Kālidāsa’s Meghadūtam (Purvamegha)
श्लोक (Original Text)
1-कश्चित् कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः शापेनास्तङ्गमतिमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः। यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु॥ १॥
श्लोक का हिंदी अर्थ
अपने कर्तव्य के प्रति असावधान (प्रमत्तः) रहने वाले किसी यक्ष को उसके स्वामी (कुबेर) ने शाप दिया। वह शाप एक वर्ष तक भोगा जाने वाला था और उसके प्रभाव से यक्ष की महिमा (दिव्य शक्तियाँ) नष्ट हो गई थी। अपनी प्रियतमा के विरह के कारण अत्यंत कष्टदायी उस शाप के दौरान, उस यक्ष ने रामगिरि के आश्रमों में अपना निवास स्थान बनाया। ये आश्रम घने छायादार वृक्षों से युक्त थे और यहाँ के जलाशय जनक की पुत्री (माता सीता) के स्नान करने से पवित्र जल वाले हो गए थे।
विशेष विवरण
- छन्द: यह श्लोक (और पूरा मेघदूतम्) मन्दाक्रान्ता छन्द में रचा गया है।
- मङ्गलाचरण: यह ‘वस्तुनिर्देशात्मक’ मङ्गलाचरण है, जहाँ कवि बिना किसी देवी-देवता की स्तुति किए सीधे कथावस्तु (Story) का आरम्भ करता है।
- स्थान: रामगिरि पर्वत को वर्तमान में नागपुर के पास ‘रामटेक’ माना जाता है।
श्लोक (Original Text)
तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबलाविप्रयुक्तः स कामी, नीत्वा मासान् कनकवलयभ्रंशरिक्तप्रकोष्ठः। आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं, वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श॥ २॥
तस्मिन् अद्रौ, अबलाविप्रयुक्तः, (अतः) कनकवलयभ्रंशरिक्तप्रकोष्ठः, कामी, सः, कतिचित् मासान् नीत्वा, आषाढस्य प्रथमदिवसे, आश्लिष्टसानुम्, वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं मेघं ददर्श॥
3. Hindi Meaning (हिन्दी भावार्थ)
उस पर्वत (रामगिरि) पर अपनी प्रिया (पत्नी) से बिछुड़ा हुआ वह कामी यक्ष कुछ महीने बिताने के बाद (अत्यंत दुर्बल हो गया था)। विरह के कारण वह इतना दुबला हो गया था कि उसकी कलाई से सोने का कंगन (कनक-वलय) खिसक कर गिर गया था और उसकी कलाई सूनी हो गई थी। ऐसे उस यक्ष ने आषाढ़ महीने के पहले दिन, पर्वत की चोटी से लिपटे हुए एक मेघ (बादल) को देखा, जो अपनी सूँड़ से मिट्टी खोदते हुए (वप्रक्रीड़ा) किसी हाथी के समान अत्यंत दर्शनीय लग रहा था।
तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो- रन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ। मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्तिचेतः कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे॥ ३॥
2. अन्वय (Prose Order)
राजराजस्य अनुचरः (यक्षः), अन्तर्बाष्पः (सन्), कौतुकाधानहेतोः तस्य (मेघस्य) पुरः कथमपि स्थित्वा, चिरं दध्यौ। (हि) मेघालोके सुखिनः अपि चेतः अन्यथावृत्ति भवति, कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने दूरसंस्थे (सति) किं पुनः? ॥ ३॥
3. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
कुबेर (राजराज) का वह सेवक यक्ष, आँसुओं को भीतर ही रोके हुए (अन्तर्बाष्पः), कौतूहल जगाने वाले उस मेघ के सामने किसी तरह खड़ा होकर देर तक सोचता रहा (चिरं दध्यौ)।
(यक्ष की ऐसी स्थिति होना स्वाभाविक ही है क्योंकि) मेघ को देख लेने पर जब सुखी व्यक्ति (जो अपनी प्रियतमा के साथ है) का मन भी व्याकुल (अन्यथावृत्ति) हो जाता है, तो फिर उस व्यक्ति के बारे में क्या कहना जिसकी गले मिलने की इच्छुक (कण्ठाश्लेषप्रणयिनि) प्रियतमा उससे बहुत दूर (दूरसंस्थे) स्थित हो?
4. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- राजराजस्य (Rājarājasya): राजाओं का राजा अर्थात् कुबेर (षष्ठी विभक्ति)।
- अन्तर्बाष्पः (Antarbāṣpaḥ): अन्तर् बाष्पः यस्य सः (बहुव्रीहि समास) – जिसकी आँखों में आँसू अंदर ही छिपे हों।
- मेघालोके (Meghāloke): मेघस्य आलोकः (षष्ठी तत्पुरुष) – बादल को देखने पर (सप्तमी विभक्ति)।
- अन्यथावृत्ति (Anyathāvṛtti): जिसका व्यवहार या चित्त बदल गया हो (व्याकुल मन)।
- कण्ठाश्लेषप्रणयिनि (Kaṇṭhāśleṣapraṇayini): कण्ठ + आश्लेष (गले लगना) की चाह रखने वाले (विशेषण)।
श्लोक (Original Text)
प्रत्यासन्ने नभसि दयिताजीवितालम्बनार्थी जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन् प्रवृत्तिम्। सः प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार॥ ४॥
२. अन्वय (Prose Order)
नभसि प्रत्यासन्ने (सति), दयिताजीवितालम्बनार्थी, सः, जीमूतेन स्वकुशलमयीं प्रवृत्तिम् हारयिष्यन् (सन्), प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः तस्मै कल्पितार्घाय (मेघाय), प्रीतः (सन्) प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार॥ ४॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रावण मास (नभसि) के निकट आ जाने पर, अपनी प्रियतमा के जीवन को बचाने (सहारा देने) का इच्छुक वह यक्ष, मेघ (जीमूत) के माध्यम से अपनी कुशलता का समाचार भेजने का विचार करने लगा। उसने प्रसन्न होकर कुटज (गिरिमल्लिका) के ताजे फूलों से उस मेघ को अर्घ्य (सम्मान स्वरूप जल/पुष्प) अर्पित किया और प्रेमपूर्ण वचनों के साथ उसका स्वागत (व्याजहार) किया।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- नभसि (Nabhasi): श्रावण मास (Sawan month)। इसमें ‘सति सप्तमी’ का प्रयोग हुआ है—”महीना पास आने पर”।
- जीमूतेन (Jīmūtena): मेघ के द्वारा (तृतीया विभक्ति)। ‘जीमूत’ मेघ का एक पर्यायवाची है।
- हारयिष्यन् (Hārayiṣyan): ‘हृ’ धातु + णिच् + शतृ प्रत्यय। “भेजने की इच्छा रखने वाला”।
- प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः (Pratyagraiḥ Kuṭajakusumaiḥ): ताजे कुटज के फूलों से। कुटज के फूल पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के आरंभ में खिलते हैं।
- व्याजहार (Vyājahāra): ‘वि’ और ‘आ’ उपसर्ग + ‘हृ’ धातु, लिट् लकार। “बोला” या “कहा”।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- यक्ष की मनोदशा: यक्ष को डर है कि वर्षा ऋतु के आने पर विरह की वेदना से उसकी पत्नी के प्राण संकट में न पड़ जाएँ, इसलिए वह मेघ को दूत बनाने का निश्चय करता है।
- कुटज पुष्प: यहाँ कुटज के फूलों का वर्णन कालिदास की सूक्ष्म प्रकृति-दृष्टि को दर्शाता है, क्योंकि पहाड़ी ढलानों पर उस समय यही पुष्प उपलब्ध थे।
श्लोक (Original Text)
धूमज्योतिःसलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः सन्देशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः। इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु॥ ५॥
२. अन्वय (Prose Order)
धूम-ज्योतिः-सलिल-मरुतां सन्निपातः मेघः क्व? पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः सन्देशार्थाः क्व? इति औत्सुक्यात् अपरिगणयन् गुह्यकः तं ययाचे। (हि) कामार्ताः चेतनाचेतनेषु प्रकृतिकृपणाः भवन्ति॥ ५॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
कहाँ धुआँ, प्रकाश (अग्नि), जल और वायु (धूम-ज्योतिः-सलिल-मरुताम्) का मिश्रण मात्र यह जड़ मेघ, और कहाँ समर्थ इन्द्रियों वाले चेतन प्राणियों (प्राणिभिः) द्वारा ले जाने योग्य सन्देश के गूढ़ अर्थ!
अर्थात् एक निर्जीव बादल सन्देश कैसे ले जा सकता है? लेकिन अपनी व्याकुलता और उत्सुकता (औत्सुक्यात्) के कारण इस बात का विचार न करते हुए उस यक्ष (गुह्यक) ने मेघ से प्रार्थना की। (सच ही है कि) काम (प्रेम) से पीड़ित व्यक्ति सजीव और निर्जीव (चेतनाचेतनेषु) के बीच भेद करने में स्वभाव से ही अक्षम (प्रकृतिकृपणाः) होते हैं।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- धूमज्योतिःसलिलमरुताम् (Dhūma-jyotiḥ-salila-marutām): धूमश्च ज्योतिश्च सलिलं च मरुत् च (इतरैतर द्वन्द्व समास)। बादल इन चार तत्वों का मिश्रण है।
- सन्निपातः (Sannipātaḥ): समूह या मिश्रण (Combination)।
- पटुकरणैः (Paṭukaraṇaiḥ): पटूनि करणानि (इन्द्रियाणि) येषां तैः। (समर्थ इन्द्रियों वाले)।
- ययाचे (Yayāce): ‘याच्’ धातु, लिट् लकार (आत्मनेपद), प्रथम पुरुष, एकवचन। “याचना की” या “प्रार्थना की”।
- प्रकृतिकृपणाः (Prakṛtikṛpaṇāḥ): स्वभाव से दीन या अविवेकी (Naturally weak in judgment)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- सूक्ति: इस श्लोक की अंतिम पंक्ति “कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु” एक विश्वप्रसिद्ध सूक्ति है। इसका अर्थ है कि विरह या प्रेम में पागल व्यक्ति को जड़ और चेतन का होश नहीं रहता।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: कालिदास ने यहाँ मेघ के भौतिक स्वरूप (धुआँ, जल, वायु आदि) का वर्णन किया है, जो उनके वैज्ञानिक ज्ञान को भी दर्शाता है।
- अलंकार: यहाँ ‘अर्थान्तरन्यास‘ अलंकार है। यक्ष की मूर्खतापूर्ण चेष्टा को एक सार्वभौमिक सत्य से पुष्ट किया गया है।
श्लोक (Original Text)
जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः। तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दूरबन्धुर्गतोऽहं याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा॥ ६॥
२. अन्वय (Prose Order)
(अहं) त्वां भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां वंशे जातं, मघोनः कामरूपं प्रकृतिपुरुषं जानामि। तेन विधिवशात् दूरबन्धुः अहं त्वयि अर्थित्वं गतः। (हि) अधिगुणे मोघा याच्ञा वरम्, अधमे लब्धकामा (याच्ञा) न (वरम्)॥ ६॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं जानता हूँ कि तुम्हारा जन्म पुष्कर और आवर्तक जैसे विश्व-प्रसिद्ध बादलों के कुल में हुआ है और तुम इन्द्र (मघोनः) के प्रमुख पुरुष (प्रधान मन्त्री) हो, जो अपनी इच्छानुसार रूप बदलने (कामरूपम्) में समर्थ हो।
इसी कारण से, भाग्यवश अपनी प्रियतमा से दूर हुआ मैं तुम्हारे पास याचक (अर्थित्वं) बनकर आया हूँ। (क्योंकि यह माना जाता है कि) गुणी व्यक्ति से की गई प्रार्थना यदि पूरी न भी हो, तो वह श्रेष्ठ है; किन्तु नीच व्यक्ति से की गई ऐसी प्रार्थना जो सफल हो जाए, वह भी अच्छी नहीं होती।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- मघोनः (Maghonaḥ): इन्द्र का (इन्द्रस्य)। यह ‘मघवन्’ शब्द की षष्ठी विभक्ति है।
- पुष्करावर्तकानाम् (Puṣkarāvartakānām): पुष्कर और आवर्तक नामक प्रलयंकारी मेघों के वंश में।
- विधिवशात् (Vidhivaśāt): भाग्य के वश में होने के कारण (पंचमी विभक्ति)।
- अधिगुणे (Adhiguṇe): अधिक गुणों वाले व्यक्ति में। यहाँ सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
- अर्थित्वम् (Arthitvam): याचकता या प्रार्थना (Request/Supplication)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- सूक्ति: “याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा” — यह मेघदूतम् की एक अत्यंत प्रेरणादायक सूक्ति है। इसका अर्थ है कि महान व्यक्तियों के सामने असफल होना भी तुच्छ व्यक्तियों के सामने सफल होने से बेहतर है।
- मनोविज्ञान: यहाँ यक्ष मेघ की प्रशंसा करके उसे अपना पक्षधर बना रहा है, जिसे काव्यशास्त्र में ‘चाटुकारिता’ या प्रशंसात्मक युक्ति कहा जाता है।
- कामरूपम्: मेघ अपनी इच्छा से छोटा, बड़ा या किसी भी आकार का हो सकता है, इसलिए उसे ‘कामरूप’ कहा गया है।
श्लोक (Original Text)
सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियायाः सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य। गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या॥ ७॥
२. अन्वय (Prose Order)
पयोद! त्वं सन्तप्तानां शरणम् असि, तत् धनपति-क्रोध-विश्लेषितस्य मे सन्देशं प्रियायाः हर। ते यक्षेश्वराणाम् अलका नाम वसतिः गन्तव्या, (सा च) बाह्योद्यान-स्थित-हर-शिरः-चन्द्रिका-धौत-हर्म्या (अस्ति)॥ ७॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे मेघ (पयोद)! तुम संताप से दुखी (प्यास या गर्मी से व्याकुल) लोगों के रक्षक (शरण) हो, इसलिए कुबेर (धनपति) के क्रोध के कारण अपनी पत्नी से बिछुड़े हुए मेरा सन्देश मेरी प्रिया तक ले जाओ। तुम्हें यक्षों के स्वामियों की अलका नामक नगरी में जाना है, जहाँ के महलों की अटारियाँ बाहरी उद्यान में स्थित भगवान शिव (हर) के मस्तक पर सुशोभित चन्द्रमा की चाँदनी से हमेशा धुली हुई (प्रकाशित) रहती हैं।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- पयोद (Payoda): पयः (जलम्) ददाति इति (उपपद तत्पुरुष)। मेघ का संबोधन।
- धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य (Dhanapati-krodha-viśleṣitasya): धनपतेः क्रोधः (षष्ठी तत्पुरुष) -> तेन विश्लेषितः (तृतीय तत्पुरुष)। कुबेर के क्रोध से अलग किए गए (यक्ष का विशेषण)।
- यक्षेश्वराणाम् (Yakṣeśvarāṇām): यक्षाणाम् ईश्वराः (यक्षराज कुबेर आदि)।
- बाह्योद्यान…धौतहर्म्या: यह अलका नगरी का विशेषण है। बाह्योद्याने स्थितस्य हरस्य शिरश्चन्द्रिकया धौताः हर्म्याः यस्यां सा (बहुव्रीहि समास)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- अलका नगरी: यह कुबेर की राजधानी है, जिसे कालिदास ने वैभव और सौन्दर्य की पराकाष्ठा बताया है।
- शिव और अलका: मान्यता है कि भगवान शिव अलकापुरी के बाहरी उद्यान में निवास करते हैं, इसी कारण वहाँ के महलों पर सदा चन्द्रमा का प्रकाश रहता है।
- यक्ष का तर्क: यक्ष कहता है कि चूँकि मेघ प्यासे और तप्त लोगों की रक्षा करता है, इसलिए वह विरह की अग्नि में जल रहे यक्ष की भी रक्षा (सहायता) अवश्य करेगा।
त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ताः प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसत्यः। कः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायां न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः॥ ८॥
२. अन्वय (Prose Order)
पवनपदवीम् आरूढं त्वां प्रत्ययात् आश्वसत्यः उद्गृहीतालकान्ताः पथिकवनिताः प्रेक्षिष्यन्ते। त्वयि सन्नद्धे (सति) कः विरहविधुरां जायां उपेक्षेत? यः अहमिव पराधीनवृत्तिः (अस्ति), सः अन्यः जनः न स्यात् (चेत्)॥ ८॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
आकाश मार्ग (पवनपदवी) पर आरूढ़ (छाए हुए) तुमको देखकर, अपने पति के घर लौटने के विश्वास (प्रत्ययात्) से आश्वस्त होती हुई, अपने मुख पर लटकी हुई अलकों (बालों) को ऊपर उठाती हुई पथिकों की पत्नियाँ बड़े चाव से देखेंगी।
क्योंकि तुम्हारे घुमड़ कर छा जाने पर भला कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनी विरह से दुखी पत्नी की उपेक्षा करेगा? (अर्थात् वर्षा ऋतु में सभी प्रवासी पति घर लौट आते हैं)। केवल मेरे जैसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं होगा, जो दूसरों के अधीन (पराधीनवृत्ति) होने के कारण विवश हो।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- पवनपदवीम् (Pavanapadavīm): पवनस्य पदवी (षष्ठी तत्पुरुष) – वायु का मार्ग अर्थात् आकाश।
- उद्गृहीतालकान्ताः (Udgṛhītālakāntāḥ): उद्गृहीताः अलकानाम् अन्ताः याभिः ताः (बहुव्रीहि समास) – जिन्होंने (बादल को देखने के लिए) अपनी लटों के सिरों को ऊपर उठा लिया है।
- पथिकवनिताः (Pathikavanitāḥ): पथिकानां वनिताः (षष्ठी तत्पुरुष) – परदेस गए हुए लोगों की पत्नियाँ।
- सन्नद्धे (Sannaddhe): तैयार होने पर या उमड़ने पर।
- पराधीनवृत्तिः (Parādhīnavṛttiḥ): परस्य अधीना वृत्तिः यस्य सः (बहुव्रीहि) – जिसका जीवन या आजीविका दूसरों के अधीन हो।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- मनोवैज्ञानिक पक्ष: कालिदास यहाँ यह बता रहे हैं कि मेघ का आगमन केवल वर्षा का सूचक नहीं है, बल्कि यह विरहियों के पुनर्मिलन की आशा का प्रतीक भी है।
- यक्ष की विवशता: यक्ष स्वयं को अपवाद मानता है क्योंकि वह शाप के कारण पराधीन है, अन्यथा वह भी अपनी पत्नी के पास लौट गया होता।
- छन्द: मन्दाक्रान्ता (संपूर्ण मेघदूतम् इसी छन्द में है)।
मेघदूतम् के नौवें श्लोक में कालिदास ने मेघ की यात्रा के दौरान मिलने वाले शुभ शकुनों और सुंदर दृश्यों का वर्णन किया है। यहाँ इसका पूर्ण विवरण दिया गया है:
१. श्लोक (Original Text)
मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः। गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्धमालाः सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः॥ ९॥
२. अन्वय (Prose Order)
अनुकूलः पवनः यथा त्वां मन्दं मन्दं नुदति, अयं सगन्धः चातकः ते वामः (सन्) मधुरं नदति। गर्भाधानक्षणपरिचयात् नूनम् आबद्धमालाः बलाकाः खे नयनसुभगं भवन्तं सेविष्यन्ते॥ ९॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे मेघ! अनुकूल पवन तुम्हें धीरे-धीरे (मन्दं मन्दं) आगे बढ़ा रहा है, और यह गर्वित (सगन्धः) चातक पक्षी तुम्हारे बाईं ओर (वामः) मधुर ध्वनि कर रहा है (जो कि यात्रा के लिए शुभ शकुन है)। गर्भाधान के उत्सव (वर्षा की बूंदों) से परिचित और पंक्तिबद्ध (आबद्धमालाः) हुई बलाकाएँ (बगुले) आकाश में आँखों को सुख देने वाले तुम मेघ की सेवा (साथ) करेंगी।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- मन्दं मन्दं (Mandam Mandam): क्रिया-विशेषण। यहाँ ‘वीप्सा’ (दुरुक्ति) के कारण पवन की मंद गति को दर्शाया गया है।
- अनुकूलः (Anukūlaḥ): अनुगतं कूलं यस्य सः (बहुव्रीहि)। जो लक्ष्य की ओर ले जाए।
- सगन्धः (Sagandhaḥ): गन्धेन (गर्वेण) सहितः। यहाँ ‘गन्ध’ का अर्थ ‘गर्व’ है—अपनी प्यास बुझने की आशा में गर्वित चातक।
- आबद्धमालाः (Ābaddhamālāḥ): आबद्धा माला याभिः ताः (बहुव्रीहि)। पंक्ति बनाकर उड़ने वाली बलाकाएँ।
- नयनसुभगम् (Nayanasubhagam): नयनयोः सुभगम् (षष्ठी तत्पुरुष)। आँखों को सुंदर लगने वाला (मेघ का विशेषण)।
- खे (Khe): आकाश में (‘ख’ शब्द की सप्तमी विभक्ति)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- शुभ शकुन: कालिदास ने यहाँ प्राचीन भारतीय शकुन शास्त्र का उल्लेख किया है। अनुकूल पवन का चलना और चातक का बाईं ओर बोलना यात्रा की सफलता के संकेत माने जाते हैं।
- प्रकृति चित्रण: बादलों के साथ सफेद बगुलों की पंक्ति का दृश्य वर्षा ऋतु का अत्यंत मनोहारी दृश्य होता है, जिसे यहाँ ‘सेविष्यन्ते’ (सेवा करेंगी) शब्द से अलंकृत किया गया है।
- यक्ष का आत्मविश्वास: इन शुभ शकुनों को देखकर यक्ष को विश्वास हो जाता है कि मेघ निश्चित रूप से उसका सन्देश अलकापुरी तक पहुँचाने में सफल होगा।
श्लोक (Original Text)
मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः। गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्धमालाः सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः॥ ९॥
२. अन्वय (Prose Order)
अनुकूलः पवनः यथा त्वां मन्दं मन्दं नुदति, अयं सगन्धः चातकः ते वामः (सन्) मधुरं नदति। गर्भाधानक्षणपरिचयात् नूनम् आबद्धमालाः बलाकाः खे नयनसुभगं भवन्तं सेविष्यन्ते॥ ९॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे मेघ! अनुकूल पवन तुम्हें धीरे-धीरे (मन्दं मन्दं) आगे बढ़ा रहा है, और यह गर्वित (सगन्धः) चातक पक्षी तुम्हारे बाईं ओर (वामः) मधुर ध्वनि कर रहा है (जो कि यात्रा के लिए शुभ शकुन है)। गर्भाधान के उत्सव (वर्षा की बूंदों) से परिचित और पंक्तिबद्ध (आबद्धमालाः) हुई बलाकाएँ (बगुले) आकाश में आँखों को सुख देने वाले तुम मेघ की सेवा (साथ) करेंगी।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- मन्दं मन्दं (Mandam Mandam): क्रिया-विशेषण। यहाँ ‘वीप्सा’ (दुरुक्ति) के कारण पवन की मंद गति को दर्शाया गया है।
- अनुकूलः (Anukūlaḥ): अनुगतं कूलं यस्य सः (बहुव्रीहि)। जो लक्ष्य की ओर ले जाए।
- सगन्धः (Sagandhaḥ): गन्धेन (गर्वेण) सहितः। यहाँ ‘गन्ध’ का अर्थ ‘गर्व’ है—अपनी प्यास बुझने की आशा में गर्वित चातक।
- आबद्धमालाः (Ābaddhamālāḥ): आबद्धा माला याभिः ताः (बहुव्रीहि)। पंक्ति बनाकर उड़ने वाली बलाकाएँ।
- नयनसुभगम् (Nayanasubhagam): नयनयोः सुभगम् (षष्ठी तत्पुरुष)। आँखों को सुंदर लगने वाला (मेघ का विशेषण)।
- खे (Khe): आकाश में (‘ख’ शब्द की सप्तमी विभक्ति)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- शुभ शकुन: कालिदास ने यहाँ प्राचीन भारतीय शकुन शास्त्र का उल्लेख किया है। अनुकूल पवन का चलना और चातक का बाईं ओर बोलना यात्रा की सफलता के संकेत माने जाते हैं।
- प्रकृति चित्रण: बादलों के साथ सफेद बगुलों की पंक्ति का दृश्य वर्षा ऋतु का अत्यंत मनोहारी दृश्य होता है, जिसे यहाँ ‘सेविष्यन्ते’ (सेवा करेंगी) शब्द से अलंकृत किया गया है।
- यक्ष का आत्मविश्वास: इन शुभ शकुनों को देखकर यक्ष को विश्वास हो जाता है कि मेघ निश्चित रूप से उसका सन्देश अलकापुरी तक पहुँचाने में सफल होगा।
श्लोक (Original Text)
तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नी- मव्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम्। आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्यः पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥ १०॥
२. अन्वय (Prose Order)
अविहतगतिः (त्वं) दिवसगणनातत्पराम् एकपत्नीम् अव्यापन्नां तां भ्रातृजायाम् अवश्यं द्रक्ष्यसि। हि विप्रयोगे आशाबन्धः अङ्गनानां कुसुमसदृशं सद्यः पाति प्रणयि हृदयं प्रायशः रुणद्धि॥ १०॥
३. हिन्दी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे मेघ! निर्बाध गति वाले तुम, (शाप की अवधि समाप्त होने के) दिनों को गिनने में लगी हुई, पतिव्रता और जीवित मेरी उस पत्नी (अपनी भ्रातृजाया/भाभी) को अवश्य देखोगे।
(क्योंकि यह सच है कि) विरह के समय में आशा का बंधन (आशाबन्धः) स्त्रियों के फूलों के समान कोमल और शीघ्र टूट जाने वाले प्रेमी हृदय को प्रायः गिरने (नष्ट होने) से बचाए रखता है।
४. व्याकरणिक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
- अविहतगतिः (Avihatagatiḥ): जिसकी गति को रोका न जा सके (मेघ का विशेषण)।
- दिवसगणनातत्पराम् (Divasagaṇanātatparām): दिनों की गिनती करने में मग्न (पत्नी का विशेषण)।
- भ्रातृजायाम् (Bhrātṛjāyām): भाई की पत्नी अर्थात् भाभी। यक्ष मेघ को मित्र या भाई मानकर अपनी पत्नी को उसकी ‘भाभी’ कह रहा है।
- आशाबन्धः (Āśābandhaḥ): आशा रूपी बंधन (मेटाफर)।
- कुसुमसदृशम् (Kusumasadṛśam): फूल के समान कोमल (हृदय का विशेषण)।
- विप्रयोगे (Viprayoge): विरह या अलगाव की स्थिति में (सप्तमी विभक्ति)।
- रुणद्धि (Ruṇaddhi): रोकता है या सहारा देता है (रुध् धातु, लट् लकार)।
५. विशेष तथ्य (Quick Notes)
- प्रसिद्ध सूक्ति: इस श्लोक की अंतिम दो पंक्तियाँ “आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां, सद्यः पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि” संस्कृत साहित्य की महानतम सूक्तियों में से एक हैं। यह बताती है कि कठिन समय में ‘उम्मीद’ ही जीवन का आधार होती है।
- भाभी शब्द का प्रयोग: कालिदास ने यहाँ ‘भ्रातृजाया’ शब्द का प्रयोग कर मेघ और यक्ष के बीच एक आत्मीय, पारिवारिक संबंध स्थापित किया है, जिससे दूत कार्य में मेघ की रुचि बढ़ सके।
- मनोविज्ञान: यक्ष को विश्वास है कि उसकी पत्नी केवल आशा के सहारे जीवित है, क्योंकि उसे पता है कि एक वर्ष बाद उसका पति लौट आएगा।
