asthangahridhayam ch=14अध्याय-१४, चतुर्दशोऽध्यायः ,द्विविधोपक्रमणीय ,(TWO TYPES OF THERAPY)
📜 श्लोक १ उपक्रम्यस्य हि द्वित्वाद् द्विधैवोपक्रमो मतः ।एकः सन्तर्पणस्तत्र द्वितीयश्चापतर्पणः ॥१॥ 🔹 शब्दार्थ 🔹 व्याख्या इस श्लोक में कहा गया है कि जिस रोग या रोगी का उपचार करना होता है, उसकी स्थिति के अनुसार उपचार भी दो प्रकार का होता है।पहला सन्तर्पण (बृंहण) है, जिसमें शरीर को पोषण देकर मजबूत बनाया जाता है।दूसरा … Continue reading asthangahridhayam ch=14अध्याय-१४, चतुर्दशोऽध्यायः ,द्विविधोपक्रमणीय ,(TWO TYPES OF THERAPY)
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