🔹 श्लोक:
सतां केनापि कार्येण लोकस्याराधनं व्रतम् ।
यत्पूरितं हि तातेन मां च प्राणाश्च मुञ्चता ॥४१ ॥
🔸 पदच्छेद (शब्द अलग करना):
सताम् + केनापि + कार्येण + लोकस्य + आराधनम् + व्रतम् ।
यत् + पूरितम् + हि + तातेन + माम् + च + प्राणाः + च + मुञ्चता ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- सताम् = सज्जनों का / अच्छे लोगों का
- केनापि = किसी भी (प्रकार के)
- कार्येण = कार्य से / काम से
- लोकस्य = संसार का / लोगों का
- आराधनम् = प्रसन्न करना / सेवा करना
- व्रतम् = व्रत / नियम / संकल्प
👉 यहाँ तक मतलब:
“सज्जनों का व्रत (नियम) है कि वे किसी भी कार्य से लोगों को प्रसन्न करें।”
- यत् = जो
- पूरितम् = पूरा किया गया
- हि = ही / निश्चय ही
- तातेन = पिता द्वारा
- माम् = मुझे
- च = और
- प्राणाः = प्राण / जीवन
- च = और
- मुञ्चता = छोड़ते हुए / त्यागते हुए
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “सज्जनों का यह व्रत होता है कि वे किसी भी तरह से लोगों की सेवा और प्रसन्नता करें।
मेरे पिता ने इस व्रत को पूरा किया — उन्होंने मुझे और अपने प्राणों तक का त्याग कर दिया।”
🔸 आसान समझ (एकदम simple 😄):
यह श्लोक कह रहा है:
👉 अच्छे लोग हमेशा दूसरों की भलाई के लिए जीते हैं।
👉 और उदाहरण के रूप में बताया गया है कि पिता ने इस नियम को निभाने के लिए
अपना बेटा और अपना जीवन तक त्याग दिया।
🔹 श्लोक:
यत्सावित्रैर्दीपितं भूमिपालैः, लोके श्रेष्ठैः साधु शुद्धं चरित्रम् ।
मत्सम्बन्धात्कश्मला किंवदन्ती स्याच्चेदस्मिन्हन्त धिक् मामधन्यम् ॥ ४२ ॥
🔸 पदच्छेद:
यत् + सावित्रैः + दीपितम् + भूमिपालैः,
लोके + श्रेष्ठैः + साधु + शुद्धम् + चरित्रम् ।
मत् + सम्बन्धात् + कश्मला + किंवदन्ती + स्यात् + चेत् + अस्मिन् + हन्त + धिक् + माम् + अधन्यम् ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- यत् = जो
- सावित्रैः = सूर्यवंशी राजाओं द्वारा (सावित्री/सूर्य से सम्बन्धित वंश)
- दीपितम् = प्रकाशित किया गया / चमकाया गया
- भूमिपालैः = राजाओं द्वारा
- लोके = संसार में
- श्रेष्ठैः = श्रेष्ठ (महान)
- साधु = अच्छा / उत्तम
- शुद्धम् = पवित्र
- चरित्रम् = आचरण / चरित्र
👉 यहाँ तक मतलब:
“जो पवित्र और श्रेष्ठ चरित्र, सूर्यवंशी महान राजाओं द्वारा संसार में प्रकाशित (प्रसिद्ध) किया गया है…”
- मत्सम्बन्धात् = मेरे सम्बन्ध से / मेरे कारण
- कश्मला = दूषित / कलंकित
- किंवदन्ती = अफवाह / बदनाम करने वाली बात
- स्यात् = हो जाए
- चेत् = यदि
- अस्मिन् = इसमें / उस (चरित्र) में
- हन्त = हाय! / अफसोस!
- धिक् = धिक्कार है
- माम् = मुझे
- अधन्यम् = अभागा / दुर्भाग्यशाली
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “जो पवित्र और श्रेष्ठ चरित्र महान सूर्यवंशी राजाओं ने इस संसार में स्थापित किया है,
यदि मेरे कारण उसमें कोई कलंक या बदनामी आ जाए,
तो हाय! मुझ जैसे अभागे को धिक्कार है।”
🔸 आसान समझ (simple 😄):
👉 यहाँ व्यक्ति कह रहा है:
- हमारे पूर्वजों (महान राजाओं) ने बहुत ऊँचा और पवित्र नाम बनाया है
- अगर मेरी वजह से उस नाम पर दाग लगे
👉 तो मैं बहुत ही दुर्भाग्यशाली हूँ और मुझे शर्म आनी चाहिए
🔹 श्लोक:
राम-
त्वया जगन्ति पुण्यानि, त्वय्यपुण्या जनोक्तयः ।
नाथवन्तस्त्वया लोकास्त्वमनाथा विपत्स्यसे ।।४३।।
🔸 पदच्छेद:
त्वया + जगन्ति + पुण्यानि,
त्वयि + अपुण्याः + जन + उक्तयः ।
नाथवन्तः + त्वया + लोकाः,
त्वम् + अनाथा + विपत्स्यसे ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- त्वया = तुम्हारे द्वारा
- जगन्ति = संसार (बहुवचन)
- पुण्यानि = पवित्र / शुभ
👉 मतलब:
“तुम्हारे कारण संसार पवित्र है।”
- त्वयि = तुममें / तुम्हारे विषय में
- अपुण्याः = अपवित्र / बुरी
- जनोक्तयः = लोगों की बातें / कथन
👉 मतलब:
“और तुम्हारे विषय में लोगों की बुरी बातें (हो ही नहीं सकतीं)।”
- नाथवन्तः = स्वामी वाले / सहारे वाले
- त्वया = तुम्हारे द्वारा
- लोकाः = लोग / संसार के प्राणी
👉 मतलब:
“तुम्हारे कारण लोग सहारा पाए हुए हैं।”
- त्वम् = तुम
- अनाथा = बिना सहारे के
- विपत्स्यसे = संकट में पड़ जाओगे / दुख पाओगे
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “हे राम! तुम्हारे कारण ही संसार पवित्र है, और तुम्हारे बारे में लोग कोई बुरी बात कह ही नहीं सकते।
तुम्हारे कारण सभी लोग सहारा पाए हुए हैं, लेकिन तुम स्वयं ही (वन जाकर) अनाथ होकर संकट में पड़ जाओगे।”
🔸 आसान समझ (simple 😄):
👉 कोई राम से कह रहा है:
- तुम इतने अच्छे हो कि पूरी दुनिया तुम्हारी वजह से अच्छी लगती है
- तुम्हारे बारे में कोई गलत सोच भी नहीं सकता
- तुम सबका सहारा हो
👉 लेकिन दुख की बात ये है कि
तुम खुद ही मुसीबत में जा रहे हो (अनाथ जैसे हो जाओगे)
🔹 श्लोक:
इक्ष्वाकुवंशोऽभिमतः प्रजानां जातं च दैवाद् वचनीय बीजम् ।
यच्चाद्भुतं कर्म विशुद्धि काले प्रत्येतु कस्तद्यदि दुरवृत्तम् ॥४४ ॥
🔸 पदच्छेद:
इक्ष्वाकु + वंशः + अभिमतः + प्रजानाम्,
जातम् + च + दैवात् + वचनीय + बीजम् ।
यत् + च + अद्भुतम् + कर्म + विशुद्धि + काले,
प्रत्येतु + कः + तत् + यदि + दुरवृत्तम् ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- इक्ष्वाकुवंशः = इक्ष्वाकु वंश (राम का कुल)
- अभिमतः = प्रिय / आदरणीय
- प्रजानाम् = प्रजा के लिए / लोगों के लिए
👉 मतलब:
“इक्ष्वाकु वंश प्रजा को बहुत प्रिय है।”
- जातम् = उत्पन्न हुआ
- च = और
- दैवात् = भाग्य से / संयोग से
- वचनीय = निन्दा योग्य / कहने योग्य (बुरा)
- बीजम् = बीज / कारण
👉 मतलब:
“और (अब) भाग्य से कोई निन्दा का कारण पैदा हो गया है।”
- यत् = जो
- च = और
- अद्भुतम् = अद्भुत / आश्चर्यजनक
- कर्म = कार्य
- विशुद्धि काले = शुद्धि के समय / सच्चाई प्रकट होने पर
👉 मतलब:
“जो अद्भुत कार्य (पहले हुआ था), वह सच्चाई सामने आने पर…”
- प्रत्येतु = कौन विश्वास करेगा
- कः = कौन
- तत् = उस पर
- यदि = यदि
- दुरवृत्तम् = बुरा आचरण / गलत व्यवहार
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “इक्ष्वाकु वंश प्रजा को बहुत प्रिय है, लेकिन अब भाग्यवश उसमें निन्दा का एक कारण उत्पन्न हो गया है।
ऐसी स्थिति में, यदि (अब) कोई बुरा आचरण दिखाई दे, तो पहले किए गए अद्भुत और पवित्र कार्यों पर कौन विश्वास करेगा?”
🔸 आसान समझ (simple 😄):
👉 बात क्या है यहाँ:
- राम का वंश बहुत महान और सबको प्रिय है
- लेकिन अगर उसमें एक भी दाग लग जाए
👉 तो लोग क्या करेंगे? - पहले की सारी अच्छाइयों को भी भूल सकते हैं
👉 मतलब:
एक गलत काम, पहले की सारी अच्छी छवि को खराब कर सकता है।
🔹 श्लोक:
शैशवात्प्रभृति पोषितां प्रियां, सौहृदादपृथगाश्रयाभिमाम् ।
छद्मना परिददामि मृत्यवे, सौनिके गृहशकुन्तिकामिव ॥४५ ॥
🔸 पदच्छेद:
शैशवात् + प्रभृति + पोषिताम् + प्रियां,
सौहृदात् + अप्रथक् + आश्रय + अभिमाम् ।
छद्मना + परिददामि + मृत्यवे,
सौनिके + गृह + शकुन्तिकाम् + इव ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- शैशवात् प्रभृति = बचपन से ही / बचपन से
- पोषिताम् = पाला-पोसा गया
- प्रियां = प्रिय (स्त्री) / बहुत प्यारी
👉 मतलब:
“जिसे मैंने बचपन से पाला-पोसा, जो मुझे बहुत प्रिय है…”
- सौहृदात् = प्रेम के कारण / मित्रता के कारण
- अप्रथक् = अलग न होने वाली
- आश्रय = सहारा
- अभिमाम् = मानने वाली / समझने वाली
👉 मतलब:
“जो प्रेम के कारण मुझसे कभी अलग नहीं रही और मुझे ही अपना सहारा मानती है…”
- छद्मना = छल से / धोखे से
- परिददामि = सौंप रहा हूँ / दे रहा हूँ
- मृत्यवे = मृत्यु को / मरने के लिए
👉 मतलब:
“मैं उसे छल से मृत्यु के हवाले कर रहा हूँ…”
- सौनिके = शिकारी को / कसाई को
- गृह = घर की
- शकुन्तिकाम् = चिड़िया
- इव = जैसे
👉 मतलब:
“जैसे कोई घर की पाली हुई चिड़िया को शिकारी को दे दे।”
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “जिस प्रिय (स्त्री) को मैंने बचपन से पाला-पोसा है, जो प्रेमवश मुझसे कभी अलग नहीं रही और मुझे ही अपना सहारा मानती है,
उसे मैं अब छल से मृत्यु के हवाले कर रहा हूँ — जैसे कोई अपनी पाली हुई चिड़िया को शिकारी को सौंप दे।”
🔸 आसान समझ (simple 😔):
👉 यहाँ बोलने वाला बहुत दुखी है:
- वह अपनी सबसे प्रिय व्यक्ति (सीता) को छोड़ रहा है
- जिसे उसने हमेशा संभाला, प्यार किया
👉 लेकिन अब उसे धोखे से छोड़ना पड़ रहा है
👉 तुलना देखो:
जैसे कोई अपनी पाली हुई चिड़िया को खुद ही शिकारी को दे दे 😢
🔹 श्लोक:
अपूर्वकर्म चाण्डाल मयि मुग्धे! बिमुञ्च माम् ।
श्रितासि चन्दन भ्रान्त्या दुविपाक विषद्रुमम् ॥४६ ॥
🔸 पदच्छेद:
अपूर्व + कर्म + चाण्डाल,
मयि + मुग्धे! + विमुञ्च + माम् ।
श्रितासि + चन्दन + भ्रान्त्या,
दुविपाक + विष + द्रुमम् ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- अपूर्वकर्म = अभूतपूर्व (बहुत बुरा/अनसुना) कर्म करने वाला
- चाण्डाल = अत्यन्त नीच व्यक्ति (गाली के रूप में)
👉 “हे अत्यन्त नीच और बुरा कर्म करने वाले!”
- मयि = मुझमें / मेरे ऊपर
- मुग्धे = भोली (स्त्री) / नासमझ
👉 “हे भोली (स्त्री)!”
- विमुञ्च = छोड़ दो / त्याग दो
- माम् = मुझे
👉 “मुझे छोड़ दो”
- श्रितासि = तुमने आश्रय लिया है / सहारा लिया है
- चन्दन भ्रान्त्या = चन्दन समझकर (भ्रम से)
👉 “तुमने मुझे चन्दन समझकर आश्रय लिया है…”
- दुविपाक = जिसका फल बुरा हो
- विष = ज़हर
- द्रुमम् = वृक्ष
👉 “(लेकिन मैं) वास्तव में बुरे फल वाला विष-वृक्ष हूँ।”
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “हे भोली! तुमने मुझे चन्दन वृक्ष समझकर मेरा सहारा लिया है,
लेकिन मैं तो बुरे फल देने वाला विष-वृक्ष हूँ।
इसलिए हे नीच कर्म करने वाले (अपने आप को कहकर), मुझे छोड़ दो।”
🔸 आसान समझ (simple 😔):
👉 यहाँ बोलने वाला (राम):
- खुद को दोष दे रहा है
- कह रहा है:
- “तुमने मुझे अच्छा समझा (चन्दन की तरह)”
- “लेकिन मैं तो बुरा निकला (ज़हरीले पेड़ जैसा)”
👉 इसलिए वह कहता है:
“मुझे छोड़ दो… मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ।”
🔸 deep meaning (important 💡):
👉 यह self-blame (खुद को दोष देना) है
👉 राम अपने निर्णय (सीता-त्याग) के कारण खुद को ही बुरा कह रहे हैं
🔹 श्लोक:
दुःखसंवेदनायैव रामे चैतन्यमाहितम् ।
मर्मोपघातिभिः प्राणैर्वज्रकीलायितं हृदि ॥४७॥
🔸 पदच्छेद:
दुःख + संवेदनाय + एव + रामे + चैतन्यम् + आहितम् ।
मर्म + उपघातिभिः + प्राणैः + वज्र + कीलायितम् + हृदि ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- दुःख = पीड़ा / कष्ट
- संवेदनाय = अनुभव करने के लिए
- एव = ही / केवल
- रामे = राम में
- चैतन्यम् = चेतना / जीवित होने की अवस्था
- आहितम् = स्थापित किया गया है
👉 मतलब:
“राम में चेतना केवल दुःख अनुभव करने के लिए ही रह गई है।”
- मर्म = हृदय के गहरे स्थान / संवेदनशील बिंदु
- उपघातिभिः = आघात करने वाले / चोट पहुँचाने वाले
- प्राणैः = प्राणों द्वारा
👉 “प्राण (जीवन) ही हृदय को चोट पहुँचा रहे हैं…”
- वज्र = वज्र (बहुत कठोर)
- कीलायितम् = कील (कील की तरह ठोंका हुआ)
- हृदि = हृदय में
👉 “(जैसे) वज्र की कील हृदय में ठोंक दी गई हो।”
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “राम के भीतर अब केवल दुःख को महसूस करने के लिए ही चेतना बची है।
उनके प्राण ही उनके हृदय को चोट पहुँचा रहे हैं, मानो हृदय में वज्र की कील ठोंक दी गई हो।”
🔸 आसान समझ (simple 😔):
👉 यहाँ स्थिति क्या है:
- राम इतने दुखी हैं कि
👉 ऐसा लग रहा है कि वे सिर्फ दुख महसूस करने के लिए ही जीवित हैं
👉 और:
- उनका दिल ऐसे दर्द में है
👉 जैसे किसी ने दिल में लोहे की कील ठोक दी हो 💔
🔸 deep meaning (important 💡):
👉 यह दिखाता है:
- extreme emotional pain
- guilt + separation (सीता से वियोग)
👉 मतलब:
जीवन है, लेकिन खुशी नहीं — सिर्फ दर्द ही बचा है।
🔹 श्लोक:
ते हि मन्ये महात्मानः कृतघ्नेन दुरात्मना ।
मया गृहीतनामानः स्पृश्यन्त इव पाप्मना ॥४८॥
🔸 पदच्छेद:
ते + हि + मन्ये + महात्मानः,
कृतघ्नेन + दुरात्मना ।
मया + गृहीत + नामानः,
स्पृश्यन्ते + इव + पाप्मना ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- ते = वे
- हि = निश्चय ही
- मन्ये = मैं मानता हूँ / सोचता हूँ
- महात्मानः = महान लोग / श्रेष्ठ व्यक्ति
👉 मतलब:
“मैं मानता हूँ कि वे महान व्यक्ति…”
- कृतघ्नेन = उपकार भूलने वाले द्वारा / कृतघ्न
- दुरात्मना = बुरे स्वभाव वाले (व्यक्ति)
👉 यहाँ राम खुद को कह रहे हैं
“मेरे जैसे कृतघ्न और दुष्ट द्वारा…”
- मया = मेरे द्वारा
- गृहीत = लिया गया / धारण किया गया
- नामानः = नाम (यहाँ → उनका नाम/यश लेना)
👉 “जिनका नाम मैंने लिया है…”
- स्पृश्यन्ते = छू लिए जाते हैं / प्रभावित होते हैं
- इव = जैसे
- पाप्मना = पाप से
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “मैं मानता हूँ कि वे महान लोग, जिनका नाम मैंने (अपने साथ) जोड़ा है,
मेरे जैसे कृतघ्न और दुष्ट व्यक्ति द्वारा (उनका नाम लेने से) मानो पाप से स्पर्शित हो रहे हैं।”
🔸 आसान समझ (simple 😔):
👉 राम यहाँ क्या कह रहे हैं:
- जिन महान लोगों (पूर्वजों) का नाम मैं लेता हूँ
- मेरे जैसे बुरे व्यक्ति के कारण
👉 उनका नाम भी जैसे अपवित्र हो रहा है
👉 मतलब:
“मैं इतना बुरा हूँ कि मेरे कारण महान लोगों का नाम भी खराब हो रहा है।”
🔸 deep meaning (important 💡):
👉 यहाँ बहुत strong self-guilt है:
- राम खुद को कृतघ्न (उपकार न मानने वाला) कह रहे हैं
- उन्हें लग रहा है कि
👉 उन्होंने अपने कुल (वंश) को बदनाम कर दिया
🔹 श्लोक:
विस्त्रम्भादुरसि निपत्य जातनिद्राम् उन्मुच्य प्रियगृहिणीं गृहस्य लक्ष्मीम् ।
आतंकस्फुरितकठोरगर्भगुर्वीं, क्रव्याद्भ्यो बलिमिव दारुणः क्षिपामि ॥४९॥
🔸 पदच्छेद:
विस्त्रम्भात् + उरस् + निपत्य + जात + निद्राम् + उन्मुच्य + प्रिय + गृहिणीम् + गृहस्य + लक्ष्मीम् ।
आतंक + स्फुरित + कठोर + गर्भ + गुर्वीम्,
क्रव्याद्भ्यः + बलिम् + इव + दारुणः + क्षिपामि ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- विस्त्रम्भात् = विश्वास से / निश्चिंत होकर
- उरस् = छाती पर
- निपत्य = गिरकर / लेटकर
- जातनिद्राम् = सो गई (नींद आ गई)
- उन्मुच्य = छोड़कर / त्यागकर
👉 मतलब:
“जो मुझ पर विश्वास करके मेरी छाती पर सो गई…”
- प्रियगृहिणीम् = प्रिय पत्नी
- गृहस्य लक्ष्मीम् = घर की लक्ष्मी (घर की शोभा)
👉 “उस प्रिय पत्नी, जो घर की लक्ष्मी है…”
- आतंक = भय
- स्फुरित = कांपती हुई
- कठोर = कठोर (कष्ट से भरी)
- गर्भगुर्वीम् = गर्भ से भारी (गर्भवती)
👉 “जो भय से कांप रही है और गर्भ से भारी है…”
- क्रव्याद्भ्यः = मांस खाने वाले (राक्षस/जंगली जानवर)
- बलिम् = बलि / आहुति
- इव = जैसे
👉 “जैसे किसी बलि को (जानवरों के लिए)”
- दारुणः = क्रूर / निर्दयी
- क्षिपामि = फेंक रहा हूँ
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “जो (सीता) मुझ पर विश्वास करके मेरी छाती पर सो गई थी, उस प्रिय पत्नी, जो मेरे घर की लक्ष्मी है,
और जो भय से कांप रही है तथा गर्भवती है —
उसे मैं अब क्रूरता से ऐसे छोड़ रहा हूँ, जैसे मांस खाने वाले प्राणियों के लिए किसी बलि को फेंक दिया जाता है।”
🔸 आसान समझ (simple 😔):
👉 यहाँ राम कह रहे हैं:
- सीता उन पर पूरा भरोसा करके उनके साथ थी
- वह उनकी सबसे प्रिय और घर की शोभा थी
- और उस समय वह गर्भवती भी थी
👉 लेकिन:
राम उसे जंगल में छोड़ रहे हैं
👉 और उन्हें खुद ऐसा लग रहा है:
“मैं उसे ऐसे छोड़ रहा हूँ जैसे किसी को जानवरों के सामने मरने के लिए फेंक दिया जाए…”
🔸 deep meaning (important 💡):
👉 यहाँ feelings peak पर हैं:
- 😢 guilt (अपराधबोध)
- 💔 दर्द (emotional pain)
- ⚖️ duty vs love (कर्तव्य बनाम प्रेम)
👉 राम खुद को “दारुणः” (निर्दयी) कह रहे हैं
🔹 श्लोक:
ऋषीणामुग्रतपसां यमुनातीरवासिनाम् ।
लवणत्रासितः स्तोमस्त्रातारं त्वामुपस्थितः ॥५०॥
🔸 पदच्छेद:
ऋषीणाम् + उग्र + तपसाम् + यमुना + तीर + वासिनाम् ।
लवण + त्रासितः + स्तोमः + त्रातारम् + त्वाम् + उपस्थितः ॥
🔸 शब्दार्थ:
- ऋषीणाम् = ऋषियों का
- उग्रतपसाम् = कठोर तप करने वाले
- यमुनातीरवासिनाम् = यमुना नदी के किनारे रहने वाले
👉 मतलब:
“यमुना के तट पर रहने वाले कठोर तप करने वाले ऋषियों का…”
- लवणत्रासितः = लवण (राक्षस) से भयभीत
- स्तोमः = समूह / भीड़
👉 मतलब:
“जो लवण नामक राक्षस से डर गए हैं, ऐसा समूह…”
- त्रातारम् = रक्षक / बचाने वाला
- त्वाम् = तुम्हें (राम को)
- उपस्थितः = उपस्थित हुआ है / आया है
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “यमुना के तट पर रहने वाले कठोर तप करने वाले ऋषियों का समूह, जो लवण नामक राक्षस से भयभीत है, तुम्हें अपना रक्षक मानकर तुम्हारे पास आया है।”
🔸 आसान समझ (simple 😄):
👉 क्या हो रहा है यहाँ:
- यमुना किनारे रहने वाले ऋषि
- एक राक्षस लवण से परेशान हैं
👉 इसलिए:
वे राम के पास मदद मांगने आए हैं 🙏
🔸 deep point (important 💡):
👉 यहाँ राम की छवि:
- केवल दुखी पति नहीं
- बल्कि 👉 धर्म के रक्षक (protector)
👉 मतलब:
व्यक्तिगत दुख के बावजूद, राम का कर्तव्य (duty) जारी है
🔹 श्लोक:
जनकानां रघूणां च यत्कृत्स्नं गोत्रमङ्गलम् ।
यां देवयजने पुण्ये पुण्यशीलाभजीजनः ॥५१॥
🔸 पदच्छेद:
जनकानाम् + रघूणाम् + च + यत् + कृत्स्नम् + गोत्र + मङ्गलम् ।
याम् + देव + यजने + पुण्ये + पुण्यशीलाः + अभ्यजीजनन् ॥
🔸 शब्दार्थ (हर शब्द का अर्थ):
- जनकानाम् = जनक के वंश का (सीता का कुल)
- रघूणाम् = रघुवंश का (राम का कुल)
- च = और
- यत् = जो
- कृत्स्नम् = सम्पूर्ण / पूरा
- गोत्रमङ्गलम् = कुल का कल्याण / कुल की शोभा
👉 मतलब:
“जो जनक और रघु—दोनों वंशों का सम्पूर्ण कल्याण/शोभा है…”
- याम् = जिसे (स्त्री—सीता)
- देवयजने = यज्ञ में / पूजा स्थल में
- पुण्ये = पवित्र
- पुण्यशीलाः = पवित्र स्वभाव वाले (लोग)
- अभ्यजीजनन् = उत्पन्न किया / जन्म दिया
👉 मतलब:
“जिसे पवित्र यज्ञ में पुण्यात्मा लोगों ने उत्पन्न किया…”
🔸 सरल हिन्दी में भावार्थ:
👉 “जो (सीता) जनक और रघु—दोनों वंशों की सम्पूर्ण शोभा है, और जिसे पवित्र यज्ञ में पुण्यात्मा जनों ने उत्पन्न किया था…”
🔸 आसान समझ (simple 😊):
👉 यहाँ सीता की महानता बताई जा रही है:
- वह दो महान वंशों (जनक + रघु) की शान है
- उसका जन्म भी साधारण नहीं
👉 बल्कि यज्ञ (पवित्र स्थान) से हुआ है
🔸 deep point (important 💡):
👉 यह श्लोक क्या emphasize करता है:
- सीता का divine origin (अलौकिक जन्म)
- और उसकी उच्च मर्यादा (high character & purity)
👉 मतलब:
जिस स्त्री को इतना महान बताया गया है, उसी को त्यागना — यही tragedy है

Leave a comment