सोम सूक्त (ऋग्वेद 9.73) (som suktam)

सोम सूक्त (ऋग्वेद 9.73)

पाठ-2 | श्री दयाराम गुप्त

सोमसूक्त के ऋषि ‘पवित्र’ हैं। इसके देवता पवमान सोम हैं। प्रथम मन्त्र में जगती छन्द है। 2-7 वें मन्त्र में निचृज्जगती तथा 8, 9 में विराट् जगती छन्द है।

मन्त्र 1

सृक्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः। त्रीन्त्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन्।।

अनुवाद: सोम पात्र के प्रान्त भाग पर (सृक्वे) ध्वनि करते हुए (धमतः) (द्रप्सस्य) बिन्दु एक साथ मिल कर गति करने लगे (समस्वरन)। सोम-बिन्दु (नाभयः) यज्ञ की (ऋतस्य) योनि पर मिलकर गतिशील हुए (समरन्त)। प्राणों का दाता वह सोम (असुर) तीन उच्छ्रित स्थानों अथवा लोकों को (त्रीन् मूर्ध्नः) कार्य आरम्भ करने के लिए (आरभे) बनाता है (चक्रे)। सत्य की नौकाएँ शुभकर्म करने वाले को पार पहुँचा देती हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • सृक्वे: सायण—यज्ञस्य हनुस्थानीये, सृक्क्व ओष्ठप्रान्तो हनुरुच्यते। ग्रिफिथ—at the rim। योगी—(सोमपात्र के) प्रान्त भाग पर।
  • धमतः: सायण—अभिषवणफलके अभिषूयमाणस्य। ग्रिफिथ—Sprouting। योगी—देदीप्यमान एवं शब्दाय मान। धातु धमा शब्दाग्निसंयोगयोः, वोपदेव—अग्नियुते ध्वनो।
  • द्रप्सस्य: सायण—सोमस्य अंशवः। मोनियर विलियम्स—बिन्दु, धातु द्रु। यास्क—द्रप्सः संभृतः प्सानीयो भवति, दुर्गाचार्य—प्सानीयः भक्षणीयः भरणीयश्च। प्सा भक्षणैः सायण भक्षणदीप्त्योः निघ०—प्सातिगतिकर्मा। तुलनीय—अंग्रेजी शब्द drops।
  • समस्वरन्: सायण—संगच्छन्ते। ग्रिफिथ—ध्वनि की है; इस क्रिया का कर्ता सोम पीसने वाले पाषाण खण्ड हैं जिनके प्रान्त भागों से सोम बिन्दु ध्वनि करते हुए गिरते हैं। योगी—मिल कर गीत गाने लगे।
  • ऋतस्य योना: सायण—सत्यभूत यज्ञ के उत्पत्ति स्थान पर। ग्रिफिथ—यज्ञ के स्थान पर। यास्क—ऋतं सत्यं यज्ञो वा।
  • नाभयः समरन्त: सायण—सोमस्य संगच्छन्ते। सम् पूर्वक ऋ धातु से सम्म गमि… इत्यादि सूत्र से आत्मनेपद प्रयोग, ‘संतिष्ठस्त्यादियश्च’ सूत्र द्वारा ड्वल के स्थान पर अङ् आदेश होकर लुङ में प्रथम पुरुष बहुवचन का रूप बना है। ऋक्थ—नाभि शब्द से अभिप्रेत रथ चक्र, रथ और फिर रूपक द्वारा तीव्र गतिशील सोम बिन्दु सोम बिन्दु मिल कर दौड़ते हैं। योगी—नाभियाँ गतिशील हुई।
  • असुरः: सायण—बलवान्, अथवा—सब को प्रसन्न करने के कारण अथवा प्राणदाता (असुन् प्राणान् राति ददातीति असुरः)। वह सोम। ग्रिफिथ—दिव्य सोम।
  • त्रीन मूर्ध्नः: सायण—समुच्छ्रित तीन लोकों को। ग्रिफिथ—तीन उच्च स्थानों को। योगी—तीन मूर्धाओं, उच्छ्रित स्थानों को।
  • आरभे: सायण—आलम्भन के लिए, मनुष्य देव आदि के संचरण के लिए। ग्रिफिथ—पकड़ने के लिए, पकड़े जाने और प्रयोग किये जाने के लिए। योगी—आरम्भ करने के लिए, रण रामस्ये, रामस्य कार्योपक्रम।
  • सत्यस्य नावः: सायण—सत्यभूत सोम की नौकाओं के समान स्थित चार पात्र जिनमें आदित्य, आग्रयण, उक्थ्य तथा ध्रुव आहुतियाँ रखी जाती हैं। ग्रिफिथ—सत्य अथवा सत्यशील सोम की नौकाएँ। योगी—सत्य की नावें।
  • सुकृतम: सायण—अच्छे कर्म करने वाले यजमान को। ग्रिफिथ—शुद्ध आचरण शील मनुष्य को। योगी—शुभ कार्यकारी को।
  • अपीपरन: सायण—अभिमत दान द्वारा सम्मानित करती हैं। ग्रिफिथ, योगी—पार पहुँचा दिया। धातु पारकर्म समाप्ती अथवा पृ पूरणे।

मन्त्र 2

सम्यक् सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्मौवधि वेना अवीविषन्। मधोर्धारामभि नयन्तो अर्कमृतिश्रिया-मिन्द्रस्य तन्वमवीवृधन्।।

सरलार्थ: महान् ऋत्विजों ने (महिषाः) सङ्गत हो कर (सम्यञ्चः) सम्यक्तया (सम्यक्) गति की (अहेषत)। स्वर्गादि की कामना से युक्त उन जनों ने (वेनाः) स्यन्दमान नदी जल के ऊपर (सिन्धो ऊर्मावधि) सोम को प्रेरित किया (अवीविषन्)। मधुर सोम की (मधोः) धाराओं के साथ-साथ (धारामि) मन्त्रात्मक स्तुति (अर्कम्) अर्पण करते हुए उन ऋत्विजों ने इन्द्र के प्रिय शरीर को (इन्द्रस्य प्रियां तन्वम्) बलशाली बनाया (अवीवृधन्)।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • अहेषत: सायण—सोम को प्रेरित करते हैं, अर्थात् सोम का अभिषवण करते हैं, धातु ही गतौ वृद्धौ च। लुङ्लकार में च्लि के स्थान पर सिच् आगम होकर रूप निष्पन्न हुआ। योगी—गति की। ग्रिफिथ—अपने को कार्य में रत किया।
  • वेनाः: यास्क—इच्छाथक वेन धातु से निष्पन्न। सायण—स्वर्गादि फल की कामना करते हुए ऋत्विजों ने। ग्रिफिथ—मित्रों ने। योगी—कामना से युक्त उन जनों ने।
  • सिन्धोः ऊर्मावधि: सायण—स्यन्दमान जल के समूह पर, अर्थात् वसतीवरी आदि जलों पर। (सोम-याग की पूर्व सन्ध्या पर नदी से लाकर जल रात भर रखा जाता है, उस जल को वसतीवरी कहते हैं)। ग्रिफिथ—नदी की तरंग पर। योगी—सिन्धु की ऊर्मि को आधार बना कर।
  • अवीविषन: सायण—सोम को कमित करते हैं, अर्थात् वहाँ प्रेरित करते हैं। वी धातु से णिच् प्रत्यय जोड़-कर लुङ लकार में च्लि के स्थान पर चङ् आदेश हो कर ‘णौ चङ् उपधाया ह्रस्वः’ इस सूत्र से ह्रस्वादेश होकर प्रथम पुरुष बहुवचन में रूप बना है। ग्रिफिथ—गीत गाया। योगी—नृत्य किया। धातु विप् क्षैपे, हिवटन के अनुसार विप् धातु कम्पन के अर्थ में है।
  • अर्कम: गीत, स्तोत्र, सूक्त। धातु ऋच स्तुतौ, अथवा अर्च पूजायाम् दीप्तौ, स्तुतौ वा (हितने), अथवा अर्क स्तवने।
  • तन्वम: सायण—धाम। ग्रिफिथ—शरीर।
  • अवीवृधन: सायण—बढ़ाया है, वृध धातु से णिच लुङ में च्लि के स्थान पर चङ् कर के प्र० पु० बहुवचन का रूप। ग्रिफिथ—शक्ति की वृद्धि की है।

मन्त्र 3

पवित्रवन्तः परिव वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभी रक्षति व्रतम्। महः समुद्रं वरुणस्तिरो दधे धीरा इच्छेकुर्धरुणेष्वारभम्।।

सरलार्थ: पवित्र अथवा शोधन-सामर्थ्य से युक्त वे मन्त्र रूपी वाणी के चारों ओर स्थित होते हैं। इनका पुरातन पिता व्रत की अभिरक्षा करता है। वरुण अथवा सब को स्वतेज से आच्छादित करने वाला सोम महान् अन्तरिक्ष रूपी समुद्र को व्याप्त करता है। धीर जन ही सर्वाधार कार्यों के विषय में प्रारम्भ करने में समर्थ होते हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • पवित्रवन्तः: सायण—पवित्र अथवा शोधक सामर्थ्य से युक्त सोम की रश्मियाँ। यास्क—रश्मि युक्त माध्यमिक देवगण। दुर्ग—आदित्यमंडल से प्रस्रुत रश्मियाँ मध्यस्थान में मरुदादि देवगणों से संयुक्त होती है, उनके संयोग से माध्यमिक देवगण पवित्रवान होते हैं।
  • वाच परि आसते: सायण—सोम-स्थित माध्यमिक वाणी के सब ओर बैठते हैं; सोम अन्तरिक्ष-स्थानीय है, गन्धर्व राज है (तुलनीय ऐ० ब्रा० 1.27)। योगी—वाक् के सब ओर स्थित होते हैं। ग्रिफिथ—गीत के चारों ओर बैठते हैं।
  • एषां प्रत्नः पिता: सायण—रश्मियों का पुरातन पिता यह सोम। ग्रिफिथ—इनका पुरातन पिता, सोम या सम्भवतः अग्नि। दुर्ग—मरुदादि का पुराण रक्षिता वरुण, अर्थात् विद्युदाख्य मध्यम पिता।
  • व्रतम् अभिरक्षति: सायण—प्रकाशनात्मक कर्म की रक्षा करता है। ग्रिफिथ—उनके पवित्र कर्म की रक्षा करता है। दुर्ग—तदादिकारयुक्त कर्म की सर्वतः रक्षा करता है।
  • वरुण: अपने तेज द्वारा सबका आच्छादक वही सोम। ग्रिफिथ—वरुण इसे उन मरुत्भृति का पुरातन विदारथ मध्यम पिता अर्थात् रक्षक।


मन्त्र 4

सहस्रधारो विततः पवित्र आ वाचमस्यन्मधुजिह्वो असरश्चतः।

अस्य स्पशो न निमिषन्ति भूर्ण्यः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः।।

सरलार्थ:

मधुर जिह्वायुक्त, कभी न थकने वाली (असरश्चतः), सहस्रों जलधाराओं को प्रवाहित करने वाली द्युलोक के अत्युन्नत प्रदेश में विद्यमान (वे सोम-रश्मियाँ) मिल कर पृथ्वी की ओर गति करती हैं (अव समस्वरन्)। इस सोम की भ्रमण-शील (भूर्ण्यः) चार-भूत रश्मियाँ (स्पशः) कभी पलक नहीं झंपती हैं। हाथ में पाश धारण करने वाले (पाशिनः) पापियों को बांधने वाले (सेतवः) पद-पद पर विद्यमान हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • सहस्रधारे वितते: सायण, वेंकट माधव तथा ग्रिफिथ—जल की सहस्रों धारा प्रवाहित करने वाला; दिवो नाके पद का विशेषण। योगी—सहस्रों प्रकाश तथा सुख की धाराओं से युक्त स्थान पर।
  • दिवो नाके: सायण, ग्रिफिथ—द्युलोक के उन्नत स्थान में। योगी—प्रकाशमय लोक के (दिवः) सुखमय प्रदेश में (नाके)। यास्क—कम् शब्द का अर्थ सुख है, अकम् का अर्थ असुख या दुःख, तथा नः अकम् = नाकम् का अर्थ दुःख का अत्यन्त अभाव है।
  • मधुजिह्वाः: सायण सोम तेजों के अग्रभागों से मधु उत्पन्न होता है, अतः मधुजिह्व कहा है। ग्रिफिथ—मधुर जिह्वा वाले।
  • असरश्चतः: सायण—संगवर्जित, अर्थात् द्युलोक में पृथक-पृथक अवस्थित। ग्रिफिथ तथा योगी—कभी न थकने वाले।
  • अव समस्वरन्: वेंकटमाधव—मिल कर पृथ्वी की ओर गति करते हैं। सायण—नीचे स्थित पृथ्वी को वर्षा से संयुक्त करते हैं। ग्रिफिथ—मिलकर अपनी ध्वनियाँ नीचे भेजते हैं। योगी—प्रदीप्त हुए और दिव्य संगीत निमग्न हुए।
  • अस्य स्पशः: वेंकटमाधव—इस सोम की चार-भूत रश्मियाँ। सायण—इस सोम की सारभूत रश्मियाँ। योगी—दिव्यानन्द के गुप्तचर।
  • भूर्ण्यः: सायण—क्षिप्रगामी। दुर्ग—भ्रमणशील। योगी—गतिशील।
  • न निमिषन्ति: सायण—पलक नहीं भांते हैं, किन्तु सुकृतियों तथा पापियों को जानने के लिए सदा जागते रहते हैं।
  • सेतवः: वेंकट माधव—पापियों को बांधने वाले। सायण—सम्बद्ध होते हुए। ग्रिफिथ—मनुष्य को दृढ़ता से बाँधने वाले। योगी—दुष्टों को बाँधने वाले।

मन्त्र 5

पितुर्मातुराध्या ये समस्वरन्न्चा शोचन्तः सन्दहन्तो अव्रतान्।

इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसितीं भूमनो दिवस्परि।।

सरलार्थ:

द्यु लोक और पृथिवी लोक में (पितुः मातुः अधि) जिन्होंने मिलकर ध्वनि उत्पन्न की है, वे (सोम-रश्मियाँ) मन्त्र रूपी स्तुति द्वारा देदीप्यमान होती हुई, यज्ञादि कर्म से विमुख (नास्तिक जनों को) संदग्ध करती हैं। इन्द्र से द्वेष करने वाले कृष्ण वर्ण वाले राक्षसों आदि अथवा अनार्य जनों को अपनी अलौकिक शक्ति से (मायया) भूलोक तथा द्युलोक से दूर भगाती हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • पितुः मातुः अधि: सायण—ऋ० 1-164-33 आदि अनेक मन्त्रों में द्यौः को पिता तथा पृथिवी को माता कहा गया है। ग्रिफिथ तथा योगी—माता और पिता को आधार बनाकर।
  • शोचन्तः: दीप्त होते हुए।
  • अव्रतान्: वेंकटमाधव—यज्ञ न करने वालों को। सायण—कर्मरहित यजमानों को। योगी—व्रत हीनों को।
  • असिनीं त्वचम्: सायण—असिनी शब्द रात्रि के अर्थ में प्रयुक्त होता है, रात्रि के समान कृष्णवर्ण की त्वचा वालों को, अर्थात् राक्षस जन को।
  • अप धमन्ति: सायण—दूर भगाते हैं, अर्थात् नष्ट करते हैं। ग्रिफिथ—उड़ाते हुए।

मन्त्र 6

प्रत्नान्मानादध्या ये समस्वरञ्श्लोकयन्त्रासो रमसस्य मन्तवः।

अपानद्वासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः।।

सरलार्थ:

स्तुति का नियमन करने वाले तथा वेग को स्वीकार करने वाले, जो अपने पुरातन निवासभूत अन्तरिक्ष से एक साथ मिल कर प्रादुर्भूत हुए। चक्षु-रहित तथा बधिर जनों ने उनसे मुँह मोड़ लिया है। पापी लोग सत्य अथवा नियम के मार्ग को पार नहीं कर पाते।


मन्त्र 7

सहस्रधारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः।

रुद्रास एषामिषि-रासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्चः सुदृशो नुचक्षसः।।

सरलार्थ:

जब सहस्रों धारा प्रवाहित करने वाला पवित्र (छाननी) फैलाया होता है, तब क्रान्तदर्शी विद्वान् अपनी वाणी को पवित्र करते हैं। इनके गुप्तचर चमकीले, ओजयुक्त, द्रोह-रहित, सुन्दर गतिशील, सुदर्शन तथा मानवों का निरीक्षण करने वाले हैं।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • कवयः: सायण—कान्त कर्मा। यास्क तथा योगी—क्रान्तदर्शी। ग्रिफिथ—ऋषि।
  • मनीषिणः: सायण—प्राज्ञ ऋत्विज। ग्रिफिथ—विचारशील।
  • रुद्रासः: सायण—रुद्रपुत्र, मध्यम वाणी के पुत्र, मरुदगण। योगी—रुद्र-पुत्र।

मन्त्र 8

ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतुस्त्री ष पवित्रा हृद्यन्तरा दधे।

विद्वान्त्स विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान्विध्यति कर्ते अव्रतान्।।

सरलार्थ:

यज्ञ के रक्षक (ऋतस्य गोपा), अत्यन्त प्रज्ञाशाली (सुक्रतुः) उस सोम को धोखा नहीं दिया जा सकता (न दभाय)। वह सोम अपने हृदय के मध्य तीन शोधक शक्तियों को संजोये रखता है। सर्वज्ञ वह सोम सब प्राणियों की गतिविधियों को ध्यान से देखता है। वह नियमों का पालन न करने वाले अप्रिय जनों को गर्त में धकेल कर ताड़ना करता है।


मन्त्र 9

ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया।

धीराश्चित्तत्समिणक्षन्त आशातात्र कर्तमव पदात्यप्रभुः।।

सरलार्थ:

ऋत का तन्तु छाननी में वरुण की माया से जिह्वा के अग्रभाग में वितत है। उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए धीर जन उसे प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु असमर्थ जन यहाँ गर्त में ही गिरता है।

टिप्पणियाँ (Tippani)

  • ऋतस्य तन्तुः: सायण—सत्यभूत यज्ञ को सम्पन्न कराने वाला सोम। ग्रिफिथ—यज्ञ का सूत्र। योगी—ऋत अर्थात् सर्वविधि नियम का सूत्र।
  • सम्प इणक्षन्तः: सायण—व्याप्त करते हुए। योगी—प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए।

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