Meghaduta by Kalidasa: Summary, Introduction, and Important Notes

“Before reading this, you might want to check out my notes on the [Som Suktam Rigveda 9.73] here.”सोम सूक्त (ऋग्वेद 9.73) (som suktam)

मेघदूत एक परिचय

मेघदूत कालिदास की उन कृतियों में से एक ऐसी उत्कृष्ट कृति है, जिसके कारण कवि की कीर्ति देश विदेश में सर्वत्र व्याप्त है, कवि ने 115 पद्यों के लघु कलेवर वाले इस काव्य में अपनी उत्कृष्ट भावना का समग्र प्रशान्त महासागर समाहित कर दिया है।

कुबेर के शाप के कारण रामगिरि पर्वत पर वर्ष भर के वनवास को गुजारता हुआ कोई ‘यक्ष‘ वर्षाकाल के आरम्भ में आकाश में मंडराये हुए बादलों को देखकर वियुक्त प्रिया की याद में तड़प उठता है, तदनन्तर बादल से प्रार्थना करता है कि वह अलकापुरी में जाकर उसकी प्रिया को उसका सन्देश पहुँचा दे, तो बड़ा उपकार होगा।

मेघदूत के पूर्वमेघ में रामगिरि पर्वत से अलकापुरी तक उस मार्ग का वर्णन है, जिससे बादल को जाना है। इस मार्ग में बादल कहीं जनपदवधुओं के सरस तथा सजल नयनों का विषय बनेगा, जो कृषि फल की सफलता के लिए चिरकाल से उसकी प्रतीक्षा में है, तो कहीं आकाशचारिणी सिद्धाङ्गनाओं को अपने गर्जन से भयभीत कर उनके प्रियों को अनायास आलिङ्गन का आनन्द प्रदान करेगा, कहीं नीपकुसुमों से सुरभित श्रीपर्वत को देखेगा, तो कभी विन्ध्य की पहाड़ियों के मध्य बिखरी हुई स्वल्पप्रवाहयुक्त रेवा की धाराओं का अवलोकन करेगा।

इसके बाद मेघ विदिशा की राजधानी उज्जयिनी में महाकाल का दर्शन करेगा, यद्यपि उज्जयिनी पहुँचने का यह रास्ता कुछ टेढ़ा अवश्य है, फिर भी उसे भाया उज्जयिनी होकर जाना चाहिए, क्योंकि वैभवपूर्ण व आलीशान इस नगरी के वातावरण से यदि वह अनभिज्ञ रहा तो उसकी आँखों की कोई सार्थकता नहीं और उस नगरी से परिचित हुए बिना उसका लौकिक ज्ञान भी अधूरा ही है।

तदनन्तर वह गम्भीरा का रसास्वादन करता हुआ ब्रह्मावर्त से क्रौञ्च पर्वत की ओर बढ़ता हुआ सीधा अलकापुरी में पहुँच जायेगा, जहाँ यक्ष कन्यायें मणियों से खेला करती हैं जिस अलका में सूर्योदय के साथ, यत्र-तत्र बिखरे हुए कानों से गिरे हुए कनककमल, मन्दारहार सूत्र से टूटे हुए अत एव बिखरे हुए मुक्ताकलाप, यक्षक़ामिनियों के रात्रि के अभिसरण की सूचना देते हैं।


इसी प्रसङ्ग में यक्ष अपने ‘भवन’ का विलासमय विवरण प्रस्तुत करता है तथा विरहविदग्धा उस यक्षिणी का भी दीनतापूर्ण एवं शालीन चित्र प्रस्तुत करता है, जो कि विधाता की एक अपूर्व सृष्टि है।

इसके बाद यक्ष अपने मनोगत प्रणयसन्देश का उपदेश करता है, जिसमें कालिदास ने आपबीती घटना को अथवा अपने अनुरागपूर्ण हृदय की भावना को भर दिया है।

इस छोटी सी कहानी को कवि ने अपने उचित शब्दार्थों वन, नदी, पर्वत, जनपद आदि का सुन्दर वर्णन कर खण्डकाव्य का रूप दिया है, इस खण्ड काव्य का उपक्रम कवि ने कुबेर के शाप से किया है, जिसका विषय यक्ष अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेमपाश में आबद्ध होकर कर्तव्य विमुख हो गया, इसीलिए इसको अपने स्वामी से शापभाजन बनना पड़ा, इस शाप का स्वरूप था ‘एक वर्षपर्यन्त अपनी पत्नी से अलग रहना’ अर्थात् ‘वर्ष भर संयम पूर्वक रहना’ इस शाप का अवसान उस शेषशायी भगवान विष्णु के जागरण पर अर्थात् हरिबोधिनी एकादशी पर होता है, जिसके निकट सर्पराज शेष और गरुड़ महाराज भी अपना शाश्वत वैर भूल कर मर्यादा से रहते हैं। समस्त मेघदूत में स्थायीभाव यद्यपि विप्रलम्भ रति है, फिर भी बीच-बीच में सहृदयों को स्मृति, दैन्य, उत्कण्ठा आदि भावों की चर्वणा होती रहती है। उपक्रम व उपसंहार की दृष्टि से उक्त काव्य में विप्रलम्भ श्रृंगार की ही प्रधानता है, इसी के अन्तर्गत कहीं-कहीं कवि सम्भोग श्रृंगार सम्बन्धी कतिपय वृत्तों का भी वर्णन करता है, जो सहृदयों के हृदयों को आकृष्ट करता रहता है।

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