भू (भवति) धातु ससजुषो रुः (पाणिनि सूत्र 8.2.66). खरवसानयोर्विसर्जनीयः (पाणिनि सूत्र 8.3.15)

1. ससजुषो रुः (पाणिनि सूत्र 8.2.66)वृत्ति: पदस्य सस्य सजुषश्च षस्य ‘रु’ स्यात्।अर्थ: यदि किसी पद के अन्त में ‘स्’ (सकार) हो, या ‘सजुष्’ शब्द का ‘ष्’ (षकार) हो, तो उसके स्थान पर ‘रु’ आदेश हो जाता है।प्रक्रिया: यहाँ ‘रु’ में ‘उ’ की इत्संज्ञा (उपदेशेऽजनुनासिक इत्) होकर केवल ‘र्’ शेष बचता है।उदाहरण:रामस् + अत्र‘ससजुषो रुः’ से … Continue reading भू (भवति) धातु ससजुषो रुः (पाणिनि सूत्र 8.2.66). खरवसानयोर्विसर्जनीयः (पाणिनि सूत्र 8.3.15)