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अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरंश्चातकान् वीक्ष्यमाणाः श्रेणीभूताः परिगणनया निर्दिशन्तो बलाकाः। त्वामासाद्य स्तनितसमये मानयिष्यन्ति सिद्धाः सोत्कम्पानि प्रियसहचरीसंभ्रमालिङ्गितानि॥ २१॥


अन्वय (गद्य रूप)

स्तनित-समये (सिद्ध-दम्पतयः) अम्भो-बिन्दु-ग्रहण-चतुरान् चातकान् वीक्ष्यमाणाः, परिगणनया श्रेणीभूताः बलाकाः निर्दिशन्तः, त्वाम् आसाद्य प्रियसहचरी-संभ्रम-आलिङ्गितानि सोत्कम्पानि मानयिष्यन्ति।


शब्दार्थ

  • अम्भोबिन्दु-ग्रहण-चतुरान्: पानी की बूंदों को पकड़ने में चतुर।
  • चातकान्: चातक पक्षियों को (जो केवल वर्षा का जल पीते हैं)।
  • श्रेणीभूताः बलाकाः: पंक्तिबद्ध उड़ती हुई बगु़लियों को।
  • परिगणनया निर्दिशन्तः: उंगलियों से गिनकर दिखाते हुए।
  • स्तनितसमये: तुम्हारे गर्जन के समय।
  • प्रियसहचरी-संभ्रम-आलिङ्गितानि: अपनी पत्नियों (प्रियतमाओं) के डर के कारण किए गए आलिंगन को।
  • मानयिष्यन्ति: सम्मान करेंगे या आनंदित होंगे।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मेघ! जब तुम आकाश में गर्जना करोगे, तब सिद्ध पुरुष (आकाशगामी ऋषि-मुनि) तुम्हारा बहुत सम्मान करेंगे। वे तुम्हें देखकर आनंदित होंगे क्योंकि:

१. वे उन चातक पक्षियों को देखेंगे जो तुम्हारी बूंदों को चोंच में पकड़ने की कला में माहिर हैं। २. वे आकाश में एक कतार में उड़ती हुई सफेद बगुलियों को उंगलियों से गिनकर अपनी प्रियतमाओं को दिखाएंगे।

सबसे बढ़कर, जब तुम्हारी गर्जना सुनकर उनकी पत्नियाँ (सिद्ध-स्त्रियाँ) डर के मारे काँपने लगेंगी और घबराकर अपने पतियों से लिपट जाएँगी, तब उन कंपकंपी भरे आलिंगनों के सुख के कारण वे सिद्ध पुरुष तुम्हारा उपकार मानेंगे और तुम्हारा सम्मान करेंगे।

उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे मत्प्रियार्थं यियासोः कालक्षेपं ककुभसुरभौ पर्वते पर्वते ते। शुक्लापाङ्गैः सजलनयनैः स्वागतीकृत्य केकाः प्रत्युद्यातः कथमपि भवान् गन्तुमाशु व्यवस्येत्॥ २२॥


अन्वय (गद्य रूप)

सखे! मत्-प्रियार्थं द्रुतं यियासोः अपि ते ककुभ-सुरभौ पर्वते पर्वते कालक्षेपं उत्पश्यामि। शुक्ल-अपाङ्गैः सजल-नयनैः केकाः स्वागतीकृत्य प्रत्युद्यातः भवान् कथम् अपि आशु गन्तुं व्यवस्येत्।


शब्दार्थ

  • यियासोः: जाने के इच्छुक।
  • मत्प्रियार्थम्: मेरी प्रियतमा के कार्य (सन्देश पहुँचाने) के लिए।
  • कालक्षेपम्: समय की बर्बादी या विलंब।
  • ककुभसुरभौ: ‘ककुभ’ (अर्जुन) के फूलों की सुगंध से महकते हुए।
  • पर्वते पर्वते: प्रत्येक पर्वत पर।
  • शुक्लापाङ्गैः: सफेद कोर (प्रान्त) वाली आँखों वाले (मोरों के लिए)।
  • सजलनयनैः: जल भरी आँखों वाले (प्रेम के आँसू)।
  • केकाः: मोरों की बोली या पुकार।
  • प्रत्युद्यातः: आगे बढ़कर स्वागत किए गए।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मित्र! यद्यपि तुम मेरे प्रिय कार्य के लिए शीघ्रता से जाना चाहते हो, फिर भी मुझे ऐसी आशंका है (उत्पश्यामि) कि मार्ग में ककुभ के फूलों से सुगंधित प्रत्येक पर्वत पर तुम्हारा विलंब होगा।

इसका कारण यह है कि तुम्हें देखकर मोर अपनी सुंदर सफेद आँखों से, जिनमें प्रेम के अश्रु भरे होंगे, ‘के-का’ ध्वनि (मोर की बोली) के माध्यम से तुम्हारा स्वागत करेंगे। जब मोर इस प्रकार तुम्हारा आलिंगन करने के लिए आगे बढ़ेंगे और स्वागत करेंगे, तब ऐसे प्रेमपूर्ण आतिथ्य को छोड़कर तुम आगे बढ़ने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से जुटा पाओगे।

यह मेघदूतम्‘ (पूर्वमेघ) का २३वाँ श्लोक है। यहाँ कालिदास ‘दशार्ण’ देश की वर्षा ऋतु की सुंदरता का वर्णन कर रहे हैं कि मेघ के आने पर वहाँ का वातावरण कैसा हो जाएगा।

मूल श्लोक

पाण्डुच्छायोपवनवृतयः केतकैः सूचिभिन्नै- र्नीडारम्भैर्गृहबलिभुजामाकुलग्रामचैत्याः। त्वय्यासन्ने परिणतफलश्यामजम्बूवनान्ताः सम्पत्स्यन्ते कतिपयदिनस्थायिहंसा दशार्णाः॥ २३॥


अन्वय (गद्य रूप)

त्वयि आसन्ने (सति), सूचि-भिन्नैः केतकैः पाण्डु-छाया-उपवन-वृतयः, नीड-आरम्भैः गृह-बलि-भुजाम् आकुल-ग्राम-चैत्याः, परिणत-फल-श्याम-जम्बू-वनान्ताः, कतिपय-दिन-स्थायि-हंसाः दशार्णाः सम्पत्स्यन्ते।


शब्दार्थ

  • सूचिभिन्नैः केतकैः: खिलती हुई कलियों वाले केतकी (केवड़ा) के फूलों से।
  • पाण्डुच्छायोपवनवृतयः: जिनके उपवनों की बाड़ें सफेद (पीली) आभा वाली हो गई हैं।
  • नीडारम्भैः: घोंसले बनाना शुरू करने के कारण।
  • गृहबलिभुजाम्: घर का अन्न खाने वाले पक्षी (कौवे/गौरैया आदि)।
  • आकुलग्रामचैत्याः: गाँवों के चैत्य (वृक्ष या मंदिर) पक्षियों के शोर से भर गए हैं।
  • परिणतफलश्यामजम्बूवनान्ताः: पके हुए फलों के कारण काले पड़े जामुन के वनों वाले।
  • कतिपयदिनस्थायिहंसाः: जहाँ हंस कुछ दिनों के लिए रुकेंगे (मानसरोवर जाने से पूर्व)।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे मेघ! तुम्हारे निकट आने पर दशार्ण देश का दृश्य अत्यंत मनोरम हो जाएगा:

१. वहाँ के बगीचों की बाड़ें खिलते हुए सफेद केतकी के फूलों से महक उठेंगी और सफेद दिखाई देंगी। २. गाँवों के पुराने विशाल वृक्षों (चैत्य वृक्षों) पर घरेलू पक्षी अपने घोंसले बनाना शुरू कर देंगे, जिससे वे स्थान चहचहाहट से भर जाएंगे। ३. जामुन के वन पके हुए फलों के कारण गहरे काले रंग के दिखाई देने लगेंगे। ४. और मानसरोवर की ओर यात्रा करने वाले हंस, वहाँ की सुंदरता देखकर कुछ दिनों के लिए वहीं रुक जाएंगे।

संक्षेप में, तुम्हारे आने से पूरा दशार्ण देश खुशहाली और प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब हो जाएगा।


विशेष:

  1. प्राकृतिक वर्णन: कालिदास ने वर्षा ऋतु के आगमन पर वनस्पतियों और पक्षियों के व्यवहार में आने वाले परिवर्तन का सटीक चित्रण किया है।
  2. दशार्ण: यह प्राचीन भारत का एक प्रसिद्ध जनपद था जिसकी राजधानी विदिशा थी।
  3. छन्द: मन्दाक्रान्ता।

तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीं गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा। तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यस्मा- त्सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि॥ २४॥


अन्वय (गद्य रूप)

तेषां (दशार्णानां) दिक्षु प्रथित-विदिशा-लक्षणां राजधानीं गत्वा कामुकत्वस्य अविकलं फलं सद्यः लब्धा (असि)। यस्मात् तीरोपान्त-स्तनित-सुभगं वेत्रवत्याः चलोर्मि पयो सभ्रूभङ्गं मुखम् इव पास्यसि।


शब्दार्थ

  • प्रथितविदिशालक्षणाम्: ‘विदिशा’ नाम से प्रसिद्ध।
  • अविकलं फलम्: पूर्ण फल (सफलता)।
  • कामुकत्वस्य: विलासी या प्रेमी होने का।
  • तीरोपान्तस्तनितसुभगम्: किनारों के पास गर्जना करने से सुंदर लगने वाला।
  • चलोर्मि: चंचल लहरों वाला।
  • सभ्रूभङ्गं मुखमिव: भौहें टेढ़ी किए हुए मुख के समान।
  • पयः: जल।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मेघ! उन दशार्णों की दिशा में स्थित प्रसिद्ध राजधानी विदिशा में पहुँचकर तुम्हें अपने ‘कामी’ (प्रेमी) होने का पूरा फल तुरंत मिल जाएगा।

वहाँ तुम वेत्रवती नदी का वह स्वादिष्ट और लहरों के कारण चंचल जल पियोगे, जो किनारों पर तुम्हारे गर्जन के कारण और भी सुंदर जान पड़ता है। वह नदी और उसकी चंचल लहरें ऐसी प्रतीत होंगी मानो कोई सुंदरी प्रेमवश अपनी भौहें तिरछी (कटाक्ष) करके अपना मुख तुम्हारे सामने कर रही हो। उस जल को पीना किसी प्रेयसी के अधरों का पान करने के समान सुखकारी होगा।

यह मेघदूतम्‘ (पूर्वमेघ) का २५वाँ श्लोक है। यहाँ यक्ष मेघ को नीचैः नामक पर्वत पर विश्राम करने और वहाँ के विलासी वातावरण का अनुभव करने के लिए कह रहा है।

मूल श्लोक

नीचैराख्यं गिरिमधिवसेस्तत्र विश्रामहेतो- स्त्वत्सम्पर्कात् पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः। यः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर्नागराणा- मुद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभिर्यौवनानि॥ २५॥


अन्वय (गद्य रूप)

तत्र विश्राम-हेतोः नीचैः-आख्यं गिरिम् अधिवसेः, यः त्वत्-सम्पर्कात् प्रौढ-पुष्पैः कदम्बैः पुलकितम् इव (राजते)। यः पण्य-स्त्री-रति-परिमल-उद्गारिभिः शिला-वेश्मभिः नागराणाम् उद्दामानि यौवनानि प्रथयति।


शब्दार्थ

  • नीचैराख्यं गिरिम्: ‘नीचैः’ नामक पर्वत पर।
  • अधिवसेः: ठहरना या विश्राम करना।
  • त्वत्सम्पर्कात्: तुम्हारे स्पर्श (वर्षा) से।
  • पुलकितमिव: रोमांच हो आने के समान।
  • प्रौढपुष्पैः कदम्बैः: खिले हुए कदम्ब के फूलों से।
  • पण्यस्त्री: वारांगनाएँ या गणिकाएँ।
  • रतिपरिमलोद्गारिभिः: रति-क्रीड़ा के समय उपयोग किए गए इत्र/सुगंध को उगलने वाले।
  • शिलावेश्मभिः: गुफाओं या पत्थर के घरों (Rock shelters) के द्वारा।
  • नागराणाम्: नगरवासियों के।
  • उद्दामानि यौवनानि: स्वच्छंद या तीव्र यौवन को।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे मेघ! विदिशा के पास ही नीचैः नाम का एक पर्वत है, तुम मार्ग की थकावट मिटाने के लिए वहाँ अवश्य रुकना। जब तुम्हारी वर्षा की बूंदें उस पर्वत को छुएँगी, तो वहाँ कदम्ब के फूल खिल उठेंगे। उन खिले हुए फूलों को देखकर ऐसा लगेगा मानो तुम्हारे स्पर्श से वह पर्वत ‘रोमांचित’ (पुलकित) हो उठा हो।

वह पर्वत वहाँ के नगरवासियों के विलासी जीवन का गवाह है। वहाँ की गुफाओं (शिला-गृहों) से इत्र और विलासी सुगंध की खुशबू आती रहती है, जो इस बात का प्रमाण देती है कि वहाँ के युवा अपनी प्रियतमाओं के साथ कितना स्वच्छंद और कामुक जीवन व्यतीत करते हैं। वह पर्वत अपने पत्थर के महलों के माध्यम से उन नगरवासियों के उच्छृंखल यौवन की कहानियाँ सुनाता प्रतीत होता है।

विश्रान्तः सन् व्रज वननदीतीरजातानि सिञ्च- न्नुद्यानानां नवजलकणैर्यूथिकाजालकानि। गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तकर्णोत्पलानां छायादानात् क्षणपरिचितः पुष्पलावीमुखानाम्॥ २६॥


अन्वय (गद्य रूप)

(नीचैः गिरौ) विश्रान्तः सन्, उद्यानानां वन-नदी-तीर-जातानि यूथिका-जालकानि नव-जल-कणैः सिञ्चन् व्रज। (तथा) छाया-दानात् गण्ड-स्वेद-अपनयन-रुजा-क्लान्त-कर्ण-उत्पलानां पुष्प-लावी-मुखानां क्षण-परिचितः (भव)।


शब्दार्थ

  • विश्रान्तः सन्: विश्राम करने के बाद।
  • ब्रज: (आगे) बढ़ो या जाओ।
  • यूथिकाजालकानि: जूही की कलियों को।
  • नवजलकणैः: नवीन जल की बूंदों से।
  • गण्डस्वेदापनयन: गालों के पसीने को पोंछने के कारण।
  • क्लान्तकर्णोत्पलानाम्: कानों में पहने हुए कमल के फूलों के कुम्हला जाने वाली।
  • पुष्पलावीमुखानम्: फूल तोड़ने वाली स्त्रियों (मालिनों) के मुखों का।
  • क्षणपरिचितः: क्षण भर के लिए मित्र या परिचित।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मेघ! ‘नीचैः’ पर्वत पर विश्राम कर लेने के बाद तुम आगे बढ़ना। मार्ग में पड़ने वाले उद्यानों और वन-नदियों के किनारे खिली हुई जूही की कलियों को अपनी नन्ही जल-बूंदों से सींचते हुए जाना।

वहाँ तुम उन पुष्प चुनने वाली मालिनों को भी सुख पहुँचाना, जो कड़ी धूप में फूल तोड़ रही हैं। गर्मी और मेहनत के कारण उनके गाल पसीने से भीग गए हैं और उस पसीने को बार-बार पोंछने के कारण उनके कानों में लगे हुए कमल के फूल कुम्हला (मुरझा) गए हैं। जब तुम अपनी छाया से उन्हें शीतलता प्रदान करोगे, तब उन थकी हुई सुंदरियों के मुख खिल उठेंगे और तुम क्षण भर के लिए उनके ‘परिचित’ (उपकारी मित्र) बन जाओगे।

वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जयिन्याः। विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां लोलापाङ्गैर्यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि॥ २७॥


अन्वय (गद्य रूप)

उत्तराशां प्रस्थितस्य भवतः पन्था यद्-अपि वक्रः (अस्ति), (तथापि) उज्जयिन्याः सौध-उत्सङ्ग-प्रणय-विमुखः मा स्म भूः। तत्र विद्युत्-दाम-स्फुरित-चकितैः पौराङ्गनानां लोल-अपाङ्गैः लोचनैः यदि न रमसे, (तर्हि त्वं) वञ्चितः असि।


शब्दार्थ

  • वक्रः पन्था: टेढ़ा रास्ता।
  • उत्तराशाम्: उत्तर दिशा की ओर।
  • सौधोत्सङ्ग: महलों की छतों या अट्टालिकाओं।
  • प्रणयविमुखः: प्रेम से विमुख (न जाने वाला)।
  • मा स्म भूः: मत होना।
  • विद्युद्दाम: बिजली की चमक।
  • पौराङ्गनानाम्: नगर (उज्जैन) की स्त्रियों के।
  • लोलापाङ्गैः: चंचल कटाक्षों वाले।
  • वञ्चितोऽसि: तुम ठगे गए (वंचित रह गए)।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे मेघ! यद्यपि तुम्हें उत्तर दिशा की ओर जाना है और उज्जैन जाने के लिए तुम्हारा मार्ग कुछ टेढ़ा (लंबा) हो जाएगा, फिर भी तुम उज्जैन के विशाल महलों की छतों पर विश्राम करने के सुख से विमुख मत होना (अर्थात वहाँ जरूर जाना)।

यदि तुम वहाँ नहीं गए, तो तुम एक बहुत बड़े आनंद से वंचित रह जाओगे। जब तुम वहाँ पहुँचोगे और आकाश में बिजली चमकाओगे, तब उस बिजली की चमक से चौंककर उज्जैन की सुंदरियाँ अपनी चंचल और तिरछी आँखों से तुम्हें निहारेंगी। यदि तुमने उन सुंदरियों के कटाक्षों और उनकी प्रेमभरी चितवनों का आनंद नहीं लिया, तो समझो कि तुम्हारा जन्म लेना व्यर्थ गया और तुम दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु देखने से ‘ठगे’ गए।

वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणिकाञ्चीगुणायाः संसर्पन्त्याः स्खलितसुभगं दर्शितावर्तनाभेः। निर्विन्ध्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः सन्निपत्य स्त्रीणामाद्यं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु॥ २८॥


अन्वय (गद्य रूप)

पथि वीचि-क्षोभ-स्तनित-विहग-श्रेणि-काञ्ची-गुणायाः, स्खलित-सुभगं संसर्पन्त्याः, दर्शित-आवर्त-नाभेः निर्विन्ध्यायाः सन्निपत्य रसाभ्यन्तरः भव। हि स्त्रीणाम् प्रियेषु आद्यं प्रणय-वचनं विभ्रमः (भवति)।


शब्दार्थ

  • वीचिक्षोभ: लहरों की हलचल।
  • विहगश्रेणिकाञ्चीगुणायाः: पक्षियों की पंक्ति रूपी करधनी (Kamarband) वाली।
  • स्खलितसुभगम्: पत्थरों से टकराकर सुंदर लड़खड़ाती हुई चाल।
  • दर्शितावर्तनाभेः: भंवर (Whirlpool) रूपी नाभि को दिखाने वाली।
  • रसाभ्यन्तरः: रस (जल) का रसास्वादन करने वाला या प्रेम में मग्न।
  • विभ्रमः: हाव-भाव या विलासपूर्ण चेष्टाएँ।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि मार्ग में तुम्हें निर्विन्ध्या नदी मिलेगी। वह नदी ऐसी प्रतीत होती है मानो कोई सुंदर नायिका हो। लहरों के टकराने से चहकते हुए पक्षियों की जो कतार है, वह उस नदी-रूपी नायिका की करधनी (Jewelled belt) के समान है जो मधुर शब्द कर रही है।

वह नदी पत्थरों के बीच से लड़खड़ाती हुई अत्यंत सुंदर गति से बह रही है। उसके जल में पड़ने वाले भंवर उसकी नाभि के समान दिखाई दे रहे हैं। यक्ष कहता है कि तुम उस नदी के पास जाकर उसके जल (रस) का आनंद लेना।

यहाँ कालिदास एक बहुत सुंदर मनोवैज्ञानिक सत्य कहते हैं— स्त्रियों का अपने प्रियतम के सामने हाव-भाव दिखाना या लज्जा के साथ चपलता करना ही उनका पहला प्रेम-निवेदन (Love Proposal) होता है।” अतः वह नदी अपने भंवर और अपनी लहरों के माध्यम से तुम्हें प्रेम का आमंत्रण दे रही है, उसे स्वीकार करना।

वेणीभूतप्रतनुसलिलाऽसावतीतस्य सिन्धुः पाण्डुच्छाया तटरुहतरुभ्रंशिभिः शीर्णपर्णैः। सौभाग्यं ते सुभग विरहावस्थाया व्यञ्जयन्ती कार्श्यं येन त्यजति विधिना स त्वयैवोपपाद्यः॥ २९॥


अन्वय (गद्य रूप)

हे सुभग! अतीतस्य ते विरहावस्थाम् व्यञ्जनयन्ती, तट-रुह-तरु-भ्रंशिभिः शीर्ण-पर्णैः पाण्डु-छाया, वेणीभूत-प्रतनु-सलिला असौ सिन्धुः (अस्ति)। येन विधिना सा कार्श्यं त्यजति, सः (विधिः) त्वयि एव उपपाद्यः।


शब्दार्थ

  • सुभग: हे भाग्यशाली (मेघ के लिए संबोधन)।
  • अतीतस्य: (तुम्हारे) चले जाने पर।
  • वेणीभूत-प्रतनु-सलिला: एक पतली धारा के रूप में बहने वाली, जो ‘वेणी’ (चोटी) जैसी लग रही है।
  • पाण्डुच्छाया: पीले रंग की आभा वाली।
  • शीर्णपर्णैः: सूखे हुए पत्तों से।
  • व्यञ्जयन्ती: प्रकट करती हुई।
  • कार्श्यम्: दुबलापन (धारा का कम होना)।
  • विधिना: उपाय से।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे भाग्यशाली मेघ! तुम्हारे वियोग में यह सिन्धु नदी अत्यंत विह्वल और दुबली हो गई है। इसकी जलधारा अब बहुत पतली हो गई है, जो ऐसी लग रही है मानो किसी विरहिणी स्त्री की चोटी‘ (वेणी) हो।

नदी के किनारों पर लगे वृक्षों से सूखे पीले पत्ते जल में गिर रहे हैं, जिससे नदी का रंग पीला (पाण्डु) पड़ गया है। यह पीलापन और नदी का दुबलापन तुम्हारे प्रति उसके अनन्य प्रेम और विरह के दुःख को प्रकट कर रहा है। अब तुम्हें ही कोई ऐसा उपाय करना चाहिए (अर्थात वर्षा करनी चाहिए), जिससे वह नदी अपनी इस दुर्बलता को त्याग दे और फिर से जल से भरकर प्रसन्न हो जाए।

दीर्घीकुर्वन् पटु मदकलं कूजितं सारसानां, प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः। यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिमङ्गानुकूलः, शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः॥ ३१॥


अन्वय (गद्य रूप)

यत्र प्रत्यूषेषु सारसानां पटु मदकलं कूजितं दीर्घीकुर्वन्, स्फुटित-कमल-आमोद-मैत्री-कषायः, अङ्गानुकूलः शिप्रावातः प्रार्थना-चाटुकारः प्रियतम इव स्त्रीणां सुरतग्लानिं हरति।


शब्दार्थ

  • दीर्घीकुर्वन्: लम्बा करता हुआ (ध्वनि को दूर तक फैलाने वाला)।
  • मदकलम् कूजितम्: सारस पक्षियों की मधुर और मदभरी बोली।
  • प्रत्यूषेषु: उषाकाल में (भोर के समय)।
  • स्फुटितकमलामोद: खिले हुए कमलों की सुगंध।
  • मैत्रीकषायः: (सुगंध के साथ) मेल हो जाने के कारण सुगंधित और शीतल।
  • सुरतग्लानिम्: रति-क्रीड़ा से उत्पन्न थकान।
  • प्रार्थनाचाटुकारः: मनुहार या प्रिय वचन बोलने वाला।

हिन्दी व्याख्या

भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे मेघ! उस उज्जैन नगरी में शिप्रा नदी की वायु बहुत ही सुखद है। सुबह के समय जब यह वायु चलती है, तो यह सारस पक्षियों की गूंजती हुई मधुर बोली को और भी दूर तक फैला देती है। यह वायु खिले हुए कमलों की सुगंध से मिलकर शीतल और खुशबूदार हो जाती है।

जब यह वायु वहां की स्त्रियों के शरीर को स्पर्श करती है, तो वह उनकी रात भर की सारी थकान (सुरत-ग्लानि) को हर लेती है। यह वायु ऐसी प्रतीत होती है मानो कोई प्रियतम अपनी रूठी हुई प्रेयसी को मनाने के लिए मीठी-मीठी बातें (चाटुकारी) कर रहा हो और उसे सुख पहुँचा रहा हो।

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