ashtanga hridayam अष्टांगहृदय ,13 अध्याय दोषोपक्रमणीय(treatment of the dosas)Dosha-Upakramaniya



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अध्याय-१३

त्रयोदशोऽध्यायः

दोषोपक्रमणीय

( Treatment of the Doṣas )

अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । इतिह स्माहुरात्रेयदयो महर्षयः । अब हम दोषोपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था ।

वातोपचार ( Treatment of increased vāta )

वातवस्योपक्रमः स्नेहः स्वेदः संशोधनं मृदु । स्वाद्वम्ललवणोष्णानि भोज्यान्यभ्यङ्ग मर्दनम् ॥१ ॥ वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यं पैष्टिकगौडिकम् । स्निग्धोष्णा बस्तयो बस्तिनियमः सुखशलीता ॥२ ॥ दीपनैः पाचनैः सिद्धाः स्नेहाश्चनेकयोनयः । विशेषान्मेद्यपिशितरसत्तैलानुवासनम् ॥३ ॥

वातोपचार निम्न प्रकार से करना चाहिए- (1) स्नेहन, स्वेदन एवं मृदु संशोधन (mild purificatory therapies) द्वारा (2) मधुर (sweet), अम्ल (Sour), लवण (Salt taste) रस के प्रयोग द्वारा, (3) उष्ण भोजन, अभ्यङ्ग व मर्दन एवं परिषेक द्वारा (4) वेष्टन (Wrapping the body with cloth), त्रास, भय या डराना (Threating) द्वारा (मानस वात कामना के लिए)

(5) पिष्टी एवं गुड (Jaggery or molasses) से निर्मित मद्य प्रयोग द्वारा (6) स्निग्ध एवं उष्ण बस्तियों का नियमित प्रयोग एवं सुखाभास द्वारा (7) दीपन, (चित्रक आदि), पाचन (मुस्ता आदि) आदि द्रव्यों से सिद्ध अनेक योनि वाले स्नेह (तिल तैल, अलसी तैल, गाय का घी, भैंस का घी इत्यादि) प्रयोग द्वारा। (8) विशेषकर मेदयुक्त मांस-रस, तैल एवं अनुवासन बस्ति (स्नेहबस्ति) द्वारा उपरोक्त सभी विधियों के प्रयोग द्वारा चिकित्सक प्रकुपित वायु की चिकित्सा करके शमन कर सकता है।

श्लोक का सरल अर्थ

१. वातवस्योपक्रमः…

“वात के उपचार में”

  • स्नेह = घी, तेल आदि से शरीर को स्निग्ध करना
  • स्वेद = पसीना लाना / सेक देना
  • मृदु संशोधन = हल्का शोधन (जैसे हल्का विरेचन)
  • स्वादु, अम्ल, लवण, उष्ण भोज्य = मीठा, खट्टा, नमकीन और गरम भोजन

👉 मतलब: वात को शांत करने के लिए तेल, घी, गरम भोजन और हल्का शोधन उपयोगी है।


अभ्यङ्ग मर्दनम्…

  • अभ्यंग = तेल मालिश
  • मर्दन = शरीर दबाना / massage

👉 वात में oil massage बहुत लाभदायक माना गया है।


२. वेष्टनं त्रासनं सेको…

  • वेष्टन = शरीर को कपड़े से लपेटना
  • सेक = गरम सेक
  • मद्यं पैष्टिकगौडिकम् = पौष्टिक मद्य (औषधीय पेय)
  • स्निग्धोष्ण बस्ति = तेलयुक्त और गरम बस्ति
  • बस्तिनियमः = बस्ति का नियमित प्रयोग
  • सुखशीलता = आरामदायक जीवन

👉 वात रोग में गरमाहट, तेल, बस्ति और आराम सबसे ज़्यादा उपयोगी हैं।


३. दीपनैः पाचनैः…

  • दीपन = अग्नि बढ़ाने वाली औषधि
  • पाचन = भोजन पचाने वाली औषधि
  • सिद्ध स्नेह = औषधि से सिद्ध घृत/तेल
  • मेद्य, पिशित रस = मांस रस / पौष्टिक सूप
  • तैलानुवासनम् = तेल की अनुवासन बस्ति

👉 यहाँ बताया गया है कि वात में

  • पाचन सुधारा जाए
  • घी/तेल दिया जाए
  • पौष्टिक मांस रस या सूप दिया जाए
  • तेल बस्ति सबसे विशेष लाभ देती है।

एक लाइन में सार

वात दोष का मुख्य इलाज है — स्नेह (तेल/घी), स्वेदन (गरम सेक), अभ्यंग, गरम पौष्टिक भोजन, और बस्ति।

पित्तोपचार ( Treatment for increased Pitta ) पित्तस्य सर्पिषः पानं स्वादुशीतैर्विरेचनम् । स्वादुतिक्तकषायाणि भोजनान्यौषधानि च ॥४ ॥ सुगन्धिशीतहृद्यानां गन्धानामुपसेवनम् । कण्ठे गुणानां हाराणां मणीनामुुरसा धृतिः ॥५ ॥ कर्पूरचन्दनोशीरैनुलेपः क्षणे क्षणे । प्रदोषश्चन्द्रमाः सौधं हारि गीतं हिमोऽनिलः ॥६ ॥ अर्यन्त्रणसुखं मित्रं पुत्रः सन्दिग्धमुग्धवाक् । छन्दानुवर्तिनो दाराः प्रियाः शीलविभूषिताः ॥७ ॥ शीताम्बुधारागर्भाणि गृहाण्युद्यानदीर्घिकाः । सुतीर्थपुलस्वच्छसलिलाशयसैकते ॥८ ॥ साम्भोजजलतीरान्ते कायमाने द्रुमाकुले । सौम्या भावाः पयः सर्पिर्विरेकश्च विशेषतः ॥९ ॥

वृद्ध-पित्त की निम्न चिकित्सा करनी चाहिए- (1) घृतपान, मधुर, शीत द्रव्यों के प्रयोग से विरेचन कराकर (2) मधुर, तिक्त, कषाय रस वाले भोजन एवं औषध प्रयोग द्वारा (3) सुगन्धित, शीतल, हृदय एवं मन के लिए प्रिय गंधों के सेवन द्वारा (4) गले में पुष्पादि निर्मित हार तथा मणियों (मोती आदि) से निर्मित माला आदि के प्रयोग द्वारा (5) प्रत्येक क्षण कपूर, चन्दन, खस आदि सुगन्धित एवं शीत द्रव्यों से निर्मित अनुलेपन के प्रयोग द्वारा (6) रात्रि के प्रथम भाग (प्रदोषकाल) में चन्द्रमा, धवलगृह, सुन्दर एवं मनोहारी संगीत, शीतल वायु, निःसंकोची मित्रों, पुत्र की अव्यक्त अस्पष्ट (तोतली वाणी) मन को मुग्ध करने वाली वाणी, चित्त के अनुकूल शीलयुक्त प्रिया पत्नी, शीताम्बुधारागृह (ठंडा घर House equipped with fountains emitting cooled water), गृह उद्यान,

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Meghaduta by Kalidasa: Summary, Introduction, and Important Notes

“Before reading this, you might want to check out my notes on the [Som Suktam Rigveda 9.73] here.”सोम सूक्त (ऋग्वेद 9.73) (som suktam)

मेघदूत एक परिचय

मेघदूत कालिदास की उन कृतियों में से एक ऐसी उत्कृष्ट कृति है, जिसके कारण कवि की कीर्ति देश विदेश में सर्वत्र व्याप्त है, कवि ने 115 पद्यों के लघु कलेवर वाले इस काव्य में अपनी उत्कृष्ट भावना का समग्र प्रशान्त महासागर समाहित कर दिया है।

कुबेर के शाप के कारण रामगिरि पर्वत पर वर्ष भर के वनवास को गुजारता हुआ कोई ‘यक्ष‘ वर्षाकाल के आरम्भ में आकाश में मंडराये हुए बादलों को देखकर वियुक्त प्रिया की याद में तड़प उठता है, तदनन्तर बादल से प्रार्थना करता है कि वह अलकापुरी में जाकर उसकी प्रिया को उसका सन्देश पहुँचा दे, तो बड़ा उपकार होगा।

मेघदूत के पूर्वमेघ में रामगिरि पर्वत से अलकापुरी तक उस मार्ग का वर्णन है, जिससे बादल को जाना है। इस मार्ग में बादल कहीं जनपदवधुओं के सरस तथा सजल नयनों का विषय बनेगा, जो कृषि फल की सफलता के लिए चिरकाल से उसकी प्रतीक्षा में है, तो कहीं आकाशचारिणी सिद्धाङ्गनाओं को अपने गर्जन से भयभीत कर उनके प्रियों को अनायास आलिङ्गन का आनन्द प्रदान करेगा, कहीं नीपकुसुमों से सुरभित श्रीपर्वत को देखेगा, तो कभी विन्ध्य की पहाड़ियों के मध्य बिखरी हुई स्वल्पप्रवाहयुक्त रेवा की धाराओं का अवलोकन करेगा।

इसके बाद मेघ विदिशा की राजधानी उज्जयिनी में महाकाल का दर्शन करेगा, यद्यपि उज्जयिनी पहुँचने का यह रास्ता कुछ टेढ़ा अवश्य है, फिर भी उसे भाया उज्जयिनी होकर जाना चाहिए, क्योंकि वैभवपूर्ण व आलीशान इस नगरी के वातावरण से यदि वह अनभिज्ञ रहा तो उसकी आँखों की कोई सार्थकता नहीं और उस नगरी से परिचित हुए बिना उसका लौकिक ज्ञान भी अधूरा ही है।

तदनन्तर वह गम्भीरा का रसास्वादन करता हुआ ब्रह्मावर्त से क्रौञ्च पर्वत की ओर बढ़ता हुआ सीधा अलकापुरी में पहुँच जायेगा, जहाँ यक्ष कन्यायें मणियों से खेला करती हैं जिस अलका में सूर्योदय के साथ, यत्र-तत्र बिखरे हुए कानों से गिरे हुए कनककमल, मन्दारहार सूत्र से टूटे हुए अत एव बिखरे हुए मुक्ताकलाप, यक्षक़ामिनियों के रात्रि के अभिसरण की सूचना देते हैं।


इसी प्रसङ्ग में यक्ष अपने ‘भवन’ का विलासमय विवरण प्रस्तुत करता है तथा विरहविदग्धा उस यक्षिणी का भी दीनतापूर्ण एवं शालीन चित्र प्रस्तुत करता है, जो कि विधाता की एक अपूर्व सृष्टि है।

इसके बाद यक्ष अपने मनोगत प्रणयसन्देश का उपदेश करता है, जिसमें कालिदास ने आपबीती घटना को अथवा अपने अनुरागपूर्ण हृदय की भावना को भर दिया है।

इस छोटी सी कहानी को कवि ने अपने उचित शब्दार्थों वन, नदी, पर्वत, जनपद आदि का सुन्दर वर्णन कर खण्डकाव्य का रूप दिया है, इस खण्ड काव्य का उपक्रम कवि ने कुबेर के शाप से किया है, जिसका विषय यक्ष अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेमपाश में आबद्ध होकर कर्तव्य विमुख हो गया, इसीलिए इसको अपने स्वामी से शापभाजन बनना पड़ा, इस शाप का स्वरूप था ‘एक वर्षपर्यन्त अपनी पत्नी से अलग रहना’ अर्थात् ‘वर्ष भर संयम पूर्वक रहना’ इस शाप का अवसान उस शेषशायी भगवान विष्णु के जागरण पर अर्थात् हरिबोधिनी एकादशी पर होता है, जिसके निकट सर्पराज शेष और गरुड़ महाराज भी अपना शाश्वत वैर भूल कर मर्यादा से रहते हैं। समस्त मेघदूत में स्थायीभाव यद्यपि विप्रलम्भ रति है, फिर भी बीच-बीच में सहृदयों को स्मृति, दैन्य, उत्कण्ठा आदि भावों की चर्वणा होती रहती है। उपक्रम व उपसंहार की दृष्टि से उक्त काव्य में विप्रलम्भ श्रृंगार की ही प्रधानता है, इसी के अन्तर्गत कहीं-कहीं कवि सम्भोग श्रृंगार सम्बन्धी कतिपय वृत्तों का भी वर्णन करता है, जो सहृदयों के हृदयों को आकृष्ट करता रहता है।

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सोम सूक्त (ऋग्वेद 9.73) (som suktam)

सोम सूक्त (ऋग्वेद 9.73)

पाठ-2 | श्री दयाराम गुप्त

सोमसूक्त के ऋषि ‘पवित्र’ हैं। इसके देवता पवमान सोम हैं। प्रथम मन्त्र में जगती छन्द है। 2-7 वें मन्त्र में निचृज्जगती तथा 8, 9 में विराट् जगती छन्द है।

मन्त्र 1

सृक्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः। त्रीन्त्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन्।।

अनुवाद: सोम पात्र के प्रान्त भाग पर (सृक्वे) ध्वनि करते हुए (धमतः) (द्रप्सस्य) बिन्दु एक साथ मिल कर गति करने लगे (समस्वरन)। सोम-बिन्दु (नाभयः) यज्ञ की (ऋतस्य) योनि पर मिलकर गतिशील हुए (समरन्त)। प्राणों का दाता वह सोम (असुर) तीन उच्छ्रित स्थानों अथवा लोकों को (त्रीन् मूर्ध्नः) कार्य आरम्भ करने के लिए (आरभे) बनाता है (चक्रे)। सत्य की नौकाएँ शुभकर्म करने वाले को पार पहुँचा देती हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • सृक्वे: सायण—यज्ञस्य हनुस्थानीये, सृक्क्व ओष्ठप्रान्तो हनुरुच्यते। ग्रिफिथ—at the rim। योगी—(सोमपात्र के) प्रान्त भाग पर।
  • धमतः: सायण—अभिषवणफलके अभिषूयमाणस्य। ग्रिफिथ—Sprouting। योगी—देदीप्यमान एवं शब्दाय मान। धातु धमा शब्दाग्निसंयोगयोः, वोपदेव—अग्नियुते ध्वनो।
  • द्रप्सस्य: सायण—सोमस्य अंशवः। मोनियर विलियम्स—बिन्दु, धातु द्रु। यास्क—द्रप्सः संभृतः प्सानीयो भवति, दुर्गाचार्य—प्सानीयः भक्षणीयः भरणीयश्च। प्सा भक्षणैः सायण भक्षणदीप्त्योः निघ०—प्सातिगतिकर्मा। तुलनीय—अंग्रेजी शब्द drops।
  • समस्वरन्: सायण—संगच्छन्ते। ग्रिफिथ—ध्वनि की है; इस क्रिया का कर्ता सोम पीसने वाले पाषाण खण्ड हैं जिनके प्रान्त भागों से सोम बिन्दु ध्वनि करते हुए गिरते हैं। योगी—मिल कर गीत गाने लगे।
  • ऋतस्य योना: सायण—सत्यभूत यज्ञ के उत्पत्ति स्थान पर। ग्रिफिथ—यज्ञ के स्थान पर। यास्क—ऋतं सत्यं यज्ञो वा।
  • नाभयः समरन्त: सायण—सोमस्य संगच्छन्ते। सम् पूर्वक ऋ धातु से सम्म गमि… इत्यादि सूत्र से आत्मनेपद प्रयोग, ‘संतिष्ठस्त्यादियश्च’ सूत्र द्वारा ड्वल के स्थान पर अङ् आदेश होकर लुङ में प्रथम पुरुष बहुवचन का रूप बना है। ऋक्थ—नाभि शब्द से अभिप्रेत रथ चक्र, रथ और फिर रूपक द्वारा तीव्र गतिशील सोम बिन्दु सोम बिन्दु मिल कर दौड़ते हैं। योगी—नाभियाँ गतिशील हुई।
  • असुरः: सायण—बलवान्, अथवा—सब को प्रसन्न करने के कारण अथवा प्राणदाता (असुन् प्राणान् राति ददातीति असुरः)। वह सोम। ग्रिफिथ—दिव्य सोम।
  • त्रीन मूर्ध्नः: सायण—समुच्छ्रित तीन लोकों को। ग्रिफिथ—तीन उच्च स्थानों को। योगी—तीन मूर्धाओं, उच्छ्रित स्थानों को।
  • आरभे: सायण—आलम्भन के लिए, मनुष्य देव आदि के संचरण के लिए। ग्रिफिथ—पकड़ने के लिए, पकड़े जाने और प्रयोग किये जाने के लिए। योगी—आरम्भ करने के लिए, रण रामस्ये, रामस्य कार्योपक्रम।
  • सत्यस्य नावः: सायण—सत्यभूत सोम की नौकाओं के समान स्थित चार पात्र जिनमें आदित्य, आग्रयण, उक्थ्य तथा ध्रुव आहुतियाँ रखी जाती हैं। ग्रिफिथ—सत्य अथवा सत्यशील सोम की नौकाएँ। योगी—सत्य की नावें।
  • सुकृतम: सायण—अच्छे कर्म करने वाले यजमान को। ग्रिफिथ—शुद्ध आचरण शील मनुष्य को। योगी—शुभ कार्यकारी को।
  • अपीपरन: सायण—अभिमत दान द्वारा सम्मानित करती हैं। ग्रिफिथ, योगी—पार पहुँचा दिया। धातु पारकर्म समाप्ती अथवा पृ पूरणे।

मन्त्र 2

सम्यक् सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्मौवधि वेना अवीविषन्। मधोर्धारामभि नयन्तो अर्कमृतिश्रिया-मिन्द्रस्य तन्वमवीवृधन्।।

सरलार्थ: महान् ऋत्विजों ने (महिषाः) सङ्गत हो कर (सम्यञ्चः) सम्यक्तया (सम्यक्) गति की (अहेषत)। स्वर्गादि की कामना से युक्त उन जनों ने (वेनाः) स्यन्दमान नदी जल के ऊपर (सिन्धो ऊर्मावधि) सोम को प्रेरित किया (अवीविषन्)। मधुर सोम की (मधोः) धाराओं के साथ-साथ (धारामि) मन्त्रात्मक स्तुति (अर्कम्) अर्पण करते हुए उन ऋत्विजों ने इन्द्र के प्रिय शरीर को (इन्द्रस्य प्रियां तन्वम्) बलशाली बनाया (अवीवृधन्)।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • अहेषत: सायण—सोम को प्रेरित करते हैं, अर्थात् सोम का अभिषवण करते हैं, धातु ही गतौ वृद्धौ च। लुङ्लकार में च्लि के स्थान पर सिच् आगम होकर रूप निष्पन्न हुआ। योगी—गति की। ग्रिफिथ—अपने को कार्य में रत किया।
  • वेनाः: यास्क—इच्छाथक वेन धातु से निष्पन्न। सायण—स्वर्गादि फल की कामना करते हुए ऋत्विजों ने। ग्रिफिथ—मित्रों ने। योगी—कामना से युक्त उन जनों ने।
  • सिन्धोः ऊर्मावधि: सायण—स्यन्दमान जल के समूह पर, अर्थात् वसतीवरी आदि जलों पर। (सोम-याग की पूर्व सन्ध्या पर नदी से लाकर जल रात भर रखा जाता है, उस जल को वसतीवरी कहते हैं)। ग्रिफिथ—नदी की तरंग पर। योगी—सिन्धु की ऊर्मि को आधार बना कर।
  • अवीविषन: सायण—सोम को कमित करते हैं, अर्थात् वहाँ प्रेरित करते हैं। वी धातु से णिच् प्रत्यय जोड़-कर लुङ लकार में च्लि के स्थान पर चङ् आदेश हो कर ‘णौ चङ् उपधाया ह्रस्वः’ इस सूत्र से ह्रस्वादेश होकर प्रथम पुरुष बहुवचन में रूप बना है। ग्रिफिथ—गीत गाया। योगी—नृत्य किया। धातु विप् क्षैपे, हिवटन के अनुसार विप् धातु कम्पन के अर्थ में है।
  • अर्कम: गीत, स्तोत्र, सूक्त। धातु ऋच स्तुतौ, अथवा अर्च पूजायाम् दीप्तौ, स्तुतौ वा (हितने), अथवा अर्क स्तवने।
  • तन्वम: सायण—धाम। ग्रिफिथ—शरीर।
  • अवीवृधन: सायण—बढ़ाया है, वृध धातु से णिच लुङ में च्लि के स्थान पर चङ् कर के प्र० पु० बहुवचन का रूप। ग्रिफिथ—शक्ति की वृद्धि की है।

मन्त्र 3

पवित्रवन्तः परिव वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभी रक्षति व्रतम्। महः समुद्रं वरुणस्तिरो दधे धीरा इच्छेकुर्धरुणेष्वारभम्।।

सरलार्थ: पवित्र अथवा शोधन-सामर्थ्य से युक्त वे मन्त्र रूपी वाणी के चारों ओर स्थित होते हैं। इनका पुरातन पिता व्रत की अभिरक्षा करता है। वरुण अथवा सब को स्वतेज से आच्छादित करने वाला सोम महान् अन्तरिक्ष रूपी समुद्र को व्याप्त करता है। धीर जन ही सर्वाधार कार्यों के विषय में प्रारम्भ करने में समर्थ होते हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • पवित्रवन्तः: सायण—पवित्र अथवा शोधक सामर्थ्य से युक्त सोम की रश्मियाँ। यास्क—रश्मि युक्त माध्यमिक देवगण। दुर्ग—आदित्यमंडल से प्रस्रुत रश्मियाँ मध्यस्थान में मरुदादि देवगणों से संयुक्त होती है, उनके संयोग से माध्यमिक देवगण पवित्रवान होते हैं।
  • वाच परि आसते: सायण—सोम-स्थित माध्यमिक वाणी के सब ओर बैठते हैं; सोम अन्तरिक्ष-स्थानीय है, गन्धर्व राज है (तुलनीय ऐ० ब्रा० 1.27)। योगी—वाक् के सब ओर स्थित होते हैं। ग्रिफिथ—गीत के चारों ओर बैठते हैं।
  • एषां प्रत्नः पिता: सायण—रश्मियों का पुरातन पिता यह सोम। ग्रिफिथ—इनका पुरातन पिता, सोम या सम्भवतः अग्नि। दुर्ग—मरुदादि का पुराण रक्षिता वरुण, अर्थात् विद्युदाख्य मध्यम पिता।
  • व्रतम् अभिरक्षति: सायण—प्रकाशनात्मक कर्म की रक्षा करता है। ग्रिफिथ—उनके पवित्र कर्म की रक्षा करता है। दुर्ग—तदादिकारयुक्त कर्म की सर्वतः रक्षा करता है।
  • वरुण: अपने तेज द्वारा सबका आच्छादक वही सोम। ग्रिफिथ—वरुण इसे उन मरुत्भृति का पुरातन विदारथ मध्यम पिता अर्थात् रक्षक।


मन्त्र 4

सहस्रधारो विततः पवित्र आ वाचमस्यन्मधुजिह्वो असरश्चतः।

अस्य स्पशो न निमिषन्ति भूर्ण्यः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः।।

सरलार्थ:

मधुर जिह्वायुक्त, कभी न थकने वाली (असरश्चतः), सहस्रों जलधाराओं को प्रवाहित करने वाली द्युलोक के अत्युन्नत प्रदेश में विद्यमान (वे सोम-रश्मियाँ) मिल कर पृथ्वी की ओर गति करती हैं (अव समस्वरन्)। इस सोम की भ्रमण-शील (भूर्ण्यः) चार-भूत रश्मियाँ (स्पशः) कभी पलक नहीं झंपती हैं। हाथ में पाश धारण करने वाले (पाशिनः) पापियों को बांधने वाले (सेतवः) पद-पद पर विद्यमान हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • सहस्रधारे वितते: सायण, वेंकट माधव तथा ग्रिफिथ—जल की सहस्रों धारा प्रवाहित करने वाला; दिवो नाके पद का विशेषण। योगी—सहस्रों प्रकाश तथा सुख की धाराओं से युक्त स्थान पर।
  • दिवो नाके: सायण, ग्रिफिथ—द्युलोक के उन्नत स्थान में। योगी—प्रकाशमय लोक के (दिवः) सुखमय प्रदेश में (नाके)। यास्क—कम् शब्द का अर्थ सुख है, अकम् का अर्थ असुख या दुःख, तथा नः अकम् = नाकम् का अर्थ दुःख का अत्यन्त अभाव है।
  • मधुजिह्वाः: सायण सोम तेजों के अग्रभागों से मधु उत्पन्न होता है, अतः मधुजिह्व कहा है। ग्रिफिथ—मधुर जिह्वा वाले।
  • असरश्चतः: सायण—संगवर्जित, अर्थात् द्युलोक में पृथक-पृथक अवस्थित। ग्रिफिथ तथा योगी—कभी न थकने वाले।
  • अव समस्वरन्: वेंकटमाधव—मिल कर पृथ्वी की ओर गति करते हैं। सायण—नीचे स्थित पृथ्वी को वर्षा से संयुक्त करते हैं। ग्रिफिथ—मिलकर अपनी ध्वनियाँ नीचे भेजते हैं। योगी—प्रदीप्त हुए और दिव्य संगीत निमग्न हुए।
  • अस्य स्पशः: वेंकटमाधव—इस सोम की चार-भूत रश्मियाँ। सायण—इस सोम की सारभूत रश्मियाँ। योगी—दिव्यानन्द के गुप्तचर।
  • भूर्ण्यः: सायण—क्षिप्रगामी। दुर्ग—भ्रमणशील। योगी—गतिशील।
  • न निमिषन्ति: सायण—पलक नहीं भांते हैं, किन्तु सुकृतियों तथा पापियों को जानने के लिए सदा जागते रहते हैं।
  • सेतवः: वेंकट माधव—पापियों को बांधने वाले। सायण—सम्बद्ध होते हुए। ग्रिफिथ—मनुष्य को दृढ़ता से बाँधने वाले। योगी—दुष्टों को बाँधने वाले।

मन्त्र 5

पितुर्मातुराध्या ये समस्वरन्न्चा शोचन्तः सन्दहन्तो अव्रतान्।

इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसितीं भूमनो दिवस्परि।।

सरलार्थ:

द्यु लोक और पृथिवी लोक में (पितुः मातुः अधि) जिन्होंने मिलकर ध्वनि उत्पन्न की है, वे (सोम-रश्मियाँ) मन्त्र रूपी स्तुति द्वारा देदीप्यमान होती हुई, यज्ञादि कर्म से विमुख (नास्तिक जनों को) संदग्ध करती हैं। इन्द्र से द्वेष करने वाले कृष्ण वर्ण वाले राक्षसों आदि अथवा अनार्य जनों को अपनी अलौकिक शक्ति से (मायया) भूलोक तथा द्युलोक से दूर भगाती हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • पितुः मातुः अधि: सायण—ऋ० 1-164-33 आदि अनेक मन्त्रों में द्यौः को पिता तथा पृथिवी को माता कहा गया है। ग्रिफिथ तथा योगी—माता और पिता को आधार बनाकर।
  • शोचन्तः: दीप्त होते हुए।
  • अव्रतान्: वेंकटमाधव—यज्ञ न करने वालों को। सायण—कर्मरहित यजमानों को। योगी—व्रत हीनों को।
  • असिनीं त्वचम्: सायण—असिनी शब्द रात्रि के अर्थ में प्रयुक्त होता है, रात्रि के समान कृष्णवर्ण की त्वचा वालों को, अर्थात् राक्षस जन को।
  • अप धमन्ति: सायण—दूर भगाते हैं, अर्थात् नष्ट करते हैं। ग्रिफिथ—उड़ाते हुए।

मन्त्र 6

प्रत्नान्मानादध्या ये समस्वरञ्श्लोकयन्त्रासो रमसस्य मन्तवः।

अपानद्वासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः।।

सरलार्थ:

स्तुति का नियमन करने वाले तथा वेग को स्वीकार करने वाले, जो अपने पुरातन निवासभूत अन्तरिक्ष से एक साथ मिल कर प्रादुर्भूत हुए। चक्षु-रहित तथा बधिर जनों ने उनसे मुँह मोड़ लिया है। पापी लोग सत्य अथवा नियम के मार्ग को पार नहीं कर पाते।


मन्त्र 7

सहस्रधारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः।

रुद्रास एषामिषि-रासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्चः सुदृशो नुचक्षसः।।

सरलार्थ:

जब सहस्रों धारा प्रवाहित करने वाला पवित्र (छाननी) फैलाया होता है, तब क्रान्तदर्शी विद्वान् अपनी वाणी को पवित्र करते हैं। इनके गुप्तचर चमकीले, ओजयुक्त, द्रोह-रहित, सुन्दर गतिशील, सुदर्शन तथा मानवों का निरीक्षण करने वाले हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • कवयः: सायण—कान्त कर्मा। यास्क तथा योगी—क्रान्तदर्शी। ग्रिफिथ—ऋषि।
  • मनीषिणः: सायण—प्राज्ञ ऋत्विज। ग्रिफिथ—विचारशील।
  • रुद्रासः: सायण—रुद्रपुत्र, मध्यम वाणी के पुत्र, मरुदगण। योगी—रुद्र-पुत्र।

मन्त्र 8

ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतुस्त्री ष पवित्रा हृद्यन्तरा दधे।

विद्वान्त्स विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान्विध्यति कर्ते अव्रतान्।।

सरलार्थ:

यज्ञ के रक्षक (ऋतस्य गोपा), अत्यन्त प्रज्ञाशाली (सुक्रतुः) उस सोम को धोखा नहीं दिया जा सकता (न दभाय)। वह सोम अपने हृदय के मध्य तीन शोधक शक्तियों को संजोये रखता है। सर्वज्ञ वह सोम सब प्राणियों की गतिविधियों को ध्यान से देखता है। वह नियमों का पालन न करने वाले अप्रिय जनों को गर्त में धकेल कर ताड़ना करता है।


मन्त्र 9

ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया।

धीराश्चित्तत्समिणक्षन्त आशातात्र कर्तमव पदात्यप्रभुः।।

सरलार्थ:

ऋत का तन्तु छाननी में वरुण की माया से जिह्वा के अग्रभाग में वितत है। उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए धीर जन उसे प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु असमर्थ जन यहाँ गर्त में ही गिरता है।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • ऋतस्य तन्तुः: सायण—सत्यभूत यज्ञ को सम्पन्न कराने वाला सोम। ग्रिफिथ—यज्ञ का सूत्र। योगी—ऋत अर्थात् सर्वविधि नियम का सूत्र।
  • सम्प इणक्षन्तः: सायण—व्याप्त करते हुए। योगी—प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए।

छान्दोग्य उपनिषद् ( chandogya upnishad)

अध्याय – 6 (Chapter VI)

1️ प्रसंग (Context)

इस अध्याय में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु को आत्मज्ञान प्रदान करते हैं।
श्वेतकेतु वेदाध्ययन करके अहंकार से भर जाता है, तब पिता उसे परम सत्य का बोध कराते हैं।


2️ मुख्य विषय (Central Theme)

🔹 सत् (ब्रह्म) ही एकमात्र सत्य है

🔹 आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं

🔹 प्रसिद्ध महावाक्य –तत् त्वम् असि”


3️ सत् सिद्धांत (Sat Theory)

उपनिषद् कहता है—

सत् एव सोम्य इदमग्र आसीत्”

अर्थ:

  • सृष्टि से पहले केवल सत् (ब्रह्म) था
  • असत् से सत् की उत्पत्ति संभव नहीं
  • इसलिए ब्रह्म ही सृष्टि का कारण है

📌 परीक्षा पंक्ति:

छान्दोग्य उपनिषद् सत्कार्यवाद का समर्थन करता है।


4️ कार्य–कारण सिद्धांत (Cause–Effect)

उद्दालक ऋषि उदाहरण देते हैं—

उदाहरण:

  • मिट्टी से बने सभी घड़े → मिट्टी ही हैं
  • सोने के आभूषण → सोना ही हैं

👉 नाम और रूप अलग हैं,
👉 तत्त्व एक ही है

📌 परीक्षा में लिखें:

कार्य में कारण निहित रहता है।


5️ जीव–ब्रह्म ऐक्य

उपनिषद् कहता है—

  • प्रत्येक जीव में वही ब्रह्म विद्यमान है
  • भेद केवल अज्ञान से है
  • ज्ञान से ऐक्य की अनुभूति होती है

6️ महावाक्य –तत् त्वम् असि”

शब्दार्थ:

  • तत् = वह (ब्रह्म)
  • त्वम् = तुम (जीव)
  • असि = हो

अर्थ:

तू वही ब्रह्म है

यह वाक्य नौ बार दोहराया गया है —
यह इसकी महत्ता दर्शाता है।

📌 परीक्षा पंक्ति:

“तत् त्वम् असि” जीव और ब्रह्म की अभिन्नता को सिद्ध करता है।


7️ आत्मज्ञान का महत्व

  • अज्ञान = बंधन
  • ज्ञान = मोक्ष
  • आत्मा को जानने से जन्म–मरण से मुक्ति

षष्ठ अध्याय

मुख्य लेख : छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-6

ब्रह्मऋषि आरुणि-पुत्र उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को सत्य-स्वरूप ‘ब्रह्म’ को विविध उदाहरणों द्वारा समझाया था और सृष्टि के सृजन की विधिवत व्याख्या की थी। इस अध्याय में उसी का विवेचन किया गया है। इस अध्याय में सोलह खण्ड हैं। पहले और दूसरे खण्ड में जगत् की उत्पत्ति के विषय में बताया गया है। अपने पुत्र श्वेतकेतु को समझाते हुए ब्रह्मऋषि उद्दालक ने कहा कि सृष्टि के प्रारम्भ में एक मात्र ‘सत्’ ही विद्यमान था। फिर किसी समय उसने अपने आपकों अनेक रूपों में विभक्त करने का संकल्प किया। उसके संकल्प करते ही उसमें से ‘तेज’ प्रकट हुआ। तेज में से जल प्रकट हुआं संकल्प द्वारा प्रकट होने वाले उस ‘तेज’ को वेद में ‘हिरण्यगर्भ’ कहा गया है। सृष्टि का मूल क्रियाशील प्रवाह यह ‘जलतत्त्व’ ही है, जो तेज से प्रकट होता है। उस जल के प्रवाह से अतिसूक्ष्म कण बने और कालान्तर में यही सूक्ष्म कण एकत्र होकर पृथ्वी का कारण बने। प्रारम्भ से सृष्टि-सृजन की पहली आहुति द्युलोक में ही हुई थी। उसी में विद्यमान ‘सत्’ से ‘तेज’ और तेज से ‘जल’ की उत्पत्ति हुई थी तथा जल के सूक्ष्म पदार्थ कणों के सम्मिलन से पृथ्वी का निर्माण हुआ था। धरती से अन्न का उत्पादन हुआ तथा दूसरे चरण में सूर्य उत्पन्न हुआ।

 श्वेतकेतु–उद्दालक संवाद : महत्वपूर्ण बिंदुओं की व्याख्या


🔹 बिंदु 1 की व्याख्या

भाव
श्वेतकेतु, जो अरुणि का पुत्र है, घर पर रहता था। उसके पिता ने उसे आदेश दिया कि वह किसी गुरु के यहाँ जाकर ब्रह्मचारी जीवन में वेदों का अध्ययन करे, क्योंकि उनके कुल में कभी किसी ने वेदज्ञान की उपेक्षा करके अपयश नहीं कमाया।

दार्शनिक महत्व

  • यह गुरु–शिष्य परम्परा को दर्शाता है
  • ब्रह्मज्ञान के लिए संनियमित जीवन (ब्रह्मचर्य) आवश्यक माना गया
  • वेदाध्ययन को कुल-धर्म से जोड़ा गया है

📌 परीक्षा बिंदु:

उपनिषदों में ज्ञान को वंश, परम्परा और आचार से जोड़ा गया है।


🔹 बिंदु 2 की व्याख्या

भाव
श्वेतकेतु बारह वर्ष की आयु में गुरु के पास गया और चौबीस वर्ष तक चारों वेदों का अध्ययन किया। जब वह घर लौटा, तो उसे अपने ज्ञान पर अत्यधिक गर्व था।

दार्शनिक महत्व

  • केवल शास्त्रज्ञान होने से ही पूर्णता नहीं आती
  • यहाँ अविद्या का सूक्ष्म रूप – अहंकार दिखाया गया है

📌 मुख्य संकेत:

वेदों का ज्ञान ≠ ब्रह्मज्ञान


🔹 बिंदु 3 की व्याख्या

भाव
पिता उद्दालक देखते हैं कि श्वेतकेतु अहंकारी हो गया है। वे उससे पूछते हैं कि क्या उसने गुरु से उस ज्ञान के बारे में पूछा है—

  • जिसे सुनने से अश्रुत सुना जाता है
  • जिसे जानने से अज्ञात ज्ञात हो जाता है
  • जिससे अशांत मन शांत हो जाता है

दार्शनिक महत्व

  • यह ब्रह्मज्ञान की परिभाषा है
  • यही उपनिषदों का केन्द्रीय प्रश्न है

📌 अति महत्वपूर्ण पंक्ति (बार-बार पूछी जाती है):

अश्रुतं श्रुतं भवति, अमतं मतं भवति”


🔹 बिंदु 4 की व्याख्या (मृत्तिका दृष्टान्त)

भाव
उद्दालक कहते हैं—
जैसे एक मिट्टी के ढेले को जान लेने से मिट्टी से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, वैसे ही एक तत्व को जान लेने से सब कुछ ज्ञात हो जाता है।

दार्शनिक अर्थ

  • नाम और रूप अलग-अलग हैं
  • वास्तविकता एक ही पदार्थ है (मिट्टी)

📌 तत्त्व:

  • कार्य–कारण अभेद
  • ब्रह्म = मूल कारण

🔹 बिंदु 5 की व्याख्या (स्वर्ण दृष्टान्त)

भाव
जैसे सोने के एक टुकड़े को जान लेने से सभी सोने के आभूषणों की प्रकृति ज्ञात हो जाती है, वैसे ही विविध नाम-रूप वास्तव में एक ही सत्य के रूप हैं।

दार्शनिक अर्थ

  • संसार की विविधता आभास मात्र है
  • सत्य पदार्थ एक है

📌 Advaita संकेत:

भेद नामरूपेण, न तत्त्वतः


🔹 बिंदु 6 की व्याख्या (लौह दृष्टान्त)

भाव
जैसे लोहे को जान लेने से लोहे के बने सभी उपकरणों की प्रकृति ज्ञात हो जाती है, वैसे ही यह जगत भी एक ही मूल तत्व का विस्तार है।

दार्शनिक महत्व

  • तीन दृष्टान्त (मिट्टी–सोना–लोहा)
  • एक ही सिद्धान्त को दृढ़ करते हैं

📌 परीक्षा टिप:
तीनों उदाहरण साथ लिखना बहुत प्रभावी होता है।


🔹 बिंदु 7 की व्याख्या

भाव
श्वेतकेतु स्वीकार करता है कि उसके गुरु यह ज्ञान नहीं जानते थे। तब वह पिता से प्रार्थना करता है कि वे उसे यह परम ज्ञान प्रदान करें।

दार्शनिक महत्व

  • शिष्य में विनय का उदय
  • अहंकार का नाश
  • ब्रह्मविद्या के उपदेश का वास्तविक आरम्भ

छान्दोग्य उपनिषद्

षष्ठ अध्याय – भाग II

सत् से सृष्टि की उत्पत्ति (Sad–Sṛṣṭi-Vāda)


🔹 बिंदु 1 की व्याख्या

(सत्–असत् विवाद)

भाव
उद्दालक कहते हैं—
सृष्टि से पहले केवल सत् (अस्तित्व) था, एक ही, अद्वितीय।
कुछ लोग कहते हैं कि पहले असत् (गैर-अस्तित्व) था और उसी से सत् उत्पन्न हुआ।

दार्शनिक निर्णय (उपनिषद् का मत)
उपनिषद् इस मत को अस्वीकार करता है।

📌 मुख्य सिद्धान्त

असत् से सत् की उत्पत्ति असंभव है।

परीक्षा में लिखने योग्य बिंदु

  • उपनिषद् असत्कार्यवाद को नकारता है
  • यह सत्कार्यवाद का समर्थन करता है

🔹 बिंदु 2 की व्याख्या

(असत् से सत् असंभव क्यों?)

भाव
उद्दालक प्रश्न उठाते हैं—
जो अस्तित्व में ही नहीं है, उससे कोई वस्तु कैसे उत्पन्न हो सकती है?

📌 प्रसिद्ध उपनिषद् वाक्य:

कथं असतः सज्जायेत?”
(असत् से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है?)

दार्शनिक महत्व

  • यह कारण-कार्य सिद्धान्त है
  • कारण में ही कार्य निहित होता है

📌 निष्कर्ष

  • सृष्टि से पहले केवल सत् ही था
  • वही सृष्टि का कारण है

🔹 बिंदु 3 की व्याख्या

(सत् की इच्छा और त्रितत्त्व उत्पत्ति)

भाव
सत् ने संकल्प किया—

“मैं अनेक हो जाऊँ, मैं सृष्टि करूँ।”

फिर क्रमशः:

  1. सत् → उष्मा (तेज)
  2. उष्मा → जल

अनुभवजन्य प्रमाण

  • शरीर में उष्मा होने पर पसीना (जल) निकलता है

📌 दार्शनिक संकेत

  • सृष्टि यादृच्छिक नहीं, संकल्पयुक्त है
  • ब्रह्म सचेतन कारण है

🔹 बिंदु 4 की व्याख्या

(जल से अन्न की उत्पत्ति)

भाव
जल ने भी इच्छा की—

“मैं अनेक हो जाऊँ।”

उससे भोजन (अन्न) उत्पन्न हुआ।

व्यावहारिक प्रमाण

  • वर्षा होने पर अन्न की उत्पत्ति
  • अन्न का मूल कारण जल है

📌 सृष्टि-क्रम (Exam must-write)

सत् तेज जल अन्न


🌟 समग्र दार्शनिक निष्कर्ष

  1. सृष्टि सत् से उत्पन्न हुई, असत् से नहीं
  2. ब्रह्म उपादान और निमित्त कारण दोनों है
  3. सृष्टि चेतन संकल्प से हुई
  4. यह विचार अद्वैत वेदान्त की आधारशिला है