- रम्यः वन-अन्तः = मनोहर वन का अन्त (सुन्दर वन-प्रदेश)
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
इसी पर्वत के ऊँचे शिखर पर गिद्धराज (जटायु) का निवास था। उसके नीचे हम भी पत्तों की झोपड़ियों में रहते थे।
जहाँ गोदावरी नदी के जल के पास हमारे आश्रय फैले हुए थे, जो देखने में अत्यन्त निर्मल और सुन्दर थे। उस वन के भीतर पक्षियों के कलरव से गूँजता हुआ अत्यन्त रमणीय वातावरण था।
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इस श्लोक में कवि जटायु के निवास स्थान और अपने पर्णकुटीर जीवन का वर्णन करते हुए गोदावरी तट के सुन्दर, पक्षियों से गूँजते वन का चित्रण करता है।
श्लोक (26):
चिराद्वेगारम्भी प्रसूत इव तीव्रो विषरसः,
कुतश्चित्संवेगात्प्रचल इव शल्यस्य शकलः ।
व्रणो रूढग्रन्थि स्फुटित इव हृन्मर्मणि पुनः,
पुराभूतः शोकः विकलयति मां नूतन इव ॥ २६ ॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- चिरात् = बहुत समय बाद
- वेग-आरम्भी = तीव्रता से प्रारम्भ होने वाला
- प्रसूत इव = उत्पन्न हुआ मानो
- तीव्रः विष-रसः = तेज़ विष के समान
- कुतश्चित् = किसी कारण से
- संवेगात् = अचानक वेग/उत्तेजना से
- प्रचल इव = हिलता हुआ मानो
- शल्यस्य शकलः = कांटे (शल्य) का टुकड़ा
- व्रणः = घाव
- रूढ-ग्रन्थि = भरा हुआ (ठीक हो चुका) घाव
- स्फुटित इव = फूट पड़ा मानो
- हृत्-मर्मणि = हृदय के मर्म-स्थान में
- पुनः = फिर से
- पुरा-भूतः शोकः = पुराना दुःख
- विकलयति = व्याकुल कर देता है
- माम् = मुझे
- नूतन इव = जैसे नया हो
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
बहुत समय बाद यह पुराना दुःख ऐसे प्रकट हो रहा है मानो तीव्र विष का प्रभाव अचानक शुरू हो गया हो।
जैसे किसी पुराने घाव में फँसा हुआ काँटे का टुकड़ा अचानक हिल जाए और वह घाव फिर से फूट पड़े, उसी प्रकार हृदय के मर्म में स्थित पुराना शोक अब फिर से नया-सा होकर मुझे अत्यन्त व्याकुल कर रहा है।
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इस श्लोक में कवि अपने पुराने शोक के पुनः जाग्रत होने को विष, काँटे और घाव के उदाहरणों से अत्यन्त मार्मिक रूप में व्यक्त करता है।
श्लोक (27):
पुरा यत्र स्रोतः पुलिनमधुना तत्र सरितां
विपर्यासं यातो घनविरलभावः क्षितिरुहाम् ।
बहुदृष्टिं कालादपरमिव मन्ये वनमिदं,
निवेशः शैलानां तदिदमिति बुद्धिं दृढयति ॥ २७ ॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- पुरा = पहले
- यत्र = जहाँ
- स्रोतः = धारा / प्रवाह
- पुलिनम् = रेत का किनारा (बालू का तट)
- अधुना = अब
- तत्र = वहाँ
- सरिताम् = नदियों का
- विपर्यासं यातः = परिवर्तन हो गया है / उलट गया है
- घन-विरल-भावः = कहीं घना, कहीं विरल (कम) होना
- क्षितिरुहाम् = वृक्षों का
- बहु-दृष्टिम् = बहुत परिवर्तन देखने वाला
- कालात् = समय के कारण
- अपरम् इव = कुछ और ही / भिन्न-सा
- मन्ये = मैं मानता हूँ
- वनम् इदम् = यह वन
- निवेशः = स्थिति / व्यवस्था
- शैलानाम् = पर्वतों की
- तत् इदम् इति = यही वही है
- बुद्धिम् दृढयति = इस बात को निश्चित करता है
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
जहाँ पहले नदी की धारा थी, वहाँ अब रेत का किनारा हो गया है; और जहाँ पहले रेत थी, वहाँ अब नदी बह रही है — इस प्रकार नदियों में परिवर्तन हो गया है।
वृक्षों का भी कहीं घना और कहीं विरल रूप हो गया है। समय के कारण यह वन मुझे कुछ अलग-सा प्रतीत होता है।
फिर भी पर्वतों की स्थिति (अपरिवर्तित होने के कारण) यह निश्चय कराती है कि यह वही पुराना वन है।
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इस श्लोक में कवि समय के कारण प्रकृति में आए परिवर्तन को दिखाता है, पर पर्वतों की स्थिरता से यह निश्चित करता है कि यह वही पुराना वन है।
श्लोक (28): (रामः)
यस्यां ते दिवसास्तथा सह मया नीता यथा स्वे गृहे,
यत्संबन्धिकथाभिरेव सततं दीर्घाभिरास्थीयते ।
एकः संप्रति नाशितप्रियतमस्तामेव रामः कथं
पापः पञ्चवटीं विलोकयतु वा गच्छत्वसंभाव्य ॥२८॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- यस्याम् = जिसमें (उस पञ्चवटी में)
- ते दिवसाः = तेरे (सीता के) दिन
- तथा = इस प्रकार
- सह मया = मेरे साथ
- नीताः = बिताए गए
- यथा स्वे गृहे = जैसे अपने घर में
- यत्-सम्बन्धि-कथाभिः = उससे संबंधित बातों द्वारा
- एव = ही
- सततम् = सदा
- दीर्घाभिः = लम्बे समय तक
- आस्थीयते = व्यतीत किया जाता है
- एकः = अकेला
- संप्रति = अब
- नाशित-प्रियतमः = प्रिय (सीता) से वंचित
- ताम् एव = उसी (पञ्चवटी को)
- रामः = राम
- कथम् = कैसे
- पापः = पापी (स्वयं को दोष देते हुए)
- पञ्चवटीम् = पञ्चवटी को
- विलोकयतु वा = देखे अथवा
- गच्छतु असंभाव्य = जाना भी असम्भव है
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
जिस पञ्चवटी में मैंने तुम्हारे (सीता के) साथ वैसे ही दिन बिताए थे जैसे अपने घर में बिताए जाते हैं, और जहाँ हम दोनों उससे संबंधित बातों में सदा लम्बा समय बिताते थे—
अब वही राम, जो अपनी प्रिय (सीता) से वंचित होकर अकेला है, उस पञ्चवटी को कैसे देख सकता है? उस पापी (स्वयं को दोषी मानते हुए) के लिए वहाँ जाना भी असम्भव-सा लगता है।
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इस श्लोक में राम पञ्चवटी की स्मृतियों को याद करके सीता-वियोग में अपने दुःख और अपराध-बोध को व्यक्त करते हैं।
श्लोक (29):
कूजत्कुञ्जकुटीरकौशिकघटाघूत्कारवत्कीचक-
स्तम्बाम्बरमूकमौकुलिकुलः क्रौञ्चाभिधोऽयं गिरिः ।
एतस्मिन् प्रचलाकिनां प्रचलतामुद्वेजिताः कूजितैः
रूद्देल्लन्ति पुराणरोहिणतरुस्कन्धेषु कुम्भीनसाः ॥२९ ॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- कूजत्-कुञ्ज-कुटीर = कूजन (चहचहाहट) से भरे हुए कुंज (वन) और कुटीर
- कौशिक = उल्लू
- घटा-घूत्कारवत् = “घू-घू” ध्वनि करने वाले
- कीचक-स्तम्ब = बाँस के स्तम्भ (बाँस के झुरमुट)
- अम्बर-मूक = आकाश को मानो मौन करने वाले (ध्वनि से भर देने वाले)
- मौकुलि-कुलः = मोरों का समूह
- क्रौञ्च-अभिधः = ‘क्रौञ्च’ नाम से प्रसिद्ध
- अयम् गिरिः = यह पर्वत
- एतस्मिन् = इस (पर्वत में)
- प्रचलाकिनाम् = चलने वाले जीवों (या पक्षियों) के
- प्रचलताम् = गतिशील होने पर
- उद्वेजिताः = व्याकुल / चौंके हुए
- कूजितैः = ध्वनियों से
- रूद्देल्लन्ति = जोर से निकल पड़ते हैं / उछलते हैं
- पुराण-रोहिण-तरु-स्कन्धेषु = पुराने रोहिण (लाल वृक्ष) के तनों में
- कुम्भीनसाः = सर्प (साँप)
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
यह ‘क्रौञ्च’ नामक पर्वत है, जहाँ कुंजों और कुटीरों में पक्षियों का कूजन हो रहा है, उल्लू “घू-घू” की आवाज़ कर रहे हैं, बाँस के झुरमुटों की ध्वनि आकाश को भर रही है और मोरों के समूह भी गूँज रहे हैं।
इस पर्वत पर जब चलने-फिरने वाले जीवों की आवाज़ें होती हैं, तब उन ध्वनियों से चौंककर पुराने रोहिण वृक्षों के तनों में रहने वाले साँप बाहर निकल पड़ते हैं।
Exam-ready short line:
इस श्लोक में ‘क्रौञ्च’ पर्वत का वर्णन है, जहाँ पक्षियों की ध्वनि, बाँस की सरसराहट और मोरों की आवाज़ से वातावरण गूँजता है, और उन ध्वनियों से सर्प भी विचलित होकर बाहर निकल आते हैं।
श्लोक (30):
एते ते कुहरेषु गदगदननद् गोदावरीवारयो
मेघालम्बितमौलिनीलशिखराः क्षोणीभृतो दाक्षिणाः ।
अन्योन्यप्रतिघातसंकुलचलत्कल्लोलकोलाहलैः
रुत्तालास्त इमे गभीरपयसः पुण्याः सरित्सङ्गमाः ॥३०॥
शब्दार्थ (Word Meaning):
- एते ते = ये वही
- कुहरेषु = गुफाओं में
- गदगद-ननद् = गूँजती हुई ध्वनि करते हुए
- गोदावरी-वारयः = गोदावरी नदी का जल
- मेघ-आलम्बित-मौलि = जिनके शिखर मेघों को छूते हैं
- नील-शिखराः = नीले शिखर वाले
- क्षोणी-भृतः = पर्वत
- दाक्षिणाः = दक्षिण दिशा के
- अन्योन्य-प्रतिघात = एक-दूसरे से टकराने वाले
- संकुल-चलत्-कल्लोल = गतिशील तरंगों से भरे हुए
- कोलाहलैः = शोर से
- रुत्तालाः = गूँजते हुए / ध्वनित
- ते इमे = ये ही
- गभीर-पयसः = गहरे जल वाले
- पुण्याः = पवित्र
- सरित्-सङ्गमाः = नदियों के संगम
हिन्दी अर्थ (Hindi Arth):
ये वही दक्षिण दिशा के पर्वत हैं, जिनके नीले शिखर मेघों को स्पर्श करते हैं, और जिनकी गुफाओं में गोदावरी नदी का जल गूँजता हुआ बह रहा है।
ये गहरे जल वाले पवित्र नदी-संगम हैं, जहाँ एक-दूसरे से टकराती हुई तरंगों के कोलाहल से चारों ओर गूँज उत्पन्न हो रही है।
Exam-ready short line:
इस श्लोक में दक्षिण के पर्वतों, गोदावरी के गूँजते जल और तरंगों के कोलाहल से भरे पवित्र संगम का वर्णन किया गया है।

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