संस्कृत शिक्षण केंद्र

महाकवि-भवभूतिप्रणीतम्

उत्तररामचरितम्

प्रथमोऽङ्कः

इदं कविभ्यः पूर्वेभ्यो नमोवाकं प्रशास्महे।

विन्देम देवतां वाचममृतामात्मनः कलाम्॥१॥

अन्वयः – पूर्वेभ्यः कविभ्यः नमोवाकम् ‘आत्मनः कलाम् अमृतां वाचं देवतां विन्देम’ इदं प्रशास्महे।

हिन्दी अर्थ – हम अपने पूर्ववर्ती (बाल्मीकि, व्यास, भास, कालिदास आदि) कवियों को नमस्कारवचन कहते हुए परब्रह्म-परमात्मा की कलास्वरूप वाग् देवता को प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

यं ब्रह्माणमियं देवी वाग्वश्येवानुवर्तते।

उत्तरं रामचरितं तत्प्रणीतं प्रयोक्ष्यते॥ २ ॥

अन्वयः — इयं देवी वाक् वश्या इव यं ब्रह्माणम् अनुवर्तते। तत्प्रणीतम् उत्तरं रामचरितं प्रयोक्ष्यते।

हिन्दी अर्थ — यह वाग्देवी सरस्वती वशवर्तिनी अनुचरी की भांति जिस ब्रह्मस्वरूप भवभूति का अनुसरण करती है। उनके द्वारा रचित उत्तररामचरित नाम के नाटक का हम अभिनय करने जा रहे हैं।

वसिष्ठाधिष्ठिता देव्यो गता रामस्य मातरः।

अरुन्धतीं पुरस्कृत्य यज्ञे जामातुराश्रमम्॥ ३ ॥

अन्वयः — वसिष्ठाधिष्ठिताः देव्यः रामस्य मातरः अरुन्धतीं पुरस्कृत्य यज्ञे जामाताुः आश्रमं गताः।

नट — और भी—

हिन्दी अर्थ — महर्षि वसिष्ठ द्वारा अपने संरक्षण में ले जाई राम की माताएँ (कौशल्या आदि) देवियाँ, वसिष्ठ पत्नी अरुन्धती को आगे कर यज्ञ में (सम्मिलित होने के लिए) जामाता ऋष्यशृङ्ग के आश्रम में गई हैं।

नटः — कन्यां दशरथो राजा शान्तां नाम व्यजीजनत्।

अपत्यकृतिकां राज्ञे रोमपादाय यां ददौ॥ ४ ॥

अन्वयः — राजा दशरथः शान्तां नाम कन्यां व्यजीजनत्। याम् अपत्य कृतिकां राज्ञे रोमपादाय ददौ।

हिन्दी अर्थ — नट — राजा दशरथ ने शान्ता नामक कन्या को उत्पन्न किया, जिसको दत्तक पुत्री के रूप में राजा रोमपाद या लोमपाद को दे दिया।

सूत्रधारः — मारिष,

सर्वथा व्यवहर्तव्यं कुतो ह्यवचनीयता।

यथा स्त्रीणां तथा वाचां साधुत्वे दुर्जनोजनः॥ ५ ॥

अन्वयः — सर्वथा व्यवहर्तव्यं, अवचनीयता कुतोहि। जनः यथा स्त्रीणां तथा वाचां साधुत्वे दुर्जनः।

हिन्दी अर्थ — आर्य! जैसे कैसे सब प्रकार से अवसरोचित व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि सर्वथा निर्दोषता कैसे हो सकती है? (इस संसार में) लोग जैसे स्त्रियों के पातिव्रत्य के विषय में सन्देहशील रहते हैं वैसे ही वाणी की निर्दोषता के विषय में भी शंकालु रहते हैं अर्थात् कवियों के काव्यों में भी दोषदर्शी होते हैं।

नटः — अति दुर्जन इति वक्तव्यम्।

देव्यामपि हि वैदेह्यां सापवादो यतो जनः।

रक्षागृहस्थितिमूलमग्निशुद्धौ त्वनिश्चयः॥ ६ ॥

अन्वयः — यतो हि जनः देव्यां वैदेह्याम् अपि सापवादः। रक्षागृह स्थितिः मूलम्, अग्निशुद्धौ तु अनिश्चयः।

हिन्दी अर्थ — नट — दोषदर्शी को तो अति दुर्जन कहना चाहिए। क्योंकि— लोग देवी सीता के विषय में भी दोष देखने वाले हैं। उनका राक्षस रावण के घर के रहना निन्दा का कारण है (सीता की) अग्निपरीक्षा के द्वारा सिद्ध निर्दोषता पर विश्वास नहीं करते।

स्नेहात् सभाजयितुमेत्य दिनान्यमूनि नीत्वोत्सवेन जनकोऽद्य गतो विदेहान्।

देव्यास्ततो विमनसः परिसान्त्वनाय धर्मासनाद् विशति वासगृहं नरेन्द्रः॥ ७ ॥

(इति निष्क्रान्तौ) इति प्रस्तावना

अन्वय — स्नेहात् सभाजयितुम् एत्य अमूनि दिनानि उत्सवेन नीत्वा जनकः अद्य विदेहान् गतः। ततः विमनसः देव्याः परिसान्त्वनाय नरेन्द्रः धर्मासनात् वासगृहं विशति।

हिन्दी अर्थ — प्रीति के कारण (राम का) अभिनन्दन करने के लिए (अयोध्या में) आए हुए राजा जनक इतने दिन आमोद प्रमोद से बिताकर आज मिथिला लौट गए हैं। इसलिए खिन्न हृदय वाली देवी सीता को सान्त्वना देने के लिए राम न्यायासन से उठकर वासगृह में गए हैं।

किन्त्वनुष्ठाननित्त्यत्वं स्वातन्त्र्यमपकर्षति।

संकटा ह्याहिताग्नीनां प्रत्यवायैर्गृहस्थता॥ ८ ॥

अन्वयः — किन्तु अनुष्ठाननित्यत्वं स्वातन्त्र्यम् अपकर्षति। हि आहिताग्नीनां गृहस्थता प्रत्यवायैः संकटा।

(तो उसके बाद बैठे हुए राम और सीता का प्रवेश)

राम — हे देवी सीता, धैर्य रखो। वे गुरूजन (जनक आदि) हमें (अधिक समय तक) नहीं छोड़ सकते।

हिन्दी अर्थ — किन्तु अनुष्ठान (नित्य प्रति किए जाने वाले यज्ञ आदि) की अनिवार्यता स्वच्छन्दता को छीन लेती है। क्योंकि अग्निहोत्रियों का गृहस्थ-जीवन पातकों के कारण संकटमय होता है।

विश्वम्भरा भगवती भवतीमसूत राजा प्रजापतिसमो जनकः पिता ते। तेषां वधूस्त्वमसि नन्दिनि! पार्थिवानां, येषां कुलेषु सविता च गुरुर्वयं च ॥९॥

तत्किमन्यदाशास्महे? केवलं वीरप्रसवा भूयाः।


विश्वम्भरा भगवती भवतीमसूत राजा प्रजापतिसमो जनकः पिता ते।

तेषां वधूस्त्वमसि नन्दिनि! पार्थिवानां, येषां कुलेषु सविता च गुरुर्वयं च ॥९॥

Ashtavakra’s Dialogue

अष्टावक्रः — (बैठकर) और क्या? हे देवी, कुलगुरु भगवान् वसिष्ठ ने यह कहा है–


अन्वय (Anvaya – Prose Order)

भगवती विश्वंभरा भवतीम् प्रसूत, प्रजापति समः राजा जनकः ते पिता। हे नन्दिनि! तेषां पार्थिवानां त्वं वधूः असि, येषां कुले सविता गुरु, वयं च गुरवः।


हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)

विश्व का भरण करने वाली भगवती पृथ्वी ने आपको जन्म दिया है, प्रजापति के समान राजा जनक आपके पिता हैं। हे आनन्ददायिनि, उन (लोक प्रसिद्ध) राजाओं की आप पुत्रवधू हैं जिनके कुल में सूर्य गुरु (वंशप्रवर्तक) हैं और हम उपदेष्टा हैं।

लौकिकानां हि साधूनामर्थं वागनुवर्तते ।

ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ॥१०॥


अन्वय (Anvaya – Prose Order)

लौकिकानां साधूनां वाक् हि अर्थम् अनुवर्तते। पुनः आद्यानाम् ऋषीणां वाचम् अर्थः अनुधावति।


हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)

हम आपके अनुगृहीत हैं। लौकिक सज्जनों की वाणी तो अर्थ का अनुसरण करती है किन्तु लोकोत्तर ऋषियों की वाणी का अर्थ अनुसरण करता है।

जामातृ यज्ञेन वयं निरुद्धा……………….. स्त्वं बाल एवासि नवं च राज्यम्। युक्तः प्रजानामनुरञ्जने स्या- स्तस्माद्यशो यत् परमं धनं वः ॥११॥


अन्वय (Anvaya – Prose Order)

वयं जामातृयज्ञेन निरुद्धा:। त्वं बाल: एव असि, नवं च राज्यम्। प्रजानाम् अनुरञ्जने युक्त: स्या:। तस्माद् यश: यत् व: परमं धनम्।


हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)

हम जामाता (ऋष्यशृंग) के यज्ञ के कारण रुके हुए हैं। तुम बालक हो और नया राज्य है। प्रजा के अनुरञ्जन में तुम तत्पर रहो। उसी से यश होगा जो तुम लोगों का परम धन है।

स्नेहं दयाँ च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।

आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥१२॥


अन्वय (Anvaya – Prose Order)

लोकस्य आराधनाय स्नेहं दयाँ च सौख्यं च, यदि वा जानकीम् अपि मुञ्चतः मे व्यथा न अस्ति।


हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)

भगवान वसिष्ठ जैसी आज्ञा देते हैं। (वैसा ही होगा) प्रजा के अनुरञ्जन के लिए स्नेह, दया, सुख अथवा जनकसुता सीता को भी छोड़ते हुए मैं व्यथित नहीं होऊंगा।

उत्पत्तिपरिपूतायाः किमस्याः पावनान्तरैः।

तीर्थोदकं च वह्निश्च नान्यतः शुद्धिमर्हतः ॥१३॥

अन्वयः — उत्पत्तिपरिपूतायाः अस्याः पावनान्तरैः किम्? तीर्थोदकं च वह्नि च अन्यतः शुद्धिं न अर्हतः।

हिन्दी अर्थ — ऐसा मत कहो। (सान्त्वना वचनों के साथ) जन्म से शुद्ध इस सीता का अन्य पवित्र करने वाले साधनों से क्या प्रयोजन। तीर्थों का जल और अग्नि किन्हीं अन्य पदार्थों से शुद्धि के योग्य नहीं।

कष्टं जनः कुलधनैरनुरञ्जनीयस्तन्नो यदुक्तमशिवं न हि तत्क्षमं ते।

नैसर्गिकी सुरभिणः कुसुमस्य सिद्धा मूर्ध्नि स्थितिर्न चरणैरवताडनानि ॥१४॥

अन्वयः — कष्टम्, कुलधनै जनः अनुरञ्जनीयः। तत् न यत् अशिवम् उक्तम् तत् ते नहि क्षमम्। सुरभिणः कुसुमस्य मूर्ध्नि स्थिति नैसर्गिकी सिद्धा न चरणैः अवताडनानि।

हिन्दी अर्थ — खेद की बात है कि कुल के (यश रूपी धन को सुरक्षित रखने के लिए) यश रूपी धन वालों (राजाओं को) को प्रजा को प्रसन्न रखना होता है। (कुछ लोगों द्वारा) हमारे विषय में जो अभद्र बातें कही गई हैं वे तुम्हारे विषय में सर्वथा अनुचित हैं। सुगन्धित सुमन का सिर पर धारण करना स्वाभाविक है, न कि पैरों से कुचला जाना।

ब्रह्मादयो ब्रह्महिताय तप्त्वा, परः सहस्रं शरदस्तपांसि।

एतान्यपश्यन् गुरवः पुराणाः, स्वान्येव तेजांसि तपोमयानि ॥१५॥


अन्वय (Anvaya – Prose Order)

ब्रह्मादयः पुराणा गुरवः ब्रह्महिताय परःसहस्रं शरदः तपांसि तप्त्वा स्वानि एव तपोमयानि तेजांसि एतानि अपश्यन्।


हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)

ब्रह्मा आदि प्राचीन आचार्यों ने वेदों (प्रतिपाद्य धर्म) के हित के लिए, सहस्र से अधिक वर्षों तक तप करके अपने ही तपोमय तेज से उद्भूत इन (जृम्भकास्त्रों) को देखा।

सम्बन्धिनो वसिष्ठादीनेष तातस्तवार्चति।

गौतमश्च शतानन्दो जनकानां पुरोहितः ॥१६॥


अन्वय (Anvaya – Prose Order)

एष तव तात: जनकानां पुरोहित: गौतम: शतानन्द: च सम्बन्धिन: वसिष्ठादीन् अर्चति।


Dialogue

लक्ष्मणः — आर्ये (सीते), देखिए देखिए


हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)

ये आपके पिता (जनक) और जनककुल के पुरोहित गौतम-पुत्र शतानन्द (वरपक्ष में बैठे) सम्बन्धी (रघुकुल गुरु) वसिष्ठ आदि की पूजा कर रहे हैं।

जनकानां रघूणां च सम्बन्धः कस्य न प्रियः।
यत्र दाता ग्रहीता च स्वयं कुशिकनन्दनः ॥१७॥

हिन्दी अर्थ – जनकवंशियों और रघुवंशियों का सम्बन्ध किसको प्रिय नहीं है, जहाँ पर स्वयं ऋषि विश्वामित्र (कन्यादान देने वाले) दाता भी (स्वयं ही) ग्रहणकर्ता (कन्यादान लेने वाले) भी हैं। अर्थात् जनक के प्रेरक होने से कन्या पक्षीय, राम के प्रेरक होने से वरपक्षीय हैं।

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