श्लोक (Original Text)
कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्ध्रामबन्ध्यां तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः। आकैलासाद्विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः॥ ११॥
२. अन्वय (Prose Order)
यत् महीम् उच्छिलीन्ध्राम् अबन्ध्यां कर्तुं प्रभवति, ते तत् श्रवणसुभगं गर्जितं श्रुत्वा, मानसोत्काः विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः राजहंसाः आकैलासात् नभसि भवतः सहायाः संपत्स्यन्ते॥ ११॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो पृथ्वी को कवक (मशरूम/सिलीन्ध्र) से युक्त और उर्वर (अबन्ध्याम्) बनाने में समर्थ है, तुम्हारे उस कानों को प्रिय लगने वाले (श्रवणसुभगम्) गर्जन को सुनकर, मानसरोवर जाने के लिए उत्सुक राजहंस, रास्ते के भोजन (पाथेय) के रूप में कमल के डंठल के कोमल टुकड़ों को साथ लेकर, कैलास पर्वत तक आकाश मार्ग में तुम्हारे साथी बनेंगे।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- उच्छिलीन्ध्राम् (Ucchilīndhrām): उद्गताः सिलीन्ध्राः यस्यां सा (बहुव्रीहि)। ऐसी भूमि जहाँ वर्षा के कारण मशरूम निकल आए हों।
- अबन्ध्याम् (Abandhyām): जो बाँझ न हो अर्थात् उपजाऊ या फलवती।
- श्रवणसुभगम् (Śravaṇasubhagam): श्रवणयोः सुभगम् (षष्ठी तत्पुरुष)। सुनने में मधुर।
- मानसोत्काः (Mānasotkāḥ): मानसाय उत्काः (चतुर्थी तत्पुरुष)। मानसरोवर के लिए लालायित।
- विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः (Visakisalayacchedapātheyavantaḥ):
- विसस्य (कमल नाल) किसलयानां छेदाः (टुकड़े)।
- वही है पाथेय (रास्ते का भोजन) जिनका, वे हंस।
- आकैलासात् (Ākailāsāt): कैलास पर्वत तक (‘आ’ मर्यादा अर्थ में)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- हंसों का प्रवास: भारतीय साहित्य में यह प्रसिद्ध मान्यता है कि वर्षा ऋतु के आने पर हंस मानसरोवर की ओर प्रस्थान करते हैं। कालिदास ने इस प्राकृतिक घटना को मेघ की यात्रा के साथ बहुत सुंदर ढंग से जोड़ा है।
- सहयात्री: यक्ष मेघ को सांत्वना दे रहा है कि उसकी यात्रा अकेली नहीं होगी, बल्कि राजहंस उसके साथ कैलास तक चलेंगे।
- ध्वनि और वर्षा: बादलों की गर्जना सुनकर हंसों को संकेत मिल जाता है कि अब उत्तर दिशा की ओर बढ़ने का समय आ गया है।
श्लोक (Original Text)
आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु।
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम्॥ १२॥
२. अन्वय (Prose Order)
पुंसां वन्द्यैः रघुपतिपदैः मेखलासु अङ्कितम् अमुं तुङ्गं प्रियसखं शैलम् आलिङ्ग्य आपृच्छस्व, काले काले भवतः संयोगम् एत्य यस्य (शैलस्य) स्नेहव्यक्तिः चिरविरहजम् उष्णं बाष्पम् मुञ्चतः (भवति)॥ १२॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
(हे मेघ!) मनुष्यों द्वारा पूजनीय भगवान राम (रघुपति) के चरणों के चिह्नों से जिसकी मध्य-भाग की चट्टानें (मेखलासु) सुशोभित हैं, उस अपने ऊँचे और प्रिय मित्र पर्वत (रामगिरि) को गले लगाकर विदा लो। समय-समय पर (प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में) तुमसे मिल कर यह पर्वत अपने प्रेम को प्रकट करता है और तुम्हारे वियोग में रोके हुए गर्म आँसुओं (भाप) को छोड़ता है।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- रघुपतिपदैः (Raghupatipadaiḥ): रघुपतेः पदैः (षष्ठी तत्पुरुष)। भगवान राम के चरण कमलों द्वारा।
- आलिङ्ग्य (Āliṅgya): आ + लिङ्ग् धातु + ल्यप् प्रत्यय। “गले लगाकर”।
- आपृच्छस्व (Āpṛcchasva): आ + प्रच्छ् धातु, लोट् लकार (आत्मनेपद)। “विदाई लो” या “पूछो”।
- चिरविरहजम् (Ciravirahajam): चिरकालं विरहात् जातम्। लंबे समय के विरह से उत्पन्न।
- बाष्पमुष्णम् (Bāṣpamuṣṇam): गर्म आँसू या भाप। यहाँ पर्वत से निकलने वाली गर्मी (भाप) की तुलना विरह के आँसुओं से की गई है।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- पर्वत और मेघ की मित्रता: कालिदास ने जड़ प्रकृति में भी मानवीय संबंधों का आरोप किया है। मेघ और पर्वत का मिलना दो मित्रों के मिलने जैसा है।
- आध्यात्मिक महत्व: यहाँ रामगिरि पर्वत की पवित्रता का वर्णन है क्योंकि वहाँ श्रीराम के चरण चिह्न हैं।
- अलंकार: यहाँ ‘सहोक्ति‘ और ‘रूपक‘ का सुंदर मिश्रण है, जहाँ पर्वत की गर्मी को विरह के आँसुओं के रूप में दिखाया गया है।
मार्गं तावच्छृणु कथयतस्त्वत्प्रयाणानुरूपं सन्देशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम्। खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपभुज्य॥ १३॥
२. अन्वय (Prose Order)
(हे) जलद! तावत् कथयतः (मम) त्वत्प्रयाणानुरूपं मार्गं शृणु, तदनु मे श्रोत्रपेयम् सन्देशं श्रोष्यसि। यत्र खिन्नः खिन्नः (सन्) शिखरिषु पदं न्यस्य, क्षीणः क्षीणः (सन्) स्रोतसां परिलघु पयः उपभुज्य च गन्तासि॥ १३॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे मेघ (जलद)! पहले तुम मेरी यात्रा के अनुकूल मार्ग के बारे में सुनो जिसे मैं बता रहा हूँ, उसके बाद तुम मेरे कानों को प्रिय लगने वाले (श्रोत्रपेयम्) सन्देश को सुनना। इस मार्ग में जहाँ-जहाँ तुम थक जाओ (खिन्नः खिन्नः), वहाँ पर्वतों की चोटियों पर विश्राम करना और जहाँ तुम्हारी शक्ति कम हो जाए (क्षीणः क्षीणः), वहाँ नदियों के अत्यंत हल्के और निर्मल जल का सेवन करते हुए आगे बढ़ना।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- त्वत्प्रयाणानुरूपम् (Tvat-prayāṇānurūpam): तव प्रयाणस्य अनुरूपम् (षष्ठी तत्पुरुष)। तुम्हारी यात्रा के जो अनुकूल हो।
- श्रोत्रपेयम् (Śrotrapeyam): श्रोत्राभ्यां पातुं योग्यम्। जो कानों से पीने योग्य हो अर्थात् सुनने में अत्यंत मधुर हो।
- खिन्नः खिन्नः / क्षीणः क्षीणः: यहाँ ‘वीप्सा‘ (पुनरुक्ति) अलंकार है, जो बार-बार होने वाली थकान और जल की कमी को दर्शाता है।
- गन्तासि (Gantāsi): ‘गम्’ धातु, लुट् लकार (अनद्यतन भविष्यत्), मध्यम पुरुष, एकवचन। “तुम जाओगे”।
- उपभुज्य (Upabhujya): उप + भुज् + ल्यप्। “भोग करके” या “सेवन करके”।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- मार्ग और सन्देश: यक्ष चतुर है; वह जानता है कि यदि वह पहले सन्देश सुना देगा, तो मेघ शायद मार्ग की कठिनाइयों पर ध्यान न दे। इसलिए वह पहले ‘मैप’ (मार्ग) समझाता है।
- प्राकृतिक उपचार: कालिदास यहाँ मेघ की थकान मिटाने के दो उपाय बताते हैं—पर्वतों पर विश्राम और नदियों का जल। यह प्रकृति के साथ मेघ के गहरे संबंध को दर्शाता है।
- श्रोत्रपेयम् शब्द का सौंदर्य: यह शब्द संदेश की महत्ता को बढ़ा देता है, जैसे प्यासे के लिए पानी अमृत होता है, वैसे ही विरही के लिए संदेश ‘कानों का अमृत’ है।
श्लोक (Original Text)
अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभि- र्दृष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः।
स्थानादस्मात् सरसनिचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान्॥ १४॥
२. अन्वय (Prose Order)
‘पवनः अद्रेः शृङ्गं हरति किंस्वित्?’ इति उन्मुखीभिः मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः चकितचकितं दृष्टोत्साहः (त्वं) सरसनिचुलात् अस्मात् स्थानात् उदङ्मुखः (सन्) पथि दिङ्नागानां स्थूलहस्तावलेपान् परिहरन् खं उत्पत॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
“क्या वायु पर्वत के शिखर को उड़ा ले जा रही है?”—इस प्रकार ऊपर की ओर मुँह करके (उन्मुखीभिः) आश्चर्यचकित भाव से देखती हुई भोली सिद्ध-स्त्रियों द्वारा जिसके उत्साह को देखा गया है, ऐसे तुम (मेघ), इस गीले वेतस (निचुल) के कुंजों वाले स्थान (रामगिरि) से उत्तर की ओर मुख करके आकाश में उड़ो। मार्ग में दिशाओं के हाथियों (दिङ्नागानाम्) के भारी सूँडों के प्रहार (टकराव) से बचते हुए अपनी यात्रा प्रारंभ करो।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- किंस्वित् (Kiṃsvit): वितर्क या संदेह के अर्थ में प्रयुक्त अव्यय (जैसे ‘शायद’ या ‘क्या’)।
- चकितचकितम् (Cakitacakitam): क्रिया-विशेषण। ‘चकित’ शब्द की द्विरुक्ति से अत्यधिक आश्चर्य का बोध होता है।
- उदङ्मुखः (Udaṅmukhaḥ): उत्तर की ओर मुख वाला (मेघ का विशेषण)।
- स्थूलहस्तावलेपान् (Sthūlahastāvalepān): स्थूलाः च ते हस्ताः (सूँड), तेषाम् अवलेपाः (गर्वपूर्ण प्रहार)। उन्हें टालते हुए (परिहरन्)।
- खम् (Kham): आकाश (‘ख’ शब्द की द्वितीया विभक्ति)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- साहित्यिक विवाद: कई विद्वान मानते हैं कि यहाँ ‘दिङ्नाग’ शब्द के माध्यम से कालिदास ने अपने प्रतिद्वंद्वी बौद्ध विद्वान दिङ्नाग पर कटाक्ष किया है और ‘निचुल’ शब्द से अपने मित्र कवि निचुल का संकेत दिया है।
- भोली सिद्ध-स्त्रियाँ: सिद्धाङ्गनाओं को ‘मुग्ध’ (भोली) कहा गया है क्योंकि वे काले मेघ को उड़ता देखकर उसे पर्वत का शिखर समझ बैठती हैं।
- उत्तर दिशा: यक्ष मेघ को उत्तर की ओर बढ़ने का निर्देश देता है क्योंकि अलकापुरी हिमालय के क्षेत्र में उत्तर दिशा में स्थित है।
संस्कृत श्लोक
रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्ता- द्वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनु:खण्डमाखण्डलस्य।
येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्यते ते बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णो:॥ १५ ॥
हिंदी व्याख्या
भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि— “हे मेघ! तुम्हारे सामने उस दीमक की बांबी (मिट्टी के ढेर) के अग्रभाग से इन्द्रधनुष निकल रहा है, जो रत्नों की किरणों के मिश्रण के समान दर्शनीय (सुंदर) है। उस रंग-बिरंगे इन्द्रधनुष के संपर्क से तुम्हारा सांवला शरीर वैसा ही अत्यधिक शोभायमान होगा, जैसा कि मोर के चमकते हुए पंख से गोप-वेषधारी भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) का सांवला शरीर सुशोभित होता है।”
प्रमुख बिंदु:
- उपमा: यहाँ मेघ के सांवले रंग की तुलना श्रीकृष्ण से और इन्द्रधनुष की तुलना श्रीकृष्ण के मुकुट में लगे मोर पंख से की गई है।
- प्राकृतिक दृश्य: कालिदास ने वर्षा ऋतु में मिट्टी के टीलों के पीछे से निकलते हुए इन्द्रधनुष का बहुत ही जीवंत चित्रण किया है।
- तात्पर्य: जिस प्रकार मोर पंख श्रीकृष्ण की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है, उसी प्रकार यह इन्द्रधनुष तुम्हारे काले बादलों वाले रूप को और भी तेजस्वी बना देगा।
मूल श्लोक
त्वामासारप्रशमितवनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानाम्रकूटः। न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः॥ १७॥
हिन्दी व्याख्या
भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मेघ! तुमने मूसलाधार वर्षा से आम्रकूट पर्वत के वन की अग्नि (दावानल) को शांत किया है। इसलिए जब तुम मार्ग की थकावट से चूर होकर वहाँ पहुँचोगे, तब वह आम्रकूट पर्वत तुम्हें अपने मस्तक (शिखर) पर बड़े प्रेम से धारण करेगा।
कालिदास यहाँ एक बहुत सुंदर सूक्ति (General Truth) कहते हैं— जब कोई मित्र शरण पाने के लिए पास आता है, तो पहले किए गए उपकारों को याद करके एक छोटा (साधारण) व्यक्ति भी उसे मना नहीं करता। फिर वह आम्रकूट पर्वत तो बहुत ऊँचा और महान है, वह भला तुम्हें आश्रय देने से कैसे मना कर सकता है?
विशेष:
- छन्द: मन्दाक्रान्ता।
- अलंकार: यहाँ ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार है, क्योंकि एक सामान्य बात के द्वारा विशेष बात का समर्थन किया गया है।
- सन्देश: यह श्लोक कृतज्ञता और मित्रता के महत्व को दर्शाता है कि उपकारी मित्र का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
मूल श्लोक
छन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रैः- स्त्वय्यारूढे शिखरमचलः स्निग्धवेणीसवर्णे। नूनं यास्यत्यमरमिथुनप्रेक्षणीयामवस्थां मध्ये श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः॥ १८॥
अन्वय (गद्य रूप)
स्निग्ध-वेणी-सवर्णे त्वयि शिखरम् आरूढे (सति), परिणत-फल-द्योतिभिः कानन-आम्रैः छन्न-उपान्तः अचलः, मध्ये श्यामः शेष-विस्तार-पाण्डुः भुवः स्तनः इव अमर-मिथुन-प्रेक्षणीयाम् अवस्थाम् नूनं यास्यति।
शब्दार्थ
- स्निग्धवेणीसवर्णे: चिकनी गुथी हुई चोटी (केशपाश) के समान काले रंग वाले (मेघ के विशेषण में)।
- परिणतफलद्योतिभिः: पके हुए फलों से चमकते हुए।
- काननाम्रैः: जंगली आम के वृक्षों से।
- छन्नोपान्तः: जिसके किनारे या ढलान ढके हुए हैं।
- अमरमिथुनप्रेक्षणीयाम्: देवताओं के जोड़ों (सिद्ध-दम्पतियों) द्वारा देखने योग्य।
- भुवः स्तन इव: पृथ्वी के स्तन के समान।
- शेषविस्तारपाण्डुः: बाकी के विस्तार में पीले/गौर वर्ण वाला।
हिन्दी व्याख्या
भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे मेघ! तुम्हारा रंग सुंदर गुथी हुई चोटी (वेणी) के समान काला और चिकना है। जब तुम उस आम्रकूट पर्वत के शिखर पर बैठोगे, तब वह दृश्य देखने लायक होगा। उस पर्वत के ढलान पके हुए पीले आमों के वृक्षों से घिरे हुए हैं।
जब शिखर के मध्य में तुम (काले मेघ) होगे और चारों ओर पीले आमों के वृक्ष होंगे, तब वह पर्वत ऐसा प्रतीत होगा मानो ‘पृथ्वी का स्तन‘ हो, जो बीच में काला और बाकी हिस्सों में पीला (गौर) है। यह दृश्य आकाश में विचरने वाले देवताओं के जोड़ों के लिए अत्यंत आकर्षक और दर्शनीय हो जाएगा।
मूल श्लोक
स्थित्वा तस्मिन् वनचरवधूभुक्तकुञ्जे मुहूर्तं तोयोत्सर्गद्रुततरगतिस्तत्परं वर्त्म तीर्णः। रेवां द्रक्ष्यस्युपलविषये विन्ध्यपादे विशीर्णां भक्तिच्छेदैरिव विरचितं भूतिमङ्गे गजस्य॥ १९॥
अन्वय (गद्य रूप)
वनचर-वधू-भुक्त-कुञ्जे तस्मिन् (आम्रकूटे) मुहूर्तं स्थित्वा, तोय-उत्सर्ग-द्रुततर-गतिः (त्वं) तत्परं वर्त्म तीर्णः (सन्), विन्ध्यपादे उपल-विषये विशीर्णां रेवां, गजस्य अङ्गे भक्ति-च्छेदैः विरचितं भूतिम् इव द्रक्ष्यसि।
शब्दार्थ
- वनचरवधूभुक्तकुञ्जे: वनवासियों (भीलों आदि) की स्त्रियों द्वारा विलास के लिए उपयोग किए गए निकुंजों वाले।
- तोयोत्सर्गद्रुततरगतिः: जल बरसा देने के कारण हल्की और तेज गति वाला।
- वर्त्म तीर्णः: मार्ग को पार करके।
- रेवाम्: नर्मदा नदी को।
- उपलविषये: पत्थरों वाले (ऊबड़-खाबड़) स्थान पर।
- विन्ध्यपादे: विन्ध्याचल पर्वत की तलहटी में।
- विशीर्णाम्: अनेक धाराओं में बंटी हुई।
- भक्तिच्छेदैः: चित्रकारी या तिलक की रेखाओं के समान।
- भूतिम्: भस्म या सजावट।
हिन्दी व्याख्या
भावार्थ: यक्ष मेघ से कहता है कि हे मेघ! उस आम्रकूट पर्वत पर (जिसके कुंजों में वनवासी स्त्रियां विहार करती हैं) थोड़ी देर विश्राम करने के बाद, तुम अपनी वर्षा के द्वारा जल का त्याग कर देना। जल बरसा देने से तुम हल्के हो जाओगे और तुम्हारी गति और भी तेज हो जाएगी।
इसके बाद जब तुम आगे का मार्ग पार करोगे, तब तुम्हें विन्ध्याचल पर्वत की पथरीली तलहटी में फैली हुई ‘रेवा‘ (नर्मदा) नदी दिखाई देगी। पत्थरों के कारण वह नदी छोटी-बड़ी अनेक धाराओं में बिखरी हुई होगी। वह दृश्य ऐसा लगेगा मानो किसी विशाल हाथी के शरीर पर सफेद भस्म से चित्रकारी या तिलक की रेखाएं बनाई गई हों। यहाँ पर्वत ‘हाथी’ के समान है और नर्मदा की धाराएं उसके शरीर पर बनी ‘सफेद रेखाओं’ के समान हैं।
तस्यास्तिक्तैर्वनगजमदैर्वासितं वान्तवृष्टि- र्जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्छेः। अन्तःसारं घन तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति त्वां रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय॥ २०॥
अन्वय (गद्य रूप)
वान्त-वृष्टिः (त्वम्), तस्याः तिक्तैः वन-गज-मदैः वासितं जम्बू-कुञ्ज-प्रतिहत-रयं तोयम् आदाय गच्छेः। हे घन! अन्तःसारं त्वां तुलयितुम् अनिलः न शक्ष्यति। हि सर्वः रिक्तः लघुः भवति, पूर्णता गौरवाय (भवति)।
शब्दार्थ
- वान्तवृष्टिः: वर्षा कर देने के कारण (खाली हुआ)।
- तिक्तैः: तीखी गंध वाले।
- वनगजमदैः: जंगली हाथियों के मद-जल से।
- वासितम्: सुगंधित।
- जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयम्: जामुन के निकुंजों (झाड़ियों) से टकराकर जिसकी गति धीमी पड़ गई हो।
- आदाय गच्छेः: (जल) लेकर जाना।
- अन्तःसारम्: भीतर से ठोस या शक्ति युक्त।
- अनिलः: वायु।
- रिक्तः: खाली।
- गौरवाय: भारीपन या प्रतिष्ठा के लिए।
हिन्दी व्याख्या
भावार्थ: यक्ष कहता है कि हे मेघ! वर्षा कर देने के बाद तुम थोड़े खाली हो जाओगे, इसलिए तुम उस रेवा नदी का जल पीकर आगे बढ़ना। वह जल जंगली हाथियों के मद से सुगंधित है और किनारे पर लगे जामुन के कुंजों से टकराने के कारण उसकी गति मंद है।
जब तुम उस जल को ग्रहण कर लोगे, तो तुम भीतर से ‘सक्षम’ (भारी) हो जाओगे। तब प्रचंड पवन भी तुम्हें उड़ाकर यहाँ-वहाँ नहीं ले जा सकेगी। इसके बाद कालिदास एक बहुत ही प्रसिद्ध और महान सत्य कहते हैं— “संसार में जो खाली (असार) होता है, उसे सब हल्का समझते हैं और तुच्छ मानते हैं, जबकि पूर्णता (गंभीरता और ज्ञान) ही गौरव और आदर का कारण होती है।”

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