ashtanga hridayam अष्टांगहृदय ,13 अध्याय दोषोपक्रमणीय(treatment of the dosas)Dosha-Upakramaniya



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अध्याय-१३

त्रयोदशोऽध्यायः

दोषोपक्रमणीय

( Treatment of the Doṣas )

अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । इतिह स्माहुरात्रेयदयो महर्षयः । अब हम दोषोपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था ।

वातोपचार ( Treatment of increased vāta )

वातवस्योपक्रमः स्नेहः स्वेदः संशोधनं मृदु । स्वाद्वम्ललवणोष्णानि भोज्यान्यभ्यङ्ग मर्दनम् ॥१ ॥ वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यं पैष्टिकगौडिकम् । स्निग्धोष्णा बस्तयो बस्तिनियमः सुखशलीता ॥२ ॥ दीपनैः पाचनैः सिद्धाः स्नेहाश्चनेकयोनयः । विशेषान्मेद्यपिशितरसत्तैलानुवासनम् ॥३ ॥

वातोपचार निम्न प्रकार से करना चाहिए- (1) स्नेहन, स्वेदन एवं मृदु संशोधन (mild purificatory therapies) द्वारा (2) मधुर (sweet), अम्ल (Sour), लवण (Salt taste) रस के प्रयोग द्वारा, (3) उष्ण भोजन, अभ्यङ्ग व मर्दन एवं परिषेक द्वारा (4) वेष्टन (Wrapping the body with cloth), त्रास, भय या डराना (Threating) द्वारा (मानस वात कामना के लिए)

(5) पिष्टी एवं गुड (Jaggery or molasses) से निर्मित मद्य प्रयोग द्वारा (6) स्निग्ध एवं उष्ण बस्तियों का नियमित प्रयोग एवं सुखाभास द्वारा (7) दीपन, (चित्रक आदि), पाचन (मुस्ता आदि) आदि द्रव्यों से सिद्ध अनेक योनि वाले स्नेह (तिल तैल, अलसी तैल, गाय का घी, भैंस का घी इत्यादि) प्रयोग द्वारा। (8) विशेषकर मेदयुक्त मांस-रस, तैल एवं अनुवासन बस्ति (स्नेहबस्ति) द्वारा उपरोक्त सभी विधियों के प्रयोग द्वारा चिकित्सक प्रकुपित वायु की चिकित्सा करके शमन कर सकता है।

श्लोक का सरल अर्थ

१. वातवस्योपक्रमः…

“वात के उपचार में”

  • स्नेह = घी, तेल आदि से शरीर को स्निग्ध करना
  • स्वेद = पसीना लाना / सेक देना
  • मृदु संशोधन = हल्का शोधन (जैसे हल्का विरेचन)
  • स्वादु, अम्ल, लवण, उष्ण भोज्य = मीठा, खट्टा, नमकीन और गरम भोजन

👉 मतलब: वात को शांत करने के लिए तेल, घी, गरम भोजन और हल्का शोधन उपयोगी है।


अभ्यङ्ग मर्दनम्…

  • अभ्यंग = तेल मालिश
  • मर्दन = शरीर दबाना / massage

👉 वात में oil massage बहुत लाभदायक माना गया है।


२. वेष्टनं त्रासनं सेको…

  • वेष्टन = शरीर को कपड़े से लपेटना
  • सेक = गरम सेक
  • मद्यं पैष्टिकगौडिकम् = पौष्टिक मद्य (औषधीय पेय)
  • स्निग्धोष्ण बस्ति = तेलयुक्त और गरम बस्ति
  • बस्तिनियमः = बस्ति का नियमित प्रयोग
  • सुखशीलता = आरामदायक जीवन

👉 वात रोग में गरमाहट, तेल, बस्ति और आराम सबसे ज़्यादा उपयोगी हैं।


३. दीपनैः पाचनैः…

  • दीपन = अग्नि बढ़ाने वाली औषधि
  • पाचन = भोजन पचाने वाली औषधि
  • सिद्ध स्नेह = औषधि से सिद्ध घृत/तेल
  • मेद्य, पिशित रस = मांस रस / पौष्टिक सूप
  • तैलानुवासनम् = तेल की अनुवासन बस्ति

👉 यहाँ बताया गया है कि वात में

  • पाचन सुधारा जाए
  • घी/तेल दिया जाए
  • पौष्टिक मांस रस या सूप दिया जाए
  • तेल बस्ति सबसे विशेष लाभ देती है।

एक लाइन में सार

वात दोष का मुख्य इलाज है — स्नेह (तेल/घी), स्वेदन (गरम सेक), अभ्यंग, गरम पौष्टिक भोजन, और बस्ति।

पित्तोपचार ( Treatment for increased Pitta ) पित्तस्य सर्पिषः पानं स्वादुशीतैर्विरेचनम् । स्वादुतिक्तकषायाणि भोजनान्यौषधानि च ॥४ ॥ सुगन्धिशीतहृद्यानां गन्धानामुपसेवनम् । कण्ठे गुणानां हाराणां मणीनामुुरसा धृतिः ॥५ ॥ कर्पूरचन्दनोशीरैनुलेपः क्षणे क्षणे । प्रदोषश्चन्द्रमाः सौधं हारि गीतं हिमोऽनिलः ॥६ ॥ अर्यन्त्रणसुखं मित्रं पुत्रः सन्दिग्धमुग्धवाक् । छन्दानुवर्तिनो दाराः प्रियाः शीलविभूषिताः ॥७ ॥ शीताम्बुधारागर्भाणि गृहाण्युद्यानदीर्घिकाः । सुतीर्थपुलस्वच्छसलिलाशयसैकते ॥८ ॥ साम्भोजजलतीरान्ते कायमाने द्रुमाकुले । सौम्या भावाः पयः सर्पिर्विरेकश्च विशेषतः ॥९ ॥

वृद्ध-पित्त की निम्न चिकित्सा करनी चाहिए- (1) घृतपान, मधुर, शीत द्रव्यों के प्रयोग से विरेचन कराकर (2) मधुर, तिक्त, कषाय रस वाले भोजन एवं औषध प्रयोग द्वारा (3) सुगन्धित, शीतल, हृदय एवं मन के लिए प्रिय गंधों के सेवन द्वारा (4) गले में पुष्पादि निर्मित हार तथा मणियों (मोती आदि) से निर्मित माला आदि के प्रयोग द्वारा (5) प्रत्येक क्षण कपूर, चन्दन, खस आदि सुगन्धित एवं शीत द्रव्यों से निर्मित अनुलेपन के प्रयोग द्वारा (6) रात्रि के प्रथम भाग (प्रदोषकाल) में चन्द्रमा, धवलगृह, सुन्दर एवं मनोहारी संगीत, शीतल वायु, निःसंकोची मित्रों, पुत्र की अव्यक्त अस्पष्ट (तोतली वाणी) मन को मुग्ध करने वाली वाणी, चित्त के अनुकूल शीलयुक्त प्रिया पत्नी, शीताम्बुधारागृह (ठंडा घर House equipped with fountains emitting cooled water), गृह उद्यान,

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