Unit: III
भारतीय कला-विद्या
चौंसठ कलाओं का सामान्य परिचय
संगीत कला, नृत्य कला, शिल्प कला
प्रमुख कलाविद एवं ग्रन्थ – वात्स्यायन, भरतमुनि, वराहमिहिर, शुक्रनीतिसार, ललितविस्तर
चतुर्दश विद्या
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भारतीय कला-विद्या
भारतीय कला-विद्या एक प्राचीन और वैज्ञानिक पद्धति है, जो न केवल सुंदरता (Aesthetics) बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और व्यावहारिक जीवन के कौशल पर आधारित है।
यहाँ भारतीय कला-विद्या का विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. दार्शनिक आधार: सत्यं शिवं सुन्दरम्
भारतीय परंपरा में कला को केवल मनोरंजन नहीं माना गया है। इसका उद्देश्य तीन सिद्धांतों पर टिका है:
- सत्यं: कला के माध्यम से शाश्वत सत्य की खोज।
- शिवं: कला ऐसी हो जो समाज और व्यक्ति का कल्याण (मंगल) करे।
- सुन्दरम्: वह सौंदर्य जो मन को आनंद और शांति प्रदान करे।
2. 14 विद्याएँ (सैद्धांतिक ज्ञान)
विद्या का अर्थ है ‘ज्ञान’ या ‘सिद्धांत’। प्राचीन काल में एक शिक्षित व्यक्ति के लिए इन 14 क्षेत्रों का ज्ञान आवश्यक था:
- 4 वेद: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
- 6 वेदांग: शिक्षा (Phonetics), कल्प (Rituals), व्याकरण (Grammar), निरुक्त (Etymology), छंद (Metrics) और ज्योतिष (Astronomy)।
- 4 अन्य: पुराण, न्याय (Logic), मीमांसा (Philosophy) और धर्मशास्त्र (Law/Ethics)।
3. 64 कलाएँ (व्यावहारिक कौशल)
कला का अर्थ है ‘कौशल’ (Skill) या ‘प्रयोग’। वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ और ‘शुक्रनीति’ जैसे ग्रंथों में 64 कलाओं का वर्णन है। इन्हें मुख्य रूप से इन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- ललित कला (Fine Arts):
- गीतम् (Gitam): गायन कला।
- वाद्यम् (Vadyam): वाद्य यंत्र बजाना।
- नृत्यम् (Nrityam): नृत्य।
- आलेख्यम् (Alekhyam): चित्रकला।
- शिल्प और निर्माण (Craft & Engineering):
- तक्षण (Takshana): बढ़ईगिरी या लकड़ी की नक्काशी।
- धातुवाद (Dhatu-vada): धातुकर्म (Metallurgy)।
- यंत्र-मातृका (Yantra-matrika): मशीनों और यंत्रों का निर्माण।
- वास्तुकला: भवन और मंदिर निर्माण।
- दैनिक जीवन की कलाएँ (Lifestyle Skills):
- तण्डुल-कुसुम-वलि-विकारा: चावल और फूलों से रंगोली बनाना।
- माल्य-ग्रन्थन-विकल्प: माला गूँथना।
- वसन-अंग-राग: वस्त्र और आभूषणों का चयन।
- पाक-शास्त्र: भोजन बनाने की कला।
4. भारतीय कला के प्रमुख स्तंभ
क. वास्तुकला (Architecture)
भारतीय वास्तुकला विज्ञान (Vastu Shastra) पर आधारित है। इसमें मंदिर निर्माण की तीन मुख्य शैलियाँ प्रसिद्ध हैं:
- नागर शैली: उत्तर भारत (जैसे खजुराहो, कोणार्क)।
- द्रविड़ शैली: दक्षिण भारत (जैसे तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर)।
- वेसर शैली: दोनों का मिश्रण।
ख. चित्रकला (Painting)
प्राचीन काल में चित्रकला के छह अंग (षडांग) बताए गए हैं: रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्य योजना, सादृश्य और वर्णिकाभंग। अजंता की गुफाओं के भित्तिचित्र इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
ग. नाट्य और संगीत (Performing Arts)
भरत मुनि द्वारा रचित ‘नाट्यशास्त्र‘ इस विद्या का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें ‘रस सिद्धांत’ (Theory of Rasa) दिया गया है, जो बताता है कि कला कैसे दर्शकों के भीतर विशिष्ट भावनाएँ (जैसे श्रृंगार, वीर, शांत आदि) जागृत करती है।
5. आधुनिक परिप्रेक्ष्य
आज की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में भी इन्हीं प्राचीन कलाओं और विद्याओं के एकीकरण (Integration) पर जोर दिया गया है, ताकि छात्रों का केवल बौद्धिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और रचनात्मक विकास भी हो सके।
चौंसठ कलाओं
भारतीय परंपरा में ‘कला‘ का अर्थ केवल चित्रकारी या संगीत नहीं है, बल्कि वह हर वह कौशल (Skill) है जिसे सीखा जा सके और जो जीवन को सुंदर, सुसंस्कृत और उपयोगी बनाए।
वात्स्यायन के ‘कामसूत्र‘ में दी गई 64 कलाओं का विस्तृत और वर्गीकृत परिचय नीचे दिया गया है:
1. संगीत और नृत्य (Performing Arts)
ये कलाएँ आत्मा की अभिव्यक्ति और मनोरंजन का मुख्य साधन थीं:
- गीतम्: गायन की कला (शास्त्रीय और लोक)।
- वाद्यम्: विभिन्न वाद्य यंत्रों (वीणा, मृदंग, शंख) को बजाने की निपुणता।
- नृत्यम्: ताल और लय के साथ शरीर का संचालन।
- नाट्यम्: अभिनय (Acting) और कथा को मंच पर प्रस्तुत करना।
2. चित्रकला और सजावट (Visual & Decorative Arts) सौंदर्यबोध विकसित करने वाली कलाएँ:
5. आलेख्यम्: चित्रकला (Painting)।
6. विशेषक-च्छेद: माथे पर तिलक, बिंदी या पेंटिंग……………………………………………………………………………………………………………..

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