महाकवि-भवभूतिप्रणीतम्
उत्तररामचरितम्
प्रथमोऽङ्कः
📖 श्लोक
इदं कविभ्यः पूर्वेभ्यो नमोवाकं प्रशास्महे ।
विन्देम देवतां वाचममृतामात्मनः कलाम् ॥१॥
🔹 पदच्छेद
इदम् + कविभ्यः + पूर्वेभ्यः + नमोवाकम् + प्रशास्महे ।
विन्देम + देवताम् + वाचम् + अमृताम् + आत्मनः + कलाम् ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- इदम् = यह
- कविभ्यः = कवियों को
- पूर्वेभ्यः = पूर्व (प्राचीन)
- नमोवाकम् = नमस्कार के वचन
- प्रशास्महे = हम कहते हैं / अर्पित करते हैं
- विन्देम = हम प्राप्त करें (कामना करते हैं)
- देवताम् = देवतुल्य / दिव्य
- वाचम् = वाणी
- अमृताम् = अमृत के समान (मधुर, अमर)
- आत्मनः = अपनी
- कलाम् = कला / रचनात्मक शक्ति
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
हम प्राचीन कवियों को नमस्कार करते हैं।
और हम यह इच्छा करते हैं कि हमें अपनी ऐसी वाणी प्राप्त हो जो देवतुल्य और अमृत के समान मधुर हो।
📖 श्लोक
यं ब्रह्माणमियं देवी वाग्वश्येवानुवर्तते ।
उत्तरं रामचरितं तत्प्रणीतं प्रयोक्ष्यते ॥२॥
🔹 पदच्छेद
यम् + ब्रह्माणम् + इयम् + देवी + वाक् + वश्येव + अनुवर्तते ।
उत्तरम् + रामचरितम् + तत् + प्रणीतम् + प्रयोक्ष्यते ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- यम् = जिस (व्यक्ति को)
- ब्रह्माणम् = ब्रह्मा (या महान विद्वान/कवि)
- इयम् = यह
- देवी वाक् = देवी सरस्वती (वाणी)
- वश्येव = वश में होने के समान
- अनुवर्तते = अनुसरण करती है
- उत्तरम् रामचरितम् = उत्तर रामचरित (नाटक का नाम)
- तत् = उसी के द्वारा
- प्रणीतम् = रचित (लिखा गया)
- प्रयोक्ष्यते = प्रस्तुत किया जाएगा / अभिनीत होगा
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
जिस महान कवि (ब्रह्मा के समान) के पीछे देवी सरस्वती स्वयं वश में होकर चलती हैं, उसी के द्वारा रचित उत्तर रामचरित नाटक अब प्रस्तुत किया जाएगा।
📖 श्लोक
वसिष्ठाधिष्ठिता देव्यो गता रामस्य मातरः।
अरुन्धतीं पुरस्कृत्य यज्ञे जामातुराश्रमम् ॥३॥
🔹 पदच्छेद
वसिष्ठ-अधिष्ठिताः + देव्यः + गताः + रामस्य + मातरः ।
अरुन्धतीम् + पुरस्कृत्य + यज्ञे + जामातुः + आश्रमम् ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- वसिष्ठ-अधिष्ठिताः = वसिष्ठ मुनि के नेतृत्व में / उनके साथ
- देव्यः = रानियाँ (सम्मान के कारण ‘देवी’ कहा गया)
- गताः = गईं
- रामस्य मातरः = राम की माताएँ
- अरुन्धतीम् = अरुन्धती (ऋषि वसिष्ठ की पत्नी)
- पुरस्कृत्य = आगे करके / साथ लेकर
- यज्ञे = यज्ञ के लिए
- जामातुः = दामाद (यहाँ राम के ससुर का आशय — जनक)
- आश्रमम् = आश्रम
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
वसिष्ठ मुनि के साथ, राम की माताएँ (रानियाँ), अरुन्धती को आगे करके, अपने दामाद (जनक) के यज्ञ के लिए उनके आश्रम को चली गईं।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 राम की माताएँ (कौशल्या आदि)
- वसिष्ठ और अरुन्धती के साथ
- जनक जी के यज्ञ में शामिल होने
- उनके आश्रम जा रही हैं
📖 श्लोक
कन्यां दशरथो राजा शान्तां नाम व्यजीजनत् ।
अपत्यकृतिकां राज्ञे रोमपादाय यां ददौ ॥४॥
🔹 पदच्छेद
कन्याम् + दशरथः + राजा + शान्ताम् + नाम + व्यजीजनत् ।
अपत्य-कृतिकाम् + राज्ञे + रोमपादाय + याम् + ददौ ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- कन्याम् = कन्या (पुत्री)
- दशरथः राजा = राजा दशरथ
- शान्ताम् नाम = शान्ता नाम की
- व्यजीजनत् = उत्पन्न किया / जन्म दिया
- अपत्य-कृतिकाम् = संतान के रूप में अपनाने के लिए (दत्तक हेतु)
- राज्ञे रोमपादाय = राजा रोमपाद को
- याम् = जिसे
- ददौ = दे दिया
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
राजा दशरथ ने शान्ता नाम की एक कन्या को जन्म दिया, और उसे संतान के रूप में (दत्तक के लिए) राजा रोमपाद को दे दिया।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 राजा दशरथ की एक बेटी थी — शान्ता
- उन्होंने उसे रोमपाद राजा को गोद (दत्तक) दे दिया
- ताकि वह उनकी संतान के रूप में पली-बढ़े
📖 श्लोक
सर्वथा व्यवहर्तव्यं कुतो ह्यवचनीयता ।
यथा स्त्रीणां तथा वाचां साधुत्वे दुर्जनोजनः ॥५॥
🔹 पदच्छेद
सर्वथा + व्यवहर्तव्यम् + कुतः + हि + अवचनीयता ।
यथा + स्त्रीणाम् + तथा + वाचाम् + साधुत्वे + दुर्जन-जनः ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- सर्वथा = हर प्रकार से / हमेशा
- व्यवहर्तव्यम् = व्यवहार करना चाहिए
- कुतः = कहाँ / क्यों
- हि = निश्चय ही
- अवचनीयता = बुरा बोलना / निन्दा करना
- यथा = जैसे
- स्त्रीणाम् = स्त्रियों का
- तथा = वैसे ही
- वाचाम् = वाणी (बातों) का
- साधुत्वे = अच्छाई में / शुद्धता में
- दुर्जन-जनः = बुरे लोग
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
हमेशा अच्छा व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि बुरा बोलने का कोई कारण नहीं है।
जैसे स्त्रियों के विषय में, वैसे ही वाणी की अच्छाई में भी, बुरे लोग (हमेशा) दोष निकालते हैं।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 यह श्लोक एक important life lesson दे रहा है:
- हमें हमेशा अच्छा व्यवहार करना चाहिए
- क्योंकि दुर्जन लोग तो हर हाल में बुराई ही निकालेंगे
- चाहे बात स्त्रियों की हो या वाणी (बोलने के तरीके) की
📖 श्लोक
देव्यामपि हि वैदेह्यां सापवादो यतो जनः ।
रक्षागृहस्थितिर्मूलभग्नि शुद्धौ त्वनिश्चयः ॥६॥
🔹 पदच्छेद
देव्याम् + अपि + हि + वैदेह्याम् + स-अपवादः + यतः + जनः ।
रक्षा-गृह-स्थितिः + मूल-भग्नि + शुद्धौ + तु + अनिश्चयः ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- देव्याम् अपि = देवी (श्रेष्ठ स्त्री) में भी
- हि = निश्चय ही
- वैदेह्याम् = वैदेही (सीता) में
- स-अपवादः = अपवाद (निन्दा/आरोप) सहित
- यतः जनः = क्योंकि लोग (जनता)
- रक्षा-गृह-स्थितिः = राक्षस के घर में रहना (रावण के अशोकवाटिका में निवास)
- मूल-भग्नि = मूल में दोष उत्पन्न करने वाला / संदेह का कारण
- शुद्धौ = शुद्धता में
- तु = परन्तु
- अनिश्चयः = निश्चितता नहीं (संदेह बना रहता है)
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
सीता जैसी देवी (पवित्र स्त्री) में भी लोग अपवाद (निन्दा) करते हैं, क्योंकि राक्षस के घर में रहने की बात (रावण के यहाँ रहना) उनकी शुद्धता पर संदेह का कारण बनती है; इसलिए उनकी पवित्रता के विषय में लोगों को निश्चितता नहीं होती।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 यहाँ एक कठोर सामाजिक सच्चाई बताई जा रही है:
- सीता जैसी पवित्र स्त्री पर भी लोग शक करते हैं
- सिर्फ इसलिए कि वह रावण के घर (लंका) में रहीं
- यानी, लोग बिना पूरी सच्चाई जाने भी दोष लगा देते हैं
📖 श्लोक
स्नेहात् सभाजयितुमेत्य दिनान्यमूनि
नीत्वोत्सवेन जनकोऽद्य गतो विदेहान् ।
देव्यास्ततो विमनसः परिसान्त्वनाय
धर्मासनाद् विशति वासगृहं नरेन्द्रः ॥७॥
🔹 पदच्छेद
स्नेहात् + सभाजयितुम् + एत्य + दिनानि + अमूनि + नीत्वा + उत्सवेन ।
जनकः + अद्य + गतः + विदेहान् ।
देव्याः + ततः + विमनसः + परिसान्त्वनाय ।
धर्म-आसनात् + विशति + वास-गृहम् + नरेन्द्रः ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- स्नेहात् = स्नेह के कारण
- सभाजयितुम् = सम्मान करने के लिए
- एत्य = आकर
- दिनानि अमूनि = ये कुछ दिन
- नीत्वा = बिताकर
- उत्सवेन = उत्सव के साथ
- जनकः = जनक (सीता के पिता)
- अद्य = आज
- गतः = चले गए
- विदेहान् = अपने देश (विदेह)
- देव्याः = देवी (सीता) की
- ततः = इसके बाद
- विमनसः = उदास (मन से दुःखी)
- परिसान्त्वनाय = सांत्वना देने के लिए
- धर्मासनात् = राजसभा (न्यायासन) से
- विशति = प्रवेश करता है
- वासगृहम् = रहने का कक्ष (महल का अंदरूनी भाग)
- नरेन्द्रः = राजा (राम)
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
जनक, स्नेहवश (प्रेम से) सम्मान पाने के लिए यहाँ आए थे और कुछ दिन उत्सव के साथ बिताकर आज अपने विदेह देश लौट गए। इसके बाद, सीता के उदास होने पर उन्हें सांत्वना देने के लिए राजा राम राजसभा से उठकर उनके रहने के कक्ष में जाते हैं।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 क्या हो रहा है यहाँ?
- जनक जी आए थे और कुछ दिन रहकर वापस चले गए
- उनके जाने से सीता उदास हो गईं
- तब राम उन्हें समझाने (सांत्वना देने) उनके पास जाते हैं ❤️
📖 श्लोक
किन्त्वनुष्ठाननित्यत्वं स्वातन्त्र्यमपकर्षति ।
संकटा ह्याहिताग्नीनां प्रत्यवायैर्गृहस्थता ॥८॥
🔹 पदच्छेद
किन्तु + अनुष्ठान-नित्यत्वम् + स्वातन्त्र्यम् + अपकर्षति ।
संकटा + हि + आहित-अग्नीनाम् + प्रत्यवायैः + गृहस्थता ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- किन्तु = परन्तु
- अनुष्ठान-नित्यत्वम् = नित्य कर्मों का नियमित पालन
- स्वातन्त्र्यम् = स्वतंत्रता
- अपकर्षति = कम कर देता है / घटा देता है
- संकटा = कठिन / कष्टदायक
- हि = निश्चय ही
- आहित-अग्नीनाम् = जिन्होंने अग्नि स्थापित की है (गृहस्थ, यज्ञ करने वाले)
- प्रत्यवायैः = दोष/पाप के भय से
- गृहस्थता = गृहस्थ जीवन
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
परन्तु नित्य कर्मों का नियमित पालन मनुष्य की स्वतंत्रता को कम कर देता है। और जिन्होंने यज्ञाग्नि स्थापित की है, उनके लिए गृहस्थ जीवन दोष (पाप) के भय से कष्टदायक हो जाता है।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 यहाँ क्या बात कही जा रही है:
- जो लोग धार्मिक नियम (नित्य कर्म) निभाते हैं
→ उनकी आज़ादी कम हो जाती है - और जो गृहस्थ हैं (यज्ञ आदि करते हैं)
→ उन्हें हर समय गलती (पाप) का डर रहता है
📖 श्लोक
विश्वम्भरा भगवती भवतीमसूत
राजा प्रजापतिसमो जनकः पिता ते।
तेषां वधूस्त्वमसि नन्दिनि ! पार्थिवानां,
येषां कुलेषु सविता च गुरुर्वयं च ॥९॥
🔹 पदच्छेद
विश्वम्भरा + भगवती + भवतीम् + असूत ।
राजा + प्रजापति-समः + जनकः + पिता + ते ।
तेषाम् + वधूः + त्वम् + असि + नन्दिनि ।
पार्थिवानाम् + येषाम् + कुलेषु + सविता + च + गुरुः + वयम् + च ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- विश्वम्भरा = पृथ्वी (जो सबको धारण करती है)
- भगवती = पूजनीय / दिव्य
- भवतीम् = आपको (सीता को)
- असूत = उत्पन्न किया (जन्म दिया)
- राजा जनकः = राजा जनक
- प्रजापति-समः = प्रजापति (ब्रह्मा) के समान
- पिता ते = आपके पिता
- तेषाम् = उन (राजाओं) की
- वधूः = वधू (बहू)
- त्वम् असि = आप हैं
- नन्दिनि = हे प्रिय पुत्री
- पार्थिवानाम् = राजाओं के
- येषाम् कुलेषु = जिनके कुलों में
- सविता = सूर्य
- च = और
- गुरुः = गुरु (यहाँ वसिष्ठ)
- वयम् च = और हम
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
हे प्रिय पुत्री! आपको भगवती पृथ्वी ने जन्म दिया है और आपके पिता राजा जनक प्रजापति के समान हैं। आप उन महान राजाओं की वधू हैं, जिनके कुल में सूर्य (वंश) और हम जैसे गुरु (वसिष्ठ) हैं।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 यहाँ सीता की महानता और उच्च कुल बताया जा रहा है:
- उनका जन्म पृथ्वी से हुआ 🌍
- उनके पिता जनक बहुत महान हैं
- और वे राम के कुल (सूर्यवंश) की बहू हैं, जहाँ वसिष्ठ जैसे गुरु हैं
👉 मतलब — सीता हर दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ और सम्माननीय हैं
📖 श्लोक
लौकिकानां हि साधूनामर्थं वागनुवर्तते ।
ऋषिणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ॥१०॥
🔹 पदच्छेद
लौकिकानाम् + हि + साधूनाम् + अर्थम् + वाक् + अनुवर्तते ।
ऋषिणाम् + पुनः + आद्यानाम् + वाचम् + अर्थः + अनुधावति ॥
🔹 शब्दार्थ (Word-by-word meaning)
- लौकिकानाम् = सामान्य लोगों के
- हि = निश्चय ही
- साधूनाम् = सज्जनों के
- अर्थम् = अर्थ (भाव/मतलब)
- वाक् = वाणी (शब्द)
- अनुवर्तते = अनुसरण करती है
- ऋषिणाम् = ऋषियों के
- पुनः = परन्तु
- आद्यानाम् = श्रेष्ठ/प्रथम (महान)
- वाचम् = वाणी
- अर्थः = अर्थ
- अनुधावति = पीछे-पीछे चलता है
🔹 सरल हिन्दी अर्थ 🌼
सामान्य सज्जनों में वाणी (शब्द) अर्थ का अनुसरण करती है (यानि पहले अर्थ होता है, फिर शब्द आते हैं)।
लेकिन महान ऋषियों के मामले में, अर्थ ही उनकी वाणी का अनुसरण करता है (यानि जो वे बोलते हैं, वही सत्य हो जाता है)।
🔹 आसान समझ 🤓
👉 यह श्लोक एक बहुत गहरी बात बता रहा है:
- सामान्य लोग → पहले सोचते हैं (अर्थ), फिर बोलते हैं (वाणी)
- महान ऋषि → जो बोल देते हैं, वही सच हो जाता है ✨
👉 यानी ऋषियों की वाणी में सत्य और शक्ति होती है

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