उत्तररामचरित के अंकों का कथा-सार
प्रथम अंक: चित्रदर्शन
प्रथम अंक की घटनाएं अयोध्या में ही घटित हैं। नान्दी के पश्चात् तथा प्रस्तावना से पहले ही अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रसंगों की सूचना मिलती है। भवभूति का परिचय, राज्याभिषेक के समय आए अतिथिगण की विदाई, दशरथी पुत्री शान्ता के पति ऋष्यशृंग के बारह वर्ष चलने वाले यज्ञ में गुरु वसिष्ठ और अरुन्धती के साथ राम की माताओं का गमन, सूत्रधार द्वारा सीताविषयक लोकापवाद का संकेत, महाराज जनक के चले जाने से सीता का उदास होना, राम का सीता की सान्त्वना के लिए अन्तःपुर में प्रवेश।
तदनन्तर सीता को आश्वस्त कर रहे राम को अष्टावक्र द्वारा गुरु वसिष्ठ आदि के उपदेश, संदेश तथा आदेश सुनाए जाते हैं जिसमें गुरु वसिष्ठ द्वारा प्रजानुरंजन का आदेश सुनकर राम कह उठते हैं—
स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति में व्यथा॥ 12 ॥
इस कथन से सीता के परित्याग की घटना का संकेत मिल जाता है। राम सीता के मनोविनोद के लिए चित्रफलक देखने में व्यस्त हो जाते हैं वहीं राम प्रसंगवश सीता की सन्तान के लिए जृम्भक अस्त्र प्राप्ति का वर देते हैं। चित्रफलक वनवास कालीन विविध घटनाओं, वर्णनों तथा प्रसंगों की चर्चा के अनन्तर सीता द्वारा वन विहार की इच्छा के उपरान्त ‘दुर्मुख’ दूत सीता विषयक लोकापवाद की सूचना राम को देता है। लोकानुरंजन के लिए राम सचमुच ही सीता के परित्याग का निश्चय कर लेते हैं और लक्ष्मण राम का आदेश पाकर सीता को वन में छोड़ने जाते हैं।
द्वितीय अंक: पञ्चवटी-प्रवेश
द्वितीय अंक में दण्डकारण्य के जनस्थान प्रदेश में आत्रेयी और वनदेवता के संवाद से ज्ञात होता है कि किसी देवता ने कुश और लव नाम के दो शिशु वाल्मीकि को सौंप दिए हैं। इन अद्भुत गुण सम्पन्न शिशुओं को जृम्भकास्त्र जन्म से प्राप्त हैं। वाल्मीकि ने इनके पालन पोषणान्तर उपनयन संस्कार आदि के साथ-साथ क्षत्रियवंशानुरूप सभी विद्याएँ सिखाई हैं। इसी अंक में ऋष्यशृंग के द्वादशवर्षीय यज्ञ के सम्पन्न होने तथा सीता की सुवर्णमयी प्रतिभा बनाकर राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करने की सूचना मिलती है। तभी दिग्विजयर्थ घोड़ा छोड़ा गया राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा लक्ष्मण पुत्र चन्द्रकेतु के नेतृत्व में रक्षकों सहित उस दण्डकारण्य में पहुँचता है उधर राम शम्बूक का वध कर अगस्त्य ऋषि के आश्रम में पहुँचते हैं।
तृतीय अंक: छाया
इस अंक में दण्डकारण्य के पञ्चवटी प्रदेश में तमसा और मुरला नामक नदियों का वार्तालाप करते सुना जाता है। ये दोनों नदी देवता सीता के परित्याग से अत्यन्त खिन्न हैं पर राम के प्रति संवेनदशील भी हैं। वे गोदावरी नदी से राम के जीवन के प्रति सचेत रहने के निर्देश देने जाती हैं वहीं पर विवरण प्राप्त होता है कि जब लक्ष्मण सीता को वाल्मीकि आश्रम के समीप छोड़ते हैं तब सीता प्रसव वेदना से पीड़ित होकर गंगा प्रवाह में स्वयं डाल देती है वहां दो पुत्रों को जन्म देती हैं और गंगाजी उसे पुत्रों सहित पाताल लोक में ले जाती है और उन शिशुओं को माता का स्तनपान छोड़ते ही महर्षि वाल्मीकि को सौंप देती है। राम के पञ्चवटी प्रवेश का समाचार सुनते ही गंगाजी सीता के साथ लेकर गोदावरी के पास आती है और यहीं सीता को अदृश्य होकर अर्थात् छाया के रूप में रहने की सिद्धि प्रदान करती है।
राम पञ्चवटी में प्रवेश करते ही पूर्व प्रसंगों का स्मरण कर मूर्च्छित होते हैं सीता अपने हाथ से स्पर्श कर उन्हें चेतना में लाती है राम सीता के प्रति अपने मनोभाव प्रकट करते हैं सीता भी राम के मनोभावों को जानकर राम के लिए भावुक हो उठती है। यहीं वासन्ती और राम का सीता विषयक वार्तालाप है जिससे पता चलता है कि राम सीता परित्याग से दुःखी है और उन्हें सीता के जीवित होने की आशा नहीं है। इसी अंक में राम पञ्चवटी से प्रस्थान करते हैं।
चतुर्थ अंक: कौशल्या-जनकयोग
चतुर्थ अंक में वाल्मीकि आश्रम में वसिष्ठ, अरुन्धती, राजा जनक और राम की माताएं अतिथि रूप में पहुँची हुई हैं। राजा जनक सीता के शोक में संतप्त हैं। कौसल्या तथा अरुन्धती जनक से मिलती है राम-सीता विषयक दुःखपूर्ण चर्चा होती है तभी राजा जनक दूर खेल रहे आश्रम के बालकों में से किसी की आकृति राम जैसी देखते हैं तो उसे बुलवाते हैं वह बालक शिष्टाचार वश सब को प्रणाम करता है। कौसल्या को भी उसके सीता पुत्र होने का सन्देह होता है। पूछने पर वह स्वयं को वाल्मीकि पुत्र बताता है। इसी बीच राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा आश्रम के समीप पहुँचता है। लव बालकों के कहने पर घोड़ा देखने जाता है वहीं अश्व रक्षकों से विवाद हो जाता है जो चन्द्रकेतु और लव को युद्ध का कारण बनता है।
पञ्चम अंक: कुमारविक्रम
पञ्चम अंक में वाल्मीकि आश्रम के समीप ही सारथि सुमन्त तथा लक्ष्मण पुत्र चन्द्रकेतु दिखाई देते हैं। दोनों लव द्वारा अश्व रक्षकों को पराजित करते हुए देखकर लव की वीरता से आश्चर्य चकित हैं। चन्द्रकेतु लव को युद्ध के लिए आह्वान करता है किन्तु इसी बीच लव जृम्भक-अस्त्र का प्रयोग करता है जिससे चन्द्रकेतु के सैनिक अचेतन हो जाते हैं। लव राम के शौर्य से प्रभावित नहीं होता। लव की वीरता और साहस से अनभिज्ञ चन्द्रकेतु लव से युद्ध करने के को तत्पर हो जाता है।
षष्ठ अंक: कुमारप्रत्यभिज्ञान
वाल्मीकि आश्रम के समीपवर्ती स्थान पर लव और चन्द्रकेतु में दिव्य अस्त्रों से घोर युद्ध होता है यह सूचना अंक के आरम्भ में विद्याधर और विद्याधरी के संवाद से मिलती है। चन्द्रकेतु आग्नेय अस्त्र का प्रयोग करते हैं तो लव तभी वारुण अस्त्र छोड़ देते हैं तभी राम वहाँ पहुँचते हैं। लव और चन्द्रकेतु राम को सादर प्रणाम करते हैं। तभी प्रसंगवश लव का परिचय पाकर राम से अपने जन्मसिद्ध जृम्भक अस्त्रों के विषय में बताता है। कुश का आगमन होता लव, कुश की राम का परिचय देता है, कुश भी राम को प्रणाम करता है राम, कुश और लव के सीता पुत्र होने का अनुमान करते हैं किन्तु विशेष तथ्यों के अभाव में उदासीन हो जाते हैं। अंक के अंत में राम वसिष्ठ, वाल्मीकि, जनक अरुन्धती और अपनी माताओं से मिलते हैं।
सप्तम अंक: सम्मेलन
सप्तम अंक में वाल्मीकि आश्रम के समीप गंगा के तट पर वाल्मीकि द्वारा रचित राम के उत्तरकालीन जीवन पर आधारित नाटक का अप्सराओं द्वारा अभिनय किया गया है जिसे देखने प्रजा के साथ स्वयं राम भी उपस्थित हैं। वाल्मीकि के तपोबल से प्रभावित समस्त जड़-चेतन जगत् तथा देव और राक्षस गण भी पहुँचे हुए हैं। नाटक के प्रारम्भ में सीता प्रसव वेदना से पीड़ित होकर अपने आप को गंगा में डालती है और वहीं जल प्रवाह में ही दो पुत्रों को जन्म देती है। गंगा और पृथ्वी एक-एक बालक को अपनी गोद में लिए सीता जल से बाहर लाती हैं। पृथ्वी सीता परित्याग के कारण राम पर कुपित हैं। कुश और लव को जृम्भक अस्त्रों की प्राप्ति का दृश्य दिखाई देता है। पृथ्वी सीता को आदेश देती है कि वह स्तनपान छोड़ने तक पुत्रों का पालन करे सीता वैसा करती है। उसके बाद गंगा द्वारा दोनों बालक वाल्मीकि को सौंप दिए जाते हैं। जिनका नाम कुश और लव है। सीता के रसातल के समाचार से राम मूर्च्छित होते हैं पर गंगा और पृथ्वी के साथ जल प्रकट हुई सीता के हस्त के स्पर्श से राम होश में आते हैं, पृथ्वी के प्रति आभार प्रकट करते हैं। कुश-लव का राम और सीता से मिलन होता है। भरत वाक्य के साथ नाटक समाप्त होता है।

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