📜 श्लोक १

उपक्रम्यस्य हि द्वित्वाद् द्विधैवोपक्रमो मतः ।
एकः सन्तर्पणस्तत्र द्वितीयश्चापतर्पणः ॥१॥


🔹 शब्दार्थ

  • उपक्रम्यस्य = जिसका उपचार करना है (रोग/रोगी का)
  • हि = निश्चय ही
  • द्वित्वात् = दो प्रकार होने के कारण
  • द्विधा = दो प्रकार में
  • एव = ही
  • उपक्रमः = उपचार
  • मतः = माना गया है
  • एकः = एक
  • सन्तर्पणः = पोषण करने वाला उपचार (बृंहण)
  • तत्र = उनमें
  • द्वितीयः = दूसरा
  • = और
  • अपतर्पणः = कमी/क्षय करने वाला उपचार (लङ्घन)

🔹 व्याख्या

इस श्लोक में कहा गया है कि जिस रोग या रोगी का उपचार करना होता है, उसकी स्थिति के अनुसार उपचार भी दो प्रकार का होता है।
पहला सन्तर्पण (बृंहण) है, जिसमें शरीर को पोषण देकर मजबूत बनाया जाता है।
दूसरा अपतर्पण (लङ्घन) है, जिसमें शरीर को हल्का कर दोषों को कम किया जाता है।


📜 श्लोक २

बृंहणो लङ्घनश्चेति तत्पर्यायावुदाहृतौ ।
बृंहणं यद् बृहत्त्वाय लङ्घनं लाघवाय यत् ॥२॥


🔹 शब्दार्थ

  • बृंहणः = पोषण करने वाला (सन्तर्पण)
  • लङ्घनः = हल्का करने वाला (अपतर्पण)
  • = और
  • इति = इस प्रकार
  • तत् = उनके
  • पर्यायौ = समानार्थक शब्द
  • उदाहृतौ = बताए गए हैं
  • बृंहणम् = पोषण करना
  • यत् = जो
  • बृहत्त्वाय = बड़ा/मजबूत बनाने के लिए
  • लङ्घनम् = हल्का करना
  • लाघवाय = हल्कापन लाने के लिए
  • यत् = जो

🔹 व्याख्या

इस श्लोक में बताया गया है कि सन्तर्पण को ही बृंहण और अपतर्पण को लङ्घन कहा जाता है।
जो उपचार शरीर को बढ़ाने, पुष्ट करने और बलवान बनाने के लिए किया जाता है, उसे बृंहण कहते हैं।
और जो उपचार शरीर को हल्का करने और दोषों को कम करने के लिए किया जाता है, उसे लङ्घन कहते हैं।

📜 श्लोक

भवतः प्रायो भौमापमितरच्च ते।


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • भवतः = शरीर के / देह के (या उत्पन्न होने वाले)
  • प्रायः = प्रायः, अधिकतर
  • भौम = पृथ्वी तत्व से संबंधित
  • आपम् = जल तत्व से संबंधित
  • इतरत् = अन्य (शेष)
  • = और
  • ते = वे (तत्व/दोष आदि)

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में द्विविधत्व (दो प्रकार होने का कारण) बताया गया है।

आयुर्वेद के अनुसार शरीर (या रोग) में मुख्यतः दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं—

  1. भौम (पृथ्वी तत्व प्रधान)
  2. आप्य (जल तत्व प्रधान)

और इनके अतिरिक्त अन्य तत्व (वायु, अग्नि, आकाश) भी होते हैं।

👉 पृथ्वी और जल तत्व शरीर में गुरुता (भारीपन), स्थिरता और वृद्धि लाते हैं — इसलिए ये सन्तर्पण (बृंहण) से संबंधित हैं।

👉 जबकि अन्य तत्व (विशेषकर वायु और अग्नि) लाघव (हल्कापन), कमी और क्षय लाते हैं — इसलिए ये अपतर्पण (लङ्घन) से संबंधित हैं।


🎯 निष्कर्ष

इसी कारण (भौम-आप्य और अन्य तत्वों के भेद से)
👉 उपचार भी दो प्रकार (द्विविध) माने गए हैं:

  • सन्तर्पण (बृंहण)
  • अपतर्पण (लङ्घन)

📜 श्लोक

स्नेहनं रूक्षणं कर्म स्वेदनं स्तम्भनं च यत् ॥३॥
भूतानां तदपि द्वैध्याद् द्वितयं नातिवर्तते ।


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • स्नेहनम् = शरीर को स्निग्ध (तेलयुक्त/मृदु) करने की क्रिया
  • रूक्षणम् = शुष्क (सूखा) करने की क्रिया
  • कर्म = उपचार/क्रिया
  • स्वेदनम् = स्वेद (पसीना) उत्पन्न करने की क्रिया
  • स्तम्भनम् = रोकने/स्थिर करने की क्रिया
  • = और
  • यत् = जो

  • भूतानाम् = पंचमहाभूतों का / तत्वों का
  • तत् अपि = वह भी
  • द्वैध्यात् = दो प्रकार होने के कारण
  • द्वितयम् = दो ही प्रकार
  • न अतिवर्तते = पार नहीं करता / अधिक नहीं होता

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में कहा गया है कि आयुर्वेद में बताए गए चार मुख्य कर्म—

  1. स्नेहन (Oiling / lubrication)
  2. रूक्षण (Drying)
  3. स्वेदन (Sudation / sweating)
  4. स्तम्भन (Stopping / रोकना)

👉 ये चारों कर्म भी अंततः दो ही श्रेणियों में आते हैं, क्योंकि पंचमहाभूत भी दो प्रकार की प्रवृत्तियों में बंटे हैं।


🔸 कैसे?

  • स्नेहन और स्वेदन
    👉 शरीर को मृदु, ढीला, प्रवाही और पोषित बनाते हैं
    👉 इसलिए ये सन्तर्पण / बृंहण पक्ष में आते हैं
  • रूक्षण और स्तम्भन
    👉 शरीर को शुष्क, संकुचित और स्थिर बनाते हैं
    👉 इसलिए ये अपतर्पण / लङ्घन पक्ष में आते हैं

🎯 निष्कर्ष

👉 भले ही कर्म चार बताए गए हैं,
लेकिन उनके गुण और प्रभाव के आधार पर वे भी अंततः दो ही प्रकार (द्विविध) में समा जाते हैं—

  • सन्तर्पण (बृंहण)
  • अपतर्पण (लङ्घन)

📜 श्लोक

शोधनं शमनं चेति द्विधा तत्रापि लङ्घनम् ॥४॥


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • शोधनम् = शुद्ध करने वाली क्रिया (दोषों को बाहर निकालना)
  • शमनम् = शांत करने वाली क्रिया (दोषों को संतुलित करना)
  • = और
  • इति = इस प्रकार
  • द्विधा = दो प्रकार
  • तत्र अपि = वहाँ भी / उसमें भी (अर्थात् लङ्घन में भी)
  • लङ्घनम् = अपतर्पण उपचार (शरीर को हल्का करने वाला)

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में बताया गया है कि लङ्घन (अपतर्पण) उपचार भी आगे दो प्रकार का होता है—

1. 🔸 शोधन (Purification Therapy)

  • इसमें शरीर के बढ़े हुए दोषों (वात, पित्त, कफ) को बाहर निकाला जाता है
  • यह अधिक प्रभावशाली (strong) उपचार है

📌 उदाहरण:

  • वमन (उल्टी द्वारा दोष निकालना)
  • विरेचन (पाचन मार्ग से शुद्धि)

2. 🔸 शमन (Pacification Therapy)

  • इसमें दोषों को बाहर नहीं निकाला जाता, बल्कि उन्हें शांत और संतुलित किया जाता है
  • यह अपेक्षाकृत मृदु (mild) उपचार है

📌 उदाहरण:

  • औषधि सेवन
  • आहार-विहार नियंत्रण

🎯 निष्कर्ष

👉 लङ्घन (अपतर्पण) उपचार के भी दो भेद हैं—

  • शोधनदोषों को बाहर निकालना
  • शमनदोषों को शांत करना

👉 दोनों का उद्देश्य शरीर को हल्का और संतुलित बनाना है।

📜 श्लोक

न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि ।
समीकरोति विषमान् शमनं तच्च सप्तधा ॥६॥
पाचनं दीपनं क्षुत्तृष्णा व्यायामातपमारुताः ।


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • = नहीं
  • शोधयति = शुद्ध करता है / बाहर निकालता है
  • यत् = जो
  • दोषान् = दोषों (वात, पित्त, कफ) को
  • समान् = समान (संतुलित)
  • = नहीं
  • उदीरयति = बढ़ाता / उत्तेजित करता
  • अपि = भी
  • समीकरोति = समान (संतुलित) करता है
  • विषमान् = असंतुलित (दोषों को)
  • शमनम् = शमन उपचार
  • तत् = वह
  • = और
  • सप्तधा = सात प्रकार का

  • पाचनम् = आम (अवशिष्ट अन्न) को पचाना
  • दीपनम् = अग्नि (पाचन शक्ति) को बढ़ाना
  • क्षुत् = भूख
  • तृष्णा = प्यास
  • व्यायाम = व्यायाम
  • आतप = धूप/ऊष्मा
  • मारुताः = वायु (शुद्ध हवा)

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में शमन चिकित्सा के लक्षण और उसके प्रकार बताए गए हैं।

👉 शमन क्या करता है?

  • यह दोषों को शरीर से बाहर नहीं निकालता (न शोधयति)
  • न ही संतुलित दोषों को बढ़ाता है
  • बल्कि जो दोष असंतुलित हैं, उन्हें संतुलित (समीकरण) करता है

इसलिए इसे शमन (Pacification Therapy) कहा जाता है।


🔸 शमन के 7 प्रकार (सप्तधा)

श्लोक में शमन के सात उपाय बताए गए हैं—

  1. पाचनआम (toxins) को पचाना
  2. दीपनजठराग्नि को बढ़ाना
  3. क्षुत् भूख को सहन करना / नियंत्रित उपवास
  4. तृष्णाप्यास का संयम
  5. व्यायामशारीरिक परिश्रम
  6. आतपधूप/गरमी का सेवन
  7. मारुतशुद्ध वायु का सेवन

🎯 निष्कर्ष

👉 शमन चिकित्सा दोषों को बाहर नहीं निकालती, बल्कि उन्हें संतुलित करती है।
👉 इसके 7 प्रमुख साधन हैं—पाचन, दीपन, क्षुत्, तृष्णा, व्यायाम, आतप और मारुत।

📜 श्लोक

बृंहणं शमनं त्वेव पायोः पित्तानिलस्य च ।


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • बृंहणम् = पोषण करने वाली चिकित्सा (stoutening therapy)
  • शमनम् = शान्त करने वाली चिकित्सा
  • तु = किन्तु / वास्तव में
  • एव = ही
  • पायोः = कफ (जलप्रधान दोष) का
  • पित्त = पित्त दोष का
  • अनिलस्य = वायु (वात) दोष का
  • = और

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में बताया गया है कि बृंहण चिकित्सा केवल शरीर को बढ़ाने वाली ही नहीं, बल्कि यह एक प्रकार की शमन चिकित्सा भी है।

👉 विशेष रूप से यह

  • वात (अनिल) और
  • पित्त दोष को शान्त (संतुलित) करती है।

👉 क्योंकि बृंहण चिकित्सा में

  • स्निग्ध (तेलयुक्त),
  • गुरु (भारी),
  • शीतल (cooling) गुण होते हैं,

जो वात और पित्त के विपरीत होते हैं, इसलिए उन्हें संतुलित करते हैं।


🎯 निष्कर्ष

👉 बृंहण चिकित्सा = पोषण + शमन
👉 यह विशेष रूप से वात और पित्त दोष को शांत करने में सहायक होती है।

📜 श्लोक

बृंहयेद् व्याधिभैषज्यमद्यस्त्रीशोककर्शितान् ।
भाराध्वोरःक्षतक्षीणरूक्षदुर्बलवातलान् ॥८॥
गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धान् ग्रीष्मेऽपरानपि ।


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • बृंहयेत् = बृंहण करना चाहिए / पोषण देना चाहिए
  • व्याधि = रोग से
  • भैषज्य = औषधि से
  • मद्य = मद्य (अत्यधिक सेवन) से
  • स्त्री = स्त्रीसंग से
  • शोक = दुःख से
  • कर्शितान् = कृश/दुर्बल हुए लोगों को

  • भार = भारी बोझ
  • अध्व = अधिक चलना/यात्रा
  • उरःक्षत = छाती में चोट/क्षति
  • क्षीण = क्षीण/दुर्बल
  • रूक्ष = शुष्क (सूखा शरीर)
  • दुर्बल = कमजोर
  • वातलान् = वातप्रकृति या वातदोष से पीड़ित

  • गर्भिणी = गर्भवती स्त्री
  • सूतिकाः = प्रसूता (delivery के बाद की स्त्री)
  • बालान् = बच्चे
  • वृद्धान् = वृद्ध लोग
  • ग्रीष्मे = ग्रीष्म ऋतु में
  • अपरान् अपि = अन्य लोगों को भी

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में बताया गया है कि किन-किन व्यक्तियों को बृंहण चिकित्सा (पोषण उपचार) देना चाहिए।

👉 जिन लोगों का शरीर विभिन्न कारणों से दुर्बल या क्षीण हो गया हो, उन्हें बृंहण करना चाहिए, जैसे—

  • रोग या औषधि के प्रभाव से कमजोर हुए लोग
  • मद्यपान, अत्यधिक स्त्रीसंग या शोक से कृश हुए व्यक्ति
  • भारी काम (भार उठाना) या अधिक यात्रा (अध्व) से थके हुए
  • छाती की चोट (उरःक्षत) वाले
  • अत्यधिक रूक्ष (dry) या दुर्बल शरीर वाले
  • वातदोष से पीड़ित व्यक्ति

👉 इसके अलावा—

  • गर्भवती (गर्भिणी)
  • प्रसूता (सूतिकाः)
  • बच्चे (बाल)
  • वृद्ध (old age)

👉 तथा ग्रीष्म ऋतु में सामान्य लोग भी बृंहण के अधिकारी होते हैं, क्योंकि इस समय शरीर में क्षय (depletion) अधिक होता है।


🎯 निष्कर्ष

👉 जिन व्यक्तियों में क्षीणता, दुर्बलता या वातप्रकोप हो, उन्हें बृंहण चिकित्सा दी जाती है।
👉 यह शरीर को पोषण, बल और स्थिरता प्रदान करती है।

📜 श्लोक

मांसक्षीरसितासर्पिर्मधुरैः स्निग्धबस्तिभिः ॥९॥
स्वप्नशय्यासुखाभ्यङ्गस्त्राननिर्वृतिहर्षणैः ।


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • मांस = मांस (meat)
  • क्षीर = दूध
  • सित = शर्करा/चीनी
  • सर्पिः = घृत (घी)
  • मधुरैः = मधुर रस वाले पदार्थों से
  • स्निग्ध = तैलयुक्त/चिकनाईयुक्त
  • बस्तिभिः = बस्ति (एनिमा उपचार) द्वारा

  • स्वप्न = नींद
  • शय्या = बिस्तर/विश्राम
  • सुख = आराम
  • अभ्यङ्ग = तेल मालिश
  • स्त्रान (स्नान) = स्नान
  • निर्वृति = संतोष/मानसिक शांति
  • हर्षणैः = प्रसन्नता देने वाले उपायों से

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में बृंहण (सन्तर्पण) चिकित्सा के साधन/औषध बताए गए हैं, जिनसे शरीर को पोषण, बल और वृद्धि मिलती है।

👉 आहार (Diet) द्वारा बृंहण

  • मांस, दूध, शर्करा, घी
  • मधुर (sweet) और स्निग्ध (oily) पदार्थ

👉 चिकित्सात्मक उपाय

  • स्निग्ध बस्ति (oil-based enema)

👉 जीवनशैली (Lifestyle) द्वारा बृंहण

  • अच्छी नींद (स्वप्न)
  • आरामदायक शय्या और सुख
  • अभ्यङ्ग (तेल मालिश)
  • स्नान

👉 मानसिक पक्ष (Mental aspect)

  • निर्वृति (संतोष)
  • हर्ष (खुशी)

🎯 निष्कर्ष

👉 बृंहण चिकित्सा केवल औषध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें

  • पौष्टिक आहार + उचित जीवनशैली + मानसिक प्रसन्नता
    तीनों शामिल हैं।

👉 इसका उद्देश्य शरीर को मजबूत, पुष्ट और स्वस्थ बनाना है।

📜 श्लोक

मेहामदोषातिस्निग्धज्वरोरुस्तम्भकुष्ठिनः ॥१०॥
विसर्पविद्रधिप्लीहशिरःकण्ठाक्षिरोगिणः ।
स्थूलांश्च लङ्घयेन्नित्यं शिशिरे त्वपरानपि ॥११॥


🔹 शब्दार्थ (Word Meaning)

  • मेह = प्रमेह (मूत्र विकार/diabetes आदि)
  • आमदोष = आम (अपचित द्रव्य/टॉक्सिन) से उत्पन्न दोष
  • अतिस्निग्ध = अत्यधिक स्निग्ध (अधिक चिकनाई/कफयुक्त)
  • ज्वर = बुखार
  • ऊरुस्तम्भ = जांघों में जकड़न/रुकावट
  • कुष्ठिनः = कुष्ठ (त्वचा रोग) से पीड़ित

  • विसर्प = त्वचा में फैलने वाला रोग (erysipelas)
  • विद्रधि = फोड़ा/अंदरूनी सूजन (abscess)
  • प्लीह = प्लीहा (spleen) रोग
  • शिरः = सिर के रोग
  • कण्ठ = गले के रोग
  • अक्षि = आँखों के रोग
  • रोगिणः = रोग से पीड़ित व्यक्ति

  • स्थूलान् = मोटे (obese) व्यक्तियों को
  • च = और
  • लङ्घयेत् = लङ्घन करना चाहिए (हल्का करने वाला उपचार देना चाहिए)
  • नित्यं = हमेशा
  • शिशिरे = शिशिर ऋतु (सर्दी के मौसम) में
  • तु = किन्तु
  • अपरान् अपि = अन्य लोगों को भी

🔹 व्याख्या (Explanation)

इस श्लोक में बताया गया है कि किन व्यक्तियों को लङ्घन (अपतर्पण) चिकित्सा देनी चाहिए।

👉 जिन लोगों में कफ, आम या स्निग्धता अधिक हो, उन्हें लङ्घन करना चाहिए, जैसे—

  • प्रमेह (मेह) के रोगी
  • आमदोष से पीड़ित
  • अत्यधिक स्निग्ध (चिकनाईयुक्त) शरीर वाले
  • ज्वर (fever) के रोगी
  • ऊरुस्तम्भ (जांघों की जकड़न)
  • कुष्ठ (skin diseases)

👉 इसके अलावा—

  • विसर्प, विद्रधि, प्लीहा रोग
  • सिर, गले और आँखों के रोग

👉 विशेष रूप से—

  • स्थूल (मोटे) व्यक्ति को हमेशा लङ्घन करना चाहिए

👉 तथा—

  • शिशिर ऋतु में अन्य लोगों को भी लङ्घन दिया जा सकता है, क्योंकि इस समय कफ का संचय अधिक होता है।

🎯 निष्कर्ष

👉 जिन व्यक्तियों में अधिक कफ, आम, मोटापा या भारीपन हो, उन्हें लङ्घन चिकित्सा दी जाती है।
👉 इसका उद्देश्य शरीर को हल्का, शुद्ध और संतुलित बनाना है।

Leave a Reply

Discover more from SanskritDom

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading